Latest Posts

Saturday, 29 March 2025

रमदान अल मुबारक, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ   

"वो मोमिन (मुसलमान) नहीं है, जो खुद पेट भर खाए और उसका पड़ोसी भूखा हो।ह्व
- कंजुल ईमान
✅ नई तहरीक : भिलाई 

मुस्लिम खवातीन गैर सरकारी तंजीम (एनजीओ)  अल मदद एजुकेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी की जानिब से रोजा इफ्तार का इनएकाद किया गया। सेक्टर-6, जामा मस्जिद के कम्युनिटी हॉल में मुनाकिद इफतार पार्टी में बड़ी तादाद में शामिल लोगों ने इफ्तार किया और दुआए खैर की। 


Ramdan, Eid, Iftar, nai tahreek, Bakhtawar Adab, Read Me

    सोसायटी की बानी अंजुम अली ने बताया कि तकरीब में बैतुल माल कमेटी और बीबी फातिमा जोहरा कमेटी से जुड़े लोग और उमरपोटी मदरसे के बच्चों ने भी शिकरत की। इफ्तार पार्टी की कामयाबी में सेक्रेटरी कौसर खान के साथ लीना तज़मीन, तहमीना, सैयद जमशेद अली, आरिफ खान, शमीमुद्दीन और अलीमुद्दीन कुरैशी ने खुसूसी किरदार अदा किया। 

अल मदद सोसाइटी के रोजा इफ्तार में जुटे लोग, की गईं दुआएं

रमदान अल मुबारक, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ   

"वो मोमिन (मुसलमान) नहीं है, जो खुद पेट भर खाए और उसका पड़ोसी भूखा हो।ह्व
- कंजुल ईमान
✅ नई तहरीक : भिलाई 

मुस्लिम खवातीन गैर सरकारी तंजीम (एनजीओ)  अल मदद एजुकेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी की जानिब से रोजा इफ्तार का इनएकाद किया गया। सेक्टर-6, जामा मस्जिद के कम्युनिटी हॉल में मुनाकिद इफतार पार्टी में बड़ी तादाद में शामिल लोगों ने इफ्तार किया और दुआए खैर की। 


Ramdan, Eid, Iftar, nai tahreek, Bakhtawar Adab, Read Me

    सोसायटी की बानी अंजुम अली ने बताया कि तकरीब में बैतुल माल कमेटी और बीबी फातिमा जोहरा कमेटी से जुड़े लोग और उमरपोटी मदरसे के बच्चों ने भी शिकरत की। इफ्तार पार्टी की कामयाबी में सेक्रेटरी कौसर खान के साथ लीना तज़मीन, तहमीना, सैयद जमशेद अली, आरिफ खान, शमीमुद्दीन और अलीमुद्दीन कुरैशी ने खुसूसी किरदार अदा किया। 

0 comment:

रमदान अल मुबारक, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ   

"तुम अपने लिए भलाई के अलावा कोई और दुआ ना करो क्योंकि जो तुम कहते हो उस पर फरिश्ते आमीन कहते है।"
- मुस्लिम

महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देते हुए एक खातून को दिया ई रिक्शा
ज़कात की रकम से मआशरे के बेरोजगार लड़के-लड़कियों को दिया गया ई-रिक्शा 
लगातार तीसरे साल ई-रिक्शा देकर एमएसके फाउंडेशन ने कायम की मिशाल 
मआशरे के जरूरतमंद लोगों की हर साल मदद कर रहा फाउंडेशन
 


Ramdan, Eid, Iftar, nai tahreek, Bakhtawar Adab, Read Me

✅ याह्या नियाजी : खैरागढ़

एमएसके फाउंडेशन ने नेक पहल करते हुए मआशरे के 2 बेरोजगार लड़के-लड़की को रोजगार मयस्सर करते हुये उन्हें जुमेरात, 27 मार्च को मुस्लिम रिवायत के मुताबिक शबे कद्र की मुबारक रात ई-रिक्शा दिया गया। गौरतलब है कि एमएसके फाउंडेशन मआशरे के जरूरतमंद लोगों को गुजिश्ता 3 सालों से मदद फराहम कर रहा है। फाउंडेशन का नस्बुलऐन मआशरे के जरूरतमंद और पसमांदा बेरोजगार लड़के-लड़कियों को रोजगार मुहैया कराना है ताकि वो मआशरे की मेन स्ट्रीम से जुड़कर बेहतर जिंदगी गुजार सकें। 
    एमएसके फाउंडेशन का कयाम साल 2023 में मआशरे के रिटायर्ड बैंक अहलकार और फिलहाल जामा मस्जिद के नायब सदर जफर हुसैन खान की अगुवाई में माहे रमजान में मिलने वाली जकात की रकम से शहर के बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने की गरज से जामा मस्जिद के सेक्रेटरी व सीरियर एडवोकेट सैय्यद अल्ताफ अली, सोशल वर्कर सलीम सोलंकी, साबिक वार्ड मेंबर नुमांइदे व सोशल वर्कर अयूब सोलंकी और मोहम्मद कलीम अशरफी ने की थी। 
    फाउंडेशन ने अपने कयाम के पहले साल में एक बेरोजगार को जकात की रकम से ई रिक्शा मुहैया कराया जिसका बेहतर नतीजा सामने आया। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए फाउंडेशन ने जकात की कुल रकम से दो मुस्लिम जरूरतमंद लड़के लड़की को रोजगार मुहैया कराने की गरज से उन्हें ई-रिक्शा देकर उनकी मदद की। खास बात ये है कि इस नेक काम में शहर के होशमंद लोगों ने बढ़चढ़कर तआवुन किया। 
    फाउंडेशन के फाउंडर मेंबर जफर हुसैन खान, सैय्यद अल्ताफ अली और अय्यूब सोलंकी ने बताया कि मुस्तकबिल में भी फाउंडेशन शहर के जरूरतमंद बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने के साथ ही मआशरे की फलाह और बहबूद के लिए काम करेगा। 
    इस दौरान जामा मस्जिद के सदर अरशद हुसैन डब्बू, नायब सदर जफर हुसैन खान, कदीर कुरैशी, सलीम सोलंकी, सुलेमान खान, हाजी रिज़वान मेमन, साबिर सरधारिया, हाजी ईमरान मेमन, रियाज़ अशरफी, इरफ़ान मेमन, उबैद खान, शारिक खान, जाफर झाड़ूदिया, इमरानुद्दीन कादरी व सादिक मोतीवाला समेत कसीर तादाद में मआशरे के लोग मौजूद थे। 

एमएसके फाउंडेशन ने की लगातार तीसरे साल नेक पहल, मआशरे के जरुरतमंद लोगों को दिया रोजगार

रमदान अल मुबारक, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ   

"तुम अपने लिए भलाई के अलावा कोई और दुआ ना करो क्योंकि जो तुम कहते हो उस पर फरिश्ते आमीन कहते है।"
- मुस्लिम

महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देते हुए एक खातून को दिया ई रिक्शा
ज़कात की रकम से मआशरे के बेरोजगार लड़के-लड़कियों को दिया गया ई-रिक्शा 
लगातार तीसरे साल ई-रिक्शा देकर एमएसके फाउंडेशन ने कायम की मिशाल 
मआशरे के जरूरतमंद लोगों की हर साल मदद कर रहा फाउंडेशन
 


Ramdan, Eid, Iftar, nai tahreek, Bakhtawar Adab, Read Me

✅ याह्या नियाजी : खैरागढ़

एमएसके फाउंडेशन ने नेक पहल करते हुए मआशरे के 2 बेरोजगार लड़के-लड़की को रोजगार मयस्सर करते हुये उन्हें जुमेरात, 27 मार्च को मुस्लिम रिवायत के मुताबिक शबे कद्र की मुबारक रात ई-रिक्शा दिया गया। गौरतलब है कि एमएसके फाउंडेशन मआशरे के जरूरतमंद लोगों को गुजिश्ता 3 सालों से मदद फराहम कर रहा है। फाउंडेशन का नस्बुलऐन मआशरे के जरूरतमंद और पसमांदा बेरोजगार लड़के-लड़कियों को रोजगार मुहैया कराना है ताकि वो मआशरे की मेन स्ट्रीम से जुड़कर बेहतर जिंदगी गुजार सकें। 
    एमएसके फाउंडेशन का कयाम साल 2023 में मआशरे के रिटायर्ड बैंक अहलकार और फिलहाल जामा मस्जिद के नायब सदर जफर हुसैन खान की अगुवाई में माहे रमजान में मिलने वाली जकात की रकम से शहर के बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने की गरज से जामा मस्जिद के सेक्रेटरी व सीरियर एडवोकेट सैय्यद अल्ताफ अली, सोशल वर्कर सलीम सोलंकी, साबिक वार्ड मेंबर नुमांइदे व सोशल वर्कर अयूब सोलंकी और मोहम्मद कलीम अशरफी ने की थी। 
    फाउंडेशन ने अपने कयाम के पहले साल में एक बेरोजगार को जकात की रकम से ई रिक्शा मुहैया कराया जिसका बेहतर नतीजा सामने आया। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए फाउंडेशन ने जकात की कुल रकम से दो मुस्लिम जरूरतमंद लड़के लड़की को रोजगार मुहैया कराने की गरज से उन्हें ई-रिक्शा देकर उनकी मदद की। खास बात ये है कि इस नेक काम में शहर के होशमंद लोगों ने बढ़चढ़कर तआवुन किया। 
    फाउंडेशन के फाउंडर मेंबर जफर हुसैन खान, सैय्यद अल्ताफ अली और अय्यूब सोलंकी ने बताया कि मुस्तकबिल में भी फाउंडेशन शहर के जरूरतमंद बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने के साथ ही मआशरे की फलाह और बहबूद के लिए काम करेगा। 
    इस दौरान जामा मस्जिद के सदर अरशद हुसैन डब्बू, नायब सदर जफर हुसैन खान, कदीर कुरैशी, सलीम सोलंकी, सुलेमान खान, हाजी रिज़वान मेमन, साबिर सरधारिया, हाजी ईमरान मेमन, रियाज़ अशरफी, इरफ़ान मेमन, उबैद खान, शारिक खान, जाफर झाड़ूदिया, इमरानुद्दीन कादरी व सादिक मोतीवाला समेत कसीर तादाद में मआशरे के लोग मौजूद थे। 

0 comment:

Wednesday, 26 March 2025

रमदान अल मुबारक, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ   

"अल्लाह ताअला फरमाता है: मेरा बंदा फर्ज़ नमाज़ अदा करने के बाद नफिल इबादत करके मुझसे इतना नज़दीक हो जाता के मैं उससे मोहब्बत करने लग जाता हूँ।"

- सहीह बुख़ारी


माहे रमजान की विदाई के दौर में जारी है इबादतों के साथ इफ्तार पार्टी का सिलसिला

ramdan, masjid, roza, islam, musalman

✅ नई तहरीक : भिलाई

माहे रमजान की विदाई के इस दौर में शहर की तमाम मस्जिदों और घरों में खास इबादत का सिलसिला जारी है। रमजान के इस आखिरी अशरे में शहर में अमन व हिफाजत की दुआओं के साथ लोग मस्जिदों और घरों में खास इबादत एतकाफ के लिए बैठ गए हैं। दुआओं का सिलसिला जारी है, वहीं जगह-जगह इफ्तार पार्टी भी मुनाकिद की जा रही है। एतकाफ पर बैठे लोग अब आखिरी रोजे पर चांद देखने के बाद अपनी इबादत पूरी कर घर लौटेंगे।
इस सिलसिले में इस्लामिक मामलों के जानकार व खुर्सीपार निवासी सैयद असलम ने बताया कि रमज़ान के आखिरी दस दिनो में 21वी शब (रात) से चांद देखने तक मस्जिदों में एतकाफ शुरू होता है। हज़रत मुहम्मद 000 वैसे पूरे रमजान में इबादत का बहुत ही ख़ास एहतेमाम फरमाया करते थे और शबे कद्र की तलाश में एतकाफ फरमाया करते थे। शेखुल हदीस हजरत मौलाना जकरिया रहमतुल्लाह ने फजाईले रमजान मुबारक में एतकाफ के बारे में 7 हदीस नकल करते हुए लिखा है, एतकाफ का असल मकसद अल्लाह को मनाना है।
    हाजी एमएच सिद्दीकी बताते हैं-एतकाफ कहते हैं मस्जिद में नीयत कर ठहरने को। इमाम अबू हनीफा रहमतुल्लाह के नजदीक इसकी तीन किस्में हैं, एक वाजिब, जो मन्नत वगैरह मानने पर की जाती है, दूसरी सुन्नत है, जो रमजान मुबारक के आखिरी अशरा में नबी-ए-करीम 000 की आदत मुबारक थी और तीसरी नफल है।
    दारूल कजा, भिलाई के शहर काजी मुफ्ती मोहम्मद सोहेल ने एतकाफ करने वालों को इस सिलसिले में उसके नियम कानून बताए कि सबसे अच्छी जगह मक्का मुकर्रम, उसके बाद मस्जिद नबवी 000 मदीना और तीसरा बैतुल मुक़द्दस और उसके बाद अपने शहर की जामा मस्जिद और फिर मोहल्ले की मस्जिदों में बेहतर है। इमाम अबू हनीफा रहमतुल्लाह के नजदीक  एतकाफ के लिए जिस मस्जिद में पांच वक्त नमाज अदा की जाए, वो शर्त है। मोतकिफ की मिसाल उस शख्स की है, जो किसी के दर पर जा पड़े, जब तक उसकी दरख्वास्त कबूल ना हो, इसलिए जब कोई शख्स दुनिया से एक तरफ कर अल्लाह के दर पर पड़ जाता है तो करीम जात बख़्शिश के बहाने ढूंढती है और माफ कर देती है।

ramdan, masjid, roza, islam, musalman


    हाजी सिद्दीकी ने कहा कि एतकाफ का बहुत सवाब है। एतकाफ करने वाले का सोना, जागना, बैठना, खाना पीना, सब इबादत में शामिल होता है। एतकाफ का एक मकसद शबे कद्र की तलाश भी है। मोहल्ले वालों के तरफ़ से कोई एक शख्स भी एतकाफ पर बैठे तो सबकी तरफ से अदा हो जाता है। मर्दों के लिए सबसे बेहतर जगह मस्जिद है जबकि औरतों के लिए उनका घर, जहां वे नमाज़ अदा करतीं हैं। इस दौरान सभी के लिए अल्लाह से रहमत, बरकत ओर अमन की दुआ करनी चाहिए ताकि दुनिया में अमन-चैन और खुशहाली हासिल हो।

शबे कद्र आज और अलविदा जुमा कल

    माहे रमजान में खास इबादत की रात शबे कद्र 27 मार्च को है। इस रोज शहर की तमाम मस्जिदों में तरावीह की नमाज में पढ़ा गया कुरआन मुकम्मल होने पर दुआएं की जाएंगी। वहीं तरावीह पढ़ाने वाले हाफिजों, मस्जिद के इमामों और मुअज्जिनों सहित तमाम लोगों का इस्तकबाल किया जाएगा। लोग मस्जिदों में रात भर ठहर कर इबादतें करेंगे। घरों में भी लोग रात भर इबादत करेंगे। शबे कद्र को देखते हुए शहर की तमाम मस्जिदों में खास इंतजाम किए गए हैं। इसी तरह माहे रमजान का आखिरी जुमा 28 मार्च को होगा। जिसमें जुमे की नमाज में दोपहर में बड़ी तादाद में लोग मस्जिदों में जुटेंगे। इसे देखते हुए खास तैयारियां मस्जिद कमेटियों की ओर से की जा रही है। 

तमाम मस्जिदों में नमाजी बैठे हैं एतकाफ पर

शहर की तमाम मस्जिदों में लोग एतकाफ पर बैठे हैं। इनमें जामा मस्जिद सेक्टर-6 में कुल 18 इबादत गुजार दिन-रात इबादत में लगे हैं। इनमें ज्यादातर नौजवान हैं। इसी तरह मस्जिद हजरत बिलाल हुडको में 4, गौसिया मस्जिद कैंप-1 में 2, मस्जिद शेरे खुदा हाउसिंग बोर्ड में 1, मस्जिद अहले सुन्नत वल जमाअत रिसाली सेक्टर में 1 और रूआबांधा मदरसा में 1 नमाजी एतकाफ पर बैठे हैं। शहर की दीगर मस्जिदों में भी लोग एतकाफ पर बैठ कर इबादत कर रहे हैं।

अमन की दुआओं के लिए खास इबादत एतकाफ पर बैठे लोग, शबे कद्र की तैयारियां शुरू

रमदान अल मुबारक, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ   

"अल्लाह ताअला फरमाता है: मेरा बंदा फर्ज़ नमाज़ अदा करने के बाद नफिल इबादत करके मुझसे इतना नज़दीक हो जाता के मैं उससे मोहब्बत करने लग जाता हूँ।"

- सहीह बुख़ारी


माहे रमजान की विदाई के दौर में जारी है इबादतों के साथ इफ्तार पार्टी का सिलसिला

ramdan, masjid, roza, islam, musalman

✅ नई तहरीक : भिलाई

माहे रमजान की विदाई के इस दौर में शहर की तमाम मस्जिदों और घरों में खास इबादत का सिलसिला जारी है। रमजान के इस आखिरी अशरे में शहर में अमन व हिफाजत की दुआओं के साथ लोग मस्जिदों और घरों में खास इबादत एतकाफ के लिए बैठ गए हैं। दुआओं का सिलसिला जारी है, वहीं जगह-जगह इफ्तार पार्टी भी मुनाकिद की जा रही है। एतकाफ पर बैठे लोग अब आखिरी रोजे पर चांद देखने के बाद अपनी इबादत पूरी कर घर लौटेंगे।
इस सिलसिले में इस्लामिक मामलों के जानकार व खुर्सीपार निवासी सैयद असलम ने बताया कि रमज़ान के आखिरी दस दिनो में 21वी शब (रात) से चांद देखने तक मस्जिदों में एतकाफ शुरू होता है। हज़रत मुहम्मद 000 वैसे पूरे रमजान में इबादत का बहुत ही ख़ास एहतेमाम फरमाया करते थे और शबे कद्र की तलाश में एतकाफ फरमाया करते थे। शेखुल हदीस हजरत मौलाना जकरिया रहमतुल्लाह ने फजाईले रमजान मुबारक में एतकाफ के बारे में 7 हदीस नकल करते हुए लिखा है, एतकाफ का असल मकसद अल्लाह को मनाना है।
    हाजी एमएच सिद्दीकी बताते हैं-एतकाफ कहते हैं मस्जिद में नीयत कर ठहरने को। इमाम अबू हनीफा रहमतुल्लाह के नजदीक इसकी तीन किस्में हैं, एक वाजिब, जो मन्नत वगैरह मानने पर की जाती है, दूसरी सुन्नत है, जो रमजान मुबारक के आखिरी अशरा में नबी-ए-करीम 000 की आदत मुबारक थी और तीसरी नफल है।
    दारूल कजा, भिलाई के शहर काजी मुफ्ती मोहम्मद सोहेल ने एतकाफ करने वालों को इस सिलसिले में उसके नियम कानून बताए कि सबसे अच्छी जगह मक्का मुकर्रम, उसके बाद मस्जिद नबवी 000 मदीना और तीसरा बैतुल मुक़द्दस और उसके बाद अपने शहर की जामा मस्जिद और फिर मोहल्ले की मस्जिदों में बेहतर है। इमाम अबू हनीफा रहमतुल्लाह के नजदीक  एतकाफ के लिए जिस मस्जिद में पांच वक्त नमाज अदा की जाए, वो शर्त है। मोतकिफ की मिसाल उस शख्स की है, जो किसी के दर पर जा पड़े, जब तक उसकी दरख्वास्त कबूल ना हो, इसलिए जब कोई शख्स दुनिया से एक तरफ कर अल्लाह के दर पर पड़ जाता है तो करीम जात बख़्शिश के बहाने ढूंढती है और माफ कर देती है।

ramdan, masjid, roza, islam, musalman


    हाजी सिद्दीकी ने कहा कि एतकाफ का बहुत सवाब है। एतकाफ करने वाले का सोना, जागना, बैठना, खाना पीना, सब इबादत में शामिल होता है। एतकाफ का एक मकसद शबे कद्र की तलाश भी है। मोहल्ले वालों के तरफ़ से कोई एक शख्स भी एतकाफ पर बैठे तो सबकी तरफ से अदा हो जाता है। मर्दों के लिए सबसे बेहतर जगह मस्जिद है जबकि औरतों के लिए उनका घर, जहां वे नमाज़ अदा करतीं हैं। इस दौरान सभी के लिए अल्लाह से रहमत, बरकत ओर अमन की दुआ करनी चाहिए ताकि दुनिया में अमन-चैन और खुशहाली हासिल हो।

शबे कद्र आज और अलविदा जुमा कल

    माहे रमजान में खास इबादत की रात शबे कद्र 27 मार्च को है। इस रोज शहर की तमाम मस्जिदों में तरावीह की नमाज में पढ़ा गया कुरआन मुकम्मल होने पर दुआएं की जाएंगी। वहीं तरावीह पढ़ाने वाले हाफिजों, मस्जिद के इमामों और मुअज्जिनों सहित तमाम लोगों का इस्तकबाल किया जाएगा। लोग मस्जिदों में रात भर ठहर कर इबादतें करेंगे। घरों में भी लोग रात भर इबादत करेंगे। शबे कद्र को देखते हुए शहर की तमाम मस्जिदों में खास इंतजाम किए गए हैं। इसी तरह माहे रमजान का आखिरी जुमा 28 मार्च को होगा। जिसमें जुमे की नमाज में दोपहर में बड़ी तादाद में लोग मस्जिदों में जुटेंगे। इसे देखते हुए खास तैयारियां मस्जिद कमेटियों की ओर से की जा रही है। 

तमाम मस्जिदों में नमाजी बैठे हैं एतकाफ पर

शहर की तमाम मस्जिदों में लोग एतकाफ पर बैठे हैं। इनमें जामा मस्जिद सेक्टर-6 में कुल 18 इबादत गुजार दिन-रात इबादत में लगे हैं। इनमें ज्यादातर नौजवान हैं। इसी तरह मस्जिद हजरत बिलाल हुडको में 4, गौसिया मस्जिद कैंप-1 में 2, मस्जिद शेरे खुदा हाउसिंग बोर्ड में 1, मस्जिद अहले सुन्नत वल जमाअत रिसाली सेक्टर में 1 और रूआबांधा मदरसा में 1 नमाजी एतकाफ पर बैठे हैं। शहर की दीगर मस्जिदों में भी लोग एतकाफ पर बैठ कर इबादत कर रहे हैं।

0 comment:

Wednesday, 12 March 2025

रमदान अल मुबारक, 1446 हिजरी 


फरमाने रसूल ﷺ

"अल्लाह ताअला फरमाता है: मेरा बंदा फर्ज़ नमाज़ अदा करने के बाद नफिल इबादत करके मुझसे इतना नज़दीक हो जाता के मैं उससे मोहब्बत करने लग जाता हूँ।"
- सहीह बुख़ारी

रमजान का दूसरा अशरा शुरू, जगह हो रहा इफ्तार का इंतजाम

nai tahreek, bakhtawar adab, read me, iftar party, ramdan

✅ नई तहरीक : भिलाई

रमजान के मुबारक महीने में इबादत का सिलसिला जारी है। मआशरे के लोग रोजा रख रहे हैं और वक्त की पाबंदी के साथ नमाज भी अदा कर रहे हैं। रोजा रख कर जहां लोग भूख और प्यास की शिद्दत को महसूस कर अपने रब को याद कर रहे हैं वहीं जगह-जगह तरावीह भी अदा की जा रही है। लोग घरों से लेकर मस्जिदों तक में तरावीह की नमाज अदा कर रहे हैं। शहर की तमाम मस्जिदों में शाम के वक्त इफ्तार के खास इंतजाम किए जा रहे हैं इसके अलावा इज्तिमाई व निजी तौर पर भी लोग इफ्तार का इंतेजाम कर रहे हैं। 

तरावीह में सुनाई जाती है मुकम्मल कुरआन : डॉ. सैयद इस्माइल

nai tahreek, bakhtawar adab, read me, iftar party, ramdan

    माहे रमजान के दौरान पढ़ी जाने वाली खास नमाज तरावीह के मुताल्लिक इस्लामिक मामलों के जानकार और भिलाई स्टील प्लांट से रिटायर्ड खुर्सीपार के रहवासी डॉ. सैयद इस्माइल ने बताया कि तरावीह की नमाज सुन्नत है। सुन्नत उसे कहा जाता है, जो पैगंबर हजरत मोहम्मद 000 को पसंद थीं। तरावीह भी सुन्नत-ए-मोअक्कदा है, यानी ये नमाज फर्ज नहीं है लेकिन पैगंबर हज़रत मोहम्मद 000 तरावीह पढ़ा करते थे, इसलिए उम्मत भी इसे खुसू व खुजू के साथ अदा करती है। इस खास नमाज में 26 रमजान के पहले मुकम्मल कुरआन सुनाया जाता है। तरावीह के बाद आवाम को अल्लाह के पैगाम, जो हजरत मोहम्मद 0  के जरिए दिए गए, समझाया जाता है। 

सुधरती है जिस्मानी और दिमागी सेहत : मुफ्ती शाहिद

    मदरसा ताजुल उलूम, रुआबांधा के प्रिंसिपल मुफ़्ती मुहम्मद शाहिद अली मिस्बाही बताते हैं कि रोज़ा न सिर्फ रूहानी बल्कि जिस्मानी और दिमागी सेहत के लिए भी फायदेमंद है। मुफ्ती शाहिद बताते हैं, रोज़ा जिस्म की कैलोरी जलाने और वसा कम करने में मदद करता है। यह वजन घटाने और मोटापे को मैनेज करने का एक असरदार तरीका है। रोज़ा इंसुलिन हस्सासियत में सुधार करता है और ब्लड शुगर के लेवल को कंट्रोल करने में मदद करता है। यह शूगर के खतरे को कम करता है। रोज़ा कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स के लेवल को कम करके कल्बी सेहत में सुधार कर सकता है। यह कल्ब के मर्ज के खतरे को कम करता है।
    मुफ्ती शाहिद बताते हैं कि रोज़ा हाजमा को आराम देता है और इसे बेहतर ढंग से काम करने में मदद करता है। यह कब्ज और हाजमा की दीगर परेशानियों से छुटकारा दिलाता है। जिस्म को डिटॉक्सिफाई करता है। मुफ्ती शाहिद कहते हैं रोज़ा रखने के और भी बहुत से जिस्मानी और दीमागी फायदे हैं।

मस्जिदों और घरों में हो रही है तरावीह 

    मर्कज़ी मस्जिद, पावर हाउस, कैंप 2 में इमाम व हाफ़िज़ कासिम बस्तवी कुरान मजीद सुना रहे हैं। यहां ईशा की नमाज रात 8.15 बजे और तरावीह 8.30 बजे हो रही है। मस्जिद आयशा हाउसिंग बोर्ड में मौलाना इनामुल हक तरावीह पढ़ा रहे हैं। मरकज सुपेला मस्जिद नूर में मुफ्ती सोहेल साहब तरावीह पढा रहे हैं। यहां  ईशा 8.15 बजे तरावीह 8.30 बजे हो रही है। फरीद नगर मदनी मस्जिद में ईशा की नमाज 8.15 और तरावीह 8.30 मौलाना दिलशाद और हाफ़िज़ शाह आलम पढ़ा रहे हैं। अय्यप्पा नगर मस्जिद अबू बकर में हाफ़िज़ इश्तियाक पढ़ा रहे हैं। यहां ईशा 8.00 बजे और तरावीह 8.15 हो रही है। जामा मस्जिद जामुल में हाफ़िज़ अहमद पढ़ा रहे हैं। यहां ईशा 8.00 बजे और तरावीह 8.15 बजे हो रही है। एकता नगर, भिलाई-3 में ईशा 8.30 बजे और तरावीह 8.45 हाफ़िज़ मुकर्रम और हाफ़िज़ मोइनुद्दीन पढ़ा रहे हैं। पेट्रोल पंप भिलाई-3 में ईशा 8.15 बजे और तरावीह 8.30 बजे हो रही है। हाफ़िज़ शाहनवाज और हाफ़िज़ अताउल्लाह नमाज़ अदा करा रहे हैं। मस्जिद अक्सा, चरोदा में ईशा 8.45 बजे और नमाज़ तरावीह 9 बजे हो रही है। नमाज़ हाफ़िज़ सुफियान साहब पढा रहे हैं। सेक्टर-1 में मौलाना जुनैद तरावीह पढ़ा रहे हैं। यहां नमाज़ 8.15 बजे हो रही है।  इसी तरह हाफ़िज़ रेहान सुपेला में नमाज पढ़ा रहे हैं।


माहे रमजान में जारी है इबादत का सिलसिला, नमाज में बड़ी तादाद में जुट रहे इबादत गुजार

रमदान अल मुबारक, 1446 हिजरी 


फरमाने रसूल ﷺ

"अल्लाह ताअला फरमाता है: मेरा बंदा फर्ज़ नमाज़ अदा करने के बाद नफिल इबादत करके मुझसे इतना नज़दीक हो जाता के मैं उससे मोहब्बत करने लग जाता हूँ।"
- सहीह बुख़ारी

रमजान का दूसरा अशरा शुरू, जगह हो रहा इफ्तार का इंतजाम

nai tahreek, bakhtawar adab, read me, iftar party, ramdan

✅ नई तहरीक : भिलाई

रमजान के मुबारक महीने में इबादत का सिलसिला जारी है। मआशरे के लोग रोजा रख रहे हैं और वक्त की पाबंदी के साथ नमाज भी अदा कर रहे हैं। रोजा रख कर जहां लोग भूख और प्यास की शिद्दत को महसूस कर अपने रब को याद कर रहे हैं वहीं जगह-जगह तरावीह भी अदा की जा रही है। लोग घरों से लेकर मस्जिदों तक में तरावीह की नमाज अदा कर रहे हैं। शहर की तमाम मस्जिदों में शाम के वक्त इफ्तार के खास इंतजाम किए जा रहे हैं इसके अलावा इज्तिमाई व निजी तौर पर भी लोग इफ्तार का इंतेजाम कर रहे हैं। 

तरावीह में सुनाई जाती है मुकम्मल कुरआन : डॉ. सैयद इस्माइल

nai tahreek, bakhtawar adab, read me, iftar party, ramdan

    माहे रमजान के दौरान पढ़ी जाने वाली खास नमाज तरावीह के मुताल्लिक इस्लामिक मामलों के जानकार और भिलाई स्टील प्लांट से रिटायर्ड खुर्सीपार के रहवासी डॉ. सैयद इस्माइल ने बताया कि तरावीह की नमाज सुन्नत है। सुन्नत उसे कहा जाता है, जो पैगंबर हजरत मोहम्मद 000 को पसंद थीं। तरावीह भी सुन्नत-ए-मोअक्कदा है, यानी ये नमाज फर्ज नहीं है लेकिन पैगंबर हज़रत मोहम्मद 000 तरावीह पढ़ा करते थे, इसलिए उम्मत भी इसे खुसू व खुजू के साथ अदा करती है। इस खास नमाज में 26 रमजान के पहले मुकम्मल कुरआन सुनाया जाता है। तरावीह के बाद आवाम को अल्लाह के पैगाम, जो हजरत मोहम्मद 0  के जरिए दिए गए, समझाया जाता है। 

सुधरती है जिस्मानी और दिमागी सेहत : मुफ्ती शाहिद

    मदरसा ताजुल उलूम, रुआबांधा के प्रिंसिपल मुफ़्ती मुहम्मद शाहिद अली मिस्बाही बताते हैं कि रोज़ा न सिर्फ रूहानी बल्कि जिस्मानी और दिमागी सेहत के लिए भी फायदेमंद है। मुफ्ती शाहिद बताते हैं, रोज़ा जिस्म की कैलोरी जलाने और वसा कम करने में मदद करता है। यह वजन घटाने और मोटापे को मैनेज करने का एक असरदार तरीका है। रोज़ा इंसुलिन हस्सासियत में सुधार करता है और ब्लड शुगर के लेवल को कंट्रोल करने में मदद करता है। यह शूगर के खतरे को कम करता है। रोज़ा कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स के लेवल को कम करके कल्बी सेहत में सुधार कर सकता है। यह कल्ब के मर्ज के खतरे को कम करता है।
    मुफ्ती शाहिद बताते हैं कि रोज़ा हाजमा को आराम देता है और इसे बेहतर ढंग से काम करने में मदद करता है। यह कब्ज और हाजमा की दीगर परेशानियों से छुटकारा दिलाता है। जिस्म को डिटॉक्सिफाई करता है। मुफ्ती शाहिद कहते हैं रोज़ा रखने के और भी बहुत से जिस्मानी और दीमागी फायदे हैं।

मस्जिदों और घरों में हो रही है तरावीह 

    मर्कज़ी मस्जिद, पावर हाउस, कैंप 2 में इमाम व हाफ़िज़ कासिम बस्तवी कुरान मजीद सुना रहे हैं। यहां ईशा की नमाज रात 8.15 बजे और तरावीह 8.30 बजे हो रही है। मस्जिद आयशा हाउसिंग बोर्ड में मौलाना इनामुल हक तरावीह पढ़ा रहे हैं। मरकज सुपेला मस्जिद नूर में मुफ्ती सोहेल साहब तरावीह पढा रहे हैं। यहां  ईशा 8.15 बजे तरावीह 8.30 बजे हो रही है। फरीद नगर मदनी मस्जिद में ईशा की नमाज 8.15 और तरावीह 8.30 मौलाना दिलशाद और हाफ़िज़ शाह आलम पढ़ा रहे हैं। अय्यप्पा नगर मस्जिद अबू बकर में हाफ़िज़ इश्तियाक पढ़ा रहे हैं। यहां ईशा 8.00 बजे और तरावीह 8.15 हो रही है। जामा मस्जिद जामुल में हाफ़िज़ अहमद पढ़ा रहे हैं। यहां ईशा 8.00 बजे और तरावीह 8.15 बजे हो रही है। एकता नगर, भिलाई-3 में ईशा 8.30 बजे और तरावीह 8.45 हाफ़िज़ मुकर्रम और हाफ़िज़ मोइनुद्दीन पढ़ा रहे हैं। पेट्रोल पंप भिलाई-3 में ईशा 8.15 बजे और तरावीह 8.30 बजे हो रही है। हाफ़िज़ शाहनवाज और हाफ़िज़ अताउल्लाह नमाज़ अदा करा रहे हैं। मस्जिद अक्सा, चरोदा में ईशा 8.45 बजे और नमाज़ तरावीह 9 बजे हो रही है। नमाज़ हाफ़िज़ सुफियान साहब पढा रहे हैं। सेक्टर-1 में मौलाना जुनैद तरावीह पढ़ा रहे हैं। यहां नमाज़ 8.15 बजे हो रही है।  इसी तरह हाफ़िज़ रेहान सुपेला में नमाज पढ़ा रहे हैं।


0 comment:

Saturday, 8 March 2025

saudi arab, ramdan, iftar, masjid nabvi, masjid haram
 रमदान अल मुबारक, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ  

"अल्लाह ताअला फरमाता है: मेरा बंदा फर्ज़ नमाज़ अदा करने के बाद नफिल इबादत करके मुझसे इतना नज़दीक हो जाता के मैं उससे मोहब्बत करने लग जाता हूँ।"
- सहीह बुख़ारी

saudi arab, ramdan, iftar, masjid nabvi, masjid haram
    
    सऊदी अरब में लाखों जायरीन ने हरमैन शरीफ़ैन में रमज़ान के पहले जुमा की नमाज़ ख़ुशू-ओ-खुजु से अदा की और बेशतर वक़्त दुआओं में गुज़ारा।
    सऊदी न्यूज एजेंसी के मुताबिक़ इदारा उमूर हरमैन की जानिब से मस्जिद उल हराम और मस्जिद नबवी ﷺ में नमाज़-ए-जुमा की अदायगी के लिए मिसाली इंतिज़ामात किए गए थे। इंतिज़ामीया ने मस्जिद उल हराम के अंदर और बैरूनी सेहनों में जुमे को सुबह से ही इंतिज़ामात मुकम्मल कर लिए थे ताकि लोगों को किसी किस्म की दुशवारी का सामना ना करना पड़े और वो आराम व सुकून से नमाज़ अदा कर सकें।
    हरमैन इंतिज़ामीया ने मस्जिद उल हराम और मस्जिद नबवी ﷺ में आने वालों की सहूलत के लिए 11 हज़ार से ज़ाइद कारकुनों को तयनात किया था जो ज़ाइरीन की रहनुमाई करते हुए उन्हें नमाज़ के लिए मख़सूस मुक़ामात की निशानदेही करते रहे। मस्जिद नबवी ﷺ में भी इंतिज़ामीया ने ज़ाइरीन की बड़ी तादाद के पेश-ए-नज़र ख़ुसूसी इंतिज़ामात किए थे।
    मस्जिद नबवी ﷺ के बैरूनी सेहनों, बरामदों और छत पर भी नमाज़ अदा करने के लिए ख़ुसूसी इंतिज़ामात किए गए थे। राहदारियों को ख़ाली रखने के लिए अहकारों को जगह-जगह तयनात किया गया था जिनकी ज़िम्मेदारी थी कि वो गुज़रगाहों पर लोगों को बैठने ना दें।



मस्जिद उल हराम और मस्जिद नबवी ﷺ में रमज़ान का पहला जुमा, लाखों अफ़राद ने अदा की नमाज़

saudi arab, ramdan, iftar, masjid nabvi, masjid haram
 रमदान अल मुबारक, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ  

"अल्लाह ताअला फरमाता है: मेरा बंदा फर्ज़ नमाज़ अदा करने के बाद नफिल इबादत करके मुझसे इतना नज़दीक हो जाता के मैं उससे मोहब्बत करने लग जाता हूँ।"
- सहीह बुख़ारी

saudi arab, ramdan, iftar, masjid nabvi, masjid haram
    
    सऊदी अरब में लाखों जायरीन ने हरमैन शरीफ़ैन में रमज़ान के पहले जुमा की नमाज़ ख़ुशू-ओ-खुजु से अदा की और बेशतर वक़्त दुआओं में गुज़ारा।
    सऊदी न्यूज एजेंसी के मुताबिक़ इदारा उमूर हरमैन की जानिब से मस्जिद उल हराम और मस्जिद नबवी ﷺ में नमाज़-ए-जुमा की अदायगी के लिए मिसाली इंतिज़ामात किए गए थे। इंतिज़ामीया ने मस्जिद उल हराम के अंदर और बैरूनी सेहनों में जुमे को सुबह से ही इंतिज़ामात मुकम्मल कर लिए थे ताकि लोगों को किसी किस्म की दुशवारी का सामना ना करना पड़े और वो आराम व सुकून से नमाज़ अदा कर सकें।
    हरमैन इंतिज़ामीया ने मस्जिद उल हराम और मस्जिद नबवी ﷺ में आने वालों की सहूलत के लिए 11 हज़ार से ज़ाइद कारकुनों को तयनात किया था जो ज़ाइरीन की रहनुमाई करते हुए उन्हें नमाज़ के लिए मख़सूस मुक़ामात की निशानदेही करते रहे। मस्जिद नबवी ﷺ में भी इंतिज़ामीया ने ज़ाइरीन की बड़ी तादाद के पेश-ए-नज़र ख़ुसूसी इंतिज़ामात किए थे।
    मस्जिद नबवी ﷺ के बैरूनी सेहनों, बरामदों और छत पर भी नमाज़ अदा करने के लिए ख़ुसूसी इंतिज़ामात किए गए थे। राहदारियों को ख़ाली रखने के लिए अहकारों को जगह-जगह तयनात किया गया था जिनकी ज़िम्मेदारी थी कि वो गुज़रगाहों पर लोगों को बैठने ना दें।



0 comment:

Wednesday, 5 March 2025

व्यंग्य

satire, story, sayeed khan, bakhtawar adab, nai tahreek, read me

✒ सईद खान

प्लग में जब कार्बन आ जाए... (व्यंग्य)

    सत्यानाश हो इस मुई स्कूटर का। कमबख्त आज फिर नखरे बताने पर आमादा है। 
    मैंने जेब से रुमाल निकालकर माथे पर छलक आए पसीने को पोंछा और गुस्से में स्कूटर को दो-चार किक और दे मारा। लेकिन कमबख्त ने तो जैसे स्टार्ट न होने की कसम खा रखी थी। बस-थोड़ा सा भुरभुराती और बंद हो जाती। कमबख्त के नखरे देखकर जी चाहा कि उसे आग लगा दूं। अगर यह मेरी खरीदी हुई होती भैनजी तो कसम ले लो, आज मैं इसे आग के हवाले कर ही दिया होता। लेकिन यह क्योंकि मुझे दहेज में मिली थी, इसलिए मैं चाहकर भी ऐसा नहीं कर सका। पसीने से लथपथ मेरी हिम्मत जवाब दे चुकी थी। यहां तक कि पैरों में किक मारने तक की ताकत भी नहीं बची थी। मैंने उसे स्टैंड में खड़ी किया और उसकी सीट पर बैठकर लंबी-लंबी सांसे लेने लगा। सच् तो यह है कि उस वक्त मैं उस घड़ी को कोस रहा था, जब यह नामुराद स्कूटर मेरे गले पड़ी थी।

  Read More  
    अल्लाह सलामत रखे मेरे स्वसुर को, जिन्होंने दहेज में स्कूटर देकर मेरी शान में झूठे चांद... सारी, चार चांद जड़ दिए थे। मुझे याद है, जिस दिन पहली बार मैं इसे लेकर घर से निकला था, मेरे चेहरे पर चौदहवीं के चांद जैसी चमक थी। मेरी छाती फूलकर दो इंच और चोड़ी हो गई थी। पूरा मोहल्ला मुझे और मेरी स्कूटर को फटी-फटी निगाहों से घूर रहा था। मोहल्ले की औरतें अपने-अपने दरवाजों पर खड़ी कानाफूसियां कर रही थीं। कुछ विश्वस्त चुगलखोरों के माध्यम से बाद में मुझे ज्ञात हुआ कि जमीला बाजी कमर आपा से कह रही थी-‘देख कम्मो, येई वाली है।’ जवाब में कमर आपा ‘हूं’ कहकर मुंह बिसूर दी थी। रूबी तो मेरी स्कूटर की आवाज सुनकर आटा गूंथना छोड़कर स्कूटर देखने के लिए दरवाजे पर आ खड़ी हुई थी। लेकिन जैसे ही उसकी नजरें मेरी नजरों से टकराई थी, वह आसमान की ओर देखने लगी थी, गोया मुझे यह जताना चाह रही थी कि यदि मेरी शादी उससे हुई होती तो उसके अब्बा इससे अच्छी स्कूटर मुझे दिए होते।

  Read More  
    और वो मुराद साइकिल वाले की दुकान में बैठे साबिर, सलीम और बहादुर..., उनके सीने पर तो जैसे सांप ही लोट गया था। मेरे जो दोस्त पहले मुझमें कोई दिलचस्पी नहीं लेते थे, अब हाथ उठा-उठा कर मुझे विश कर रहे थे। मुझे चाय-पान आफर कर रहे थे। और हां, वो कलीम मास्टर। उन्हें भला मैं कैसे भूल सकता हूं। मोहल्ले में कल तक वे अकेले ही स्कूटर वाले थे इसलिए जैसे ही उन्हें खबर लगी थी कि दहेज में मुझे स्कूटर मिलने वाली है, वे फौरन अपने एमए पास लड़के का रिश्ता लेकर मेरी ससुराल जा धमके थे और जी भरकर मेरी बुराईयां मेरे स्वसुर के सामने गिनवा दी थी। उन्होंने मेरे स्वसुर के सामने मेरे अनपढ़ होने तक की पोल खोलकर रख दी थी, लेकिन भला हो मेरे स्वसुर मोहतरम का। अड़े रहे अपनी जबान पर। बोले-‘स्कूटर ...सारी, बेटी दूंगा तो सईद को ही दूंगा। जबान दे चुका हूं।’ और सचमुच मेरे स्वसुर अपनी जबान पर अड़े रहे। बेटी तो दिए ही दिए, स्कूटर बोनस में थमा दिए। 

  Read More  
    लेकिन अल्लाह झूठ न बुलवाए, अब लगता है कि वे मुझे सिर्फ बेटी ही दिए होते तो अच्छा होता। मुई स्कूटर तो गले ही पड़ गई है। जुमा-जुमा आठ ही दिन तो हुए हैं शादी हुए (स्कूटर मिले) यह अभी से टें बोल गई। मैं सोच में पड़ गया कि आखिर जिंदगीभर का साथ यह कैसे निभा पाएगी? आखिर बीवी भी तो इसी के साथ की है। वह तो एक बार नहीं रूठी अब तक। और एक यह है। ‘कमबख्त।’ मन ही मन स्कूटर को एक और गाली देते हुए मैंने गुस्से में उसे दो बार और किकियाया कि शायद अब इसे कुछ शर्म आ जाए। और यह स्टार्ट हो जाए। लेकिन वाह री स्कूटर। स्टार्ट होना तो दूर रहा। भुरभुराई तक नहीं। 

  Read More  
    थकाहारा मैं फिर स्कूटर की सीट पर बैठ गया। अचानक मेरी नजर अपनी ओर आते बुक्की दा पर पड़ी। उन्हें देखकर मेरा कलेजा मुंह को आ गया। मैंने सोचा, अगर बुक्की दा को पता चल गया कि स्कूटर रास्तें में टें बोल गई है तो मेरी सारी हेकड़ी निकल जाएगी। उफ्फ! मैं बुरी तरह खीज गया। अब इस मुसीबत से कैसे बचूं? लेकिन तब तक बुक्की दा मेरे नजदीक पहुंच चुके थे। मुझे देखकर बोले-‘की दादा, एनी प्रोब्लोम?’

  Read More  
    ‘अरे नहीं।’ मैंने हंसकर कहा-‘कोई प्राब्लम नहीं...।’
    ‘तारपोरे तुमी ए खाने की कारो?’ उन्होंने चश्मे के नीचे से झांककर स्कूटर का मुआयना करते हुए पूछा-‘गाड़ी ट खराब आहो न की?’

  Read More  
    मैंने जल्दी से कहा-‘अरे नहीं दादा। गाड़ी को भला क्या होगा। अभी दस ही दिन तो हुआ है गाड़ी को।’
    ‘हूं।’ वे बोले- ‘तो ठीक हाय। और तुम्हारा वाइफ। वो कैसा है?’
    ‘वो भी ठीक है दादा।’ मैंने उन्हें टालने की गरज से कहा-‘दोनों साथ के ही तो हैं। जब इसे कुछ नहीं हुआ तो उसे क्या होगा।’

  Read More  
    ‘वो तो ठीक हाय।’ वे बोले-‘लेकिन दोनों का मैन्युफैक्चरिंग डेट सेम थोड़े ही होगा।’ कहकर वे ही-ही कर हंसने लगे। उनकी हंसी मुझे चुभ रही थी लेकिन मैं उन्हें कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था। वह तो अच्छा हुआ कि थोड़ी देर बाद वे खुद ही वहां से चले गए। उनके जाने के बाद मैंने स्कूटर स्टार्ट करने की कोई कोशिश करने की बजाए उसे नजदीक के किसी गैरेज तक खींचकर ले जाना गवारा किया। हालांकि यह कोशिश भी मुझे काफी भारी पड़ी। वहां से निकटतम गैरेज की दूरी एक किलोमीटर से अधिक नहीं थी। लेकिन उतनी ही देर में मुझे अपनी ताजा-ताजा आई जवानी के दमखम की समीक्षा करने पर मजबूर होना पड़ गया था। किसी तरह गैरेज पहुंचकर मैंने स्कूटर मिस्त्री के हवाले किया और वहीं पड़ी एक गंदी सी कुर्सी पर पसरकर अपनी उखड़ी सांसों को संयत करने लगा। 

  Read More  
    अचानक मेरी नजर वहां पेंट हो रही एक स्कूटर पर पड़ी। स्कूटर को पेंट होता देख, एकबारगी मेरा दिल इतनी जोर से धड़का, गोया एक ही बार धड़क कर शांत हो जाना चाहता हो। मुझे लगा, कहीं मुझे बेवकूफ तो नहीं बना दिया गया है? कहीं पेंट-सेंट करवा कर कोई पुरानी स्कूटर तो मुझे नहीं थमा दी गई है, और मैं उसे ब्रांड न्यू माल समझकर जबरदस्ती इतरा रहा हूं। लेकिन अगले ही पल मेरा यह डर खुद ही काफुर हो गया। मैंने सोचा, मेरी स्कूटर पुरानी नहीं हो सकती। बिदाई (जुदाई) के वक्त अपने सास-स्वसुर और उनसे ज्यादा सालों को हिचक-हिचक कर रोते मैंने अपनी आंखों से देखा था। बेटी या बहन के लिए कोई इतना थोड़े ही रोता है। वह तो आती-जाती रहती है। खुद को दिलासा देकर मैं चश्मे की कांच साफ करने लगा। तभी मिस्त्री ने मुझसे कहा-‘प्लग में कार्बन आ गया है।’

  Read More  
    ‘तो?’ मेरे मुंह से बेसाख्ता यह अलफाज निकल गया। जैसे मिस्त्री से मैं यह जानना चाह रहा होउं कि मैं क्या करुं?

  Read More  
    वह बोला-‘कुछ नहीं। बस दो मिनट लगेगा। कार्बन साफ होते ही गाड़ी स्टार्ट हो जाएगी।’ कहकर वह कार्बन साफ करने लगा। जबकि मैं सोच रहा था, यह भी कोई बात हुई यार। इत्ते से प्लग की इत्ती औकात कि उसकी नाक में मक्खी क्या बैठ गई, साले ने हमारी नाक में दम कर दिया। और सिर्फ प्लग ही क्यों भैनजी। अगर प्लग ठीक काम करता रहे और चक्का पंक्चर हो जाए तो भी यही हाल हो। मैंने सोचा, कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके तुफैल मिली बीवी भी ऐसी ही नखरैली हो। लेकिन अगले ही पल मैंने खुद ही अपना यह ख्याल जहन से निकाल फेंका। जुमा-जुमा आठ ही दिन में मुझे उसकी कैरिंग कैपिसिटी और हार्स पावर का अंदाज हो गया था। इसलिए मुझे यकीन है कि उसके साथ ऐसा कोई प्राब्लम नहीं हो सकता। वह लंगड़ी होकर भी मेरे बच्चों की देखभाल कर सकती है। हाथ न रहे तो भी मेरा साथ दे सकती है। गूंगी-बहरी हो जाए तो भी वह मेरे लिए सवा लाख की ही रहेगी। 

  Read More  
    एक साल बाद।
    मैं समझ नहीं पा रहा था कि बेगम को अचानक क्या हो गया है? वह उखड़ी-उखड़ी सी क्यों है? मेरी किसी बात का ढंग से जवाब भी नहीं दे रही है। मैं पूछ कुछ रहा हूं, वह जवाब कुछ दे रही है। यह भी नहीं बता रही कि उसके मिजाज में आए बदलाव की वजह क्या है? मैंने उसकी ट्यूनिंग करने की सभी कोशिशें करके देख ली लेकिन वह वैसे ही भुरभुराती रही जैसे उस दिन स्कूटर भुरभुरा रही थी। अचानक मुझे प्लग साफ करते मिस्त्री की याद आ गई। उसने कहा था-‘डइविंग सीख लेना ही काफी नहीं होता भाई साहब। गाड़ी की नब्ज पहचानना भी आना चाहिए। कम से कम प्लग साफ करना तो आना ही चाहिए। नहीं तो अक्सर ऐसी परेशानी पेश आएगी।’ प्लग साफ करते मिस्त्री की याद ने मुझे खासी राहत पहुंचाई। जैसे कोई राह सूझ गई हो मुझे। मैंने अचानक उसे अपनी बाहों में लिया और उसके कान के पास अपना मुंह ले जाकर, जैसे मिस्त्री ने बारीक तार से प्लग में सुरसुरी की थी, बोला-‘चलो! पिक्चर चलते हैं। खाना भी बाहर ही खाएंगे।’ थोड़ा ना-नुकुर करने (भुरभुराने) के बाद वह तैयार हो गई। मैंने मन ही मन मिस्त्री को थैंक्स कहा और दहेज वाली स्कूटर में उसे लेकर थिएटर की ओर उड़ चला।

  Read More  


प्लग में जब कार्बन आ जाए... (व्यंग्य)

व्यंग्य

satire, story, sayeed khan, bakhtawar adab, nai tahreek, read me

✒ सईद खान

प्लग में जब कार्बन आ जाए... (व्यंग्य)

    सत्यानाश हो इस मुई स्कूटर का। कमबख्त आज फिर नखरे बताने पर आमादा है। 
    मैंने जेब से रुमाल निकालकर माथे पर छलक आए पसीने को पोंछा और गुस्से में स्कूटर को दो-चार किक और दे मारा। लेकिन कमबख्त ने तो जैसे स्टार्ट न होने की कसम खा रखी थी। बस-थोड़ा सा भुरभुराती और बंद हो जाती। कमबख्त के नखरे देखकर जी चाहा कि उसे आग लगा दूं। अगर यह मेरी खरीदी हुई होती भैनजी तो कसम ले लो, आज मैं इसे आग के हवाले कर ही दिया होता। लेकिन यह क्योंकि मुझे दहेज में मिली थी, इसलिए मैं चाहकर भी ऐसा नहीं कर सका। पसीने से लथपथ मेरी हिम्मत जवाब दे चुकी थी। यहां तक कि पैरों में किक मारने तक की ताकत भी नहीं बची थी। मैंने उसे स्टैंड में खड़ी किया और उसकी सीट पर बैठकर लंबी-लंबी सांसे लेने लगा। सच् तो यह है कि उस वक्त मैं उस घड़ी को कोस रहा था, जब यह नामुराद स्कूटर मेरे गले पड़ी थी।

  Read More  
    अल्लाह सलामत रखे मेरे स्वसुर को, जिन्होंने दहेज में स्कूटर देकर मेरी शान में झूठे चांद... सारी, चार चांद जड़ दिए थे। मुझे याद है, जिस दिन पहली बार मैं इसे लेकर घर से निकला था, मेरे चेहरे पर चौदहवीं के चांद जैसी चमक थी। मेरी छाती फूलकर दो इंच और चोड़ी हो गई थी। पूरा मोहल्ला मुझे और मेरी स्कूटर को फटी-फटी निगाहों से घूर रहा था। मोहल्ले की औरतें अपने-अपने दरवाजों पर खड़ी कानाफूसियां कर रही थीं। कुछ विश्वस्त चुगलखोरों के माध्यम से बाद में मुझे ज्ञात हुआ कि जमीला बाजी कमर आपा से कह रही थी-‘देख कम्मो, येई वाली है।’ जवाब में कमर आपा ‘हूं’ कहकर मुंह बिसूर दी थी। रूबी तो मेरी स्कूटर की आवाज सुनकर आटा गूंथना छोड़कर स्कूटर देखने के लिए दरवाजे पर आ खड़ी हुई थी। लेकिन जैसे ही उसकी नजरें मेरी नजरों से टकराई थी, वह आसमान की ओर देखने लगी थी, गोया मुझे यह जताना चाह रही थी कि यदि मेरी शादी उससे हुई होती तो उसके अब्बा इससे अच्छी स्कूटर मुझे दिए होते।

  Read More  
    और वो मुराद साइकिल वाले की दुकान में बैठे साबिर, सलीम और बहादुर..., उनके सीने पर तो जैसे सांप ही लोट गया था। मेरे जो दोस्त पहले मुझमें कोई दिलचस्पी नहीं लेते थे, अब हाथ उठा-उठा कर मुझे विश कर रहे थे। मुझे चाय-पान आफर कर रहे थे। और हां, वो कलीम मास्टर। उन्हें भला मैं कैसे भूल सकता हूं। मोहल्ले में कल तक वे अकेले ही स्कूटर वाले थे इसलिए जैसे ही उन्हें खबर लगी थी कि दहेज में मुझे स्कूटर मिलने वाली है, वे फौरन अपने एमए पास लड़के का रिश्ता लेकर मेरी ससुराल जा धमके थे और जी भरकर मेरी बुराईयां मेरे स्वसुर के सामने गिनवा दी थी। उन्होंने मेरे स्वसुर के सामने मेरे अनपढ़ होने तक की पोल खोलकर रख दी थी, लेकिन भला हो मेरे स्वसुर मोहतरम का। अड़े रहे अपनी जबान पर। बोले-‘स्कूटर ...सारी, बेटी दूंगा तो सईद को ही दूंगा। जबान दे चुका हूं।’ और सचमुच मेरे स्वसुर अपनी जबान पर अड़े रहे। बेटी तो दिए ही दिए, स्कूटर बोनस में थमा दिए। 

  Read More  
    लेकिन अल्लाह झूठ न बुलवाए, अब लगता है कि वे मुझे सिर्फ बेटी ही दिए होते तो अच्छा होता। मुई स्कूटर तो गले ही पड़ गई है। जुमा-जुमा आठ ही दिन तो हुए हैं शादी हुए (स्कूटर मिले) यह अभी से टें बोल गई। मैं सोच में पड़ गया कि आखिर जिंदगीभर का साथ यह कैसे निभा पाएगी? आखिर बीवी भी तो इसी के साथ की है। वह तो एक बार नहीं रूठी अब तक। और एक यह है। ‘कमबख्त।’ मन ही मन स्कूटर को एक और गाली देते हुए मैंने गुस्से में उसे दो बार और किकियाया कि शायद अब इसे कुछ शर्म आ जाए। और यह स्टार्ट हो जाए। लेकिन वाह री स्कूटर। स्टार्ट होना तो दूर रहा। भुरभुराई तक नहीं। 

  Read More  
    थकाहारा मैं फिर स्कूटर की सीट पर बैठ गया। अचानक मेरी नजर अपनी ओर आते बुक्की दा पर पड़ी। उन्हें देखकर मेरा कलेजा मुंह को आ गया। मैंने सोचा, अगर बुक्की दा को पता चल गया कि स्कूटर रास्तें में टें बोल गई है तो मेरी सारी हेकड़ी निकल जाएगी। उफ्फ! मैं बुरी तरह खीज गया। अब इस मुसीबत से कैसे बचूं? लेकिन तब तक बुक्की दा मेरे नजदीक पहुंच चुके थे। मुझे देखकर बोले-‘की दादा, एनी प्रोब्लोम?’

  Read More  
    ‘अरे नहीं।’ मैंने हंसकर कहा-‘कोई प्राब्लम नहीं...।’
    ‘तारपोरे तुमी ए खाने की कारो?’ उन्होंने चश्मे के नीचे से झांककर स्कूटर का मुआयना करते हुए पूछा-‘गाड़ी ट खराब आहो न की?’

  Read More  
    मैंने जल्दी से कहा-‘अरे नहीं दादा। गाड़ी को भला क्या होगा। अभी दस ही दिन तो हुआ है गाड़ी को।’
    ‘हूं।’ वे बोले- ‘तो ठीक हाय। और तुम्हारा वाइफ। वो कैसा है?’
    ‘वो भी ठीक है दादा।’ मैंने उन्हें टालने की गरज से कहा-‘दोनों साथ के ही तो हैं। जब इसे कुछ नहीं हुआ तो उसे क्या होगा।’

  Read More  
    ‘वो तो ठीक हाय।’ वे बोले-‘लेकिन दोनों का मैन्युफैक्चरिंग डेट सेम थोड़े ही होगा।’ कहकर वे ही-ही कर हंसने लगे। उनकी हंसी मुझे चुभ रही थी लेकिन मैं उन्हें कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था। वह तो अच्छा हुआ कि थोड़ी देर बाद वे खुद ही वहां से चले गए। उनके जाने के बाद मैंने स्कूटर स्टार्ट करने की कोई कोशिश करने की बजाए उसे नजदीक के किसी गैरेज तक खींचकर ले जाना गवारा किया। हालांकि यह कोशिश भी मुझे काफी भारी पड़ी। वहां से निकटतम गैरेज की दूरी एक किलोमीटर से अधिक नहीं थी। लेकिन उतनी ही देर में मुझे अपनी ताजा-ताजा आई जवानी के दमखम की समीक्षा करने पर मजबूर होना पड़ गया था। किसी तरह गैरेज पहुंचकर मैंने स्कूटर मिस्त्री के हवाले किया और वहीं पड़ी एक गंदी सी कुर्सी पर पसरकर अपनी उखड़ी सांसों को संयत करने लगा। 

  Read More  
    अचानक मेरी नजर वहां पेंट हो रही एक स्कूटर पर पड़ी। स्कूटर को पेंट होता देख, एकबारगी मेरा दिल इतनी जोर से धड़का, गोया एक ही बार धड़क कर शांत हो जाना चाहता हो। मुझे लगा, कहीं मुझे बेवकूफ तो नहीं बना दिया गया है? कहीं पेंट-सेंट करवा कर कोई पुरानी स्कूटर तो मुझे नहीं थमा दी गई है, और मैं उसे ब्रांड न्यू माल समझकर जबरदस्ती इतरा रहा हूं। लेकिन अगले ही पल मेरा यह डर खुद ही काफुर हो गया। मैंने सोचा, मेरी स्कूटर पुरानी नहीं हो सकती। बिदाई (जुदाई) के वक्त अपने सास-स्वसुर और उनसे ज्यादा सालों को हिचक-हिचक कर रोते मैंने अपनी आंखों से देखा था। बेटी या बहन के लिए कोई इतना थोड़े ही रोता है। वह तो आती-जाती रहती है। खुद को दिलासा देकर मैं चश्मे की कांच साफ करने लगा। तभी मिस्त्री ने मुझसे कहा-‘प्लग में कार्बन आ गया है।’

  Read More  
    ‘तो?’ मेरे मुंह से बेसाख्ता यह अलफाज निकल गया। जैसे मिस्त्री से मैं यह जानना चाह रहा होउं कि मैं क्या करुं?

  Read More  
    वह बोला-‘कुछ नहीं। बस दो मिनट लगेगा। कार्बन साफ होते ही गाड़ी स्टार्ट हो जाएगी।’ कहकर वह कार्बन साफ करने लगा। जबकि मैं सोच रहा था, यह भी कोई बात हुई यार। इत्ते से प्लग की इत्ती औकात कि उसकी नाक में मक्खी क्या बैठ गई, साले ने हमारी नाक में दम कर दिया। और सिर्फ प्लग ही क्यों भैनजी। अगर प्लग ठीक काम करता रहे और चक्का पंक्चर हो जाए तो भी यही हाल हो। मैंने सोचा, कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके तुफैल मिली बीवी भी ऐसी ही नखरैली हो। लेकिन अगले ही पल मैंने खुद ही अपना यह ख्याल जहन से निकाल फेंका। जुमा-जुमा आठ ही दिन में मुझे उसकी कैरिंग कैपिसिटी और हार्स पावर का अंदाज हो गया था। इसलिए मुझे यकीन है कि उसके साथ ऐसा कोई प्राब्लम नहीं हो सकता। वह लंगड़ी होकर भी मेरे बच्चों की देखभाल कर सकती है। हाथ न रहे तो भी मेरा साथ दे सकती है। गूंगी-बहरी हो जाए तो भी वह मेरे लिए सवा लाख की ही रहेगी। 

  Read More  
    एक साल बाद।
    मैं समझ नहीं पा रहा था कि बेगम को अचानक क्या हो गया है? वह उखड़ी-उखड़ी सी क्यों है? मेरी किसी बात का ढंग से जवाब भी नहीं दे रही है। मैं पूछ कुछ रहा हूं, वह जवाब कुछ दे रही है। यह भी नहीं बता रही कि उसके मिजाज में आए बदलाव की वजह क्या है? मैंने उसकी ट्यूनिंग करने की सभी कोशिशें करके देख ली लेकिन वह वैसे ही भुरभुराती रही जैसे उस दिन स्कूटर भुरभुरा रही थी। अचानक मुझे प्लग साफ करते मिस्त्री की याद आ गई। उसने कहा था-‘डइविंग सीख लेना ही काफी नहीं होता भाई साहब। गाड़ी की नब्ज पहचानना भी आना चाहिए। कम से कम प्लग साफ करना तो आना ही चाहिए। नहीं तो अक्सर ऐसी परेशानी पेश आएगी।’ प्लग साफ करते मिस्त्री की याद ने मुझे खासी राहत पहुंचाई। जैसे कोई राह सूझ गई हो मुझे। मैंने अचानक उसे अपनी बाहों में लिया और उसके कान के पास अपना मुंह ले जाकर, जैसे मिस्त्री ने बारीक तार से प्लग में सुरसुरी की थी, बोला-‘चलो! पिक्चर चलते हैं। खाना भी बाहर ही खाएंगे।’ थोड़ा ना-नुकुर करने (भुरभुराने) के बाद वह तैयार हो गई। मैंने मन ही मन मिस्त्री को थैंक्स कहा और दहेज वाली स्कूटर में उसे लेकर थिएटर की ओर उड़ चला।

  Read More  


0 comment:

 रमदान अल मुबारक, 1446 हिजरी 


  फरमाने रसूल ﷺ  

"अल्लाह ताअला फरमाता है: मेरा बंदा किसी और चीज़ के जरिये मुझ से इतना करीब नहीं होता, जितना फर्ज़ इबादत के जरिये होता है।"
- सहीह बुखारी 



✅ बख्तावर अदब : भिलाई

माहे रमजान की शुरुआत होते ही मआशरे के लोग इबादत में मसरूफ हो गए हैं। रमजान में दिन भर रोजे रहना और 5 वक्त की नमाज के साथ रात में नमाजे तरावीह की इबादत में लोगों का वक्त गुजर रहा है। बाजार में रमजान की खास रौनक देखने को मिल रही है। रमजान को देखते हुए शहर की तमाम मस्जिदों में खास इंतजाम किए गए हैं।

अल्लाह का महीना है रमजान : डॉ. इस्माइल

बीएसपी के रिटायर्ड कर्मी डॉ. सैय्यद ईस्माइल ने रमजान की फजीलत बयान करते हुए कहा- अल्लाह के आखिरी नबी हजरत मोहम्मद 000 ने फरमाया कि शाबान मेरा महीना और रमजान अल्लाह का महीना है। शेखुल हदीस हजरत मौलाना जकरिया रहमतुल्लाह ने फजाईले रमजान में लिखा है, इस महीने में अल्लाह बंदो की नेकी को बढा देता है। 
    एक फर्ज सत्तर फर्जों के बराबर हो जाते हैं। इसलिए बंदों को नेकी के तरफ तेजी से कदम बढ़ाना चाहिए। अल्लाह कहता है, हर इबादत का बदला फरिश्तों के जरिए से मैं देता हूं लेकिन रोज़े का बदला मैं खुद देता हूं। डॉ. सैयद इस्माइल ने कहा कि रोजा बुराई से रोकता है, ये रहमत, बरकत और माफी कराने का महीना है। 
    अपने गुनाहों से तौबा कर अल्लाह को राजी करें। उन्होंने कहा कि रोजा सिर्फ भूखे और प्यासे रहने का नाम नहीं है बल्कि रोज़े के मकसद से इंसान अपने अंदर गुस्सा, झूठ, फरेब, बुरे काम छोड़कर कर संयम, यकजहती और अल्लाह का डर दिलों में ला सके, क्योंकि रोजा अल्लाह का हुक्म है।

मुहब्बत और खुलूस का महीना है रमजान : हैदर

जामा मस्जिद सेक्टर-6 के इमाम खतीब मौलाना हाफिज इकबाल अंजुम हैदर ने कहा कि रमजान की बहुत सी फजीलत हैं और हमें यह सब्र का पैगाम देता है। यह पाकीजा महीना हमें उन गरीबों और मोहताजों के बारे में एहसास दिलाता है, जिन्हें दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती। 
भूख और प्यास का एहसास जब हमें होता है तो इसकी अहमियत पता चलती है कि गरीबों और मोहताजों की भूख-प्यास का भी हमें खयाल रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि रमजान को मोहब्बत और खुलूस का महीना भी कहा गया है। हमेशा सब्र का दामन थामे रखना चाहिए। अपनी जिंदगी को अल्लाह की राह में लगा देना चाहिए।

मस्जिदों में जारी है तरावीह की नमाज

रमजान के मौके पर रात में ईशा की नमाज के बाद शहर की तमाम मस्जिदों में तरावीह की नमाज पढ़ाई जा रही है। जिसमें 26 वां रोजा पूरा होने से ठीक पहले तरावीह की नमाज के दौरान कुरआन मुकम्मल किया जाएगा। शहर में जामा मस्जिद सेक्टर-6, रज़ा मस्जिद केम्प 2, गौसिया मस्जिद केम्प 1, शेर ए खुदा मस्जिद हाऊसिंग बोर्ड, अशरफी मस्जिद जोन-3, मदनी मस्जिद जोन-2, मस्जिद गफ्फार कालोनी, गरीब नवाज़ मस्जिद-सुपेला, मस्जिद शांति नगर, नूरी मस्जिद बाबा फ़रीद नगर, फरीदिया मस्जिद, फरीद नगर, मक्का मस्जिद निज़ामी चौक, फलक नुमा मस्जिद आयप्पा नगर, हनफी मस्जिद कोहका, हुसैनी मस्जिद कर्बला मैदान, हजरत बिलाल मस्जिद हुडको, रुआबाँधा मस्जिद और रिसाली मस्जिद में शाम 7:30 बजे के बाद अजान, ईशा की नमाज और उसके बाद तरावीह की नमाज पढ़ाई जा रही है।

सेक्टर-7 में भी पढ़ाई जा रही तरावीह

सेक्टर-7 में हाजी सैयद अनवर अली के दौलतकदे पर वाके मदरसा में तरावीह की नमाज पढ़ाई जा रही है। यहां 7:45 बजे अजान और इसके बाद रात 8 बजे से जमाअत हो रही है। हाजी अनवर ने बताया कि आसपास के लोग यहां पहुंच कर तरावीह की नमाज में शामिल हो सकते हैं।

रमजान के महीने में नमाज, सेहरी व इफ्तार का सिलसिला जारी, बाजार में आई रौनक

 रमदान अल मुबारक, 1446 हिजरी 


  फरमाने रसूल ﷺ  

"अल्लाह ताअला फरमाता है: मेरा बंदा किसी और चीज़ के जरिये मुझ से इतना करीब नहीं होता, जितना फर्ज़ इबादत के जरिये होता है।"
- सहीह बुखारी 



✅ बख्तावर अदब : भिलाई

माहे रमजान की शुरुआत होते ही मआशरे के लोग इबादत में मसरूफ हो गए हैं। रमजान में दिन भर रोजे रहना और 5 वक्त की नमाज के साथ रात में नमाजे तरावीह की इबादत में लोगों का वक्त गुजर रहा है। बाजार में रमजान की खास रौनक देखने को मिल रही है। रमजान को देखते हुए शहर की तमाम मस्जिदों में खास इंतजाम किए गए हैं।

अल्लाह का महीना है रमजान : डॉ. इस्माइल

बीएसपी के रिटायर्ड कर्मी डॉ. सैय्यद ईस्माइल ने रमजान की फजीलत बयान करते हुए कहा- अल्लाह के आखिरी नबी हजरत मोहम्मद 000 ने फरमाया कि शाबान मेरा महीना और रमजान अल्लाह का महीना है। शेखुल हदीस हजरत मौलाना जकरिया रहमतुल्लाह ने फजाईले रमजान में लिखा है, इस महीने में अल्लाह बंदो की नेकी को बढा देता है। 
    एक फर्ज सत्तर फर्जों के बराबर हो जाते हैं। इसलिए बंदों को नेकी के तरफ तेजी से कदम बढ़ाना चाहिए। अल्लाह कहता है, हर इबादत का बदला फरिश्तों के जरिए से मैं देता हूं लेकिन रोज़े का बदला मैं खुद देता हूं। डॉ. सैयद इस्माइल ने कहा कि रोजा बुराई से रोकता है, ये रहमत, बरकत और माफी कराने का महीना है। 
    अपने गुनाहों से तौबा कर अल्लाह को राजी करें। उन्होंने कहा कि रोजा सिर्फ भूखे और प्यासे रहने का नाम नहीं है बल्कि रोज़े के मकसद से इंसान अपने अंदर गुस्सा, झूठ, फरेब, बुरे काम छोड़कर कर संयम, यकजहती और अल्लाह का डर दिलों में ला सके, क्योंकि रोजा अल्लाह का हुक्म है।

मुहब्बत और खुलूस का महीना है रमजान : हैदर

जामा मस्जिद सेक्टर-6 के इमाम खतीब मौलाना हाफिज इकबाल अंजुम हैदर ने कहा कि रमजान की बहुत सी फजीलत हैं और हमें यह सब्र का पैगाम देता है। यह पाकीजा महीना हमें उन गरीबों और मोहताजों के बारे में एहसास दिलाता है, जिन्हें दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती। 
भूख और प्यास का एहसास जब हमें होता है तो इसकी अहमियत पता चलती है कि गरीबों और मोहताजों की भूख-प्यास का भी हमें खयाल रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि रमजान को मोहब्बत और खुलूस का महीना भी कहा गया है। हमेशा सब्र का दामन थामे रखना चाहिए। अपनी जिंदगी को अल्लाह की राह में लगा देना चाहिए।

मस्जिदों में जारी है तरावीह की नमाज

रमजान के मौके पर रात में ईशा की नमाज के बाद शहर की तमाम मस्जिदों में तरावीह की नमाज पढ़ाई जा रही है। जिसमें 26 वां रोजा पूरा होने से ठीक पहले तरावीह की नमाज के दौरान कुरआन मुकम्मल किया जाएगा। शहर में जामा मस्जिद सेक्टर-6, रज़ा मस्जिद केम्प 2, गौसिया मस्जिद केम्प 1, शेर ए खुदा मस्जिद हाऊसिंग बोर्ड, अशरफी मस्जिद जोन-3, मदनी मस्जिद जोन-2, मस्जिद गफ्फार कालोनी, गरीब नवाज़ मस्जिद-सुपेला, मस्जिद शांति नगर, नूरी मस्जिद बाबा फ़रीद नगर, फरीदिया मस्जिद, फरीद नगर, मक्का मस्जिद निज़ामी चौक, फलक नुमा मस्जिद आयप्पा नगर, हनफी मस्जिद कोहका, हुसैनी मस्जिद कर्बला मैदान, हजरत बिलाल मस्जिद हुडको, रुआबाँधा मस्जिद और रिसाली मस्जिद में शाम 7:30 बजे के बाद अजान, ईशा की नमाज और उसके बाद तरावीह की नमाज पढ़ाई जा रही है।

सेक्टर-7 में भी पढ़ाई जा रही तरावीह

सेक्टर-7 में हाजी सैयद अनवर अली के दौलतकदे पर वाके मदरसा में तरावीह की नमाज पढ़ाई जा रही है। यहां 7:45 बजे अजान और इसके बाद रात 8 बजे से जमाअत हो रही है। हाजी अनवर ने बताया कि आसपास के लोग यहां पहुंच कर तरावीह की नमाज में शामिल हो सकते हैं।

0 comment:

Tuesday, 4 March 2025

व्यंग्य

sayeed khan, nai tahreek, bakhtawar adab, read me, satire, story

✒ सईद खान

ये जो नया टेंशन है (व्यंग्य)

    ऊहापोह से भरे इस दौर में आदमी की हालत ऐसी होती जा रही है, जैसी पिलपिले आम की होती है। हालांकि आदमी स्वस्थ्य और प्रसन्नचित रहने के लिए हर मुमकिन कोशिशें कर रहा है। लेकिन जैसे ढाक के हमेशा तीन ही पात होते हैं, वैसे ही आदमी के प्रयास के भी परिणाम सामने आ रहे हैं। सुबह उठकर जागिंग करने से लेकर ताश की महफिल सजाने, दफ्तर में खरार्टे भरने, देर रात तक टीवी देखने अथवा दोस्तों के साथ गपशप लड़ाने और जी हल्का करने लिए राजनीति पर बहस करने तथा राजनीतिज्ञों को भला-बुरा कहकर मन की भड़ास निकालने तक, हर प्रयास करके देख चुका है आदमी। लेकिन हालत है कि दिन पर दिन गिरती ही जा रही है और बजाए स्वस्थ्य होने के वह और मुर्झाता जा रहा है।
    आदमी की इस हालत के कई कारण हो सकते हैं। मसलन-उसकी संताने ज्यादा हो। पत्नी नापसंद हो उसे। बास चिड़चिड़ा हो अथवा उसकी पगार कम हो। आदि-इत्यादि। टेंशन यह नहीं कि कारण क्या है। टेंशन तो यह है कि आदमी परेशान है। और परेशान आदमी देश की प्रगति में कितना सहायक हो सकता है, यह अतिरिक्त टेंशन है। इसलिए सरकार भी आदमी को परेशानी से निजात दिलाने की चिंता में घुली जा रही है। यानि एक टेंशन यह भी है कि सरकार खुद भी परेशान है। और हो भी क्यों न? सतत बढ़ती जा रही जनसंख्या की मार से पहले ही दोहरी हो चुकी सरकार आदमी को पेरशानी से नजात दिलाने के उपाय अभी सोच ही रही होती है कि उत्ती देर में आदमी ढेरों और बच्चे पैदा करके उसके सामने कुढ़ो देता है। अब सरकार क्या करें? माना कि वह माई-बाप है लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि वह हमेशा ढील ही देती रहे। इसलिए गाहे ब-गाहे वह कुछ कड़े फैसले भी लेती है।
    अगर गौर करें तो सरकार की परेशानी का कारण नाजायज कतई नहीं है। जब हर बार किसी समस्या के निदान के लिए उठाए गए कदम विफल हो जाएं तो आदमी का खीजना और परेशान होना जायज है। यही सरकार के साथ हो रहा है। जनसंख्या वृद्धि दर को नियंत्रित करने के लिए सरकार हर संभव प्रयास कर रही है। एक ओर आम जनता को लोटा-थाली देकर नसबंदी के लिए प्रेरित कर रही है तो दूसरी ओर ज्यादा बच्चों वाले अधिकारियों, कर्मचारियों को पदच्युत कर रही है अथवा पदच्युत करने की धमकी दे रही है। लेकिन आदमी भी पूरा आदमी है। कमबख्त! कुछ समझने की कोशिश ही नहीं करता।
    अब नीमच के उस गांव को ही लें, जहां की महिला सरपंच को सरकार ने सिर्फ इसलिए पदच्युत कर दिया था, क्योंकि पद में रहते हुए वह तीसरे बच्चे की अम्मा बन गई थी लेकिन आदमी को सरकार का यह कदम रास न आया और विरोध स्वरूप उसने एक ऐसी महिला को सरपंच चुन लिया जो पहले से ही छह बच्चों की अम्मा थी। ऐसा ही एक वाकेआ आंध्र के एक गांव का है। वहां सरकार ने नसबंदी का जो लक्ष्य निर्धारित किया था, अधिकारी जब कूदकर उस लक्ष्य को जा लपके तो आदमी हाय-तौबा मचाने लगा। कहता है कि लक्ष्य तक पहुंचने की हड़बड़ी में अधिकारियों ने उन आदमियों की भी नसबंदी कर दी जो सही मायनों में आदमी नहीं थे। इनमें से ज्यातर या तो 50-60 वर्ष की आयु के थे या विकलांग थे और बच्चे पैदा करने के योग्य ही नहीं थे। कुछ आदमी ऐसे भी थे जो पहले से ही नसबंदीशुदा थे। अब आदमी क्या जाने की माई-बाप को टेंशन क्या है। एक टेंशन तो यह भी है कि जनसंख्या के मामले में चीन के साथ होड़ करने वाला अपना देश पदकों के मामले में हर बाद इतना फिसड्डी क्यों साबित हो जाता है। एक अरब से अधिक वाले इस देश की झोली में हर बार सिर्फ एक-दो पदक ही क्यों हाथ आता है। व्हाट अ टेंशन यार।
    और एक टेंशन तो अभीच शुरू हुआ है। ये जो नया टेंशन है, बिल्कुल लेटेस्ट और नेशनालाइज्ड टेंशन है ये। और ये जो नेशनालाइज्ड टेंशन है, यह पहले वाले टेंशन से भी ज्यादा जानलेवा है। पहले तो सिर्फ यही टेंशन थी कि आबादी छलांग लगा रही है। अब यह टेंशन है कि आबादी एक समुदाय विशेष की ही क्यों छलांग लगा रही है। इसलिए धर्म के कुछ तथाकथित ठेकेदार अपने समुदाय से ज्यादा बच्चे पैदा करने का आह्वान कर रहे हैं। सरकार कहती है- ‘हम दो, हमारे दो।’ ठेकदार कह रहे हैं-‘हम दो, हमारे चार हों।’ नहीं तो संतुलन बिगड जाएगा। इसलिए और पैदा करो। जानवरों की तरह करो। मगर करो।
    तो ऐसा है। भईया। 
    अगर यही हाल रहा, तो देखना एक समय ऐसा भी आएगा जब आदमी का बच्चा भी पैदा होते ही जानवर के बच्चे की तरह कुंलाचें मारने लगेगा। देश की स्थिति पर गौर करते हुए उसके भी मन में प्रतिस्पर्धा की भावना जागृत होगी। क्योंकि प्रतिस्पर्धा की भावना में ही वह पैदा होगा। इसलिए यह सोचकर कि जितने दिनों में वह चलना सीखेगा, उतने दिनों में तो लाखों और बच्चे जन्म ले चुकेंगे, इसलिए पैदा होते ही वह दौड़ने लगेगा। 
    और अब तो हद ही हो गई भैनजी। देख लो, बोतलों में भी बच्चे ढाले जाने लगे हैं। जैसे इंसान-इंसान न हुआ कोई प्रोडक्ट हो गया। इसलिए कांपीटीशन बढ़ रहा है। तो देख लेना, आदमी का बच्चा भी पैदा होते ही दौड़ने लगेगा। जैसे जानवर का बच्चा दौड़ता है। लड़खड़ाते हुए ही सहीं। जैसे देश दौड़ रहा है। जनसंख्या कम करने के सभी प्रयासों को धत्ता बताते हुए जैसे जनसंख्या छलांग लगा रही है। जबकि दुनिया में जनसंख्या नीति बनाने वाला भारत ही पहला देश है। फिर भी यहां की जनसंख्या एक अरब को पार कर गई बताते हैं। हमसे तो अपने बारह भी ठीक तरह से गिने नहीं जाते हैं। यार लोग इतनी बड़ी संख्या का ठीक-ठीक हिसाब कैसे लगा लेते हैं, अपुन यही सोच कर टेंस हो जाते हैं।

ये जो नया टेंशन है (व्यंग्य)

व्यंग्य

sayeed khan, nai tahreek, bakhtawar adab, read me, satire, story

✒ सईद खान

ये जो नया टेंशन है (व्यंग्य)

    ऊहापोह से भरे इस दौर में आदमी की हालत ऐसी होती जा रही है, जैसी पिलपिले आम की होती है। हालांकि आदमी स्वस्थ्य और प्रसन्नचित रहने के लिए हर मुमकिन कोशिशें कर रहा है। लेकिन जैसे ढाक के हमेशा तीन ही पात होते हैं, वैसे ही आदमी के प्रयास के भी परिणाम सामने आ रहे हैं। सुबह उठकर जागिंग करने से लेकर ताश की महफिल सजाने, दफ्तर में खरार्टे भरने, देर रात तक टीवी देखने अथवा दोस्तों के साथ गपशप लड़ाने और जी हल्का करने लिए राजनीति पर बहस करने तथा राजनीतिज्ञों को भला-बुरा कहकर मन की भड़ास निकालने तक, हर प्रयास करके देख चुका है आदमी। लेकिन हालत है कि दिन पर दिन गिरती ही जा रही है और बजाए स्वस्थ्य होने के वह और मुर्झाता जा रहा है।
    आदमी की इस हालत के कई कारण हो सकते हैं। मसलन-उसकी संताने ज्यादा हो। पत्नी नापसंद हो उसे। बास चिड़चिड़ा हो अथवा उसकी पगार कम हो। आदि-इत्यादि। टेंशन यह नहीं कि कारण क्या है। टेंशन तो यह है कि आदमी परेशान है। और परेशान आदमी देश की प्रगति में कितना सहायक हो सकता है, यह अतिरिक्त टेंशन है। इसलिए सरकार भी आदमी को परेशानी से निजात दिलाने की चिंता में घुली जा रही है। यानि एक टेंशन यह भी है कि सरकार खुद भी परेशान है। और हो भी क्यों न? सतत बढ़ती जा रही जनसंख्या की मार से पहले ही दोहरी हो चुकी सरकार आदमी को पेरशानी से नजात दिलाने के उपाय अभी सोच ही रही होती है कि उत्ती देर में आदमी ढेरों और बच्चे पैदा करके उसके सामने कुढ़ो देता है। अब सरकार क्या करें? माना कि वह माई-बाप है लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि वह हमेशा ढील ही देती रहे। इसलिए गाहे ब-गाहे वह कुछ कड़े फैसले भी लेती है।
    अगर गौर करें तो सरकार की परेशानी का कारण नाजायज कतई नहीं है। जब हर बार किसी समस्या के निदान के लिए उठाए गए कदम विफल हो जाएं तो आदमी का खीजना और परेशान होना जायज है। यही सरकार के साथ हो रहा है। जनसंख्या वृद्धि दर को नियंत्रित करने के लिए सरकार हर संभव प्रयास कर रही है। एक ओर आम जनता को लोटा-थाली देकर नसबंदी के लिए प्रेरित कर रही है तो दूसरी ओर ज्यादा बच्चों वाले अधिकारियों, कर्मचारियों को पदच्युत कर रही है अथवा पदच्युत करने की धमकी दे रही है। लेकिन आदमी भी पूरा आदमी है। कमबख्त! कुछ समझने की कोशिश ही नहीं करता।
    अब नीमच के उस गांव को ही लें, जहां की महिला सरपंच को सरकार ने सिर्फ इसलिए पदच्युत कर दिया था, क्योंकि पद में रहते हुए वह तीसरे बच्चे की अम्मा बन गई थी लेकिन आदमी को सरकार का यह कदम रास न आया और विरोध स्वरूप उसने एक ऐसी महिला को सरपंच चुन लिया जो पहले से ही छह बच्चों की अम्मा थी। ऐसा ही एक वाकेआ आंध्र के एक गांव का है। वहां सरकार ने नसबंदी का जो लक्ष्य निर्धारित किया था, अधिकारी जब कूदकर उस लक्ष्य को जा लपके तो आदमी हाय-तौबा मचाने लगा। कहता है कि लक्ष्य तक पहुंचने की हड़बड़ी में अधिकारियों ने उन आदमियों की भी नसबंदी कर दी जो सही मायनों में आदमी नहीं थे। इनमें से ज्यातर या तो 50-60 वर्ष की आयु के थे या विकलांग थे और बच्चे पैदा करने के योग्य ही नहीं थे। कुछ आदमी ऐसे भी थे जो पहले से ही नसबंदीशुदा थे। अब आदमी क्या जाने की माई-बाप को टेंशन क्या है। एक टेंशन तो यह भी है कि जनसंख्या के मामले में चीन के साथ होड़ करने वाला अपना देश पदकों के मामले में हर बाद इतना फिसड्डी क्यों साबित हो जाता है। एक अरब से अधिक वाले इस देश की झोली में हर बार सिर्फ एक-दो पदक ही क्यों हाथ आता है। व्हाट अ टेंशन यार।
    और एक टेंशन तो अभीच शुरू हुआ है। ये जो नया टेंशन है, बिल्कुल लेटेस्ट और नेशनालाइज्ड टेंशन है ये। और ये जो नेशनालाइज्ड टेंशन है, यह पहले वाले टेंशन से भी ज्यादा जानलेवा है। पहले तो सिर्फ यही टेंशन थी कि आबादी छलांग लगा रही है। अब यह टेंशन है कि आबादी एक समुदाय विशेष की ही क्यों छलांग लगा रही है। इसलिए धर्म के कुछ तथाकथित ठेकेदार अपने समुदाय से ज्यादा बच्चे पैदा करने का आह्वान कर रहे हैं। सरकार कहती है- ‘हम दो, हमारे दो।’ ठेकदार कह रहे हैं-‘हम दो, हमारे चार हों।’ नहीं तो संतुलन बिगड जाएगा। इसलिए और पैदा करो। जानवरों की तरह करो। मगर करो।
    तो ऐसा है। भईया। 
    अगर यही हाल रहा, तो देखना एक समय ऐसा भी आएगा जब आदमी का बच्चा भी पैदा होते ही जानवर के बच्चे की तरह कुंलाचें मारने लगेगा। देश की स्थिति पर गौर करते हुए उसके भी मन में प्रतिस्पर्धा की भावना जागृत होगी। क्योंकि प्रतिस्पर्धा की भावना में ही वह पैदा होगा। इसलिए यह सोचकर कि जितने दिनों में वह चलना सीखेगा, उतने दिनों में तो लाखों और बच्चे जन्म ले चुकेंगे, इसलिए पैदा होते ही वह दौड़ने लगेगा। 
    और अब तो हद ही हो गई भैनजी। देख लो, बोतलों में भी बच्चे ढाले जाने लगे हैं। जैसे इंसान-इंसान न हुआ कोई प्रोडक्ट हो गया। इसलिए कांपीटीशन बढ़ रहा है। तो देख लेना, आदमी का बच्चा भी पैदा होते ही दौड़ने लगेगा। जैसे जानवर का बच्चा दौड़ता है। लड़खड़ाते हुए ही सहीं। जैसे देश दौड़ रहा है। जनसंख्या कम करने के सभी प्रयासों को धत्ता बताते हुए जैसे जनसंख्या छलांग लगा रही है। जबकि दुनिया में जनसंख्या नीति बनाने वाला भारत ही पहला देश है। फिर भी यहां की जनसंख्या एक अरब को पार कर गई बताते हैं। हमसे तो अपने बारह भी ठीक तरह से गिने नहीं जाते हैं। यार लोग इतनी बड़ी संख्या का ठीक-ठीक हिसाब कैसे लगा लेते हैं, अपुन यही सोच कर टेंस हो जाते हैं।

0 comment:

Monday, 3 March 2025

व्यंग्य

satire, story, nai tahreek, bakhtawar adab, read me, sayeed khan

✒ सईद खान 

एक पाती, बम धमाके में दिवंगत पड़ोसन के नाम

प्रिये 
आशा है, तुम वहां (स्वर्ग अथवा नरक में, जहां भी हो) मजे में होंगी। इससे पहले एक खत, जो हमने तुम्हें नरक के पते पर लिखा था, अब तक उसका जवाब नहीं मिला इसलिए यह दूसरा खत हम तुम्हें स्वर्ग के पते पर लिख रहे हैं। हालांकि तुम्हारे स्वर्ग में होने की उम्मीद जÞरा कम है। फिर भी, हो सकता है, तुम वहीं हो। तुम तो हिंया भी ऐसे गुल खिलाती रहती थी। तैय्यबा आपा के घर जा रही हूं, बोलकर घर से निकलती थीं लेकिन ढूंढने पर कम्मो बाजी के घर पाई जाती थी।
    तुम्हें पता तो चल ही गया होगा कि हमारे हिंया आतंकवादियों ने फिर धमाके किए हैं। मुंबई और दिल्ली में हुए धमाके के बाद, बहुत दिनों तक जब कहीं कोई धमाका नहीं हुआ तो हमें लग रहा था कि आतंकियों ने शायद कमीनेपन से तौबा कर ली है अथवा राजनेताओं की गैरत जाग गई है। पिछली बार हुए धमाके के बाद नेताओं ने एक सुर में कहा भी था कि आतंकियों से सख्ती से निपटा जाएगा तो हम यह मानकर चल रहे थे कि सरकार सचमुच सख्ती बरतने लगी है। लेकिन पुणे में हुए धमाकों से तय है कि न तो आतंकियों ने कमीनेपन से तौबा की है न राजनेताओं की गैरत ही जागी है। यानी बे-गैरत कर्णधारों के राज में आतंकियों का कमीनापन और धूम-धड़ाम होते रहने की आशंका आगे भी बनी हुई है। 
    उस दिन इंडिया गेट में हम अगर तुम्हारे लिए भेलपुरी लेने तुमसे थोड़ी दूर नहीं गए होते तो आज हम भी तुम्हारे साथ बादल के किसी टुकड़े में बैठकर चल छईयां-छईयां कर रहे होते। लेकिन कमबख्त आतंकवादियों ने हमारे लौटने तक का भी इंतजार न किया और धमाका कर दिया। हमारा कहना है कि जब तुम्हे टाईमर और रिमोट से धमाका करने की तकनीक मालूम है तो कम से कम यह तो देख लिया करो कि कौन, किससे बिछुड़ रहा है। ये क्या बात हुई कि जब मन किया, दबा दिया रिमोट और कर दिया धमाका। 
    खैर! पहले तो केवल दीवाली के दीवाली ही धमाके सुनाई देते थे। श्री राम की अयोध्या से वापसी की खुशी में लोगों ने पटाखे फोड़कर खुशी मनाई थी। तब से यह परंपरा अब तक चली आ रही है। बाद में लोग शादी-ब्याह जैसे मौकों पर भी पटाखे फोड़ने लगे। पिछले दिनों नब्बू चाचा की बकरी की डिलेवरी हुई तो उन्होंने भी पटाखे फोड़कर खुशी मनाई थी। यानी पटाखों की धमक एक तरह से यह संदेशा लाती थी कि कहीं कोई बंदा खुशी मना रहा है। क्रिकेट के सीजन में पटाखों की आवाज से हमें यह भी पता चल जाता है कि पाकिस्तानी टीम को अपने खिलाड़ी धूल चटा रहे हैं। 
    लेकिन अब पटाखों की आवाजÞ के मायने बदल गए हैं प्रिये। पटाखों की गूंज अब सिर्फ खुशी का संदेश नहीं देती, बल्कि दिलों को दहला देती है। अब धमाके होते हैं तो खबर आती है कि कहीं दर्जनभर लोग खल्लास हो गए हैं। श्री राम की अयोध्या वापसी से वाबस्ता पटाखे इतने रंग बदलेंगे, किसी ने सोचा भी न होगा। हद् तो यह कि पटाखों के रंग ही नहीं, उनकी सूरत भी बदल गई है अब। अब मानव बम, टिफिन बम, साइकिल बम और न जाने कैसे-कैसे बम बनने लगे हैं, जो फूटते ही एक बार में दर्जनभर से ज्यादा बंदों को हिंया से खर्च कर तुम्हारे उंहा ट्रांसफर कर देते हैं। भला बताओ, क्या छतरी, साइकिल और टिफिन बनाने वालों ने कभी सोचा होगा कि इन चीजों का इस्तेमाल भी धमाके के लिए किया जा सकता है। लेकिन देख लो, लोगों की जानें लेने के लिए आतंकवादी कैसे-कैसे हथकंडे अपना रहे हैं। 
    रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों को बम के रूप में इस्तेमाल करने के चलते हालत यह है कि लोग अब लावारिस पड़ी चीजÞों के करीब जाने से भी डरने लगे हैं कि कहीं यह भी फूटने वाली चीजÞ न हो। हालांकि इसकी वजह से चीजÞों को अब कुछ देर लावारिस पड़ी रहने का सुख मिलने लगा है। कल ही की बात लो। शर्मा जी रास्ते में मिले थे। बातचीत में पता चला कि पत्नी के साथ हवा खाने निकले थे लेकिन पत्नी को मैत्रीबाग में ही भूल आए हैं। हमने कहा-‘जल्दी जाओ। भाभी जी अकेली परेशान हो रही होंगी।’ तो बोले -‘डोंट वरी, मैंने उन्हें मोबाइल में समझा दिया है कि किसी बेंच पर लावारिस स्टाइल में बैठी रहना। लोग मानव बम समझकर तुम्हारे नजदीक भी नहीं आएंगे। इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है।’ कहकर वे टहलने के से अंदाज में आगे बढ़ गए थे। 
    पुणे धमाके में छतरी का इस्तेमाल हुआ था, बताते हैं। हमें लगता है कि जो छतरी तुमने हमें गिफ्ट की थी, आतंकवादियों ने शायद ऐसे ही कहीं धमाका करने में उसका इस्तेमाल कर लिया हो। और तुम हम पर शक करती रही कि हमने वो छतरी कविता को तो नहीं दे दी है। खैर! 
    बहरहाल! तुम जानती हो कि पटाखों से हमें कितना डर लगता है। पटाखे तो क्या, सुरसुरी जलाते हुए भी हमारी घिग्घी बंध जाती है कि कहीं फूट न जाए मुई। हालांकि सुरसुरी की फितरत फूटने वाली नहीं होती। लेकिन हमने देखा है कि कभी-कभी यह फूट भी जाती है। हमारे कुछ दोस्त अनारदाना को हाथ में पकड़कर भी जलाया करते हैं और एक हम हंै कि हाथ में तो क्या उसे जÞमीन पर रखकर भी जलाते हुए डरते हैं कि कहीं फूट-फाट न जाए। यही वजह है कि दीवाली वाले दिन हम अक्सर कमरे में दुबके रहते हैं। इसके बावजूद हर साल दीवाली का हमें बेसब्री से इंतजार रहता है। तुम्हें तो याद ही होगा, दुर्गा पूजा से लेकर दशहरा और दीवाली आने तक पूरा देश किस तरह उत्सव की खुमारी में डूबा रहता है। घरों का रंग-रोगन, नए सामान और कपड़ों की खरीददारी करती भीड़ से बाजार और सड़कों तक में उत्साह घुला रहता है, जो हमें अच्छा लगता है। ऐसा लगता है, जैसे ये चीजें, ये चहल-पहल, घरों की नए सिरे से साज-सज्जा और खरीददारी के लिए छलके उत्साह से मानव अपने शेष जीवन के लिए ऊर्जा जुटा रहा है, जिसे मुए आतंकवादी बदरंग कर देना चाहते हैं। 
    हालांकि इतनी कोशिशों के बाद भी, तुम्हें ये जानकार ताअज्जुब होगा कि वे अपनी कोशिश में रत्तीभर भी कामयाब नहीं हो पाए हैं। कल नब्बू चाचा मिले थे। सत्तर बसंत पार कर चुकने के बाद भी उनका उत्साह देखते ही बनता है। शाम की तफरीह के लिए झवेरी बाजार होकर हैंगिंग गार्डन जाते हैं। हमने कहा -‘इधर खतरा ज्यादा रहता है, मैरिन ड्राइव की तरफ जाया करो।’ तो कहने लगे -‘तुम जिस खतरे का भय दिखा रहे हो, उससे देश की धड़कन को लेशमात्र भी फर्क पड़ा हो तो बताओ।’ कहते हुए अजीब से अंदाज में मुंह बिसूरकर वे आगे बढ़ गए थे। 
    खैर! अब बंद करते हैं। तुम अपना ध्यान रखना। चित्रगुप्त को अपने कर्मों का हिसाब देते समय होश से काम लेना। और हां, तुम रोज-रोज सपने में मत आया करो,  नींद उचट जाती है। 


Read More


कहानी 


व्यंग्य


एक पाती, बम धमाके में दिवंगत पड़ोसन के नाम (व्यंग्य)

व्यंग्य

satire, story, nai tahreek, bakhtawar adab, read me, sayeed khan

✒ सईद खान 

एक पाती, बम धमाके में दिवंगत पड़ोसन के नाम

प्रिये 
आशा है, तुम वहां (स्वर्ग अथवा नरक में, जहां भी हो) मजे में होंगी। इससे पहले एक खत, जो हमने तुम्हें नरक के पते पर लिखा था, अब तक उसका जवाब नहीं मिला इसलिए यह दूसरा खत हम तुम्हें स्वर्ग के पते पर लिख रहे हैं। हालांकि तुम्हारे स्वर्ग में होने की उम्मीद जÞरा कम है। फिर भी, हो सकता है, तुम वहीं हो। तुम तो हिंया भी ऐसे गुल खिलाती रहती थी। तैय्यबा आपा के घर जा रही हूं, बोलकर घर से निकलती थीं लेकिन ढूंढने पर कम्मो बाजी के घर पाई जाती थी।
    तुम्हें पता तो चल ही गया होगा कि हमारे हिंया आतंकवादियों ने फिर धमाके किए हैं। मुंबई और दिल्ली में हुए धमाके के बाद, बहुत दिनों तक जब कहीं कोई धमाका नहीं हुआ तो हमें लग रहा था कि आतंकियों ने शायद कमीनेपन से तौबा कर ली है अथवा राजनेताओं की गैरत जाग गई है। पिछली बार हुए धमाके के बाद नेताओं ने एक सुर में कहा भी था कि आतंकियों से सख्ती से निपटा जाएगा तो हम यह मानकर चल रहे थे कि सरकार सचमुच सख्ती बरतने लगी है। लेकिन पुणे में हुए धमाकों से तय है कि न तो आतंकियों ने कमीनेपन से तौबा की है न राजनेताओं की गैरत ही जागी है। यानी बे-गैरत कर्णधारों के राज में आतंकियों का कमीनापन और धूम-धड़ाम होते रहने की आशंका आगे भी बनी हुई है। 
    उस दिन इंडिया गेट में हम अगर तुम्हारे लिए भेलपुरी लेने तुमसे थोड़ी दूर नहीं गए होते तो आज हम भी तुम्हारे साथ बादल के किसी टुकड़े में बैठकर चल छईयां-छईयां कर रहे होते। लेकिन कमबख्त आतंकवादियों ने हमारे लौटने तक का भी इंतजार न किया और धमाका कर दिया। हमारा कहना है कि जब तुम्हे टाईमर और रिमोट से धमाका करने की तकनीक मालूम है तो कम से कम यह तो देख लिया करो कि कौन, किससे बिछुड़ रहा है। ये क्या बात हुई कि जब मन किया, दबा दिया रिमोट और कर दिया धमाका। 
    खैर! पहले तो केवल दीवाली के दीवाली ही धमाके सुनाई देते थे। श्री राम की अयोध्या से वापसी की खुशी में लोगों ने पटाखे फोड़कर खुशी मनाई थी। तब से यह परंपरा अब तक चली आ रही है। बाद में लोग शादी-ब्याह जैसे मौकों पर भी पटाखे फोड़ने लगे। पिछले दिनों नब्बू चाचा की बकरी की डिलेवरी हुई तो उन्होंने भी पटाखे फोड़कर खुशी मनाई थी। यानी पटाखों की धमक एक तरह से यह संदेशा लाती थी कि कहीं कोई बंदा खुशी मना रहा है। क्रिकेट के सीजन में पटाखों की आवाज से हमें यह भी पता चल जाता है कि पाकिस्तानी टीम को अपने खिलाड़ी धूल चटा रहे हैं। 
    लेकिन अब पटाखों की आवाजÞ के मायने बदल गए हैं प्रिये। पटाखों की गूंज अब सिर्फ खुशी का संदेश नहीं देती, बल्कि दिलों को दहला देती है। अब धमाके होते हैं तो खबर आती है कि कहीं दर्जनभर लोग खल्लास हो गए हैं। श्री राम की अयोध्या वापसी से वाबस्ता पटाखे इतने रंग बदलेंगे, किसी ने सोचा भी न होगा। हद् तो यह कि पटाखों के रंग ही नहीं, उनकी सूरत भी बदल गई है अब। अब मानव बम, टिफिन बम, साइकिल बम और न जाने कैसे-कैसे बम बनने लगे हैं, जो फूटते ही एक बार में दर्जनभर से ज्यादा बंदों को हिंया से खर्च कर तुम्हारे उंहा ट्रांसफर कर देते हैं। भला बताओ, क्या छतरी, साइकिल और टिफिन बनाने वालों ने कभी सोचा होगा कि इन चीजों का इस्तेमाल भी धमाके के लिए किया जा सकता है। लेकिन देख लो, लोगों की जानें लेने के लिए आतंकवादी कैसे-कैसे हथकंडे अपना रहे हैं। 
    रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों को बम के रूप में इस्तेमाल करने के चलते हालत यह है कि लोग अब लावारिस पड़ी चीजÞों के करीब जाने से भी डरने लगे हैं कि कहीं यह भी फूटने वाली चीजÞ न हो। हालांकि इसकी वजह से चीजÞों को अब कुछ देर लावारिस पड़ी रहने का सुख मिलने लगा है। कल ही की बात लो। शर्मा जी रास्ते में मिले थे। बातचीत में पता चला कि पत्नी के साथ हवा खाने निकले थे लेकिन पत्नी को मैत्रीबाग में ही भूल आए हैं। हमने कहा-‘जल्दी जाओ। भाभी जी अकेली परेशान हो रही होंगी।’ तो बोले -‘डोंट वरी, मैंने उन्हें मोबाइल में समझा दिया है कि किसी बेंच पर लावारिस स्टाइल में बैठी रहना। लोग मानव बम समझकर तुम्हारे नजदीक भी नहीं आएंगे। इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है।’ कहकर वे टहलने के से अंदाज में आगे बढ़ गए थे। 
    पुणे धमाके में छतरी का इस्तेमाल हुआ था, बताते हैं। हमें लगता है कि जो छतरी तुमने हमें गिफ्ट की थी, आतंकवादियों ने शायद ऐसे ही कहीं धमाका करने में उसका इस्तेमाल कर लिया हो। और तुम हम पर शक करती रही कि हमने वो छतरी कविता को तो नहीं दे दी है। खैर! 
    बहरहाल! तुम जानती हो कि पटाखों से हमें कितना डर लगता है। पटाखे तो क्या, सुरसुरी जलाते हुए भी हमारी घिग्घी बंध जाती है कि कहीं फूट न जाए मुई। हालांकि सुरसुरी की फितरत फूटने वाली नहीं होती। लेकिन हमने देखा है कि कभी-कभी यह फूट भी जाती है। हमारे कुछ दोस्त अनारदाना को हाथ में पकड़कर भी जलाया करते हैं और एक हम हंै कि हाथ में तो क्या उसे जÞमीन पर रखकर भी जलाते हुए डरते हैं कि कहीं फूट-फाट न जाए। यही वजह है कि दीवाली वाले दिन हम अक्सर कमरे में दुबके रहते हैं। इसके बावजूद हर साल दीवाली का हमें बेसब्री से इंतजार रहता है। तुम्हें तो याद ही होगा, दुर्गा पूजा से लेकर दशहरा और दीवाली आने तक पूरा देश किस तरह उत्सव की खुमारी में डूबा रहता है। घरों का रंग-रोगन, नए सामान और कपड़ों की खरीददारी करती भीड़ से बाजार और सड़कों तक में उत्साह घुला रहता है, जो हमें अच्छा लगता है। ऐसा लगता है, जैसे ये चीजें, ये चहल-पहल, घरों की नए सिरे से साज-सज्जा और खरीददारी के लिए छलके उत्साह से मानव अपने शेष जीवन के लिए ऊर्जा जुटा रहा है, जिसे मुए आतंकवादी बदरंग कर देना चाहते हैं। 
    हालांकि इतनी कोशिशों के बाद भी, तुम्हें ये जानकार ताअज्जुब होगा कि वे अपनी कोशिश में रत्तीभर भी कामयाब नहीं हो पाए हैं। कल नब्बू चाचा मिले थे। सत्तर बसंत पार कर चुकने के बाद भी उनका उत्साह देखते ही बनता है। शाम की तफरीह के लिए झवेरी बाजार होकर हैंगिंग गार्डन जाते हैं। हमने कहा -‘इधर खतरा ज्यादा रहता है, मैरिन ड्राइव की तरफ जाया करो।’ तो कहने लगे -‘तुम जिस खतरे का भय दिखा रहे हो, उससे देश की धड़कन को लेशमात्र भी फर्क पड़ा हो तो बताओ।’ कहते हुए अजीब से अंदाज में मुंह बिसूरकर वे आगे बढ़ गए थे। 
    खैर! अब बंद करते हैं। तुम अपना ध्यान रखना। चित्रगुप्त को अपने कर्मों का हिसाब देते समय होश से काम लेना। और हां, तुम रोज-रोज सपने में मत आया करो,  नींद उचट जाती है। 


Read More


कहानी 


व्यंग्य


0 comment:

Recent Posts

© 2013 Read Me. Powered by Blogger.
Blogger Template by Bloggertheme9 Published..Blogger Templates
back to top