Thursday, 27 February 2025

अवसर (कहानी)

Posted by Hastakshar  |  at  February 27, 2025

                                                                                                    कहानी  

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                    ✒ सईद खान                                                

अवसर

    हिसाब करने के बाद कैल्क्यूलेटर को परे सरकाते हुए दुकानदार बोला-‘सात सौ अस्सी रुपए।’ 
    ‘सात सौ अस्सी।’ रमाकांत ने आश्चर्य से दुकानदार को देखा। उसे लगा, दुकानदार किसी और से कह रहा है, लेकिन वह उसी से मुखातिब था। रमाकांत को अपनी ओर देखता पाकर वह बोला-‘जी हां, सात सौ अस्सी।’ 
    ‘अरे, लेकिन ये तीन किताब और एक नोट बुक का इतना पैसा।’ रमाकांत किताब खोलकर उसका प्रिंट रेट देखने लगा। उसने हिसाब लगाया, किताबें ही 740 रुपए की हो रही थी। शेष 40 रुपए की नोटबुक। उसने नोटबुक को उलट-पुलट कर देखा और बोला-‘ये नोटबुक तो 25 रुपए में मिलती है।’ 
    ‘मिलती है नहीं, मिलती थी।’ दुकानदार बोला-‘छह महीना पहले तक इसकी कीमत 25 रुपए ही थी। अब बढ़कर 40 हो गई है। उसने आगे कहा-‘लगता है, आपने लंबे समय से कापी-किताब नहीं खरीदी है।’
    ‘नहीं...ऐसी बात नहीं है।’ रमाकांत जल्दी से बोला-‘आप ऐसा कीजिए, ये एक किताब रहने दीजिए और ये दो किताब और ये नोटबुक दे दीजिए।’ कहते हुए उसने जेब से 480 रुपए निकालकर दुकानदार की ओर बढ़ा दिया। और शेष रकम और किताबें लेकर स्कूटर की ओर बढ़ गया। स्कूटर में किक मारते हुए वह सोच रहा था, अगर वह उस किताब को भी ले लेता तो उसकी जेब में मात्र 30 रुपए ही बच जाते। तनख्वाह मिलने में अभी भी चार दिन बाकी है। इस बीच पेट्रोल, सब्जी और पान-सिगरेट पर होने वाले चिल्हर खर्च के अलावा कोई इमरजेंसी भी आ सकती है। इन खर्चों के लिए आदमी को पहले से तैयार रहना चाहिए। ऐन वक्त पर किसी से दस रुपए भी नहीं मिलते। लेकिन जब वह घर पहुंचा तो पेट्रोल और सब्जी वगैरह पर होने वाले चिल्हर खर्च के नाम पर किताब न लाने की उसकी अक्लमंदी को लेकर सुमन की जमकर खरी-खोटी सुनने को मिली उसे। वो तो अच्छा हुआ कि उसने पेट्रोल और सब्जी के साथ पान-सिगरेट का जिक्र नहीं किया। अन्यथा पता नहीं, सुमन के किस रूप का उसे सामना करना पड़ता। सुमन का कहना था, बिटिया की पढ़ाई को लेकर वह कोई समझौता नहीं करना चाहती। वह बोली-‘पेट्रोल और सब्जी के बगैर हम गुजारा कर सकते हैं लेकिन मुझे ये बिल्कुल पसंद नहीं कि कापी-किताब या फीस के नाम पर स्कूल में बिटिया को सबके सामने बेंच पर खड़ा होना पड़े।’
    ‘ऐसे कैसे बेंच पर खड़ा करा देंगे बच्चे को।’ रमाकांत भड़क कर बोला-‘ताला नहीं लगवा दूंगा स्कूल में।’ 
    ‘क्यों। पिछले महीने ही तो बिटिया को एक घंटा गेट पर खड़ा रहना पड़ा था। बिटिया ने तुम्हें बताया भी था, तब तो नहीं लगवाया था तुमने स्कूल में ताला।’  सुमन सब्जी काटते हुए बोली।
    ‘वो तो अपनी ही गलती थी।’ रमाकांत बोला-‘बिटिया ही देर से स्कूल पहुंची थी इसलिए उसे गेट पर खड़ा रहना पड़ा था।’ 
    ‘समय पर बच्चों को कापी-किताब लाकर न देना या फीस जमा न करना भी अपनी ही गलती है।’ सुमन बोली। 
    ‘हां, ठीक है। अपनी गलती है।’ रमाकांत शर्ट के बटन खोलता हुआ बोला- ‘दो-चार दिन की ही बात है। पेमेंट मिलते ही उसकी किताब ला दूंगा। वैसे भी, कल सेटरडे है। पढ़ाई होगी नहीं। और परसों संडे की छुट्टी रहेगी। बिटिया को केवल एक दिन यानी मंडे को किताब के बिना स्कूल जाना पड़ेगा। मंडे की शाम तक मैं किताब ला दूंगा।’ कहते हुए रमाकांत ने शर्ट उतारी और उसे खूंटी पर टांग दिया। तभी उसके मोबाईल की घंटी घनघनाने लगी। मोबाईल कान से लगाकर उसने ‘हैलो’ कहा और तत्काल बाद उसके मुंह से आश्चर्यमिश्रिम आवाज निकली-‘अरे...कब...कैसे...कहां हो तुम लोग...ओके-ओके, मैं भी पहुंचता हूं।’ कहकर उसने मोबाईल आफ किया और वापस शर्ट पहनने लगा। 
    ‘क्या हुआ।’ उसकी बौखलाहट देख सुमन बोली-‘फिर कहां चल पड़े।’ 
    ‘यार, वो...।’ शर्ट के बटन लगाते हुए रमाकांत बोला-‘राजेश को अटैक आया है। तुम जानती हो न उसे...वो प्रापर्टी डीलर।’
    ‘राजेश...।’ सुमन अपने दिमाग पर जोर डालते हुए बोली-‘अच्छा वो..। उन्हें अटैक कैसे आ गया। वो तो अच्छे-भले थे।’
    सुमन की बातों का जवाब देने की बजाए रमाकांत बोला-‘मैं चलता हूं। हो सकता है देर हो जाए। मेरा इंतजार मत करना और खाना खा लेना।’ कहकर वह बाहर निकल गया। 
    अस्पताल पहुंचने पर उसने देखा, वहां काफी भीड़ जमा है। भीड़ देखकर उसका दिल धक्क से रह गया था। भीड़ के साथ पुलिस बल भी मौजूद था। अस्पताल परिसर में भीड़ और उसके साथ पुलिस बल के होने का तात्पर्य उसकी समझ में नहीं आया। अनिष्ट की आशंका से उसने जल्दी से स्कूटर पार्क किया और तेज-तेज कदमों से मुख्य द्वार की ओर बढ़ गया। सामने ही उसे विमल तिवारी, गजेंद्र और ईश्वर मिल गए। राजेश के परेशानहाल परिजन इधर-उधर टहल रहे थे। महिलाएं राजेश की पत्नी को दिलासा दे रही थीं।  
    ‘अब कैसा है राजेश।’ रमाकांत ने दबी जबान में गजेंद्र से पूछा। 
    ‘कुछ कहा नहीं जा सकता।’ गजेंद्र बोला-‘कुछ टेस्ट हो गए हैं। अब एंजीओग्राफी हो रही है। देखो, क्या होता है।’ 
    ‘बाहर शोर कैसा है, काफी भीड़ लगी है।’ रमाकांत ने पूछा।
    ‘उनके किसी परिजन की उपचार के दौरान अस्पताल में मौत हो गई है।’ ईश्वर बोला-‘अस्पताल प्रबंधन ने परिजनों को एक लाख रुपए का बिल थमा दिया है। परिजन कह रहे हैं कि डाक्टरों की लापरवाही से मौत हुई है...।’ 
    ‘तो...।’
    ‘तो क्या।’ ईश्वर बोला-‘मृतक के परिजन पैसा देने के मूड में नहीं है। ऊपर से वे डाक्टरों पर कार्रवाई की मांग भी कर रहे हैं।’ 
    ‘यार।’ रमाकांत ने दोनों हाथ कमर पर रखते हुए कहा-‘गरीबों को भी इतनी महंगी बीमारी होती है...।’ 
    रमाकांत की फुसफुसाहट पर विमल तिवारी हंसकर बोले-‘बीमारी भी क्या अमीरी-गरीबी देखकर आती है।’ 
    अभी वे बातें कर रही ही थे कि डा. दीक्षित केबिन से बाहर निकले। उन्हें देखकर राजेश के परिजन सहित गजेंद्र, विमल और रमाकांत वगैरह भी उधर ही बढ़ गए। 
    डा. दीक्षित ने कहा-‘कार्डियक एंजाईना बढ़ा हुआ है। एंजीओप्लास्टी करनी पड़ेगी।’ उन्होंने आगे कहा-‘आप चाहें तो सेकंड ओपिनियन ले सकते हैं। पेशेंट को कहीं और भी ले जा सकते हैं। लेकिन...।’
    ‘लेकिन क्या...।’ राजेश के चाचा ने जल्दी से पूछा।
    ‘जो भी करना हो, जल्दी करें। देर करना पेशेंट के लिए घातक हो सकता है।’ 
    ‘हमें कुछ नहीं करना।’ चाचा जी के कुछ बोलने से पहले ही राजेश के बेटे ने कहा-‘डाक्टर साब, आप जो जरूरी समझें, करें। हमें न सेकंड ओपिनियन लेना है न पापा को कहीं और लेकर जाना है।’ 
    बिटिया को ट्यूशन मैम के पास छोड़कर सुमन जब घर लौटी तो रमाकांत उसे घर पर ही मिल गया। वह आंगन में ही बैठा था। सुमन को देखकर वह हौले से मुस्कुराया और बोला-‘ट्यूशन मैम के पास गई थीं।’ 
    ‘हां।’ कहकर सुमन ने उसके बालों को सहलाया और बोली-‘चाय लाऊं।’
    ‘हां, पी लूंगा।’ रमाकांत बोला-‘तुम अपने लिए भी बना लो।’ 
    ‘ओ के।’ कहकर सुमन भीतर चली गई। 
    थोड़ी देर बाद वह चाय के कप लिए रमाकांत के पास पहुंची और वहीं पड़ी एक कुर्सी खींचकर उसके बगल में बैठ गई। रमाकांत ने चाय का एक लंबा घूंट लिया और अमरूद के पेड़ पर चहचहा रही चिड़िया को देखने लगा। 
    ‘क्या बात है।’ रमाकांत को गौर से देखते हुए सुमन बोली-‘तबियत तो ठीक है न।’
    ‘तबियत।’ रमाकांत चौंककर बोला-‘क्या हुआ।’
    ‘कुछ गुमसुम लग रहे हो।’ 
    ‘गुमसुम...। नहीं तो...।’ 
    ‘बिटिया की किताब आज ही ले आए। तुम तो कह रहे थे परसों लाउंगा। पेमेंट मिलेगी तो।’ 
    ‘वो...ऐसे ही।’ रमाकांत ने चाय का एक और घूंट लिया और बोला-‘मैंने सोचा, किताब लाना तो है ही, फिर आज ही क्यों न ले लूं।’ 
    ‘आज तुमने स्कूटर भी आड़ा-तिरछा खड़ा करने की बजाए बिल्कुल वैसा ही खड़ा किया है, जैसा करने को मैं कहती थी। तुम्हारे जूते, जुराब, शर्ट और पैंट वगैरह भी अपनी जगह पर हैं।’ 
    ‘तो...।’
    ‘तुम ऐसे तो नहीं थे।’ सुमन बोली-‘रोज मेरी आधी एनर्जी तुम्हारा सामान सहेजते चुक जाती थी।’ 
    ‘ऐसे ही यार।’ सुमन के चेहरे की ओर देखते हुए रमाकांत बोला-‘समझ लो, आज तुम पर प्यार आ गया है।’ 
    ‘वाव।’ सुमन चहककर बोली और रमाकांत की नाक पकड़कर उसके चेहरे को दाएं-बाएं घुमाने लगी।
    ‘छोड़ो भी।’ रमाकांत जल्दी से बोला-‘मेरी चाय गिर जाएगी।’ रमाकांत की हालत देख सुमन खिलखिलाकर हंस पड़ी। थोड़ी देर बाद चाय के कप उठाकर वह भीतर जाने के लिए उठी। लेकिन अचानक जैसे कुछ याद आया, बोली-‘और हां, तुम्हारा दोस्त राजेश कैसा है। गए थे उससे मिलने।’ 
    ‘राजेश।’ सुमन का हाथ पकड़कर रमाकांत उसे वापस कुर्सी पर बैठाते हुए बोला-‘राजेश की अस्पताल से छुट्टी हो गई है। मैं अभी उसी से मिलकर आ रहा हूं।’ 
    ‘अरे! लेकिन तुम तो कह रहे थे, उसे सीवियर अटैक आया है। फिर इतनी जल्दी डिस्चार्ज कैसे हो गए।’ 
    सुमन की बातों का कोई जवाब न देकर रमाकांत बोला-‘उससे मिलने जाते हुए मैं सोच रहा था, वह गंभीर हालत में बिस्तर में पड़ा होगा। हो सकता है, उसके स्लाईन भी लगी हो। और पता नहीं उससे बात करने का मौका भी मिलेगा या उसे सिर्फ देखकर ही लौटना पड़ेगा।’ 
    ‘तो।’ रमाकांत के लहजे ने सुमन को उत्सुकता में डाल दिया था। वह पूरी तन्मयता से रमाकांत की बातें सुन रही थी। रमाकांत ने आगे कहा-‘मैं जब उसके घर पहुंचा तो मेरी उम्मीद के बरअक्स वह मेरे लिए गेट खोलने खुद गेट तक आया। जितनी देर मैं वहां रहा, वह मेरे साथ बैठा बतियाता रहा। उसे देखकर ऐसा लग ही नहीं रहा था कि दो दिन पहले उसकी जिंÞदगी का कोई भरोसा नहीं था।’ 
    ‘ये तो अच्छी बात है।’ 
    ‘अच्छी तो है, लेकिन क्या अजीब भी नहीं है।’ रमाकांत बोला-‘दो दिन पहले जो बंदा मौत और जिंदगी के बीच झूल रहा था, वह आज इतना स्वस्थ दिखा जैसे उसे कुछ हुआ ही नहीं था।’
    ‘मेडिकल सार्इंस ने काफी तरक्की कर ली है जनाब।’ सुमन बोली-‘डाक्टर अब मरीज को मौत के मुंह से भी खींच लाते हैं।’
    ‘बशर्ते...।’ रमाकांत गंभीर लहजे में बोला-‘मरीज की जेब में पैसे हों।’ 
    ‘हां, वो तो है।’ सुमन बोली-पैसे जरूरी हैं। वैसे... कितना खर्च आ गया होगा राजेश को।’
    ‘तीन लाख साठ हजार।’
    ‘तीन ला...ख...।’ सुमन के मुंह से चीख सी निकल गई। शेष शब्द उसके मुंह में ही गडमड हो गए थे। थोड़ी देर बाद खुद को संयत कर वह बोली-‘दो दिन में इतने पैसे लग गए।’
    ‘जरा सोचो।’ रमाकांत बोला- ‘अगर उसके पास पैसे नहीं होते या उसकी जगह मैं होता...।’
    ‘डोंट वरी।’ रमाकांत की मनोदशा को समझते हुए सुमन उठ खड़ी हुई और चाय के कप हाथ में लेकर भीतर जाते हुए बोली-‘भगवान पीठ देखकर डंडे मारता है।’ कहकर वह भीतर चली गई। संभवत: वह नम हो चुकी अपनी आंखों को रमाकांत से छुपाना चाह रही थी। 
    जबकि उस वक्त रमाकांत की आंखों के आगे अस्पताल प्रबंधन से मिले एक लाख के बिल के विरोध में प्रदर्शन कर रहे गरीबों के चेहर डोल रहे थे। उसने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला और उसे तोड़-मरोड़कर गेट से बाहर फेंक कर उठ खड़ा हुआ। 


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