Saturday, 22 February 2025

कुत्ता तंत्र

Posted by Hastakshar  |  at  February 22, 2025

व्यंग्य 

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✒ सईद खान 

कुत्ता तंत्र

    मेरा स्वागत अनापेक्षित गर्मजोशी से हुआ। हालांकि हम मेट्कि तक साथ-साथ ही थे। कालेज में भी हमने एक साथ ही दाखिला लिया था और संभव था कि आगे कुछ और वर्षों तक भी हमारी पढ़ाई साथ-साथ ही जारी रहती, यदि एक भूतपूर्व छात्र नेता से इसका झगड़ा न हुआ होता। उस झगड़े के बाद से ही हमारे बीच दूरियां बढ़ती गई। यहां तक कि हमारे रास्ते भी अलग-अलग हो गए। वह क्रमश: वाया गुंडागर्दी राजनीति की ओर अग्रसर हो गया और मैं उसी रफ्तार से अपनी पढ़ाई में जुट गया।
    इसलिए आज मैं एमबीए हूं। अन्य सुख-सुविधाओं रहित मात्र दस हजार रुपए मासिक वेतनभोगी। और यह केंद्र में एक प्रभावशाली मंत्री है। भव्य बंगले, सेवा टहल के लिए नौकरों की पूरी एक गारद और आवागमन के लिए विलायती कारों का सुविधाभोगी।

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घर (कहानी)

    मैंने एक लंबी सांस लेकर कार्नर टेबल पर पड़े अखबार को चैथी मर्तबा उठाया और उसे यूं ही उलट-पुलट कर देखने लगा। अखबार की पढ़ी जा सकने योग्य तमाम खबरों को दो-दो बार और एक बार भी न पढ़ी जा सकने योग्य खबरों को एक-एक बार पढ़ चुकने के बाद, पूरे अखबार को सरसरी तौर पर देखने के चौथे चरण पर था कि तभी स्वल्पाहार से भरी एक बड़ी सी ट्े थामें एक सेवक वहां नमुदार हुआ। हाथ में थमी स्वल्पाहार की ट्े को उसने सेंटर टेबल पर रखा और मंत्री महोदय के ट्वायलेट में होने की परंपरागत सूचना देकर उल्टे पांव लौट गया।

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क्या रे जिंदगी (कहानी)

    मैंने एक अचटती सी नजर ट्े पर डाली और पुन: अखबार के पन्नों में खो गया। देश-विदेश पृष्ठ पर ब्रिटनी स्पीयर और मेडोना आदि की मादक तस्वीर छापने का औचित्य मैं आज ही समझ पाया। इसके साथ ही मेरा मन पृष्ठ प्रभारी की सजगता और ब्रिटनी, मैडोना की सोशल सर्विस के प्रति श्रद्धा से भर गया। इसके अभाव में मंत्री महोदय के ट्वायलेट की संड़ांध और सामने रखी ट्े की स्वादिष्ट महक से बचना कितना कष्टकारी होता।

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बुद्धिजीवी (कहानी)

    स्वल्पाहार परोसे जाने के पूरे पंद्रह मिनट बाद मंत्री महोदय वहां अवतरित हुए। उन्हें साक्षात देखकर मेरी काया उनके स्वागत में यंत्र चलित सी खड़ी हो गई। हालांकि काया के अंदर का ‘एमबीए’ सख्त प्रतिरोध कर रहा था।  लेकिन काया बाहरी व्यवस्था के प्रभाव में थी। सो तन कर सीधी खड़ी हो गई। अंदर के ‘एमबीए’ होने का दंभ उसी समय भरभरा कर ढेर हो गया था, जब वाचमेन ने मुझे हिकारतभरी नजर से देखा था।

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   वे मेरे सामने एक सोफे पर पसर गए और मुझे बैठने का इशारा करते हुए बोले -‘सब कुशल मंगल तो हैं।’
    मैंने कहा-‘हां। सब कुशल मंगल है।’
    ‘भाभी, बच्चे वगैरह?’ उसने मेरे परिवार की सुध ली। मैं अभिभूत हो गया। 
    मैं बोला -‘हां, सब ठीक हैं। बस- एक मुश्किल आ खड़ी हुई है।’
    ‘अरे! कैसी मुश्किल?’
    ‘अभी जिस मकान में मैं किराए से रह रहा हूं।’ मैं थोड़े संकोच के साथ बोला -‘उस मकान को बलराम सिंह ने खरीद लिया है।’
    ‘बल्लू ने...?’
    ‘बल्लू...?’
    ‘हां वही, बलराम सिंह। बहुत खुराफाती है साला। पैसे की बहुत गर्मी है साले को।’
    ‘उसने मकान खाली करने के लिए एक महीने की मोहलत दी थी। मुझे कोई ढंग का मकान मिला नहीं इसलिए मैं मकान खाली नहीं कर पाया।’
    ‘तो?’ 
    ‘दो दिन पहले इलाके का थानेदार आया था। यह कहने कि दो दिन में अगर मकान खाली नहीं हुआ तो सामान फेंकवा देगा।’
    ‘अरे।’ उसके मुंह से सम्वेदनात्मक आवाज निकली।
    ‘आज कुछ गुंडे आए थे।’ मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई -‘घर में घुसकर पत्नी और बच्चों के साथ बड़ी अभद्रता से पेश आए।’
    ‘मैं बात करता हूं उससे।’ अखबार का एक कोना फाड़कर उसकी सुरसरी बनाते हुए वह बोला -‘तुम ऐसा करो, जितनी जल्दी हो सके अपने लिए कोई दूसरा मकान ढूंढ लो। एकाध हफ्ते की मोहलत मैं उससे ले लूंगा।’ एक समोसा उठाकर उसे उदरस्थ करते हुए वह आगे बोला -‘तुमने तो कुछ लिया ही नहीं। ये तले हुए काजू तो लो, सेहत के लिए बहुत मुफीद हैं ये।’
    मैंने एक काजू उठाकर उसे हाथ में ले लिया और उंगलियों के बीच उसे यूं ही गोल-गोल करते हुए बोला -‘मैं चाहता हूं कि मुझे एक महीने की मोहलत मिल जाए। अगले महीने बच्चों की परीक्षा है। अभी मकान शिफ्ट करुंगा तो बच्चों को पढ़ाई में दिक्कत होगी।’
    ‘एक महीना...?’ वह लंबी डकार लेकर बोला -‘मुश्किल है। साला नहीं मानेगा।’
    ‘तुम्हारे बात करने से भी...?’
    ‘मैं बात करुंगा उससे। लेकिन मुश्किल है।’
    ‘बस, एक महीने की ही मोहलत दिलवा दो। परीक्षा होते ही...।’
    तभी उसके कुर्ते की जेब में रखा मोबाइल घनघनाने लगा। उसने जेब से मोबाइल निकालकर उसे कान से लगाया और बोला-‘हैलो। हां, मैं बोल रहा हूं।’
    थोड़ी देर बाद मोबाइल जेब के हवाले करते हुए वह मुझसे बोला -‘सीएम साहब का बुलावा है। मुझे जाना होगा। लेकिन तुम चिंता मत करो। बल्लू से मैं बात कर लूंगा। परीक्षा का क्या है। परीक्षा तो कहीं भी रहकर दी जा सकती है। फिर भी मैं बात करुंगा उससे।’
    वह उठ खड़ा हुआ। मैं भी खड़ा हो गया। वह अंदर वाले कमरे की ओर बढ़ गया। मैं बाहर निकल आया। काजू अब भी मेरे हाथ में था। मैं उसे मुट्ठी मेंं भींचे आगे बढ़ गया।
    आज मैं पैदल ही घर से चला था। स्कूटर की हेड लाइट पिछले कुछ दिनों से परेशान कर रही थी। दिन को मिस्त्री के पास जाने का न वक्त रहता है न याद आती है। इसलिए आज आफिस से लौटते हुए मैंने स्कूटर को मिस्त्री के पास छोड़ दिया था और मंत्री निवास के निकट रहने का लाभ उठाते हुए मैं पैदल ही घर से चल पड़ा था।
    मंत्री निवास से निकल कर मैं अपने घर की ओर अग्रसर हो गया। मन खिन्नता से भरा हुआ था। मंै इस मंत्री के पास जो आस लेकर आया था, वह टूट चुकी थी। यह मंत्री बाद में था, पहले मेरा दोस्त था इसलिए मुझे पूरी उम्मीद थी कि यह मेरा काम करवा देगा। इसका एक फोन कर देना ही काफी होता। लेकिन पता नहीं क्यों, इसने मुझमें कोई दिलचस्पी नहीं ली।
    मैं जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए घर की ओर जाने वाली गली में प्रविष्ठ हो गया। गली में सन्नाटा पसरा पड़ा था। मैं लंबे-लंबे डग भरता आगे बढ़ रहा था कि सहसा मेरी आहट से शेरु के कान खड़े हो गए। उसने भौंक कर गली में अपनी मौजूदगी का इशारा किया। मंैने भी गला खंखार कर उसे उसके भौंकने का जवाब दिया। यह बताने के लिए कि यह मैं हूं। इस मोहल्ले के पुराने बाशिंदों में से एक। लेकिन मेरे गला खंखारने का उसकी सेहत पर कोई असर नहीं हुआ। वह गुर्राने लगा। मैंने सोचा, शायद प्यार जता रहा है। गली का कुत्ता है। अपना शेरू है। लेकिन मेरी सोच गलत साबित हुई। उसकी गुर्राहट बदस्तूर बढ़ती गई। यहां तक कि जोर-जोर से भौंकते हुए वह मेरे पीछे ही हो लिया। थोड़ा आगे, एक स्थान पर जहां जरा रौशनी थी, मैं रुक गया। सोचा, शायद मेरी सूरत देखकर यह भौंकना बंद कर देगा। लेकिन मेरी सूरत देखकर भी उसने भौंकना बंद नहीं किया। अलबत्ता अब वह ऐसे-ऐसे पैंतरे दिखाने लगा था, जैसे मौका मिलते ही वह मुझे काट खाएगा। मैं बौखला गया। सोचने लगा, कल तक जो मेरी झूठन खाता था, आज मुझे ही आंखे दिखा रहा है। आखिर इसे हो क्या गया है?
    एक बारगी मेरे दिमाग में इस ख्याल ने भी करवट ली कि कहीं मेरे पसीने की बू तो चेंज नहीं हो गई है। कुत्तों के आगे (बद) बू का खास महत्व होता है। बू से ही वे निर्णय लेते हैं। कुछेक मामलों में मानव द्वारा लिए गए निर्णय भी कुत्तों द्वारा ग्रहित बू पर आधारित हुआ करते हैं। लेहाजा कुत्तों की घ्राण शक्ति से इंकार नहीं किया जा सकता। अलबत्ता यह माना जा सकता है कि पसीने की बू ही चेंज हो जाए।
    वे दिन लद गए, जब पसीना गुलाब हुआ करता था। पहले एक सी गिजा हुआ करती थी। एक जैसे लोग थे। साफ-सुथरी हवा थी और भ्रष्टाचार रहित वातावरण होता था। अब किसिम-किसिम की गिजा है। रंग-बिरंगे लोग हैं। प्रदूषण से लबरेज हवा है और भ्रष्ट वातावरण है। आज आदमी की आदमियत ही कहीं खो गई है, पसीने की कौन कहे। और शक्ल तो वैसे भी चेंजेबल है यार। आदमी ही आदमी को धोखा दे रहा है।
    शेरु के बदस्तूर भौंकनाद से दूसरी-तीसरी गली के कुत्ते भी अपनी-अपनी जगह से उसके सुर में सुर मिलाने लगे थे। पूरी गली भौंकनाद से गूंज रही थी। इधर शेरु भौंकता ‘भौं-भौं।’ उधर से कोई दूसरा कुत्ता उसके जवाब में तुकबंदी करता सा भौंकता ‘भौं-भौ-भउ-उ-उ..।’
    मुझे लगा, एकता की ऐसी मिसाल कहीं और देखने को शायद ही मिले। किसी पार्टी.... सारी... किसी गली का एक कुत्ता भौंकना शुरू किया नहीं कि दूसरी, तीसरी गली के बाकी कुत्ते भी भौंकने लग पड़ते हैं। बगैर यह देखे की क्यों और किस पर भौंका जा रहा है। चाहे उनका आपस में कोई वैचारिक मतभेद ही क्यों न हो, लेकिन जब बात पूरी बिरादरी पर आ जाती है तो इनकी एकता देखते ही बनती है। 
    अनुभव बताता है कि ऐसे में प्रतिकार की बजाए उनके आगे हथियार डाल देना चाहिए। 
    यही मैंने भी किया।


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