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Friday, 22 August 2025

नौशाद अहमद सिद्दीकी

✅ नई तहरीक : भिलाई

    अंचल के शायर नौशाद अहमद सिद्दीकी की ग़ज़लों का प्रसारण आकाशवाणी रायपुर रेडियो स्टेशन के साहित्यिक पत्रिका पल्लवी के कार्यक्रम में 23 अगस्त, शनिवार को सुबह 10 बजे होगा। इसकी रिकॉर्डिंग कार्यक्रम प्रभारी संपादक प्रकाश उदय ने की है। 
    इसके अलावा शायर नौशाद सिद्दीकी देश के प्रमुख मंचों पर ससम्मान आमंत्रित किए गए हैं। 24 अगस्त को अखिल भारतीय रेडियो श्रोता सम्मेलन, बागपत (उत्तर प्रदेश) के कार्यक्रम में नौशाद सिद्दीकी का सम्मान किया जाएगा वहीं वे 25 अगस्त को मेरठ सिटी उत्तर प्रदेश में आल इंडिया मुशायरा और कवि सम्मेलन में नामचीन शायरों, कवियों, कवित्रियों के साथ मंच साझा करेंगे। इस उपलब्धि पर साहित्यिक बिरादरी ने नौशाद अहमद सिद्दीकी को शुभकामनाएं दी है।

बागपत में सम्मानित होंगे शायर नौशाद, आकाशवाणी से प्रसारण आज

नौशाद अहमद सिद्दीकी

✅ नई तहरीक : भिलाई

    अंचल के शायर नौशाद अहमद सिद्दीकी की ग़ज़लों का प्रसारण आकाशवाणी रायपुर रेडियो स्टेशन के साहित्यिक पत्रिका पल्लवी के कार्यक्रम में 23 अगस्त, शनिवार को सुबह 10 बजे होगा। इसकी रिकॉर्डिंग कार्यक्रम प्रभारी संपादक प्रकाश उदय ने की है। 
    इसके अलावा शायर नौशाद सिद्दीकी देश के प्रमुख मंचों पर ससम्मान आमंत्रित किए गए हैं। 24 अगस्त को अखिल भारतीय रेडियो श्रोता सम्मेलन, बागपत (उत्तर प्रदेश) के कार्यक्रम में नौशाद सिद्दीकी का सम्मान किया जाएगा वहीं वे 25 अगस्त को मेरठ सिटी उत्तर प्रदेश में आल इंडिया मुशायरा और कवि सम्मेलन में नामचीन शायरों, कवियों, कवित्रियों के साथ मंच साझा करेंगे। इस उपलब्धि पर साहित्यिक बिरादरी ने नौशाद अहमद सिद्दीकी को शुभकामनाएं दी है।

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Tuesday, 19 August 2025



satire, story, article, feature, sayeed khan


- व्यंग्य
- सईद खान 

    बेगम को कामवाली चाहिए। मैं बोला-‘नौ लखा ले लो।’ 
    वह बोली-‘नहीं, कामवाली।’
    ‘कार, बंगला...।’ मैनें उसके स्त्रीत्व लोभ को कुरेदा।
    ‘नो, सिर्फ कामवाली।’
    ‘कहो तो वैसी साड़ी ला दूं, जैसी नए साल में पड़ोसन पहनी थी।’ मैंने पड़ोसन फंडा आजमाया।
    वह बोली-‘पहले कामवाली।’ वह तटस्थ थी। 
    अगर वह इनमें से किसी एक पर या सभी पर भी राजी हो जाती तो मैं फौरन प्रामिस कर लेता। लेकिन कोई चारा काम न आया। कार, बंगला और नौलखा का प्रलोभन भी नहीं चला। पड़ोसन का फंडा भी फुस्स हो गया।
     मैं आफिस पहुंचा। कामवाली दिमाग में हाथौड़े की तरह बार-बार प्रहार कर रही थी। मेरी परेशानी सुखचैन से छुपी न रह सकी। आखिर उसने पूछ ही लिया-‘क्या बात है बड़े बाबू, आज कुछ परेशान लग रहे हो?’
    ‘हां यार!’ मैं उसके हाथ से फाईल लेते हुए बोला-‘कामवाली नहीं मिल रही है।’
    ‘अरे!’ वह एकदम से चौंककर बोला-‘भाग गई? कब भागी?’ और मेरे कुछ बोलने से पहले ही वह कहता चला गया-‘कामवालियों का कोई भरोसा नहीं बड़े बाबू कि कब भाग जाए।’ थोड़े दिन तो ठीक-ठाक रहती है लेकिन मौका मिलते ही मालमत्ता लेकर चंपत हो जाती है। कभी-कभी तो यह भी सुनाई दे जाता है कि कामवाली अगर थोड़ा ठीक-ठाक हुई तो घर के लड़के ही उसे लेकर नौ-दो ग्यारह हो जाते हैं। वैसे...।’ थोड़ा रुककर वह बोला-‘आपका बेटा तो अभी छोटा है न...।’
    मैंने आंखे तरेरकर उसकी ओर देखा तो वह संभलकर बोला-‘नई, मैं तो यूं ही कह रहा था। वैसे... ज्यादा मालमत्ता लेकर तो नहीं भागी न बड़े बाबू? रपट-वपट लिखवाए या नहीं?’
    ‘नहीं।’ 
    ‘अरे! क्यों?’ं वह बोला-‘सबसे पहले तो रपट ही लिखवानी थी बड़े बाबू। ऐसे मामलों में लापरवाही ठीक नहीं होती। ऐसा कीजिए, अभीच चलिए। मैं भी चलता हूं।’
    ‘यार...।’ मैंने कुछ कहना चाहा।
    लेकिन मेरी बात काटकर वह धाराप्रवाह बोलता रहा-‘नई, अगर मालमत्ता जाने की रपट नहीं लिखवाना है तो मत लिखवाइये। लेकिन कामवाली के भागने की रपट तो जरूर लिखवाइये बड़े बाबू। शर्मा जी ने भी ऐसइच किया था।’ 
    ‘शर्मा जी ने...?’
    ‘हां बड़े बाबू।’ वह तनिक झुककर बोला-‘शर्मा जी की कामवाली तो काफी मालमत्ता लेकर भागी थी। लेकिन उन्होंने रपट लिखवाई सिर्फ कामवाली के भागने की। मुझसे कह रहे थे, यार! अगर मैं यह लिखवाता कि कामवाली मालमत्ता लेकर भागी है तो मेरी इंक्वारी हो जाती। मालमत्ते का क्या है। हाथ का मैल है। चला गया तो चला गया। फिर आ जाएगा।’
    ‘अच्छा।’ 
    ‘और क्या बड़े बाबू। आखिर आप भी तो उसी विभाग में हैं। मालमत्ते का क्या है। हाथ का मैल है। चला गया तो चला गया। फिर आ जाएगा। आ ही जाएगा। क्यों। वैसे.. गया कितना है?’ ढंग ऐसा था, जैसे सुखचैन के भेष में सामने जेम्स बांड खड़ा है।
    मैं बोला-‘एक भी नहीं।’
    ‘अंय।’ वह एकदम से सीधा हो गया। फिर बोला-‘चलो अच्छा हुआ। अच्छा हुआ कि खाली हाथ भागी। मालमत्ता लेकर भागती तो मुश्किल हो जाती।’
    ‘यार।’ मैं तनिक झल्लाकर बोला-‘तुम मेरी भी कुछ सुनोगे।’ 
    ‘हां-हां। बोलिए न बड़े बाबू।’ 
    ‘मेरी कामवाली नहीं भागी है।’
    ‘अंय। लेकिन अभी तो आप कह रहे थे...।’
    ‘मैंने कहा था, नहीं मिल रही है।’
    ‘तो मतलब तो वोइच हुआ न बड़े बाबू। भागी है तब तो नहीं मिल रही है।’
    ‘नहीं।’ मैं बोला -‘थी ही नहीं। होती तो भागती न?’
    ‘अरे! तो ऐसा बोलते न बड़े बाबू।’ वह बोला-‘आप बोले, नहीं मिल रही है तो मैंने समझा भाग गई है तो नहीं मिल रही है।’
    ‘अच्छा, सुनो।’ उसकी बकवास से तंग आकर मैं बोला-‘तुम्हारी नजर में है कोई?’
    ‘कई हैं।’ वह एक झटके से बोला-‘कहिए तो एकाध सेट कर दूं।’
    ‘सेट कर दूं मतलब?’ मैंने तनिक चैंककर कर पूछा।
    वह बोला-‘सेट कर दूं मतलब। सेट कर दूं, और क्या? पता तो चले कि आपको कामवाली चाहिए किसलिए? घर के लिए, पर्सनल यूज के लिए या बास के लिए?’
    ‘मुझे घर के लिए चाहिए।’ मैं जल्दी से बोला।
    ‘घर के लिए...।’ वह एक पल कुछ सोचकर बोला-‘तो फिर घर टाइप देखनी पड़ेगी। यानि थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। लेकिन मिल जाएगी। ऐसा कीजिए, आज आफिस के बाद आप मेरे साथ ही चलिए।’
    आफिस के बाद सुखचैन मुझे लेकर एक गंदी सी बस्ती में गया। वहां एक घर के सामने स्कूटर रुकवाकर ‘अभी आया’ कहते हुए वह घर के अंदर घुस गया।
    थोड़ी देर बाद एक अधेड़ उम्र की औरत के साथ वह बाहर निकला।
    वह लीला थी। वह बोली-‘मेरे पास तो टेम नहीं है। आप सावित्री से मिल लीजिए।’
    सावित्री का पता उसने सुखचैन को समझा दी थी।
    हम सावित्री के घर पहुंचे। सावित्री ने हमें कमला के पास भेज दी। कमला ने विमला के पास। विमला बोली-‘सविता को देख लो। शायद वह खाली हो। हम सविता के पास पहुंचे। वह बोली -‘मेरे पास तो पहले ही छह घर हैं।’
    हमें वहां से बैंरग लौटना पड़ा।
    घर लौटते हुए रास्ते में सुखचैन बोला-‘चिंता की बात नहीं है बड़े बाबू। कल हम फिर निकलेंगे इस अभियान पर।’
    घर लौटा तो बेगम फिर भिनक गई। एक तो देर से घर लौट रहा था। दूसरा ये कि उसे सुनाने के लिए कामवाली से संबंधित कोई शुभ समाचार भी नहीं था मेरे पास। ‘कैसे मर्द हो तुम? एक कामवाली भी नहीं ढूंढ सकते...।’ जैसा कटु वचन सुनकर भी कामवाली ढूंढने के निमित्त आज की अपनी कोशिश का ब्यौरा मैं उसे नहीं दे सका। कोई फायदा नहीं होता। उसे तो रिजल्ट चाहिए था।
    दूसरे दिन आफिस जाते हुए मैं सोच रहा था कि कुछ दिनों की छुट्टी लेकर सिर्फ एक सूत्रीय काम किया जाए। कामवाली ढूंढने का। सो आफिस पहुंच कर सबसे पहला काम जो मैंने किया, वह था, छुट्टी के लिए आवेदन लिखकर बास के सामने खड़े होने का।
    वे बोले-‘क्या बात है?’
    मैं बोला-‘सर। मुझे छुट्टी चाहिए। पूरे एक हफ्ते की। इटस एन इमरजेंसी।’
    बॉस जरा भी विचलित नहीं हुए। पूर्ववत फाइल देखते हुए बोले-‘तुम्हारी सास पिछले हफ्ते ही बाथरूम में फिसलकर गिरी थी जिससे उनकी कमर में फे्रक्चर गया था। साढू की बिटिया की शादी भी हो गई है। साले का रिश्ता तय करने के नाम पर भी तुम छुट्टी ले चुके हो। अब क्या बहाना लेकर आए हो?’
    ‘बहाना नहीं सर।’ मैं बोला-‘इस बार मेरे पास जेनुइन कारण है। मुझे कामवाली ढूंढने के लिए छुट्टी चाहिए।’
    ‘कामवाली?’ बास ने चैंक कर मेरी ओर देखा।
    मैंने कहा-‘जी सर।’
    मेरा आवेदन फौरन मंजूर हो गया। दस्तखत करते हुए बास बोले-‘यार! अगर कोई ढंग की मिले तो एकाध मेरी वाइफ के लिए भी देख लेना।’
    हफ्ते भर की छुटटी का एक-एक पल कामवाली ढूंढने में गुजर गया। लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। इस चक्कर में वजन घटकर आधा हो गया। रंग काला पड़ गया और बाल भी काफी झड़ गए। अपने फीगर में आए इस क्रांतिकारी परिवर्तन का अहसास मुझे आफिस ज्वायन करते ही हो गया था। शीला अब घोष दादा के बगल में बैठने लगी थी।
    बीवी की प्रताड़ना का क्रम भी जारी थी। शीला का मेरे बगल से कुर्सी हटाकर घोष दादा के बगल में बैठने की हरकत से मन पहले ही कुंठा से भरा हुआ था कि एक दिन सुखचैन आया। आते ही बोला-‘बड़े बाबू। मिल गई।’
    ‘अच्छा।’ मैं फाईल के पन्ने पलटते हुए बोला-‘ऐसा करो, उसे शर्मा जी के पास ले जाओ। उनसे कहना, एक सरसरी नजर डालकर बास के केबिन में भेज दें।’
    ‘क्या?’ सुखचैन चौंककर बोला-‘क्या बोल रय हो बड़े बाबू?’
    ‘अरे यार।’ फाईल एक झटके से बंद कर मैं तनिक झल्लाकर बोला-‘मैं उसे निपटा चुका हंू। शर्मा जी देख लें तो बास का दस्तखत करवाकर वापस ले आना।’
    ‘किसकी बात कर रय हो बड़े बाबू?’
    ‘लेबर फाइल की। और किसकी।’
    ‘ओह!’ सुखचैन जरा झुककर बोला-‘लेकिन मैं तो कामवाली की बात कर रहा हंू। कामवाली की। एक नंबर की कामवाली ढूंढकर रखा हूं मैं आपके लिए।’
    ‘कामवाली?’ मैं एकदम से उछलकर खड़ा ही हो गया।
    थोड़ी देर बाद मैं सुखचैन के साथ लीला की उसी गंदी सी बस्ती में एक घर के सामने खड़ा दरवाजा खुलने का इंतजार कर रहा था। दूसरी बार दरवाजा खटखटाने पर पच्चीस-छब्बीस वर्षीय एक युवती ने दरवाजा खोला। उसे देखकर सुखचैन ने मुझसे कहा, ‘ये रामकली है। मैं इसी की बात कर रहा था। कल ही गांव से लौटी है।’
    तीखे नाक-नक्श की वह युवती कहीं से भी कमवाली नजर नहीं आ रही थी। मैं उसे ऊपर से नीचे तक देखकर सुखचैन से बोला-‘ये कामवाली है?’
    ‘और कैसी चाहिए बड़े बाबू आपको?’ मेरा आशय न समझते हुए वह बोला-‘फस्स क्लास तो है।’
    बाकी बातें मैंने रामकली से की। उसे काम की तलाश थी और मुझे कामवाली की। अंतत: डीलिंग हो गई। वह बोली-‘मैं कल से आउंगी।’
    घर लौटते हुए, रास्ते में सुखचैन मुझसे बोला-‘बड़े बाबू, आज तो आप ऐसे खुश नजर आ रहे हैं जैसे आपका डबल प्रमोशन हो गया हो।’
    ‘हां, और ये खुशी मुझे तुम्हारी वजह से मिली है।’ मैं एक होटल के सामने स्कूटर खड़ी करते हुए बोला-‘चलो, आज इसी खुशी में तुम्हे बढ़िया नाश्ता कराता हूं।’
    नाश्ता करते हुए सुखचैन बोला-‘मेरे आठ बच्चे है बड़े बाबू। बूढ़े माता-पिता भी साथ ही रहते हैं। और घर भी पुश्तैनी है। पुराने जमाने का। आज के छोटे-छोटे चार फ्लैट के बराबर। पूरे घर की देखभाल पत्नी के ही जिम्मे है। घर के अलावा बच्चों की, मेरी और माता-पिता की साज-संभाल भी वही करती है।’
    ‘अकेले?’
    ‘जी हां।’
    ‘कोई कामवाली क्यों नही रख लेते?’
    ‘कामवाली।’ सुखचैन एक रसगुल्ला उठा कर मुंह में रखते हुए बोला-‘मेरी पत्नी को पसंद नहीं कि उसके हिस्से का काम कोई और करे। घर का काम करने में उसे आनंद आता है।’
    सुखचैन ने जवाब तो सहजता से दिया था लेकिन मुझे लगा कि वह मुझे लताड़ रहा है।
    दूसरे दिन नियत समय पर रामकली घर आ गई।
    मंै उस वक्त नहा कर बाहर निकला था और अफिस के लिए तैयार हो रहा था, जब रामकली ने घंटी बजाई। दरवाजा पत्नी ने खोला। तब तक मैं भी वहां पहुंच गया था। दरवाजे पर रामकली को देखकर मैं चहका -‘ओह! रामकली। तू आ गई।’ कहकर मैंने पत्नी से रामकली का परिचय कराया। रामकली को ऊपर से नीचे तक देखते हुए बेगम की आंखे क्रमश: फैलती रही। रामकली का अच्छी तरह मुआएना करने के बाद, जब बेगम ने मेरी ओर देखा तो उसकी फैली-फैली आंखों में मैं अपने लिए प्रशंसा के भाव तलाश रहा था। लेकिन वहां प्रशंसा की बजाए शोले भड़क रहे थे। मैं समझ गया कि यह रामकली की कमसिन उमर और उसकी गठी हुई देहयष्टि का असर है। अगर मजबूरी नहीं होती तो तय था कि बेगम उसी क्षण रामकली को धक्के देकर भगा दी होती और मेरी सात पुश्तों के पुल्लिंग वर्ग को बदचलन करार दे रही होती।
    शाम को जब मैं आफिस से लौटा तो रामकली हाल में सफाई कर रही थी और बेगम किचन में मशरूफ थी। मैं सीधे अपने कमरे में चला गया और फाइल वगैरह यथास्थान रखते हुए रामकली को आवाज देकर चाय लाने के लिए कहा।
    थोड़ी देर बाद, हाथों में चाय की ट्े थामें रामकली की जगह बेगम दनदनाते हुए कमरे में नमुदार हुई और चाय की ट्े मेरे सामने पटकते हुए बोली-‘खबरदार! जो आज के बाद किसी काम के लिए तुमने रामकली को आवाज दी तो। मंै मर गई हंू क्या?’
    मुझे सहसा सुखचैन की याद हो आई। उसकी पत्नी को घर का काम करने में आनंद आता था। मेरी बेगम को यह आनंद कमसिन रामकली के आने के बाद आने लगा था। शायद।

कामवाली



satire, story, article, feature, sayeed khan


- व्यंग्य
- सईद खान 

    बेगम को कामवाली चाहिए। मैं बोला-‘नौ लखा ले लो।’ 
    वह बोली-‘नहीं, कामवाली।’
    ‘कार, बंगला...।’ मैनें उसके स्त्रीत्व लोभ को कुरेदा।
    ‘नो, सिर्फ कामवाली।’
    ‘कहो तो वैसी साड़ी ला दूं, जैसी नए साल में पड़ोसन पहनी थी।’ मैंने पड़ोसन फंडा आजमाया।
    वह बोली-‘पहले कामवाली।’ वह तटस्थ थी। 
    अगर वह इनमें से किसी एक पर या सभी पर भी राजी हो जाती तो मैं फौरन प्रामिस कर लेता। लेकिन कोई चारा काम न आया। कार, बंगला और नौलखा का प्रलोभन भी नहीं चला। पड़ोसन का फंडा भी फुस्स हो गया।
     मैं आफिस पहुंचा। कामवाली दिमाग में हाथौड़े की तरह बार-बार प्रहार कर रही थी। मेरी परेशानी सुखचैन से छुपी न रह सकी। आखिर उसने पूछ ही लिया-‘क्या बात है बड़े बाबू, आज कुछ परेशान लग रहे हो?’
    ‘हां यार!’ मैं उसके हाथ से फाईल लेते हुए बोला-‘कामवाली नहीं मिल रही है।’
    ‘अरे!’ वह एकदम से चौंककर बोला-‘भाग गई? कब भागी?’ और मेरे कुछ बोलने से पहले ही वह कहता चला गया-‘कामवालियों का कोई भरोसा नहीं बड़े बाबू कि कब भाग जाए।’ थोड़े दिन तो ठीक-ठाक रहती है लेकिन मौका मिलते ही मालमत्ता लेकर चंपत हो जाती है। कभी-कभी तो यह भी सुनाई दे जाता है कि कामवाली अगर थोड़ा ठीक-ठाक हुई तो घर के लड़के ही उसे लेकर नौ-दो ग्यारह हो जाते हैं। वैसे...।’ थोड़ा रुककर वह बोला-‘आपका बेटा तो अभी छोटा है न...।’
    मैंने आंखे तरेरकर उसकी ओर देखा तो वह संभलकर बोला-‘नई, मैं तो यूं ही कह रहा था। वैसे... ज्यादा मालमत्ता लेकर तो नहीं भागी न बड़े बाबू? रपट-वपट लिखवाए या नहीं?’
    ‘नहीं।’ 
    ‘अरे! क्यों?’ं वह बोला-‘सबसे पहले तो रपट ही लिखवानी थी बड़े बाबू। ऐसे मामलों में लापरवाही ठीक नहीं होती। ऐसा कीजिए, अभीच चलिए। मैं भी चलता हूं।’
    ‘यार...।’ मैंने कुछ कहना चाहा।
    लेकिन मेरी बात काटकर वह धाराप्रवाह बोलता रहा-‘नई, अगर मालमत्ता जाने की रपट नहीं लिखवाना है तो मत लिखवाइये। लेकिन कामवाली के भागने की रपट तो जरूर लिखवाइये बड़े बाबू। शर्मा जी ने भी ऐसइच किया था।’ 
    ‘शर्मा जी ने...?’
    ‘हां बड़े बाबू।’ वह तनिक झुककर बोला-‘शर्मा जी की कामवाली तो काफी मालमत्ता लेकर भागी थी। लेकिन उन्होंने रपट लिखवाई सिर्फ कामवाली के भागने की। मुझसे कह रहे थे, यार! अगर मैं यह लिखवाता कि कामवाली मालमत्ता लेकर भागी है तो मेरी इंक्वारी हो जाती। मालमत्ते का क्या है। हाथ का मैल है। चला गया तो चला गया। फिर आ जाएगा।’
    ‘अच्छा।’ 
    ‘और क्या बड़े बाबू। आखिर आप भी तो उसी विभाग में हैं। मालमत्ते का क्या है। हाथ का मैल है। चला गया तो चला गया। फिर आ जाएगा। आ ही जाएगा। क्यों। वैसे.. गया कितना है?’ ढंग ऐसा था, जैसे सुखचैन के भेष में सामने जेम्स बांड खड़ा है।
    मैं बोला-‘एक भी नहीं।’
    ‘अंय।’ वह एकदम से सीधा हो गया। फिर बोला-‘चलो अच्छा हुआ। अच्छा हुआ कि खाली हाथ भागी। मालमत्ता लेकर भागती तो मुश्किल हो जाती।’
    ‘यार।’ मैं तनिक झल्लाकर बोला-‘तुम मेरी भी कुछ सुनोगे।’ 
    ‘हां-हां। बोलिए न बड़े बाबू।’ 
    ‘मेरी कामवाली नहीं भागी है।’
    ‘अंय। लेकिन अभी तो आप कह रहे थे...।’
    ‘मैंने कहा था, नहीं मिल रही है।’
    ‘तो मतलब तो वोइच हुआ न बड़े बाबू। भागी है तब तो नहीं मिल रही है।’
    ‘नहीं।’ मैं बोला -‘थी ही नहीं। होती तो भागती न?’
    ‘अरे! तो ऐसा बोलते न बड़े बाबू।’ वह बोला-‘आप बोले, नहीं मिल रही है तो मैंने समझा भाग गई है तो नहीं मिल रही है।’
    ‘अच्छा, सुनो।’ उसकी बकवास से तंग आकर मैं बोला-‘तुम्हारी नजर में है कोई?’
    ‘कई हैं।’ वह एक झटके से बोला-‘कहिए तो एकाध सेट कर दूं।’
    ‘सेट कर दूं मतलब?’ मैंने तनिक चैंककर कर पूछा।
    वह बोला-‘सेट कर दूं मतलब। सेट कर दूं, और क्या? पता तो चले कि आपको कामवाली चाहिए किसलिए? घर के लिए, पर्सनल यूज के लिए या बास के लिए?’
    ‘मुझे घर के लिए चाहिए।’ मैं जल्दी से बोला।
    ‘घर के लिए...।’ वह एक पल कुछ सोचकर बोला-‘तो फिर घर टाइप देखनी पड़ेगी। यानि थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। लेकिन मिल जाएगी। ऐसा कीजिए, आज आफिस के बाद आप मेरे साथ ही चलिए।’
    आफिस के बाद सुखचैन मुझे लेकर एक गंदी सी बस्ती में गया। वहां एक घर के सामने स्कूटर रुकवाकर ‘अभी आया’ कहते हुए वह घर के अंदर घुस गया।
    थोड़ी देर बाद एक अधेड़ उम्र की औरत के साथ वह बाहर निकला।
    वह लीला थी। वह बोली-‘मेरे पास तो टेम नहीं है। आप सावित्री से मिल लीजिए।’
    सावित्री का पता उसने सुखचैन को समझा दी थी।
    हम सावित्री के घर पहुंचे। सावित्री ने हमें कमला के पास भेज दी। कमला ने विमला के पास। विमला बोली-‘सविता को देख लो। शायद वह खाली हो। हम सविता के पास पहुंचे। वह बोली -‘मेरे पास तो पहले ही छह घर हैं।’
    हमें वहां से बैंरग लौटना पड़ा।
    घर लौटते हुए रास्ते में सुखचैन बोला-‘चिंता की बात नहीं है बड़े बाबू। कल हम फिर निकलेंगे इस अभियान पर।’
    घर लौटा तो बेगम फिर भिनक गई। एक तो देर से घर लौट रहा था। दूसरा ये कि उसे सुनाने के लिए कामवाली से संबंधित कोई शुभ समाचार भी नहीं था मेरे पास। ‘कैसे मर्द हो तुम? एक कामवाली भी नहीं ढूंढ सकते...।’ जैसा कटु वचन सुनकर भी कामवाली ढूंढने के निमित्त आज की अपनी कोशिश का ब्यौरा मैं उसे नहीं दे सका। कोई फायदा नहीं होता। उसे तो रिजल्ट चाहिए था।
    दूसरे दिन आफिस जाते हुए मैं सोच रहा था कि कुछ दिनों की छुट्टी लेकर सिर्फ एक सूत्रीय काम किया जाए। कामवाली ढूंढने का। सो आफिस पहुंच कर सबसे पहला काम जो मैंने किया, वह था, छुट्टी के लिए आवेदन लिखकर बास के सामने खड़े होने का।
    वे बोले-‘क्या बात है?’
    मैं बोला-‘सर। मुझे छुट्टी चाहिए। पूरे एक हफ्ते की। इटस एन इमरजेंसी।’
    बॉस जरा भी विचलित नहीं हुए। पूर्ववत फाइल देखते हुए बोले-‘तुम्हारी सास पिछले हफ्ते ही बाथरूम में फिसलकर गिरी थी जिससे उनकी कमर में फे्रक्चर गया था। साढू की बिटिया की शादी भी हो गई है। साले का रिश्ता तय करने के नाम पर भी तुम छुट्टी ले चुके हो। अब क्या बहाना लेकर आए हो?’
    ‘बहाना नहीं सर।’ मैं बोला-‘इस बार मेरे पास जेनुइन कारण है। मुझे कामवाली ढूंढने के लिए छुट्टी चाहिए।’
    ‘कामवाली?’ बास ने चैंक कर मेरी ओर देखा।
    मैंने कहा-‘जी सर।’
    मेरा आवेदन फौरन मंजूर हो गया। दस्तखत करते हुए बास बोले-‘यार! अगर कोई ढंग की मिले तो एकाध मेरी वाइफ के लिए भी देख लेना।’
    हफ्ते भर की छुटटी का एक-एक पल कामवाली ढूंढने में गुजर गया। लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। इस चक्कर में वजन घटकर आधा हो गया। रंग काला पड़ गया और बाल भी काफी झड़ गए। अपने फीगर में आए इस क्रांतिकारी परिवर्तन का अहसास मुझे आफिस ज्वायन करते ही हो गया था। शीला अब घोष दादा के बगल में बैठने लगी थी।
    बीवी की प्रताड़ना का क्रम भी जारी थी। शीला का मेरे बगल से कुर्सी हटाकर घोष दादा के बगल में बैठने की हरकत से मन पहले ही कुंठा से भरा हुआ था कि एक दिन सुखचैन आया। आते ही बोला-‘बड़े बाबू। मिल गई।’
    ‘अच्छा।’ मैं फाईल के पन्ने पलटते हुए बोला-‘ऐसा करो, उसे शर्मा जी के पास ले जाओ। उनसे कहना, एक सरसरी नजर डालकर बास के केबिन में भेज दें।’
    ‘क्या?’ सुखचैन चौंककर बोला-‘क्या बोल रय हो बड़े बाबू?’
    ‘अरे यार।’ फाईल एक झटके से बंद कर मैं तनिक झल्लाकर बोला-‘मैं उसे निपटा चुका हंू। शर्मा जी देख लें तो बास का दस्तखत करवाकर वापस ले आना।’
    ‘किसकी बात कर रय हो बड़े बाबू?’
    ‘लेबर फाइल की। और किसकी।’
    ‘ओह!’ सुखचैन जरा झुककर बोला-‘लेकिन मैं तो कामवाली की बात कर रहा हंू। कामवाली की। एक नंबर की कामवाली ढूंढकर रखा हूं मैं आपके लिए।’
    ‘कामवाली?’ मैं एकदम से उछलकर खड़ा ही हो गया।
    थोड़ी देर बाद मैं सुखचैन के साथ लीला की उसी गंदी सी बस्ती में एक घर के सामने खड़ा दरवाजा खुलने का इंतजार कर रहा था। दूसरी बार दरवाजा खटखटाने पर पच्चीस-छब्बीस वर्षीय एक युवती ने दरवाजा खोला। उसे देखकर सुखचैन ने मुझसे कहा, ‘ये रामकली है। मैं इसी की बात कर रहा था। कल ही गांव से लौटी है।’
    तीखे नाक-नक्श की वह युवती कहीं से भी कमवाली नजर नहीं आ रही थी। मैं उसे ऊपर से नीचे तक देखकर सुखचैन से बोला-‘ये कामवाली है?’
    ‘और कैसी चाहिए बड़े बाबू आपको?’ मेरा आशय न समझते हुए वह बोला-‘फस्स क्लास तो है।’
    बाकी बातें मैंने रामकली से की। उसे काम की तलाश थी और मुझे कामवाली की। अंतत: डीलिंग हो गई। वह बोली-‘मैं कल से आउंगी।’
    घर लौटते हुए, रास्ते में सुखचैन मुझसे बोला-‘बड़े बाबू, आज तो आप ऐसे खुश नजर आ रहे हैं जैसे आपका डबल प्रमोशन हो गया हो।’
    ‘हां, और ये खुशी मुझे तुम्हारी वजह से मिली है।’ मैं एक होटल के सामने स्कूटर खड़ी करते हुए बोला-‘चलो, आज इसी खुशी में तुम्हे बढ़िया नाश्ता कराता हूं।’
    नाश्ता करते हुए सुखचैन बोला-‘मेरे आठ बच्चे है बड़े बाबू। बूढ़े माता-पिता भी साथ ही रहते हैं। और घर भी पुश्तैनी है। पुराने जमाने का। आज के छोटे-छोटे चार फ्लैट के बराबर। पूरे घर की देखभाल पत्नी के ही जिम्मे है। घर के अलावा बच्चों की, मेरी और माता-पिता की साज-संभाल भी वही करती है।’
    ‘अकेले?’
    ‘जी हां।’
    ‘कोई कामवाली क्यों नही रख लेते?’
    ‘कामवाली।’ सुखचैन एक रसगुल्ला उठा कर मुंह में रखते हुए बोला-‘मेरी पत्नी को पसंद नहीं कि उसके हिस्से का काम कोई और करे। घर का काम करने में उसे आनंद आता है।’
    सुखचैन ने जवाब तो सहजता से दिया था लेकिन मुझे लगा कि वह मुझे लताड़ रहा है।
    दूसरे दिन नियत समय पर रामकली घर आ गई।
    मंै उस वक्त नहा कर बाहर निकला था और अफिस के लिए तैयार हो रहा था, जब रामकली ने घंटी बजाई। दरवाजा पत्नी ने खोला। तब तक मैं भी वहां पहुंच गया था। दरवाजे पर रामकली को देखकर मैं चहका -‘ओह! रामकली। तू आ गई।’ कहकर मैंने पत्नी से रामकली का परिचय कराया। रामकली को ऊपर से नीचे तक देखते हुए बेगम की आंखे क्रमश: फैलती रही। रामकली का अच्छी तरह मुआएना करने के बाद, जब बेगम ने मेरी ओर देखा तो उसकी फैली-फैली आंखों में मैं अपने लिए प्रशंसा के भाव तलाश रहा था। लेकिन वहां प्रशंसा की बजाए शोले भड़क रहे थे। मैं समझ गया कि यह रामकली की कमसिन उमर और उसकी गठी हुई देहयष्टि का असर है। अगर मजबूरी नहीं होती तो तय था कि बेगम उसी क्षण रामकली को धक्के देकर भगा दी होती और मेरी सात पुश्तों के पुल्लिंग वर्ग को बदचलन करार दे रही होती।
    शाम को जब मैं आफिस से लौटा तो रामकली हाल में सफाई कर रही थी और बेगम किचन में मशरूफ थी। मैं सीधे अपने कमरे में चला गया और फाइल वगैरह यथास्थान रखते हुए रामकली को आवाज देकर चाय लाने के लिए कहा।
    थोड़ी देर बाद, हाथों में चाय की ट्े थामें रामकली की जगह बेगम दनदनाते हुए कमरे में नमुदार हुई और चाय की ट्े मेरे सामने पटकते हुए बोली-‘खबरदार! जो आज के बाद किसी काम के लिए तुमने रामकली को आवाज दी तो। मंै मर गई हंू क्या?’
    मुझे सहसा सुखचैन की याद हो आई। उसकी पत्नी को घर का काम करने में आनंद आता था। मेरी बेगम को यह आनंद कमसिन रामकली के आने के बाद आने लगा था। शायद।

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Thursday, 3 July 2025

 मोहर्रम उल हराम, 1447 हिजरी 

                                                                             फरमाने रसूल   

"रसुल अल्लाह ﷺ ने एक शख्स को सूरह अखलास पढ़ते हुए सुना तो फरमाया, इसके लिए जन्नत वाजिब हो गई।"

- जमाह तिर्मिज़ी 


Hajj, Umra, Saudi Arebia, Makka, Madina, Read Me
✅ नई तहरीक : रियाद 
हज के मनासिक से फारिग होकर बेशतर हुज्जाज रूहानियत के एक गहरे सफ़र पर गामज़न हो गए और सऊदी अरब में बिखरी इस्लाम के तारीख़ी मुक़ामात का रूहानी सफर किया। 
    मक्का मुकर्रमा में हुज्जाज कराम ने जबल-ए-नूर का रूख किया। नूर का पहाड़ नामी इस पहाड़ की चोटी पर ग़ार-ए-हिरा वाके है, जहां हज़रत जिब्राईल पहली वही लेकर आए थे। ऊंट के कोहान जैसी शक्ल जबले नूर के क़रीब ही हिरा कल्चरल डिस्ट्रिक्ट की 'रेवीलेशन गैलरी है, जहां हुज्जाज को अपनी मालूमात में इज़ाफे़ के लिए इस्लामी तारीख़ के औराक़ पलटने का बेहतरीन मौका मिलता है। 

Hajj, Umra, Saudi Arebia, Makka, Madina, Read Me


    हुज्जाज कहते हैं 'जहां से ये सब कुछ शुरू हुआ, वहां खड़े हो कर ऐसा लगता है कि अभी कुछ और जानना बाक़ी है। यहां पहुंचने पर बहुत से लोगों की आँखों में आँसू होते हैं। ये सिर्फ एक चढ़ाई नहीं है, ये रुहानी बेदारी है।
    जबले नूर के जुनूब में, जबल-ए-सौर है। ये वो पहाड़ है जो पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 और उनके सहाबी हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ के लिए उस वक़्त ना दिखाई देने वाला गहोरा बन गया था, जब वो मदीने को हिज्रत कर रहे थे।
    ये मुक़द्दस कहानी अब भी हुज्जाज को बहुत अच्छी तरह उस वाक़े की याद दिलाती है, जब मकड़ी ने ग़ार के दहाने पर जाला बुन दिया था और कुमरी ने घोंसला बना दिया था ताकि ख़ुदा के पैग़ंबर और उनके साथी को कोई देख ना सके।

Hajj, Umra, Saudi Arebia, Makka, Madina, Read Me


    एक और मुक़ाम जहां हुज्जाज अक्सर जाते हैं, वो जबल-ए-अबूओक़ुबीस है, जिसके बारे में रिवायत है कि इस पहाड़ को पहली बार ज़मीन की गोद में रखा गया। ये पहाड़, मस्जिद उल-हराम से क़रीब है और पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 की तरफ़ से दीन की इबतिदाई दावत और भारी रुहानी ज़िम्मेदारी की याद दिलाता है। पास में, नमूद नुमाइश से बेनयाज़ मगर तारीख़ी लिहाज़ से अहम, मस्जिद अलाकबा है, जहां अंसार-ए-मदीना ने पैगंबर-ए-इस्लाम 000 के दस्त-ए-मुबारक पर बैअत की थी।
    अब्बासी दौर में तामीर होने वाली ये मस्जिद, मुस्लमानों के दीन पर कारबन्द रहने के अह्द और इबतिदाई इस्लामी उखूवत-ओ-इत्तिहाद की अलामत है।
    इस मुक़ाम से थोड़े ही फ़ासले पर अलहजून का ज़िला है, जहां जबल-ए-सय्यदा वाके है। इस पहाड़ की बुनियाद के नज़दीक मुकब्बिर-ए-अलमाला है, जो पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 की इंतिहाई अज़ीज़ अहलिया अमीर उल मोमेनीन हज़रत ख़दीजा की आख़िरी आरामगाह है और जो आज भी बेहद एहतिराम का मर्कज़ है।  हुज्जाज उन मुक़ामात की जियारत को जाना ज्यादा पसंद करते हैं जहां ऐसे अफ़राद की क़ुर्बानीयों को समझने में मदद मिलती है, जिन्होंने इस्लाम की तशकील साज़ी की।
    मदीने की अपनी ही एक लाज़वाल विरासत है। यहां मस्जिद-ए-किब्लातैन है जहां नमाज़ के दौरान पैग़ंबर-ए-इस्लाम पर वही नाज़िल हुई जिसके बाद आप 999  ने यरूशलम के बजाय अपना रूख मक्का की जानिब मोड़ लिया। इस लम्हे ने मुस्लमानों की अलहदा शिनाख़्त क़ायम करने में एक इंतिहाई अहम तबदीली की बुनियाद डाल दी। 
    मस्जिद-ए-नबवी से जानिब-ए-मग़रिब, सात मसाजिद हैं। उनमें हर मस्जिद किसी ना किसी तरह जंग ख़ंदक़ के किसी वाक़े से जुड़ी हुई है। इन मसाजिद में अलिफ़ता मस्जिद के अलावा दीगर मसाजिद किसी शख़्सियत के नाम पर है। मसलन यहां की तीन मसाजिद के नाम मस्जिद-ए-फ़ातिमा, मस्जिद-ए-अली इब्न-ए-अबी तालिब और मस्जिद-ए-सलमान फ़ारसी हैं। ये मसाजिद, इस्लाम की तारीख़ से भरी पड़ी हैं और इस्लाम की अहम तरीन जंगी मुहिम्मात के दौरान जो मुश्किलात दरपेश हुईं, उनकी यादगार भी हैं।
    अहद का पहाड़, मदीना से शुमाल की जानिब है और इसकी ढलान जंग अहद और इस मुक़ाम की याद दिलाती है जहां पैग़ंबर-ए-इस्लाम के चचा हज़रत हमज़ा इब्न-ए-अबदुल मुतलिब और लश्कर के 70 जान-निसार शहीद हुए थे। आज जब हुज्जाज इस क़ब्रिस्तान के पास से गुज़रते हैं तो उन शहीदों के एहतिराम में चंद लम्हों के लिए ख़ामोश हो जाते हैं। 



    एक अरसा बीत चुका है लेकिन मस्जिद-ए-नबवी के क़रीब वाके उस क़ब्रिस्तान के पास आ कर हुज्जाज आज भी दुआ करते हैं और इस्लाम के अहद-ए-रफ़्ता को याद करते हैं। इस मुक़ाम पर हुज्जाज को इन शख़्सियात से एक राबिता सा महसूस होता है जो इस्लाम के इबतिदाई बरसों में बानी-ए-इस्लाम के साथ खड़े रहे।
    मुक़ामात-ए-मुक़द्दसा के अलावा भी दीगर ऐसी कई जगहें हैं जो रूहानियत में बेशक़ीमत इज़ाफ़ा करने के लिए उन्हें अपनी तरफ़ मुतवज्जा करती हैं। उनमें मदीना के शुमाल मग़रिब की तरफ़ वाके मुक़ाम ख़ैबर है जहां इस्लाम के ख़िलाफ़ एक मर्कज़ी फ़ौजी मुहिम का आग़ाज़ हुआ था। यहीं पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 की क़ियादत के अख़लाक़ी और जंगी हिकमत-ए-अमली के मुख़्तलिफ़ पहलू यकजा हो कर सामने आते हैं।

हज की अदायगी के बाद हाजियों ने किया तारीखी मुकामात का रूहानी सफर

 मोहर्रम उल हराम, 1447 हिजरी 

                                                                             फरमाने रसूल   

"रसुल अल्लाह ﷺ ने एक शख्स को सूरह अखलास पढ़ते हुए सुना तो फरमाया, इसके लिए जन्नत वाजिब हो गई।"

- जमाह तिर्मिज़ी 


Hajj, Umra, Saudi Arebia, Makka, Madina, Read Me
✅ नई तहरीक : रियाद 
हज के मनासिक से फारिग होकर बेशतर हुज्जाज रूहानियत के एक गहरे सफ़र पर गामज़न हो गए और सऊदी अरब में बिखरी इस्लाम के तारीख़ी मुक़ामात का रूहानी सफर किया। 
    मक्का मुकर्रमा में हुज्जाज कराम ने जबल-ए-नूर का रूख किया। नूर का पहाड़ नामी इस पहाड़ की चोटी पर ग़ार-ए-हिरा वाके है, जहां हज़रत जिब्राईल पहली वही लेकर आए थे। ऊंट के कोहान जैसी शक्ल जबले नूर के क़रीब ही हिरा कल्चरल डिस्ट्रिक्ट की 'रेवीलेशन गैलरी है, जहां हुज्जाज को अपनी मालूमात में इज़ाफे़ के लिए इस्लामी तारीख़ के औराक़ पलटने का बेहतरीन मौका मिलता है। 

Hajj, Umra, Saudi Arebia, Makka, Madina, Read Me


    हुज्जाज कहते हैं 'जहां से ये सब कुछ शुरू हुआ, वहां खड़े हो कर ऐसा लगता है कि अभी कुछ और जानना बाक़ी है। यहां पहुंचने पर बहुत से लोगों की आँखों में आँसू होते हैं। ये सिर्फ एक चढ़ाई नहीं है, ये रुहानी बेदारी है।
    जबले नूर के जुनूब में, जबल-ए-सौर है। ये वो पहाड़ है जो पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 और उनके सहाबी हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ के लिए उस वक़्त ना दिखाई देने वाला गहोरा बन गया था, जब वो मदीने को हिज्रत कर रहे थे।
    ये मुक़द्दस कहानी अब भी हुज्जाज को बहुत अच्छी तरह उस वाक़े की याद दिलाती है, जब मकड़ी ने ग़ार के दहाने पर जाला बुन दिया था और कुमरी ने घोंसला बना दिया था ताकि ख़ुदा के पैग़ंबर और उनके साथी को कोई देख ना सके।

Hajj, Umra, Saudi Arebia, Makka, Madina, Read Me


    एक और मुक़ाम जहां हुज्जाज अक्सर जाते हैं, वो जबल-ए-अबूओक़ुबीस है, जिसके बारे में रिवायत है कि इस पहाड़ को पहली बार ज़मीन की गोद में रखा गया। ये पहाड़, मस्जिद उल-हराम से क़रीब है और पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 की तरफ़ से दीन की इबतिदाई दावत और भारी रुहानी ज़िम्मेदारी की याद दिलाता है। पास में, नमूद नुमाइश से बेनयाज़ मगर तारीख़ी लिहाज़ से अहम, मस्जिद अलाकबा है, जहां अंसार-ए-मदीना ने पैगंबर-ए-इस्लाम 000 के दस्त-ए-मुबारक पर बैअत की थी।
    अब्बासी दौर में तामीर होने वाली ये मस्जिद, मुस्लमानों के दीन पर कारबन्द रहने के अह्द और इबतिदाई इस्लामी उखूवत-ओ-इत्तिहाद की अलामत है।
    इस मुक़ाम से थोड़े ही फ़ासले पर अलहजून का ज़िला है, जहां जबल-ए-सय्यदा वाके है। इस पहाड़ की बुनियाद के नज़दीक मुकब्बिर-ए-अलमाला है, जो पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 की इंतिहाई अज़ीज़ अहलिया अमीर उल मोमेनीन हज़रत ख़दीजा की आख़िरी आरामगाह है और जो आज भी बेहद एहतिराम का मर्कज़ है।  हुज्जाज उन मुक़ामात की जियारत को जाना ज्यादा पसंद करते हैं जहां ऐसे अफ़राद की क़ुर्बानीयों को समझने में मदद मिलती है, जिन्होंने इस्लाम की तशकील साज़ी की।
    मदीने की अपनी ही एक लाज़वाल विरासत है। यहां मस्जिद-ए-किब्लातैन है जहां नमाज़ के दौरान पैग़ंबर-ए-इस्लाम पर वही नाज़िल हुई जिसके बाद आप 999  ने यरूशलम के बजाय अपना रूख मक्का की जानिब मोड़ लिया। इस लम्हे ने मुस्लमानों की अलहदा शिनाख़्त क़ायम करने में एक इंतिहाई अहम तबदीली की बुनियाद डाल दी। 
    मस्जिद-ए-नबवी से जानिब-ए-मग़रिब, सात मसाजिद हैं। उनमें हर मस्जिद किसी ना किसी तरह जंग ख़ंदक़ के किसी वाक़े से जुड़ी हुई है। इन मसाजिद में अलिफ़ता मस्जिद के अलावा दीगर मसाजिद किसी शख़्सियत के नाम पर है। मसलन यहां की तीन मसाजिद के नाम मस्जिद-ए-फ़ातिमा, मस्जिद-ए-अली इब्न-ए-अबी तालिब और मस्जिद-ए-सलमान फ़ारसी हैं। ये मसाजिद, इस्लाम की तारीख़ से भरी पड़ी हैं और इस्लाम की अहम तरीन जंगी मुहिम्मात के दौरान जो मुश्किलात दरपेश हुईं, उनकी यादगार भी हैं।
    अहद का पहाड़, मदीना से शुमाल की जानिब है और इसकी ढलान जंग अहद और इस मुक़ाम की याद दिलाती है जहां पैग़ंबर-ए-इस्लाम के चचा हज़रत हमज़ा इब्न-ए-अबदुल मुतलिब और लश्कर के 70 जान-निसार शहीद हुए थे। आज जब हुज्जाज इस क़ब्रिस्तान के पास से गुज़रते हैं तो उन शहीदों के एहतिराम में चंद लम्हों के लिए ख़ामोश हो जाते हैं। 



    एक अरसा बीत चुका है लेकिन मस्जिद-ए-नबवी के क़रीब वाके उस क़ब्रिस्तान के पास आ कर हुज्जाज आज भी दुआ करते हैं और इस्लाम के अहद-ए-रफ़्ता को याद करते हैं। इस मुक़ाम पर हुज्जाज को इन शख़्सियात से एक राबिता सा महसूस होता है जो इस्लाम के इबतिदाई बरसों में बानी-ए-इस्लाम के साथ खड़े रहे।
    मुक़ामात-ए-मुक़द्दसा के अलावा भी दीगर ऐसी कई जगहें हैं जो रूहानियत में बेशक़ीमत इज़ाफ़ा करने के लिए उन्हें अपनी तरफ़ मुतवज्जा करती हैं। उनमें मदीना के शुमाल मग़रिब की तरफ़ वाके मुक़ाम ख़ैबर है जहां इस्लाम के ख़िलाफ़ एक मर्कज़ी फ़ौजी मुहिम का आग़ाज़ हुआ था। यहीं पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 की क़ियादत के अख़लाक़ी और जंगी हिकमत-ए-अमली के मुख़्तलिफ़ पहलू यकजा हो कर सामने आते हैं।

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Saturday, 14 June 2025

✅ इंशा वारसी : रायपुर 

    एक ऐतिहासिक कदम के तहत भारत सरकार ने आगामी राष्ट्रीय जनगणना में जाति गणना को शामिल करने को मंजूरी दे दी है, जो स्वतंत्रता के बाद बंद कर दी गई एक प्रथा की महत्वपूर्ण वापसी को दर्शाता है। समाज सुधारकों, विद्वानों और नीति निर्माताओं द्वारा लंबे समय से मांगे जा रहे इस निर्णय को देश में समानता को बढ़ावा देने और सामाजिक न्याय की जड़ों को गहरा करने की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम के रूप में सराहा जा रहा है। ऐसे समय में जब समावेशी विकास राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र है, जाति जनगणना डेटा-संचालित नीति निर्माण के एक युग की शुरुआत करने का वादा करती है जो वास्तव में भारत के जटिल सामाजिक ताने-बाने को दर्शाती है।
    जाति जनगणना, राष्ट्रीय गणना अभ्यास के हिस्से के रूप में व्यक्ति की जातिगत पहचान पर डेटा का व्यवस्थित संग्रह है। इसका लक्ष्य विभिन्न जाति समूहों के सामाजिक-आर्थिक वितरण की सटीक और विस्तृत समझ हासिल करना है, जिससे सरकार को लक्षित नीतियों को तैयार करने में मदद मिले, जो सबसे वंचितों का उत्थान करें। ऐतिहासिक रूप से, 1931 तक औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा जाति के आंकड़े नियमित रूप से एकत्र किए जाते थे। हालाँकि, स्वतंत्रता के बाद, जाति की गणना अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) तक सीमित थी, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अन्य को व्यापक राष्ट्रीय डेटा सेट से बाहर रखा गया था। इस अंतर को पाटने का आखिरी प्रयास, 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) विसंगतियों और डेटा की अविश्वसनीयता से प्रभावित हुई थी, जिसका मुख्य कारण एक मानकीकृत जाति सूची का अभाव था।


    भारत ने ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े समुदायों के उत्थान के लिए संवैधानिक प्रतिबद्धताएं की हैं, लेकिन जाति पर विश्वसनीय डेटा के बिना जनसांख्यिकी के अनुसार, सकारात्मक कार्रवाई की नीतियाँ अक्सर अंधेरे में काम करती हैं। वर्तमान में, ओबीसी के लिए आरक्षण नीतियाँ 1931 की जनगणना के अनुमानों पर आधारित हैं, जिसमें ओबीसी की आबादी 52% आंकी गई थी। हालाँकि, बिहार के 2023 जाति सर्वेक्षण जैसे राज्य-स्तरीय सर्वेक्षणों से पता चला है कि ओबीसी और अत्यंत पिछड़े वर्ग राज्य की आबादी का 63% से अधिक हिस्सा हैं। ऐसे निष्कर्ष कल्याणकारी लाभों और आरक्षणों के समान वितरण को सुनिश्चित करने के लिए एक अद्यतन राष्ट्रीय जाति डेटाबेस की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
    राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने एसईसीसी 2011 की खामियों को दूर करने के लिए एक परिष्कृत गणना तंत्र की जोरदार वकालत की है, जहां ओपन-एंडेड जाति रिपोर्टिंग के कारण 46 लाख से अधिक अलग-अलग प्रविष्टियां और 8 करोड़ से अधिक त्रुटियां हुईं। आगामी जाति जनगणना का उद्देश्य अधिक संरचित और सत्यापन योग्य डेटा संग्रह प्रक्रिया के माध्यम से इन चुनौतियों को दूर करना है। पहचान सत्यापन के लिए आधार को एकीकृत करना, शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना और छंटाई और वर्गीकरण के लिए एआई उपकरणों का लाभ उठाना अभ्यास की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए प्रस्तावित उपायों में से हैं।
    जाति जनगणना सिर्फ़ एक संख्यात्मक अभ्यास ही नहीं, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा है, इसका सामाजिक समानता और शासन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। विभिन्न समुदायों के वास्तविक जनसांख्यिकीय प्रसार को उजागर कर यह पिछड़े समूहों के उप-वर्गीकरण की अनुमति देता है, जैसे कि न्यायमूर्ति रोहिणी आयोग द्वारा अनुशंसित ओबीसी के भीतर। यह सुनिश्चित करता है कि आरक्षण का लाभ सबसे वंचितों तक पहुँचे, न कि प्रमुख उप-समूहों द्वारा एकाधिकार किया जाए। इसी तरह, सटीक जाति डेटा राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करने, ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े लोगों को आवाज़ देकर लोकतंत्र को मज़बूत करने में सहायक हो सकता है। इस कदम के महत्व को भारत के संवैधानिक दृष्टिकोण के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। अनुच्छेद 340 राज्य को पिछड़े वर्गों के कल्याण की पहचान करने और उन्हें बढ़ावा देने का अधिकार देता है, और जाति जनगणना इस जनादेश के अनुरूप है। यह अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 के लक्ष्यों को प्रतिध्वनित करता है, जो भेदभाव को प्रतिबंधित करते हैं और अवसर की समानता की गारंटी देते हैं। हालांकि, विश्वसनीय डेटा के बिना, इन संवैधानिक आदर्शों को प्रतीकात्मक इशारों में कमजोर किए जाने का जोखिम है।
    हालांकि इस बात पर चिंता जताई गई है कि जाति जनगणना जातिगत पहचान को मजबूत कर सकती है या राजनीतिक शोषण का साधन बन सकती है, लेकिन पारदर्शी, नैतिक और विवेकपूर्ण कार्यान्वयन के माध्यम से ऐसे जोखिमों को कम किया जा सकता है। जाति जनगणना को राजनीतिक के बजाय विकास के साधन के रूप में मानना, इसे समावेशी विकास के उत्प्रेरक में बदल सकता है। निगरानी तंत्र, कानूनी सुरक्षा उपाय और नीति मूल्यांकन अवश्य होने चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत रूप दिया गया है कि डेटा केवल सामाजिक न्याय के लिए काम करे न कि चुनावी अंकगणित के लिए। इसके अलावा, आय स्तर, शिक्षा और बहुआयामी गरीबी जैसे सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के साथ जाति के आंकड़ों को पूरक बनाने से समग्र कल्याण कार्यक्रमों को तैयार करने में मदद मिल सकती है। यह क्षेत्रीय असमानताओं को संबोधित करने और स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में अंतराल को पाटने के लिए अनुकूलित हस्तक्षेप की अनुमति देता है जहां जाति-आधारित असमानताएं बनी रहती हैं।
    निष्कर्ष रूप में, जाति जनगणना कराने का निर्णय भारत की अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज की ओर यात्रा में एक महत्वपूर्ण क्षण है। यह सकारात्मक कार्रवाई को फिर से मापने, कल्याण लक्ष्यीकरण को परिष्कृत करने और हमारे संविधान में निहित समानता के प्रति प्रतिबद्धता को पुनर्जीवित करने का अवसर है। इस डेटा-संचालित दृष्टिकोण को ईमानदारी और सावधानी से अपनाकर, भारत संरचनात्मक असमानताओं को खत्म करने और एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण की दिशा में एक निर्णायक कदम उठा सकता है, जहाँ प्रत्येक नागरिक की प्रगति में समान हिस्सेदारी हो।

- फ़्रैंकोफ़ोन और पत्रकारिता अध्ययन,

जामिया मिलिया इस्लामिया.
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

जाति जन गणना : भारत में सामाजिक न्याय को पुनर्परिभाषित करना

✅ इंशा वारसी : रायपुर 

    एक ऐतिहासिक कदम के तहत भारत सरकार ने आगामी राष्ट्रीय जनगणना में जाति गणना को शामिल करने को मंजूरी दे दी है, जो स्वतंत्रता के बाद बंद कर दी गई एक प्रथा की महत्वपूर्ण वापसी को दर्शाता है। समाज सुधारकों, विद्वानों और नीति निर्माताओं द्वारा लंबे समय से मांगे जा रहे इस निर्णय को देश में समानता को बढ़ावा देने और सामाजिक न्याय की जड़ों को गहरा करने की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम के रूप में सराहा जा रहा है। ऐसे समय में जब समावेशी विकास राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र है, जाति जनगणना डेटा-संचालित नीति निर्माण के एक युग की शुरुआत करने का वादा करती है जो वास्तव में भारत के जटिल सामाजिक ताने-बाने को दर्शाती है।
    जाति जनगणना, राष्ट्रीय गणना अभ्यास के हिस्से के रूप में व्यक्ति की जातिगत पहचान पर डेटा का व्यवस्थित संग्रह है। इसका लक्ष्य विभिन्न जाति समूहों के सामाजिक-आर्थिक वितरण की सटीक और विस्तृत समझ हासिल करना है, जिससे सरकार को लक्षित नीतियों को तैयार करने में मदद मिले, जो सबसे वंचितों का उत्थान करें। ऐतिहासिक रूप से, 1931 तक औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा जाति के आंकड़े नियमित रूप से एकत्र किए जाते थे। हालाँकि, स्वतंत्रता के बाद, जाति की गणना अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) तक सीमित थी, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अन्य को व्यापक राष्ट्रीय डेटा सेट से बाहर रखा गया था। इस अंतर को पाटने का आखिरी प्रयास, 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) विसंगतियों और डेटा की अविश्वसनीयता से प्रभावित हुई थी, जिसका मुख्य कारण एक मानकीकृत जाति सूची का अभाव था।


    भारत ने ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े समुदायों के उत्थान के लिए संवैधानिक प्रतिबद्धताएं की हैं, लेकिन जाति पर विश्वसनीय डेटा के बिना जनसांख्यिकी के अनुसार, सकारात्मक कार्रवाई की नीतियाँ अक्सर अंधेरे में काम करती हैं। वर्तमान में, ओबीसी के लिए आरक्षण नीतियाँ 1931 की जनगणना के अनुमानों पर आधारित हैं, जिसमें ओबीसी की आबादी 52% आंकी गई थी। हालाँकि, बिहार के 2023 जाति सर्वेक्षण जैसे राज्य-स्तरीय सर्वेक्षणों से पता चला है कि ओबीसी और अत्यंत पिछड़े वर्ग राज्य की आबादी का 63% से अधिक हिस्सा हैं। ऐसे निष्कर्ष कल्याणकारी लाभों और आरक्षणों के समान वितरण को सुनिश्चित करने के लिए एक अद्यतन राष्ट्रीय जाति डेटाबेस की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
    राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने एसईसीसी 2011 की खामियों को दूर करने के लिए एक परिष्कृत गणना तंत्र की जोरदार वकालत की है, जहां ओपन-एंडेड जाति रिपोर्टिंग के कारण 46 लाख से अधिक अलग-अलग प्रविष्टियां और 8 करोड़ से अधिक त्रुटियां हुईं। आगामी जाति जनगणना का उद्देश्य अधिक संरचित और सत्यापन योग्य डेटा संग्रह प्रक्रिया के माध्यम से इन चुनौतियों को दूर करना है। पहचान सत्यापन के लिए आधार को एकीकृत करना, शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना और छंटाई और वर्गीकरण के लिए एआई उपकरणों का लाभ उठाना अभ्यास की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए प्रस्तावित उपायों में से हैं।
    जाति जनगणना सिर्फ़ एक संख्यात्मक अभ्यास ही नहीं, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा है, इसका सामाजिक समानता और शासन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। विभिन्न समुदायों के वास्तविक जनसांख्यिकीय प्रसार को उजागर कर यह पिछड़े समूहों के उप-वर्गीकरण की अनुमति देता है, जैसे कि न्यायमूर्ति रोहिणी आयोग द्वारा अनुशंसित ओबीसी के भीतर। यह सुनिश्चित करता है कि आरक्षण का लाभ सबसे वंचितों तक पहुँचे, न कि प्रमुख उप-समूहों द्वारा एकाधिकार किया जाए। इसी तरह, सटीक जाति डेटा राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करने, ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े लोगों को आवाज़ देकर लोकतंत्र को मज़बूत करने में सहायक हो सकता है। इस कदम के महत्व को भारत के संवैधानिक दृष्टिकोण के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। अनुच्छेद 340 राज्य को पिछड़े वर्गों के कल्याण की पहचान करने और उन्हें बढ़ावा देने का अधिकार देता है, और जाति जनगणना इस जनादेश के अनुरूप है। यह अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 के लक्ष्यों को प्रतिध्वनित करता है, जो भेदभाव को प्रतिबंधित करते हैं और अवसर की समानता की गारंटी देते हैं। हालांकि, विश्वसनीय डेटा के बिना, इन संवैधानिक आदर्शों को प्रतीकात्मक इशारों में कमजोर किए जाने का जोखिम है।
    हालांकि इस बात पर चिंता जताई गई है कि जाति जनगणना जातिगत पहचान को मजबूत कर सकती है या राजनीतिक शोषण का साधन बन सकती है, लेकिन पारदर्शी, नैतिक और विवेकपूर्ण कार्यान्वयन के माध्यम से ऐसे जोखिमों को कम किया जा सकता है। जाति जनगणना को राजनीतिक के बजाय विकास के साधन के रूप में मानना, इसे समावेशी विकास के उत्प्रेरक में बदल सकता है। निगरानी तंत्र, कानूनी सुरक्षा उपाय और नीति मूल्यांकन अवश्य होने चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत रूप दिया गया है कि डेटा केवल सामाजिक न्याय के लिए काम करे न कि चुनावी अंकगणित के लिए। इसके अलावा, आय स्तर, शिक्षा और बहुआयामी गरीबी जैसे सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के साथ जाति के आंकड़ों को पूरक बनाने से समग्र कल्याण कार्यक्रमों को तैयार करने में मदद मिल सकती है। यह क्षेत्रीय असमानताओं को संबोधित करने और स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में अंतराल को पाटने के लिए अनुकूलित हस्तक्षेप की अनुमति देता है जहां जाति-आधारित असमानताएं बनी रहती हैं।
    निष्कर्ष रूप में, जाति जनगणना कराने का निर्णय भारत की अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज की ओर यात्रा में एक महत्वपूर्ण क्षण है। यह सकारात्मक कार्रवाई को फिर से मापने, कल्याण लक्ष्यीकरण को परिष्कृत करने और हमारे संविधान में निहित समानता के प्रति प्रतिबद्धता को पुनर्जीवित करने का अवसर है। इस डेटा-संचालित दृष्टिकोण को ईमानदारी और सावधानी से अपनाकर, भारत संरचनात्मक असमानताओं को खत्म करने और एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण की दिशा में एक निर्णायक कदम उठा सकता है, जहाँ प्रत्येक नागरिक की प्रगति में समान हिस्सेदारी हो।

- फ़्रैंकोफ़ोन और पत्रकारिता अध्ययन,

जामिया मिलिया इस्लामिया.
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Sunday, 1 June 2025

 जिल हज्ज, 1446 हिजरी

﷽ 

   फरमाने रसूल     

"तुम अपने लिए भलाई के अलावा कोई और दुआ ना करो क्योंकि जो तुम कहते हो उस पर फरिश्ते आमीन कहते है।"

- मुस्लिम 

रियाज़ अल जन्ना में साल के दौरान सिर्फ एक मर्तबा नवाफ़िल अदा करने के हवाले से पाबंदी ख़त्म 


makka-madina-masjid-e-nabvi-masjid-e-haram

✅ नई तहरीक : रियाद 

मदीना मुनव्वरा में कयाम के दौरान रौज़ा-ए-रसूलﷺ  पर हाज़िरी के ख्वाहिशमंदों के लिए बड़ी ख़ुशख़बरी सामने आई है। हरमैन शरीफ़ैन इंतिज़ामी उमूर के सोशल मीडीया एकाऊंटस के मुताबिक़ मस्जिद नबवीﷺ  रियाज़ अल जन्ना में एक साल के दौरान सिर्फ एक मर्तबा नवाफ़िल अदा करने के हवाले से पाबंदी ख़त्म कर दी गई है। 

makka-madina-masjid-e-nabvi-masjid-e-haram


 

    जानकारी के मुताबिक नसक़ मोबाइल एप के ज़रीये परमिट के हुसूल की शर्त अब भी बरक़रार रहेगी, नई हिदायात के तहत तमाम ज़ाइरीन नसक़ मोबाइल एप के ज़रीये हर 20 मिनट बाद नया इजाज़तनामा हासिल कर सकते हैं। मस्जिद नबवीﷺ  में मौजूद ज़ाइरीन भी नए शैडूल के तहत मोबाइल एप के ज़रीये रियाज़ अल जन्ना में नवाफ़िल अदा करने के इजाज़त नामे हासिल कर सकेंगे।

रौज़ा रसूलﷺ पर हाज़िरी के ख्वाहिशमंदों के लिए बड़ी ख़ुशख़बरी

 जिल हज्ज, 1446 हिजरी

﷽ 

   फरमाने रसूल     

"तुम अपने लिए भलाई के अलावा कोई और दुआ ना करो क्योंकि जो तुम कहते हो उस पर फरिश्ते आमीन कहते है।"

- मुस्लिम 

रियाज़ अल जन्ना में साल के दौरान सिर्फ एक मर्तबा नवाफ़िल अदा करने के हवाले से पाबंदी ख़त्म 


makka-madina-masjid-e-nabvi-masjid-e-haram

✅ नई तहरीक : रियाद 

मदीना मुनव्वरा में कयाम के दौरान रौज़ा-ए-रसूलﷺ  पर हाज़िरी के ख्वाहिशमंदों के लिए बड़ी ख़ुशख़बरी सामने आई है। हरमैन शरीफ़ैन इंतिज़ामी उमूर के सोशल मीडीया एकाऊंटस के मुताबिक़ मस्जिद नबवीﷺ  रियाज़ अल जन्ना में एक साल के दौरान सिर्फ एक मर्तबा नवाफ़िल अदा करने के हवाले से पाबंदी ख़त्म कर दी गई है। 

makka-madina-masjid-e-nabvi-masjid-e-haram


 

    जानकारी के मुताबिक नसक़ मोबाइल एप के ज़रीये परमिट के हुसूल की शर्त अब भी बरक़रार रहेगी, नई हिदायात के तहत तमाम ज़ाइरीन नसक़ मोबाइल एप के ज़रीये हर 20 मिनट बाद नया इजाज़तनामा हासिल कर सकते हैं। मस्जिद नबवीﷺ  में मौजूद ज़ाइरीन भी नए शैडूल के तहत मोबाइल एप के ज़रीये रियाज़ अल जन्ना में नवाफ़िल अदा करने के इजाज़त नामे हासिल कर सकेंगे।

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Saturday, 3 May 2025

 जी काअदा, 1446 हिजरी

   फरमाने रसूल     

"वो शख्स जन्नत में दाखिल नही होगा, जिसकी शरारतों से उसका हमसाया (पड़ोसी) बे ख़ौफ़ नही रहता।"

- मुस्लिम  

4  4 मई, यौमे शहादत पर खास 


Tipu Sultan, Sher-e-Maisoor, sri rangpatnam, Haider Ali

✅ नई तहरीक : भोपाल

    4 मई का दिन बर्रे सग़ीर की तारीख़ में एक अज़ीम, गैरतमंद और बेमिसाल सिपाही-ओ-हुक्मरान की याद दिलाता है। ये दिन उस बहादुर, इंसाफ़ पसंद और उसूल परस्त बादशाह की शहादत का है, जिसे दुनिया शेर-ए-मैसूर टीपू सुल्तान के नाम से जानती है। 
    ये वो बादशाह हैं जिसने अंग्रेज़ों की गु़लामी क़बूल करने की बजाय शहादत को तर्जीह दी। वो हुक्मरां थे, मगर ग़ैरत-ओ-हमीयत उनके लहू में थी। आज जब उनका यौम शहादत आता है, तो मुल्क की फ़िज़ा में अदल-ओ-इन्साफ़ की कमी, बदअमनी और गिरते अख़लाक़ी इक़दार उसकी ग़ैरतभरी क़ियादत को मज़ीद यादगार बना देते हैं। हमें ये सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि कहीं हमने ऐसे किरदारों को सिर्फ तारीख़ की किताबों तक महदूद तो नहीं कर दिया है। 

Tipu Sultan, Sher-e-Maisoor, sri rangpatnam, Haider Ali
टीपू सुलतान किसी मख़सूस फ़िरक़े, क़ौम या ज़ात को तर्जीह नहीं देते थे बल्कि उनका पैग़ाम पूरे भारत के लिए था। उन्होंने अपनी हुक्मरानी में अदल-ओ-इन्साफ़ को बुनियाद बनाया। उनके दौर-ए-हुकूमत में हर मज़हब, हर ज़ात, हर फ़र्द को यकसाँ हुक़ूक़ हासिल थे। वो सिर्फ़ तलवार के शहसवार ना थे, बल्कि उनकी रियासत में फ़लाही कामों का भी सिलसिला था, तमाम कामों की फ़रावानी थी और चारों सिम्त उनका बोल-बाला था।
टीपू सुलतान ने ख़वातीन के हुक़ूक़ के तहफ़्फ़ुज़ के लिए जो इक़दामात किए, वो ना सिर्फ अपने वक़्त के लिए इन्क़िलाबी थे, बल्कि आज के दौर में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारों का अमली नमूना कहे जा सकते हैं। इस अह्द में औरत को कमतर, हक़ीर और महज एक जिन्सी शै समझा जाता था। खासतौर पर निचली ज़ात की औरतें दलित, शूद्र और दीगर पसमांदा तबक़ात से ताल्लुक़ रखने वाली ख़वातीन, जिन्हें ना इज़्ज़त-ए-नफ़स का हक़ हासिल था और ना ही तन ढांपने की आज़ादी। मुआशरे का जब्र इस क़दर संगीन था कि इन औरतों पर जिस्म ढकने पर जुर्माने और तशद्दुद किया जाता। ऐसी ही एक ख़ातून थी नंगेली, जिसका ताल्लुक़ केराला के इलाक़े से था। जब उस पर नंगे जिस्म रखने के टैक्स का तक़ाज़ा किया गया तो उसने अपनी छाती काट कर उसे टैक्स के तौर पर पेश कर दिया था। ये एहतिजाज सिर्फ उसका ज़ाती रद्द-ए-अमल ना था बल्कि एक अह्द के ख़िलाफ़ ख़ामोश इन्क़िलाब था।
    ऐसे ही पस-ए-मंज़र में टीपू सुलतान का ये ऐलान कि हर औरत को पर्दे और हया का हक़ हासिल है, ख़ाह वो किसी भी ज़ात, मज़हब या तबक़े से ताल्लुक़ रखती हो, एक अदालती इन्क़िलाब से कम ना था। उनके इस फ़रमान के बाद रियासत-ए-मैसूर में निचली ज़ात की ख़वातीन को वो समाजी तहफ़्फ़ुज़ मिला जिससे वो पहली बार ख़ुद को इन्सान समझने लगें। टीपू सुलतान ने औरतों के लिए तालीमी मवाक़े, विरासत के हुक़ूक़ और मुआशरती वक़ार को क़ानूनी शक्ल दी जो इस दौर में किसी हिंदू या मुस्लमान हुकमरान के यहां आम ना था।
    ये हक़ीक़त है कि उनके दौर में औरत को बापरदा ज़िंदगी, तालीम, और जायदाद में हिस्सा जैसी नेअमतें मिलीं, जो सदियों तक फ़क़त ऊंची ज़ात की ख़वातीन को दस्तयाब थीं। उन्होंने रियास्ती सतह पर उस निज़ाम को चैलेंज किया जो औरत के बदन को भी टैक्स के काबिल समझता था, और औरत के हिजाब को ना सिर्फ मज़हबी बल्कि इन्सानी हक़ क़रार दिया। आज जब हम ख़वातीन के हुक़ूक़ के हवाले से क़ानूनसाज़ी की बात करते हैं, तो टीपू सुलतान जैसे इन्क़िलाबी हुक्मरां की मसाल हमें ये सबक़ देती है कि एक रियासत तभी इन्साफ़ पर क़ायम हो सकती है जब उसमें हर इन्सान, ख़ुसूसन हर औरत, को उसका बुनियादी हक़ हासिल हो।
    उन्होंने तालीम को आम करने और बच्चियों की तालीम पर ज़ोर दिया। उनका मानना था कि किसी क़ौम की तरक़्क़ी उसकी औरतों की तालीम से मशरूत है। उन्होंने मदारिस, लाइब्रेरियां और तर्बीयती इदारे क़ायम किए जहां ख़वातीन भी ज़ेवर-ए-इलम से आरास्ता हो सकें।
    टीपू सुलतान की सबसे ख़ूबसूरत पहचान उनका बैन उल मज़ाहिब इत्तिहाद था। उनका वज़ीर-ए-आज़म पण्डित पूर्णिया एक हिंदू था, जो उनके क़रीब तरीन मुशीरों में शामिल था हालाँकि बाद में उसने ग़द्दारी की। उन्होंने पूरा इख़तियार दे रखा था कि वो रियास्ती उमूर में फ़ैसले कर सके। ये उस दौर की मिसाल है, जब मज़हब, ज़ात, या अक़ीदे की बुनियाद पर तफ़रीक़ ना की जाती थी, बल्कि सलाहीयत को मयार बनाया जाता था।
    आज जब हमारा मुआशरा फ़िर्कावारीयत, ज़ात पात और मज़हबी ताअस्सुब का शिकार है, हमें टीपू सुलतान की तालीमात और तर्ज़-ए-हुक्मरानी की तरफ़ लौटने की ज़रूरत है। उनकी ज़िंदगी हमें सिखाती है कि असल ताक़त तलवार में नहीं, इन्साफ़ में है।
    टीपू सुलतान ने अंग्रेज़ों की गु़लामी क़बूल नहीं की, बल्कि अपनी जान दे दी, मगर कभी सर नहीं झुकाया। उनका वो मशहूर क़ौल आज भी हमारे दिलों में गूँजता है :

शेर की एक दिन की ज़िंदगी, गीदड़ की सौ साला ज़िंदगी से बेहतर है। 

    आज मुल्क में हालात अफ़सोसनाक हैं। मज़हब और शिनाख़्त की बुनियाद पर इन्सानों के दरमयान तफ़रीक़ बढ़ती जा रही है। कहीं नाम पूछ कर मार दिया जाता है, कहीं मस्जिद में इबादत करने वालों को निशाना बनाया जाता है, और कहीं गाय के नाम पर बे-गुनाहों को सर-ए-बाज़ार पीट-पीट कर मार दिया जाता है, इन्सान का नाम ही ज़िंदगी और मौत के फ़ैसले का पैमाना बन चुका है। तालीमी इदारों, शहरों, और सड़कों के नाम तक बदले जा रहे हैं ताकि तारीख़ का चेहरा मसख़ कर सिर्फ एक मख़सूस नज़रिए को ग़ालिब कर दिया जाए। और ये नाम महज इस बुनियाद पर बदले जा रहे हैं कि वो किसी ख़ास मज़हब या शख़्सियत से मंसूब हैं। ये हालात ना सिर्फ जमहूरी इक़दार के मुनाफ़ी हैं बल्कि इन्सानियत के बुनियादी उसूलों से भी टकराते हैं। ये वो दौर है, जहां तास्सुब ने इन्साफ़ को दबा दिया है, और नफ़रत ने भाईचारे की जगह ले ली है।
    ऐसे माहौल में टीपू सुलतान का अदल-ओ-इन्साफ़ और मज़हबी हम-आहंगी पर मबनी तर्ज़-ए-हुकूमत एक रोशन मिसाल बन कर सामने आता है। उन्होंने कभी किसी की शिनाख़्त, मज़हब या ज़ात को उसकी इज़्ज़त या इन्साफ़ से महरूम करने का ज़रीया नहीं बनाया। 
    दरे अस्ना औरंगज़ेब रहमतुल्लाह अलैह के ख़िलाफ़ जो ज़हर उगला गया और उनकी क़ब्र पर सियासत की गई, वो ना सिर्फ तारीख़ से जहालत का सबूत है बल्कि समाज में नफ़रत के बढ़ते ज़हर का भी पता देती है। एक बाशऊर क़ौम अपने माज़ी को हमेशा याद रखती है, बल्कि इससे सबक़ सीख कर हाल को बेहतर बनाती है। लेकिन आज हमारे बुज़ुर्गों की तौहीन की जा रही है बल्कि फ़िर्कापरस्ती को हथियार बना कर समाज को बांटने की कोशीश की जा रही है। टीपू सुलतान और औरंगज़ेब जैसे किरदार हमें याद दिलाते हैं कि असल क़ियादत वही होती है, जो दीन, अदल और ग़ैरत पर मबनी हो और यही पैग़ाम आज हमें सबसे ज़्यादा दरकार है। 
    शहीद टीपू सुलतान एक ऐसे बादशाह हैं, जो मुल्क की हिफ़ाज़त करते हुए मैदान-ए-जंग में शहीद हुए। 4 मई, यौम शहादत टीपू सुलतान सिर्फ एक तारीख़ी दिन नहीं, बल्कि ये तारीख हमें याद दिलाती है कि हमें भी इन्साफ़, बराबरी, ख़वातीन के हुक़ूक़, तालीम और क़ौमी इत्तिहाद के लिए आवाज़ बुलंद करनी है। एससी, एसटी और दलितों को इन्साफ़ दिलाने के लिए पुरज़ोर आवाज़ बुलंद करना होगी, जो मनुवादी, पूंजीवादी अनासिर बदनाम करने में लगे हुए हैं, उन्हें हर जगह से उखाड़ फेंकना है, यही इस दिन का पैग़ाम है। टीपू सुलतान आज भी ज़िंदा हैं। हमारी सोच में, हमारे उसूलों में और हर उस इन्सान में जो जुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा होता है।

MW Ansari, IPS (Rtd)
Bhopal



शेर-ए-मैसूर का इंसारफ, औरत को मिली बापरदा ज़िंदगी, तालीम, और जायदाद में हिस्सा जैसी नेअमतें : एमडब्ल्यू अंसारी

 जी काअदा, 1446 हिजरी

   फरमाने रसूल     

"वो शख्स जन्नत में दाखिल नही होगा, जिसकी शरारतों से उसका हमसाया (पड़ोसी) बे ख़ौफ़ नही रहता।"

- मुस्लिम  

4  4 मई, यौमे शहादत पर खास 


Tipu Sultan, Sher-e-Maisoor, sri rangpatnam, Haider Ali

✅ नई तहरीक : भोपाल

    4 मई का दिन बर्रे सग़ीर की तारीख़ में एक अज़ीम, गैरतमंद और बेमिसाल सिपाही-ओ-हुक्मरान की याद दिलाता है। ये दिन उस बहादुर, इंसाफ़ पसंद और उसूल परस्त बादशाह की शहादत का है, जिसे दुनिया शेर-ए-मैसूर टीपू सुल्तान के नाम से जानती है। 
    ये वो बादशाह हैं जिसने अंग्रेज़ों की गु़लामी क़बूल करने की बजाय शहादत को तर्जीह दी। वो हुक्मरां थे, मगर ग़ैरत-ओ-हमीयत उनके लहू में थी। आज जब उनका यौम शहादत आता है, तो मुल्क की फ़िज़ा में अदल-ओ-इन्साफ़ की कमी, बदअमनी और गिरते अख़लाक़ी इक़दार उसकी ग़ैरतभरी क़ियादत को मज़ीद यादगार बना देते हैं। हमें ये सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि कहीं हमने ऐसे किरदारों को सिर्फ तारीख़ की किताबों तक महदूद तो नहीं कर दिया है। 

Tipu Sultan, Sher-e-Maisoor, sri rangpatnam, Haider Ali
टीपू सुलतान किसी मख़सूस फ़िरक़े, क़ौम या ज़ात को तर्जीह नहीं देते थे बल्कि उनका पैग़ाम पूरे भारत के लिए था। उन्होंने अपनी हुक्मरानी में अदल-ओ-इन्साफ़ को बुनियाद बनाया। उनके दौर-ए-हुकूमत में हर मज़हब, हर ज़ात, हर फ़र्द को यकसाँ हुक़ूक़ हासिल थे। वो सिर्फ़ तलवार के शहसवार ना थे, बल्कि उनकी रियासत में फ़लाही कामों का भी सिलसिला था, तमाम कामों की फ़रावानी थी और चारों सिम्त उनका बोल-बाला था।
टीपू सुलतान ने ख़वातीन के हुक़ूक़ के तहफ़्फ़ुज़ के लिए जो इक़दामात किए, वो ना सिर्फ अपने वक़्त के लिए इन्क़िलाबी थे, बल्कि आज के दौर में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारों का अमली नमूना कहे जा सकते हैं। इस अह्द में औरत को कमतर, हक़ीर और महज एक जिन्सी शै समझा जाता था। खासतौर पर निचली ज़ात की औरतें दलित, शूद्र और दीगर पसमांदा तबक़ात से ताल्लुक़ रखने वाली ख़वातीन, जिन्हें ना इज़्ज़त-ए-नफ़स का हक़ हासिल था और ना ही तन ढांपने की आज़ादी। मुआशरे का जब्र इस क़दर संगीन था कि इन औरतों पर जिस्म ढकने पर जुर्माने और तशद्दुद किया जाता। ऐसी ही एक ख़ातून थी नंगेली, जिसका ताल्लुक़ केराला के इलाक़े से था। जब उस पर नंगे जिस्म रखने के टैक्स का तक़ाज़ा किया गया तो उसने अपनी छाती काट कर उसे टैक्स के तौर पर पेश कर दिया था। ये एहतिजाज सिर्फ उसका ज़ाती रद्द-ए-अमल ना था बल्कि एक अह्द के ख़िलाफ़ ख़ामोश इन्क़िलाब था।
    ऐसे ही पस-ए-मंज़र में टीपू सुलतान का ये ऐलान कि हर औरत को पर्दे और हया का हक़ हासिल है, ख़ाह वो किसी भी ज़ात, मज़हब या तबक़े से ताल्लुक़ रखती हो, एक अदालती इन्क़िलाब से कम ना था। उनके इस फ़रमान के बाद रियासत-ए-मैसूर में निचली ज़ात की ख़वातीन को वो समाजी तहफ़्फ़ुज़ मिला जिससे वो पहली बार ख़ुद को इन्सान समझने लगें। टीपू सुलतान ने औरतों के लिए तालीमी मवाक़े, विरासत के हुक़ूक़ और मुआशरती वक़ार को क़ानूनी शक्ल दी जो इस दौर में किसी हिंदू या मुस्लमान हुकमरान के यहां आम ना था।
    ये हक़ीक़त है कि उनके दौर में औरत को बापरदा ज़िंदगी, तालीम, और जायदाद में हिस्सा जैसी नेअमतें मिलीं, जो सदियों तक फ़क़त ऊंची ज़ात की ख़वातीन को दस्तयाब थीं। उन्होंने रियास्ती सतह पर उस निज़ाम को चैलेंज किया जो औरत के बदन को भी टैक्स के काबिल समझता था, और औरत के हिजाब को ना सिर्फ मज़हबी बल्कि इन्सानी हक़ क़रार दिया। आज जब हम ख़वातीन के हुक़ूक़ के हवाले से क़ानूनसाज़ी की बात करते हैं, तो टीपू सुलतान जैसे इन्क़िलाबी हुक्मरां की मसाल हमें ये सबक़ देती है कि एक रियासत तभी इन्साफ़ पर क़ायम हो सकती है जब उसमें हर इन्सान, ख़ुसूसन हर औरत, को उसका बुनियादी हक़ हासिल हो।
    उन्होंने तालीम को आम करने और बच्चियों की तालीम पर ज़ोर दिया। उनका मानना था कि किसी क़ौम की तरक़्क़ी उसकी औरतों की तालीम से मशरूत है। उन्होंने मदारिस, लाइब्रेरियां और तर्बीयती इदारे क़ायम किए जहां ख़वातीन भी ज़ेवर-ए-इलम से आरास्ता हो सकें।
    टीपू सुलतान की सबसे ख़ूबसूरत पहचान उनका बैन उल मज़ाहिब इत्तिहाद था। उनका वज़ीर-ए-आज़म पण्डित पूर्णिया एक हिंदू था, जो उनके क़रीब तरीन मुशीरों में शामिल था हालाँकि बाद में उसने ग़द्दारी की। उन्होंने पूरा इख़तियार दे रखा था कि वो रियास्ती उमूर में फ़ैसले कर सके। ये उस दौर की मिसाल है, जब मज़हब, ज़ात, या अक़ीदे की बुनियाद पर तफ़रीक़ ना की जाती थी, बल्कि सलाहीयत को मयार बनाया जाता था।
    आज जब हमारा मुआशरा फ़िर्कावारीयत, ज़ात पात और मज़हबी ताअस्सुब का शिकार है, हमें टीपू सुलतान की तालीमात और तर्ज़-ए-हुक्मरानी की तरफ़ लौटने की ज़रूरत है। उनकी ज़िंदगी हमें सिखाती है कि असल ताक़त तलवार में नहीं, इन्साफ़ में है।
    टीपू सुलतान ने अंग्रेज़ों की गु़लामी क़बूल नहीं की, बल्कि अपनी जान दे दी, मगर कभी सर नहीं झुकाया। उनका वो मशहूर क़ौल आज भी हमारे दिलों में गूँजता है :

शेर की एक दिन की ज़िंदगी, गीदड़ की सौ साला ज़िंदगी से बेहतर है। 

    आज मुल्क में हालात अफ़सोसनाक हैं। मज़हब और शिनाख़्त की बुनियाद पर इन्सानों के दरमयान तफ़रीक़ बढ़ती जा रही है। कहीं नाम पूछ कर मार दिया जाता है, कहीं मस्जिद में इबादत करने वालों को निशाना बनाया जाता है, और कहीं गाय के नाम पर बे-गुनाहों को सर-ए-बाज़ार पीट-पीट कर मार दिया जाता है, इन्सान का नाम ही ज़िंदगी और मौत के फ़ैसले का पैमाना बन चुका है। तालीमी इदारों, शहरों, और सड़कों के नाम तक बदले जा रहे हैं ताकि तारीख़ का चेहरा मसख़ कर सिर्फ एक मख़सूस नज़रिए को ग़ालिब कर दिया जाए। और ये नाम महज इस बुनियाद पर बदले जा रहे हैं कि वो किसी ख़ास मज़हब या शख़्सियत से मंसूब हैं। ये हालात ना सिर्फ जमहूरी इक़दार के मुनाफ़ी हैं बल्कि इन्सानियत के बुनियादी उसूलों से भी टकराते हैं। ये वो दौर है, जहां तास्सुब ने इन्साफ़ को दबा दिया है, और नफ़रत ने भाईचारे की जगह ले ली है।
    ऐसे माहौल में टीपू सुलतान का अदल-ओ-इन्साफ़ और मज़हबी हम-आहंगी पर मबनी तर्ज़-ए-हुकूमत एक रोशन मिसाल बन कर सामने आता है। उन्होंने कभी किसी की शिनाख़्त, मज़हब या ज़ात को उसकी इज़्ज़त या इन्साफ़ से महरूम करने का ज़रीया नहीं बनाया। 
    दरे अस्ना औरंगज़ेब रहमतुल्लाह अलैह के ख़िलाफ़ जो ज़हर उगला गया और उनकी क़ब्र पर सियासत की गई, वो ना सिर्फ तारीख़ से जहालत का सबूत है बल्कि समाज में नफ़रत के बढ़ते ज़हर का भी पता देती है। एक बाशऊर क़ौम अपने माज़ी को हमेशा याद रखती है, बल्कि इससे सबक़ सीख कर हाल को बेहतर बनाती है। लेकिन आज हमारे बुज़ुर्गों की तौहीन की जा रही है बल्कि फ़िर्कापरस्ती को हथियार बना कर समाज को बांटने की कोशीश की जा रही है। टीपू सुलतान और औरंगज़ेब जैसे किरदार हमें याद दिलाते हैं कि असल क़ियादत वही होती है, जो दीन, अदल और ग़ैरत पर मबनी हो और यही पैग़ाम आज हमें सबसे ज़्यादा दरकार है। 
    शहीद टीपू सुलतान एक ऐसे बादशाह हैं, जो मुल्क की हिफ़ाज़त करते हुए मैदान-ए-जंग में शहीद हुए। 4 मई, यौम शहादत टीपू सुलतान सिर्फ एक तारीख़ी दिन नहीं, बल्कि ये तारीख हमें याद दिलाती है कि हमें भी इन्साफ़, बराबरी, ख़वातीन के हुक़ूक़, तालीम और क़ौमी इत्तिहाद के लिए आवाज़ बुलंद करनी है। एससी, एसटी और दलितों को इन्साफ़ दिलाने के लिए पुरज़ोर आवाज़ बुलंद करना होगी, जो मनुवादी, पूंजीवादी अनासिर बदनाम करने में लगे हुए हैं, उन्हें हर जगह से उखाड़ फेंकना है, यही इस दिन का पैग़ाम है। टीपू सुलतान आज भी ज़िंदा हैं। हमारी सोच में, हमारे उसूलों में और हर उस इन्सान में जो जुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा होता है।

MW Ansari, IPS (Rtd)
Bhopal



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Monday, 28 April 2025

 शव्वाल उल मुकर्रम, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल   ﷺ    

"सिर्फ तीन जगह पर झूठ जाएज़ और हलाल है, एक ये के आदमी अपनी बीवी से बात करें ताकि उसको राज़ी कर ले, दूसरा जंग में झूठ बोलना और तीसरा लोगों के दरमियान सुलह कराने के लिए झूठ बोलना।"

- अबू दाऊद 

शाम के शहर हमाह से था मदीना मुनव्वरा में इन्सानियत की बेलौस ख़िदमत करने वाले शेख़ इस्माईल का ताल्लुक़ 

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बख्तावर अदब : मुस्लमानों के लिए दुनियाभर में दूसरे इंतिहाई मुक़द्दस शहर मदीना मुनव्वरा में 40 बरस से ज़ाइरीन को मुफ़्त चाय और क़हवा पिलाने वाले 96 साला शेख़ इस्माईल अलज़ाइम अब्बू इंतिक़ाल कर गए। शाम के शहर हमास से ताअल्लुक रखने वाले शेख इस्माईल गुजिश्ता पचास सालों से मदीना मुनव्वरा में मुकीम थे और हर आने वाले जाइरीन को मुफत चाय, काफी और खुजूर पेश किया करते थे। कभी-कभी ज़ाइरीन को वे अपने आबाई इलाक़े से आने वाली रिवायती मिठाईयां भी पेश करते थे।
    जानकारी के मुताबिक 96 साला बुज़ुर्ग शेख़ इस्माईल अलज़ाइम मस्जिद नबवी ﷺ के क़रीब एक प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ जाते। उनके सामने एक मेज़ होती जिस पर काफ़ी चाय के अलावा मीठे पकवान की प्लेट भी होती और जो भी जायरीन उनके सामने से गुजरता, उसे वे चाय पेश करते। जायरीन पैसा देना चाहते तो वे मना कर देते। इस तरह इन्सानी ख़िदमत के सबब वे पैग़ंबर रसूल ﷺ के मेहमानों के मेज़बान के तौर पर मशहूर थे। 

ख़ातून और सिक्योरिटी गार्ड के बीच हुई हाथापाई

    मदीना मुनव्वरा में मस्जिद नबवी ﷺ में एक ख़ातून और सिक्योरिटी गार्ड के दरमयान पिछले दिनों हुई हाथापाई का वीडियो सोशल मीडया पर वाइरल होने के बाद सऊदी हुक्काम का मौकूफ सामने आया है। तफ़सीलात के मुताबिक़ मस्जिद नबवी 000 में ख़ातून और सिक्योरिटी अहलकार के दरमयान पेश आने वाले वाकिये पर सऊदी जनरल डायरेक्टोरेट आफ़ पब्लिक सिक्योरिटी ने कहा कि महकमा मस्जिद नबवीﷺ  में एक खातून की जानिब से सिक्योरिटी अहलकार पर हमला करने वाले वाकिये की ताहकीकात की जा रही है। हुक्काम ने कहा कि जब कोई अहलकार अपने दायरा इख़तियार में ज़वाबत और हिदायात पर अमल दरआमद करने और ख़िलाफ़ वर्जियों का पता लगाने के अपने फ़राइज़ अंजाम दे रहा हो तो किसी सिक्योरिटी अफ़्सर पर हमला करना ममनू है, इन कार्यवाईयों को बड़े जराइम तसव्वुर किया जाता है जिनकी गिरफ़्तारी और सख़्त सज़ा दी जाती है।

ज़ाइरीन को 40 बरस से पिला रहे थे मुफ़्त चाय, मस्जिदे नबवी में खातून और सिक्योरिटी गार्ड के बीच हुई हाथापाई

 शव्वाल उल मुकर्रम, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल   ﷺ    

"सिर्फ तीन जगह पर झूठ जाएज़ और हलाल है, एक ये के आदमी अपनी बीवी से बात करें ताकि उसको राज़ी कर ले, दूसरा जंग में झूठ बोलना और तीसरा लोगों के दरमियान सुलह कराने के लिए झूठ बोलना।"

- अबू दाऊद 

शाम के शहर हमाह से था मदीना मुनव्वरा में इन्सानियत की बेलौस ख़िदमत करने वाले शेख़ इस्माईल का ताल्लुक़ 

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बख्तावर अदब : मुस्लमानों के लिए दुनियाभर में दूसरे इंतिहाई मुक़द्दस शहर मदीना मुनव्वरा में 40 बरस से ज़ाइरीन को मुफ़्त चाय और क़हवा पिलाने वाले 96 साला शेख़ इस्माईल अलज़ाइम अब्बू इंतिक़ाल कर गए। शाम के शहर हमास से ताअल्लुक रखने वाले शेख इस्माईल गुजिश्ता पचास सालों से मदीना मुनव्वरा में मुकीम थे और हर आने वाले जाइरीन को मुफत चाय, काफी और खुजूर पेश किया करते थे। कभी-कभी ज़ाइरीन को वे अपने आबाई इलाक़े से आने वाली रिवायती मिठाईयां भी पेश करते थे।
    जानकारी के मुताबिक 96 साला बुज़ुर्ग शेख़ इस्माईल अलज़ाइम मस्जिद नबवी ﷺ के क़रीब एक प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ जाते। उनके सामने एक मेज़ होती जिस पर काफ़ी चाय के अलावा मीठे पकवान की प्लेट भी होती और जो भी जायरीन उनके सामने से गुजरता, उसे वे चाय पेश करते। जायरीन पैसा देना चाहते तो वे मना कर देते। इस तरह इन्सानी ख़िदमत के सबब वे पैग़ंबर रसूल ﷺ के मेहमानों के मेज़बान के तौर पर मशहूर थे। 

ख़ातून और सिक्योरिटी गार्ड के बीच हुई हाथापाई

    मदीना मुनव्वरा में मस्जिद नबवी ﷺ में एक ख़ातून और सिक्योरिटी गार्ड के दरमयान पिछले दिनों हुई हाथापाई का वीडियो सोशल मीडया पर वाइरल होने के बाद सऊदी हुक्काम का मौकूफ सामने आया है। तफ़सीलात के मुताबिक़ मस्जिद नबवी 000 में ख़ातून और सिक्योरिटी अहलकार के दरमयान पेश आने वाले वाकिये पर सऊदी जनरल डायरेक्टोरेट आफ़ पब्लिक सिक्योरिटी ने कहा कि महकमा मस्जिद नबवीﷺ  में एक खातून की जानिब से सिक्योरिटी अहलकार पर हमला करने वाले वाकिये की ताहकीकात की जा रही है। हुक्काम ने कहा कि जब कोई अहलकार अपने दायरा इख़तियार में ज़वाबत और हिदायात पर अमल दरआमद करने और ख़िलाफ़ वर्जियों का पता लगाने के अपने फ़राइज़ अंजाम दे रहा हो तो किसी सिक्योरिटी अफ़्सर पर हमला करना ममनू है, इन कार्यवाईयों को बड़े जराइम तसव्वुर किया जाता है जिनकी गिरफ़्तारी और सख़्त सज़ा दी जाती है।

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Saturday, 26 April 2025

 शव्वाल उल मुकर्रम, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ   

"ऐसे शख्स की बददुआ से बचो जिस पर ज़ुल्म किया गया हो, इसलिए कि उसकी बददुआ और अल्लाह के दरमियान कोई आड़ नही होती।"

- तिर्मिज़ी 

पहलगाम में जां बहक होने वालों को पेश की खेराजे अकीदत, दिखाई एकजुटता

✅ नई तहरीक : भिलाई 

अल मदद एजुकेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी ने कश्मीर के पहलगाम में की गई नस्लकुशी के खिलाफ मुजाहिरा किया। सिविक सेंटर में हुए इस मुजाहिरे में आतंकवादी हमले में जान गंवाने वाले लोगों को मोमबत्ती जलाकर खेराजे अकीदत पेश की गई। 
    इस दौरान सोसायटी की प्रेसिडेंट अंजुम ने कहा कि मुश्किल की इस घड़ी में हम सब एकजुट हैं। इसमें कहीं भी जाति-मजहब की बिना पर भेद न किया जाए। सबसे पहले हम सब हिंदुस्तानी हैं और इंसानियत हमारा मजहब है। इस दौरान खुसूसी तौर पर सेक्रेटरी कौसर खान, नायब सदर शबाना सिद्दीकी, लीना तज़ीन, नरगिस, एसएन शेख, शमशुन, कैसर इकबाल, रेहाना, मिस्बाह हुसैन, रुखसाना सिद्दीकी और फरीदा अली समेत तंजीम की दीगर खवातीन मौजूद थीं। 

पहलगाम में जां बहक होने वालों को पेश की खेराजे अकीदत, दिखाई एकजुटता

 शव्वाल उल मुकर्रम, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ   

"ऐसे शख्स की बददुआ से बचो जिस पर ज़ुल्म किया गया हो, इसलिए कि उसकी बददुआ और अल्लाह के दरमियान कोई आड़ नही होती।"

- तिर्मिज़ी 

पहलगाम में जां बहक होने वालों को पेश की खेराजे अकीदत, दिखाई एकजुटता

✅ नई तहरीक : भिलाई 

अल मदद एजुकेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी ने कश्मीर के पहलगाम में की गई नस्लकुशी के खिलाफ मुजाहिरा किया। सिविक सेंटर में हुए इस मुजाहिरे में आतंकवादी हमले में जान गंवाने वाले लोगों को मोमबत्ती जलाकर खेराजे अकीदत पेश की गई। 
    इस दौरान सोसायटी की प्रेसिडेंट अंजुम ने कहा कि मुश्किल की इस घड़ी में हम सब एकजुट हैं। इसमें कहीं भी जाति-मजहब की बिना पर भेद न किया जाए। सबसे पहले हम सब हिंदुस्तानी हैं और इंसानियत हमारा मजहब है। इस दौरान खुसूसी तौर पर सेक्रेटरी कौसर खान, नायब सदर शबाना सिद्दीकी, लीना तज़ीन, नरगिस, एसएन शेख, शमशुन, कैसर इकबाल, रेहाना, मिस्बाह हुसैन, रुखसाना सिद्दीकी और फरीदा अली समेत तंजीम की दीगर खवातीन मौजूद थीं। 

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 शव्वाल उल मुकर्रम, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल     

जो चीज़ सबसे ज़्यादा लोगों को जन्नत में दाखिल करेगी, वह ख़ौफ-ए-खुदा और हुस्न अखलाक है।

- तिर्मिज़ी 

मआशरे ने मौन रैली निकाल अपर कलेक्टर ठाकुर को सौंपा मेमोरेंडम, पहलगाम हादसे के कसूरवारों को कड़ी सजा देने का किया मुतालबा 

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✅ नई तहरीक : खैरागढ़

जिला मुस्लिम मआशरा केसीजी ने आतंकवादियो के खिलाफ सख्त कार्रवाई का मुतालबा करते हुए बरोज जुमा, 25 अप्रैल को बाद नमाजे जुमा मस्जिद चौक से मौन जुलूस निकाला जो जय स्तंभ चौक, आंबेडकर चौक होते हुए कलेक्टोरेट पहुंचा जहां मआशरे ने सदर द्रोपदी मूर्मू के नाम कलेक्टर को मेमोरेंडम सौंपा। 
    
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    मआशरे ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले की कड़ी मजम्मत करते हुए कहा कि कश्मीर के पहलगाम में दहशतगर्दों की जानिब से किए गए कायराना हमले में 27 बेकसूर शहरियों की जाने चली गई। दहशतगर्दों के हमले ने पूरे मुल्क को झकझोर कर रख दिया है। जिला खैरागढ़, छुईखदान, गंडई (केसीजी) का मुस्लिम मआशरा भी हमले से रंजीदा है। इस दौरान जिला मुस्लिम समाज के सदर सज्जाक खान, खैरागढ़ नपा के नायब सदर अब्दुल रज्जाक खान, जिला नायब सदर अरशद हुसैन, बानी जफर हुसैन खान, शमशुल होदा खान, जिला महामंत्री व गंडई सदर जाबिद खान, जिला मुस्लिम समाज के खजांची हाज़ी रिज़वान मेमन, खलील कुरैशी, जिला मुस्लिम समाज के सेक्रेटरी मोहम्मद याहिया नियाज़ी, छुईखदान सदर निजामुद्दीन खान, फारुख मेमन, शेख कलीम खान, असीर खान, नसीम खान, डॉ. मकसूद अहमद, याकूब खान, सैय्यद अल्ताफ अली, जुनैद खान, अय्यूब सोलंकी व नदीम मेमन, हाजी तनवीर मेमन, हाजी मुर्तजा खान, रहीम बख्श, अमीन मेमन, मतीन अशरफ़, सलीम सोलंकी, इरफ़ान मेमन, शकील सोलंकी, जाफर झाड़ूदिया, सादिक मोतीवाला, तारिक अमान, राजा सोलंकी, लक्की सोलंकी, बाबू खान, सद्दाम मेमन, माजिद खान, इरशाद खान, शेख जाहिद, तालिब मेमन व फारुख सोलंकी सहित सैकड़ों की तादाद में मौजूद लोगों ने दहशतगर्दों की इस कायराना हरकत की पुरजोर मजम्मत करते हुये राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के नाम कलेक्टर इंद्रजीत सिंह चंद्रवाल की गैर मौजूदगी में अपर कलेक्टर सुरेंद्र सिंह ठाकुर को सौंपे ज्ञापन में कहा कि हम भारत सरकार से अपील करते है कि आतंकवादियो के खिलाफ कठोर कार्यवाही करते हुए उन्हें सख्त से सख्त सजा दी जाए और इन्हें पनाह देने वाले देश पाकिस्तान के खिलाफ भी कड़ी कार्रवई की जाए। 
    रैली में शामिल लोगों ने कलेक्टोरेट पहुंचने तक पाकिस्तान मुर्दाबाद, आतंकवाद मुर्दाबाद और हिंदुस्तान जिंदाबाद की तख्ती लिए हुए थे। इस दौरान वे आतंकवाद मुर्दाबाद और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाते रहे।

मस्जिद चौक से निकला जुलूस, गूंजा पाकिस्तान मुर्दाबाद का नारा, दहशतगर्दों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का मुतालबा

 शव्वाल उल मुकर्रम, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल     

जो चीज़ सबसे ज़्यादा लोगों को जन्नत में दाखिल करेगी, वह ख़ौफ-ए-खुदा और हुस्न अखलाक है।

- तिर्मिज़ी 

मआशरे ने मौन रैली निकाल अपर कलेक्टर ठाकुर को सौंपा मेमोरेंडम, पहलगाम हादसे के कसूरवारों को कड़ी सजा देने का किया मुतालबा 

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✅ नई तहरीक : खैरागढ़

जिला मुस्लिम मआशरा केसीजी ने आतंकवादियो के खिलाफ सख्त कार्रवाई का मुतालबा करते हुए बरोज जुमा, 25 अप्रैल को बाद नमाजे जुमा मस्जिद चौक से मौन जुलूस निकाला जो जय स्तंभ चौक, आंबेडकर चौक होते हुए कलेक्टोरेट पहुंचा जहां मआशरे ने सदर द्रोपदी मूर्मू के नाम कलेक्टर को मेमोरेंडम सौंपा। 
    
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    मआशरे ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले की कड़ी मजम्मत करते हुए कहा कि कश्मीर के पहलगाम में दहशतगर्दों की जानिब से किए गए कायराना हमले में 27 बेकसूर शहरियों की जाने चली गई। दहशतगर्दों के हमले ने पूरे मुल्क को झकझोर कर रख दिया है। जिला खैरागढ़, छुईखदान, गंडई (केसीजी) का मुस्लिम मआशरा भी हमले से रंजीदा है। इस दौरान जिला मुस्लिम समाज के सदर सज्जाक खान, खैरागढ़ नपा के नायब सदर अब्दुल रज्जाक खान, जिला नायब सदर अरशद हुसैन, बानी जफर हुसैन खान, शमशुल होदा खान, जिला महामंत्री व गंडई सदर जाबिद खान, जिला मुस्लिम समाज के खजांची हाज़ी रिज़वान मेमन, खलील कुरैशी, जिला मुस्लिम समाज के सेक्रेटरी मोहम्मद याहिया नियाज़ी, छुईखदान सदर निजामुद्दीन खान, फारुख मेमन, शेख कलीम खान, असीर खान, नसीम खान, डॉ. मकसूद अहमद, याकूब खान, सैय्यद अल्ताफ अली, जुनैद खान, अय्यूब सोलंकी व नदीम मेमन, हाजी तनवीर मेमन, हाजी मुर्तजा खान, रहीम बख्श, अमीन मेमन, मतीन अशरफ़, सलीम सोलंकी, इरफ़ान मेमन, शकील सोलंकी, जाफर झाड़ूदिया, सादिक मोतीवाला, तारिक अमान, राजा सोलंकी, लक्की सोलंकी, बाबू खान, सद्दाम मेमन, माजिद खान, इरशाद खान, शेख जाहिद, तालिब मेमन व फारुख सोलंकी सहित सैकड़ों की तादाद में मौजूद लोगों ने दहशतगर्दों की इस कायराना हरकत की पुरजोर मजम्मत करते हुये राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के नाम कलेक्टर इंद्रजीत सिंह चंद्रवाल की गैर मौजूदगी में अपर कलेक्टर सुरेंद्र सिंह ठाकुर को सौंपे ज्ञापन में कहा कि हम भारत सरकार से अपील करते है कि आतंकवादियो के खिलाफ कठोर कार्यवाही करते हुए उन्हें सख्त से सख्त सजा दी जाए और इन्हें पनाह देने वाले देश पाकिस्तान के खिलाफ भी कड़ी कार्रवई की जाए। 
    रैली में शामिल लोगों ने कलेक्टोरेट पहुंचने तक पाकिस्तान मुर्दाबाद, आतंकवाद मुर्दाबाद और हिंदुस्तान जिंदाबाद की तख्ती लिए हुए थे। इस दौरान वे आतंकवाद मुर्दाबाद और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाते रहे।

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Wednesday, 23 April 2025

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सीरत-ए- बेमिसाल मिलन व सहाफियों के एजाजिया तकरीब में सहाफियों समेत एजाज से नवाजे गए बच्चे व सोशल वर्कर्स 
विधायक लहरिया बोले, बच्चे मुल्क का मुस्तकबिल और सहाफी समाज का आइना
संपादक 8, न्यूज सीजी शेख असलम के काम को सराहा

✅ नई तहरीक : बिलासपुर 

गुजिश्ता दिनों सिम्स ऑडिटोरियम में मुनाकिद सीरत-ए-बेमिसाल मिलन व सहाफी एजाजिया तकरीब में सहाफियों समेत मुख्तलिफ शोबों में बेहतर काम करने वाले बच्चों व सोशल वर्कर्स को एजाज से नवाजा गया। मेहमाने खुसूसी मस्तूरी विधायक दिलीप लहरिया, मेहमाने खास राजेश सूर्यवंशी, सदर जिला पंचायत, कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक डॉक्टर शिल्पा कौशिक और सर्व आदिवासी समाज के सदर राजीव ध्रुव थे। तकरीब की शुरुआत दीप जलाने से हुई। जिसके बाद मुदीरे आला (संपादक) असलम शेख ने गुलदस्ता भेंटकर मेहमानों का इस्तकबाल किया। 

bakhtawar adab, nai tahreek, read me
    मेहमाने खुसूसी विधायक लहरिया ने तकरीब से खिताब करते हुए तकरीब को यादगार बताते हुए कहा कि इसके जरिये अपने-अपने हल्के में बेहतर काम करने वालों को एजाज से नवाजा जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि मंच ही एक ऐसी जगह है जहां लोगों को एकजुट होने का मौका मिलता है। 
    उन्होंने कहा, एक ओर बच्चे मुल्क का नाम रोशन कर रहे है तो दूसरी ओर सहाफी जम्हूरियत के चौथे सुतून के तौर पर मुल्क की बेहतरी के लिए काम कर रहे हैं। जिला पंचायत सदर राजेश सूर्यवंशी ने कहा कि इस तरह की तकरीब समूची रियासत में जगह-जगह मुनाकिद की जानी चाहिए। उन्होंने अपने चेनल के जरिये लोगों को एक सूत्र में बांधे रखने की संपादक शेख असलम की कोशिशों को सराहा। कृषि विज्ञान केन्द्र की साइंटिस्ट डॉक्टर शिल्पा कौशिक ने मुख्तलिफ इम्तेहान में अपनी कारकर्दगी का बेहतर मुजाहिरा करने वाले बच्चों की मेहनत को सराहा। उन्होंने कहा, शहर के होनहार बच्चों ने रियासत में शहर का नाम रोशन किया है। सहाफियों से खिताब करते हुए उन्होंने कहा, सहाफत आसान नहीं है। कई बार खबरों के लिए सहाफियों को अपनी जान जोखिम में डालना पड़ जाता है। 
    फ्यूचर साइन इंग्लिश मीडियम स्कूल की सुमैया फातिमा ने आईपीएस के मौजूद पर लोगों को खिताब किया। सुमैया ने बड़ी होकर आईपीएस बनकर मुल्क की खिदमत करने के अपने अज्म का इजहार किया। तकरीब में फ्यूचर शाईन इंग्लिश मीडियम स्कूल के प्रिंसिपल इमरान, महेंद्र मोनू, कमलेश लवहात्रे, विनय शुक्ला और दिलीप अग्रवाल तकरीबन 500 लोगों ने शिरकत की। 

ये नवाजे गए

    तकरीब के दौरान वैदिक न्यूज की एमडी सैयद सलमा, पर्वतारोही निशू सिंह, बॉक्सिंग इंटरनेशनल खिलाड़ी अंकुर यादव, अब्दुल शमीम, सैयद ताजुद्दीन, किरण मोईत्रा, अजीता पाण्डेय, अंकिता शुक्ला, नीरज गेमनानी, मितवा महिला कल्याण सेवा समिति, स्वाति गुप्ता भवन की टीम, दीपक शर्मा व उनकी टीम, कमांडर महाविद्यालय एनएसएस एनसीसी की टीम, आजाद युवा संगठन, शाह कुरैशी व टीम, सद्भाव पत्रकार संघ, श्रमजीवी पत्रकार कल्याण संघ, प्रेस क्लब के सीनियर सहाफी लोकेश वाघमारे, विनय मिश्रा, दिलीप अग्रवाल, कमलेश लोहात्रे, मनीष शर्मा, गुड्डा सदाफले, कमांडर महाविद्यालय के एनएसएस, एनसीसी छात्र-छात्राओं के साथ प्रबंधक रोहित लहरे, जीएसटी बार एसोसिएशन के जिला सदर सुरेश शुक्ला, शिक्षा विभाग में बेहतर काम के लिए विकास कायरवार, अवधेश विमल, रेवती यादव, शिवसेना महिला जिला सदर बिलासपुर, सुनीता ध्रुव, बीएमओ बिल्हा विकासखंड, नीरज मखीजा, नीरज शुक्ला, संजीव ठाकुर, जिया खान, विनय शुक्ला, कमलेश लव्हात्रे के अलावा एंकर भारती यादव, नेहा शर्मा, जागृति, प्रज्ञा, रमा, सृष्टि सिंह, रिपोर्टर प्रियंका सिंह, ऋतु साहू, मधु शर्मा, मधु खान और काजल किरण और सीनियर सहाफियों के साथ तकरीबन 400 लोगों को एजाज से नवाजा गया। 


बेहतर काम के लिए एजाज से नवाजी गई वैदिक ग्रुप की एमडी सलमा

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सीरत-ए- बेमिसाल मिलन व सहाफियों के एजाजिया तकरीब में सहाफियों समेत एजाज से नवाजे गए बच्चे व सोशल वर्कर्स 
विधायक लहरिया बोले, बच्चे मुल्क का मुस्तकबिल और सहाफी समाज का आइना
संपादक 8, न्यूज सीजी शेख असलम के काम को सराहा

✅ नई तहरीक : बिलासपुर 

गुजिश्ता दिनों सिम्स ऑडिटोरियम में मुनाकिद सीरत-ए-बेमिसाल मिलन व सहाफी एजाजिया तकरीब में सहाफियों समेत मुख्तलिफ शोबों में बेहतर काम करने वाले बच्चों व सोशल वर्कर्स को एजाज से नवाजा गया। मेहमाने खुसूसी मस्तूरी विधायक दिलीप लहरिया, मेहमाने खास राजेश सूर्यवंशी, सदर जिला पंचायत, कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक डॉक्टर शिल्पा कौशिक और सर्व आदिवासी समाज के सदर राजीव ध्रुव थे। तकरीब की शुरुआत दीप जलाने से हुई। जिसके बाद मुदीरे आला (संपादक) असलम शेख ने गुलदस्ता भेंटकर मेहमानों का इस्तकबाल किया। 

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    मेहमाने खुसूसी विधायक लहरिया ने तकरीब से खिताब करते हुए तकरीब को यादगार बताते हुए कहा कि इसके जरिये अपने-अपने हल्के में बेहतर काम करने वालों को एजाज से नवाजा जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि मंच ही एक ऐसी जगह है जहां लोगों को एकजुट होने का मौका मिलता है। 
    उन्होंने कहा, एक ओर बच्चे मुल्क का नाम रोशन कर रहे है तो दूसरी ओर सहाफी जम्हूरियत के चौथे सुतून के तौर पर मुल्क की बेहतरी के लिए काम कर रहे हैं। जिला पंचायत सदर राजेश सूर्यवंशी ने कहा कि इस तरह की तकरीब समूची रियासत में जगह-जगह मुनाकिद की जानी चाहिए। उन्होंने अपने चेनल के जरिये लोगों को एक सूत्र में बांधे रखने की संपादक शेख असलम की कोशिशों को सराहा। कृषि विज्ञान केन्द्र की साइंटिस्ट डॉक्टर शिल्पा कौशिक ने मुख्तलिफ इम्तेहान में अपनी कारकर्दगी का बेहतर मुजाहिरा करने वाले बच्चों की मेहनत को सराहा। उन्होंने कहा, शहर के होनहार बच्चों ने रियासत में शहर का नाम रोशन किया है। सहाफियों से खिताब करते हुए उन्होंने कहा, सहाफत आसान नहीं है। कई बार खबरों के लिए सहाफियों को अपनी जान जोखिम में डालना पड़ जाता है। 
    फ्यूचर साइन इंग्लिश मीडियम स्कूल की सुमैया फातिमा ने आईपीएस के मौजूद पर लोगों को खिताब किया। सुमैया ने बड़ी होकर आईपीएस बनकर मुल्क की खिदमत करने के अपने अज्म का इजहार किया। तकरीब में फ्यूचर शाईन इंग्लिश मीडियम स्कूल के प्रिंसिपल इमरान, महेंद्र मोनू, कमलेश लवहात्रे, विनय शुक्ला और दिलीप अग्रवाल तकरीबन 500 लोगों ने शिरकत की। 

ये नवाजे गए

    तकरीब के दौरान वैदिक न्यूज की एमडी सैयद सलमा, पर्वतारोही निशू सिंह, बॉक्सिंग इंटरनेशनल खिलाड़ी अंकुर यादव, अब्दुल शमीम, सैयद ताजुद्दीन, किरण मोईत्रा, अजीता पाण्डेय, अंकिता शुक्ला, नीरज गेमनानी, मितवा महिला कल्याण सेवा समिति, स्वाति गुप्ता भवन की टीम, दीपक शर्मा व उनकी टीम, कमांडर महाविद्यालय एनएसएस एनसीसी की टीम, आजाद युवा संगठन, शाह कुरैशी व टीम, सद्भाव पत्रकार संघ, श्रमजीवी पत्रकार कल्याण संघ, प्रेस क्लब के सीनियर सहाफी लोकेश वाघमारे, विनय मिश्रा, दिलीप अग्रवाल, कमलेश लोहात्रे, मनीष शर्मा, गुड्डा सदाफले, कमांडर महाविद्यालय के एनएसएस, एनसीसी छात्र-छात्राओं के साथ प्रबंधक रोहित लहरे, जीएसटी बार एसोसिएशन के जिला सदर सुरेश शुक्ला, शिक्षा विभाग में बेहतर काम के लिए विकास कायरवार, अवधेश विमल, रेवती यादव, शिवसेना महिला जिला सदर बिलासपुर, सुनीता ध्रुव, बीएमओ बिल्हा विकासखंड, नीरज मखीजा, नीरज शुक्ला, संजीव ठाकुर, जिया खान, विनय शुक्ला, कमलेश लव्हात्रे के अलावा एंकर भारती यादव, नेहा शर्मा, जागृति, प्रज्ञा, रमा, सृष्टि सिंह, रिपोर्टर प्रियंका सिंह, ऋतु साहू, मधु शर्मा, मधु खान और काजल किरण और सीनियर सहाफियों के साथ तकरीबन 400 लोगों को एजाज से नवाजा गया। 


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✅ रेशमा फातिमा : रायपुर 

भारत का सांस्कृतिक परिदृश्य विविध परंपराओं, भाषाओं, धर्मों और कला रूपों का मिश्रण है, जो हज़ारों वर्षों से सह-अस्तित्व में हैं और विकसित हुआ है। पीढ़ियों से चली आ रही ये साझा सांस्कृतिक विरासत गर्व के प्रतीक से कहीं ज़्यादा है और भविष्य के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश है। तेज़ी से बदलती दुनिया में, भारत एक ज़्यादा समावेशी, टिकाऊ और सशक्त समाज बनाने के लिए अपने अतीत की प्रासंगिकता को फिर से खोज रहा है। 
    भारत की विरासत के सबसे गहन पहलुओं में से एक यह विचार है सह-अस्तित्व का। पूरे इतिहास में, भारत ने हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म से लेकर इस्लाम, ईसाई, सिख, जैन धर्म और आदिवासी मान्यताओं तक कई पहचानों को अपनाया है। भक्ति और सूफी आंदोलन इस साझा आध्यात्मिक यात्रा के प्रमुख उदाहरण हैं। कबीर और गुरु नानक जैसे संतों ने धार्मिक और जातिगत विभाजनों से ऊपर उठकर एकता, करुणा और समानता का उपदेश दिया। इस साझा संस्कृति के भौतिक स्थान-अजमेर शरीफ, वाराणसी के घाट, तमिलनाडु के मंदिर और पंजाब के गुरुद्वारे, सद्भाव के स्थल बने हुए हैं, जहाँ सभी पृष्ठभूमि के लोग एक साथ आते हैं। 
    ये सिर्फ़ स्मारक नहीं हैं; ये सांस्कृतिक संवाद के जीवंत प्रतीक हैं। भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली, आयुर्वेद, योग, वास्तु शास्त्र और टिकाऊ खेती का आधुनिक चुनौतियों के संदर्भ में पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है। कभी ग्रामीण या धार्मिक परिवेश तक सीमित रहने वाली प्रथाएँ अब स्वास्थ्य, जलवायु और माइंडफुलनेस पर वैश्विक बातचीत में प्रवेश कर रही हैं। उदाहरण के लिए, योग का वैश्विक आलिंगन, जिसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के साथ मान्यता दी गई है, भारत की समग्र कल्याण की प्राचीन समझ में निहित है। इसी तरह, पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों जैसे बावड़ी, बावड़ी और टैंक सिंचाई को जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे के मॉडल के रूप में फिर से देखा जा रहा है। 
    भारत की साझा विरासत इसके विविध कला रूपों में भी दिखाई देती है। मधुबनी, वारली और पट्टचित्र जैसे पारंपरिक शिल्प और कथक, भरतनाट्यम और बाउल संगीत जैसी प्रदर्शन कलाएँ सामूहिक स्मृति और क्षेत्रीय पहचान की कहानियाँ बताती हैं। हाल के वर्षों में, इन लुप्त होती कलाओं को पुनर्जीवित करने के लिए एक सचेत प्रयास किया गया है। सरकारी योजनाएँ, ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म और डिज़ाइन सहयोग कारीगर समुदायों में नई जान फूंक रहे हैं, जिनमें से कई ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े समूहों से संबंधित हैं। यह पुनरुद्धार न केवल संस्कृति को संरक्षित कर रहा है बल्कि आजीविका भी पैदा कर रहा है, खासकर ग्रामीण महिलाओं और युवाओं के लिए।
    साझा सांस्कृतिक विरासत शांतिपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए एक सेतु के रूप में भी उभरी है। नेपाल, भूटान बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंध बौद्ध धर्म से लेकर भाषा और खान-पान तक साझा धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाओं में निहित हैं। नालंदा विश्वविद्यालय के जीर्णोद्धार और दक्षिण एशिया में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों पर सहयोग जैसी पहल दर्शाती है कि कैसे साझा विरासत राजनीतिक सीमाओं को पार कर सकती है और आपसी सम्मान को बढ़ावा दे सकती है। ये प्रयास वैश्विक दक्षिण में एक सांस्कृतिक नेता के रूप में भारत की छवि को मजबूत करते हैं। भारतीय शिक्षा हमेशा से संस्कृति के संचार का माध्यम रही है। आज, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों, क्षेत्रीय इतिहास और स्थानीय भाषाओं को मुख्यधारा की शिक्षा में एकीकृत करने पर जोर देती है। यह नया फोकस सुनिश्चित करता है कि युवा भारतीय न केवल अपनी विरासत की सराहना करें बल्कि भविष्य के लिए इसे नया रूप देने और अनुकूलित करने के लिए भी सुसज्जित हों। 
    कक्षाओं में कहानी सुनाने के सत्रों से लेकर शहरों में हेरिटेज वॉक तक, सांस्कृतिक शिक्षा को अनुभवात्मक और समावेशी बनाने के लिए एक बढ़ता हुआ आंदोलन है। जब बच्चे अपनी विरासत के बारे में इस तरह से सीखते हैं जो उनके रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा होता है, तो इससे पहचान और अपनेपन की गहरी भावना पैदा होती है।

स्थिर नहीं है भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत 

यह एक जीवंत, सांस लेने वाली शक्ति है जो निरंतर विकसित और प्रेरित करती रहती है। आध्यात्मिक शिक्षाओं और प्राचीन विज्ञानों से लेकर कला रूपों और वास्तुकला तक, अतीत के ज्ञान को एक उज्जवल, अधिक दयालु भविष्य को आकार देने के लिए पुनर्व्याख्यायित किया जा रहा है।

- अंतर्राष्ट्रीय संबंध में परास्नातक, 
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय



साझी सांस्कृतिक विरासत : उज्जवल भविष्य की ओर ले जाते अतीत के उदाहरण

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✅ रेशमा फातिमा : रायपुर 

भारत का सांस्कृतिक परिदृश्य विविध परंपराओं, भाषाओं, धर्मों और कला रूपों का मिश्रण है, जो हज़ारों वर्षों से सह-अस्तित्व में हैं और विकसित हुआ है। पीढ़ियों से चली आ रही ये साझा सांस्कृतिक विरासत गर्व के प्रतीक से कहीं ज़्यादा है और भविष्य के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश है। तेज़ी से बदलती दुनिया में, भारत एक ज़्यादा समावेशी, टिकाऊ और सशक्त समाज बनाने के लिए अपने अतीत की प्रासंगिकता को फिर से खोज रहा है। 
    भारत की विरासत के सबसे गहन पहलुओं में से एक यह विचार है सह-अस्तित्व का। पूरे इतिहास में, भारत ने हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म से लेकर इस्लाम, ईसाई, सिख, जैन धर्म और आदिवासी मान्यताओं तक कई पहचानों को अपनाया है। भक्ति और सूफी आंदोलन इस साझा आध्यात्मिक यात्रा के प्रमुख उदाहरण हैं। कबीर और गुरु नानक जैसे संतों ने धार्मिक और जातिगत विभाजनों से ऊपर उठकर एकता, करुणा और समानता का उपदेश दिया। इस साझा संस्कृति के भौतिक स्थान-अजमेर शरीफ, वाराणसी के घाट, तमिलनाडु के मंदिर और पंजाब के गुरुद्वारे, सद्भाव के स्थल बने हुए हैं, जहाँ सभी पृष्ठभूमि के लोग एक साथ आते हैं। 
    ये सिर्फ़ स्मारक नहीं हैं; ये सांस्कृतिक संवाद के जीवंत प्रतीक हैं। भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली, आयुर्वेद, योग, वास्तु शास्त्र और टिकाऊ खेती का आधुनिक चुनौतियों के संदर्भ में पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है। कभी ग्रामीण या धार्मिक परिवेश तक सीमित रहने वाली प्रथाएँ अब स्वास्थ्य, जलवायु और माइंडफुलनेस पर वैश्विक बातचीत में प्रवेश कर रही हैं। उदाहरण के लिए, योग का वैश्विक आलिंगन, जिसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के साथ मान्यता दी गई है, भारत की समग्र कल्याण की प्राचीन समझ में निहित है। इसी तरह, पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों जैसे बावड़ी, बावड़ी और टैंक सिंचाई को जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे के मॉडल के रूप में फिर से देखा जा रहा है। 
    भारत की साझा विरासत इसके विविध कला रूपों में भी दिखाई देती है। मधुबनी, वारली और पट्टचित्र जैसे पारंपरिक शिल्प और कथक, भरतनाट्यम और बाउल संगीत जैसी प्रदर्शन कलाएँ सामूहिक स्मृति और क्षेत्रीय पहचान की कहानियाँ बताती हैं। हाल के वर्षों में, इन लुप्त होती कलाओं को पुनर्जीवित करने के लिए एक सचेत प्रयास किया गया है। सरकारी योजनाएँ, ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म और डिज़ाइन सहयोग कारीगर समुदायों में नई जान फूंक रहे हैं, जिनमें से कई ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े समूहों से संबंधित हैं। यह पुनरुद्धार न केवल संस्कृति को संरक्षित कर रहा है बल्कि आजीविका भी पैदा कर रहा है, खासकर ग्रामीण महिलाओं और युवाओं के लिए।
    साझा सांस्कृतिक विरासत शांतिपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए एक सेतु के रूप में भी उभरी है। नेपाल, भूटान बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंध बौद्ध धर्म से लेकर भाषा और खान-पान तक साझा धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाओं में निहित हैं। नालंदा विश्वविद्यालय के जीर्णोद्धार और दक्षिण एशिया में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों पर सहयोग जैसी पहल दर्शाती है कि कैसे साझा विरासत राजनीतिक सीमाओं को पार कर सकती है और आपसी सम्मान को बढ़ावा दे सकती है। ये प्रयास वैश्विक दक्षिण में एक सांस्कृतिक नेता के रूप में भारत की छवि को मजबूत करते हैं। भारतीय शिक्षा हमेशा से संस्कृति के संचार का माध्यम रही है। आज, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों, क्षेत्रीय इतिहास और स्थानीय भाषाओं को मुख्यधारा की शिक्षा में एकीकृत करने पर जोर देती है। यह नया फोकस सुनिश्चित करता है कि युवा भारतीय न केवल अपनी विरासत की सराहना करें बल्कि भविष्य के लिए इसे नया रूप देने और अनुकूलित करने के लिए भी सुसज्जित हों। 
    कक्षाओं में कहानी सुनाने के सत्रों से लेकर शहरों में हेरिटेज वॉक तक, सांस्कृतिक शिक्षा को अनुभवात्मक और समावेशी बनाने के लिए एक बढ़ता हुआ आंदोलन है। जब बच्चे अपनी विरासत के बारे में इस तरह से सीखते हैं जो उनके रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा होता है, तो इससे पहचान और अपनेपन की गहरी भावना पैदा होती है।

स्थिर नहीं है भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत 

यह एक जीवंत, सांस लेने वाली शक्ति है जो निरंतर विकसित और प्रेरित करती रहती है। आध्यात्मिक शिक्षाओं और प्राचीन विज्ञानों से लेकर कला रूपों और वास्तुकला तक, अतीत के ज्ञान को एक उज्जवल, अधिक दयालु भविष्य को आकार देने के लिए पुनर्व्याख्यायित किया जा रहा है।

- अंतर्राष्ट्रीय संबंध में परास्नातक, 
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय



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Saturday, 19 April 2025

 शव्वाल उल मुकर्रम, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ   

"अल्लाह ताअला फरमाता है: मेरा बंदा किसी और चीज़ के जरिये मुझ से इतना करीब नहीं होता, जितना फर्ज़ इबादत के जरिये होता है।"

- सहीह बुखारी 

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                                                                          File Photo

    नई तहरीक : लवाहिक़ीन (मरने वाले के परिजन) ने क़ातिल को इस शर्त पर माफी दे दी कि वो डेढ़ साल के दौरान ताइफ में मक़्तूल (मृतक) के नाम से एक मस्जिद तामीर कराएगा। मस्जिद की ताअमीर पूरी होने के बाद मस्जिद को वज़ारत मज़हबी उमूर के हवाले कर दिया जाएगा। 
    सऊदी मीडीया के मुताबिक़ ताइफ की एक फ़ौजदारी अदालत ने कत्ल के एक केस का फ़ैसला सुनाते हुए मक़्तूल के लवाहिक़ीन की तरफ़ से क़ातिल को माफ़ करने की दरख़ास्त मंज़ूर कर ली जिसमें मक़्तूल के लवाहिक़ीन ने ये शर्त रखी कि कातिल मक्तूल के नाम पर डेढ़ साल के दौरान ताइफ में एक मस्जिद तामीर करवाएगा और उसे मुकम्मल करने के बाद वज़ारत मज़हबी उमूर के हवाले कर देगा।
    जानकारी के मुताबिक सुनवाई के दौरान फ़रीक़ैन (दोनों पक्षों) के दरमयान अदालत की निगरानी में ये मुआहिदा तै पाया गया। माफ़ी मिलने के बाद क़ातिल की जानिब से मक़्तूल के लवाहिक़ीन और अदालत का शुक्रिया अदा किया गया।

कत्ल कर लाश जलाने वाले को सजा-ए-मौत

    दूसरी तरफ़ सऊदी अरब में एक ख़ातून को कत्ल कर उसकी लाश जलाने वाले ग़ैरमुल्की को सज़ा-ए-मौत दे दी गई। ये मामला ममलकत में मुक़ीम एक ग़ैरमुल्की ख़ातून के कत्ल का है जिसे मिस्री शहरी कत्ल कर दिया था और उसकी लाश को जला दिया था। कसूरवार पाए जाने पर मुजरिम को मदीना मुनव्वरा रीजन में सज़ा-ए-मौत दी गई।
    इस सिलसिले में सऊदी अरब की वज़ारत-ए-दाख़िला की जानिब से जारी बयान में कहा गया है कि मिस्र के शहरी ने गै़रक़ानूनी तौर पर सऊदी अरब में मुक़ीम एक ग़ैर मुल्की ख़ातून को क़तल करने के बाद वारदात छिपाने के लिए उसकी लाश को जला डाला था हालांकि सिक्योरिटी फ़ोर्स ने मिस्री शहरी को तलाश कर गिरफ़्तार कर लिया था। मज़कूरा शख़्स को फ़ौजदारी अदालत में पेश किया गया जहां उस पर क़तल का इल्ज़ाम साबित होने पर उसे मौत की सज़ा दी गई। 

सऊदी अरब : मस्जिद बनाने की शर्त पर क़ातिल को मिल गई माफी

 शव्वाल उल मुकर्रम, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ   

"अल्लाह ताअला फरमाता है: मेरा बंदा किसी और चीज़ के जरिये मुझ से इतना करीब नहीं होता, जितना फर्ज़ इबादत के जरिये होता है।"

- सहीह बुखारी 

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                                                                          File Photo

    नई तहरीक : लवाहिक़ीन (मरने वाले के परिजन) ने क़ातिल को इस शर्त पर माफी दे दी कि वो डेढ़ साल के दौरान ताइफ में मक़्तूल (मृतक) के नाम से एक मस्जिद तामीर कराएगा। मस्जिद की ताअमीर पूरी होने के बाद मस्जिद को वज़ारत मज़हबी उमूर के हवाले कर दिया जाएगा। 
    सऊदी मीडीया के मुताबिक़ ताइफ की एक फ़ौजदारी अदालत ने कत्ल के एक केस का फ़ैसला सुनाते हुए मक़्तूल के लवाहिक़ीन की तरफ़ से क़ातिल को माफ़ करने की दरख़ास्त मंज़ूर कर ली जिसमें मक़्तूल के लवाहिक़ीन ने ये शर्त रखी कि कातिल मक्तूल के नाम पर डेढ़ साल के दौरान ताइफ में एक मस्जिद तामीर करवाएगा और उसे मुकम्मल करने के बाद वज़ारत मज़हबी उमूर के हवाले कर देगा।
    जानकारी के मुताबिक सुनवाई के दौरान फ़रीक़ैन (दोनों पक्षों) के दरमयान अदालत की निगरानी में ये मुआहिदा तै पाया गया। माफ़ी मिलने के बाद क़ातिल की जानिब से मक़्तूल के लवाहिक़ीन और अदालत का शुक्रिया अदा किया गया।

कत्ल कर लाश जलाने वाले को सजा-ए-मौत

    दूसरी तरफ़ सऊदी अरब में एक ख़ातून को कत्ल कर उसकी लाश जलाने वाले ग़ैरमुल्की को सज़ा-ए-मौत दे दी गई। ये मामला ममलकत में मुक़ीम एक ग़ैरमुल्की ख़ातून के कत्ल का है जिसे मिस्री शहरी कत्ल कर दिया था और उसकी लाश को जला दिया था। कसूरवार पाए जाने पर मुजरिम को मदीना मुनव्वरा रीजन में सज़ा-ए-मौत दी गई।
    इस सिलसिले में सऊदी अरब की वज़ारत-ए-दाख़िला की जानिब से जारी बयान में कहा गया है कि मिस्र के शहरी ने गै़रक़ानूनी तौर पर सऊदी अरब में मुक़ीम एक ग़ैर मुल्की ख़ातून को क़तल करने के बाद वारदात छिपाने के लिए उसकी लाश को जला डाला था हालांकि सिक्योरिटी फ़ोर्स ने मिस्री शहरी को तलाश कर गिरफ़्तार कर लिया था। मज़कूरा शख़्स को फ़ौजदारी अदालत में पेश किया गया जहां उस पर क़तल का इल्ज़ाम साबित होने पर उसे मौत की सज़ा दी गई। 

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Tuesday, 15 April 2025

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सालाना उर्स पार्क (एकता उत्सव) की तकरीब के पोस्टर का अमल में आया रस्मे इजरा

✅ नई तहरीक : दुर्ग 

हजरत बाबा सैयद अब्दुल रहमान शाह काबुली रहमतुल्ला अलैह, पुराना बस स्टैंड का सालाना उर्स पाक (एकता उत्सव ) 13 मई से शुरू होने जा रहा है। उर्सपाक को लेकर गुजिश्ता दिनों मुनाकिद बैठक में उर्सपाक की तकरीब के पोस्टर का रस्मे इजरा अमल में आया। बैठक की सदारत उर्सपाक कमेटी के सदर प्रकाश देशलहरा ने की। 
    बैठक से खिताब करते हुए उन्होंने कहा कि काबुली बाबा का उर्स पाक न केवल रियासत छत्तीसगढ़ बल्कि दीगर प्रांतो में भी खासी अहमियत रखता है,  भाईचारा, प्यार, हम आहंगी और यकजहती का पैगाम देने वाले काबुली दरबार के उर्सपाक में सभी मजाहिब के लोग पूरी अकीदत से शामिल होते हैं। 

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  •     कमेटी के जनरल सेक्रेटरी रऊफ कुरेशी ने तकरीब की तफसीली जानकारी देते हुए बताया कि उर्स पाक की शुरुआत 13 मई को बाद नमाज मगरिब दरगाह शरीफ में परचम कुशाई से होगी। 
  • 14 मई को ख़ादिम-ए-आस्ताना के दौलतकदे, जामा मस्जिद के करीब से रात आठ बजे शाही संदल निकलकर शहर का गश्त करता हुआ दरगाह शरीफ पहुंचेगा जहां चादरपोशी की रस्म अदा कर रियासत छत्तीसगढ़ समेत मुल्क-ओ-मिल्लत के लिए अम्नो-अमां, तरक्की और खुशहाली की दुआ की जाएगी। 
  • 15 मई को रात 9:30 बजे मशहूर आतिशबाजी अयाज रजा, रजा फायर वर्क्स की ओर से दिलकश आतिशबाजी की जाएगी। जिसके बाद रात 10 बजे से निसार एहसान चिश्ती एंड ब्रदर्स, कव्वाल चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) और नौशाद चिश्ती कव्वाल, मुजफ्फरनगर (दिल्ली) के बीच कव्वाली का मुकाबला होगा। 
  • 16 मई को छोटे मजीद शोला कव्वाल एंड पार्टी, मुंबई और जुनैद सुल्तानी कव्वाल (बदायुं) के बीच कव्वाली का मुकाबला होगा। 
  • 17 मई को शाकिब अली साबरी कव्वाल, लखनऊ और गुलाम हबीब पेंटर कव्वाल, अलीगढ़ के बीच कव्वाली का मुकाबला होगा। 
  • 18 मई को सुबह 8 बजे कुल की फातेहा के साथ सालाना उर्स पाक (एकता उत्सव) इख्तेताम पजीर होगा। 
    
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    ज्यूरी बोर्ड इंचार्ज हाजी इसराइल बेग शाद ने खानदान के किसी फर्द की याद में यादगारी अवार्ड देने के ख्वाहिशमंद लोगों से राब्ता करने कहा है। बैठक के आखिर में राजेंद्र पाल सिंह भाटिया, सीनियर नायब सदर, सालाना उर्स पाक कमेटी ने सभी के तंई शुक्रगुजारी का इजहार किया। 

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    बैठक में अजय शर्मा, अमजद अली, शेख असलम, हैदर अली, नसीम फारूकी, अबरार पुवार, मारूफ आलम, हाजी मिर्जा साजिद, अतिक़ शेख, मोहम्मद सादिक, शाहबाज खान, मुन्ना खान, जाहिद अली, हाजी इस्माइल चौहान, मोहसिन हाशमी, अमजद खान, शेख यूनुस, दिलराज भाटिया, सिमरन जीत सिंह समेत कमेटी दीगर अराकीन मौजूद थे। 

काबुली दरबार : सालाना उर्स देता है भाईचारगी और यकजहती का पैगाम

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सालाना उर्स पार्क (एकता उत्सव) की तकरीब के पोस्टर का अमल में आया रस्मे इजरा

✅ नई तहरीक : दुर्ग 

हजरत बाबा सैयद अब्दुल रहमान शाह काबुली रहमतुल्ला अलैह, पुराना बस स्टैंड का सालाना उर्स पाक (एकता उत्सव ) 13 मई से शुरू होने जा रहा है। उर्सपाक को लेकर गुजिश्ता दिनों मुनाकिद बैठक में उर्सपाक की तकरीब के पोस्टर का रस्मे इजरा अमल में आया। बैठक की सदारत उर्सपाक कमेटी के सदर प्रकाश देशलहरा ने की। 
    बैठक से खिताब करते हुए उन्होंने कहा कि काबुली बाबा का उर्स पाक न केवल रियासत छत्तीसगढ़ बल्कि दीगर प्रांतो में भी खासी अहमियत रखता है,  भाईचारा, प्यार, हम आहंगी और यकजहती का पैगाम देने वाले काबुली दरबार के उर्सपाक में सभी मजाहिब के लोग पूरी अकीदत से शामिल होते हैं। 

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  •     कमेटी के जनरल सेक्रेटरी रऊफ कुरेशी ने तकरीब की तफसीली जानकारी देते हुए बताया कि उर्स पाक की शुरुआत 13 मई को बाद नमाज मगरिब दरगाह शरीफ में परचम कुशाई से होगी। 
  • 14 मई को ख़ादिम-ए-आस्ताना के दौलतकदे, जामा मस्जिद के करीब से रात आठ बजे शाही संदल निकलकर शहर का गश्त करता हुआ दरगाह शरीफ पहुंचेगा जहां चादरपोशी की रस्म अदा कर रियासत छत्तीसगढ़ समेत मुल्क-ओ-मिल्लत के लिए अम्नो-अमां, तरक्की और खुशहाली की दुआ की जाएगी। 
  • 15 मई को रात 9:30 बजे मशहूर आतिशबाजी अयाज रजा, रजा फायर वर्क्स की ओर से दिलकश आतिशबाजी की जाएगी। जिसके बाद रात 10 बजे से निसार एहसान चिश्ती एंड ब्रदर्स, कव्वाल चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) और नौशाद चिश्ती कव्वाल, मुजफ्फरनगर (दिल्ली) के बीच कव्वाली का मुकाबला होगा। 
  • 16 मई को छोटे मजीद शोला कव्वाल एंड पार्टी, मुंबई और जुनैद सुल्तानी कव्वाल (बदायुं) के बीच कव्वाली का मुकाबला होगा। 
  • 17 मई को शाकिब अली साबरी कव्वाल, लखनऊ और गुलाम हबीब पेंटर कव्वाल, अलीगढ़ के बीच कव्वाली का मुकाबला होगा। 
  • 18 मई को सुबह 8 बजे कुल की फातेहा के साथ सालाना उर्स पाक (एकता उत्सव) इख्तेताम पजीर होगा। 
    
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    ज्यूरी बोर्ड इंचार्ज हाजी इसराइल बेग शाद ने खानदान के किसी फर्द की याद में यादगारी अवार्ड देने के ख्वाहिशमंद लोगों से राब्ता करने कहा है। बैठक के आखिर में राजेंद्र पाल सिंह भाटिया, सीनियर नायब सदर, सालाना उर्स पाक कमेटी ने सभी के तंई शुक्रगुजारी का इजहार किया। 

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    बैठक में अजय शर्मा, अमजद अली, शेख असलम, हैदर अली, नसीम फारूकी, अबरार पुवार, मारूफ आलम, हाजी मिर्जा साजिद, अतिक़ शेख, मोहम्मद सादिक, शाहबाज खान, मुन्ना खान, जाहिद अली, हाजी इस्माइल चौहान, मोहसिन हाशमी, अमजद खान, शेख यूनुस, दिलराज भाटिया, सिमरन जीत सिंह समेत कमेटी दीगर अराकीन मौजूद थे। 

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Sunday, 13 April 2025

 शव्वाल उल मुकर्रम, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ   

"जो कोई नजूमी (ज्योतिश) के पास जाए फिर उससे कुछ पूछे तो उसकी चालीस रात की नमाज़े क़ुबूल न होगी।"

- मुस्लिम



सफर-ए-हज पर रवाना होने वाले आजमीन के लिए ट्रेनिंग कैंप मुनाकिद

✅ नई तहरीक : भिलाई

मरकज सुपेला मस्जिद, नूर सुपेला की ओर से इस साल हज पर जाने वाले हुज्जाजे कराम के लिए तरबीयत कैंप, इतवार की दोपहर फरीद नगर में मुनाकिद किया गया जहां मुफ्ती मोहम्मद इमरान और मुफ्ती फैयाज ने हज के दौरान अदा किए जाने वाले अरकान को आसान तरीके से समझाया।
इस दौरान आजमीन-ए-हज को मुफ्तियान कराम ने बताया कि हैसियत वालों पर जिंदगी में एक बार हज फ़र्ज़ है। अपने घरवालों पर खर्च करने के बाद इतनी रकम हो कि हज पर जा सकें तो जब अल्लाह मौका दे, तो हज जरूर अदा करें। उलेमा ने उनसे कहा कि सफर पर रवाना होने से पहले अपना दिल हर एक से साफ कर लें। किसी से पहले कभी कहा-सुनी हुई है, तो माफी तलाफी कर लें। जहां जा रहे हैं, वो अल्लाह का दुनिया में घर है, पाक-साफ और हर किस्म की बदगुमानी से दिल भी साफ रहे। काबा शरीफ का तवाफ करने के बाद आजमीन-ए-हज की कैफियत बिल्कुल ऐसी हो जाती है जैसे वह आज ही तवल्लुद हुआ है। यानी उसके जिम्मे कोई गुनाह बाकी नहीं रहता। उलेमा ने कहा कि हज पर जाने से कब्ल उसके अरकान के बारे में पूरी मालूमात कर लेने से हर अरकान आसानी से अदा होते हैं। 



    उन्होंने कहा कि हज पर जाने वाले बहुत मुबारक लोग हैं। वहां हज़रत इब्राहिम, इस्माइल अलैहिस्सलाम की सुन्नत कुर्बानी अदा करना है। मदीने की हाजिरी पर दरूद व सलाम हर वक्त ज़ुबान पर जारी रखें। हजरत मोहम्मद 000 के रोजे मुबारक पर हाजिरी पर सलाम पेश करें। हर वक्त पूरी इंसानियत की हिदायत की दुआ करें। उलेमा ने उमरा और हज के तरीके मसाइल और सुन्नत और वाजिबात से कुरआन और हदीस की रोशनी में बताए। उन्होंने एहराम बांधने का तरीका समझाया। मुफ्तीयान कराम ने बताया कि हज की किस्म और हज के तीन फर्ज है। जिसमें एहराम, नीयत, तलबिया, दो वुकुफे अरफा तीन तवाफे जियारत हज में छह वाजिब है। इसी तरह मुजदलफा की हाजिरी, तीनों शैतानों को कंकरी मारना, कुर्बानी, हलक कराना, हज की सई करना और तवायफें विदा भी शामिल हैं।
    उलेमा ने कहा कि जब आप हज से वापस आएंगे तो आपकी जिंदगी में अब अल्लाह का डर के साथ हज़रत मुहम्मद 000 वाली पाकीजा जिंदगी अपनाना और उसके मुताबिक जिंदगी गुजारने और लोगों के साथ हमदर्दी, सिला रहमी और मददगार साबित होना चाहिए।
    इस दौरान मस्जिद नूर सुपेला के हाजी नईम अहम, हाजी नैय्यर इकबाल और हाजी अब्दुल हमीद ने बताया कि हर साल हज पर जाने वालों के लिए तरबीयती प्रोग्राम मुनाकिद किया जाता  है ताकि लोगों को हज आसान हो सके। आखिर में दुर्ग भिलाई से हज पर जाने वालों को हाजी हमीद की लिखी हिंदी की किताब रहनुमा-ए-हज मुफ्त तकसीम की गई। आखिर में मुल्क में अमन चैन खुशहाली और तरक्की की दुआएं की गई। इस दौरान सैय्यद असलम, हाफिज नसीम, हाफिज अब्दुल मतीन, फैजी पटेल, सुलेमान, अब्दुल जमील, अब्दुल समद, वसीम अहमद समेत आजमीन हज 60 मौजूद थे।

आजमीन-ए-हज को हिदायत, सफर से कब्ल अपना दिल हर एक से साफ कर लें : उलेमा

 शव्वाल उल मुकर्रम, 1446 हिजरी 

   फरमाने रसूल ﷺ   

"जो कोई नजूमी (ज्योतिश) के पास जाए फिर उससे कुछ पूछे तो उसकी चालीस रात की नमाज़े क़ुबूल न होगी।"

- मुस्लिम



सफर-ए-हज पर रवाना होने वाले आजमीन के लिए ट्रेनिंग कैंप मुनाकिद

✅ नई तहरीक : भिलाई

मरकज सुपेला मस्जिद, नूर सुपेला की ओर से इस साल हज पर जाने वाले हुज्जाजे कराम के लिए तरबीयत कैंप, इतवार की दोपहर फरीद नगर में मुनाकिद किया गया जहां मुफ्ती मोहम्मद इमरान और मुफ्ती फैयाज ने हज के दौरान अदा किए जाने वाले अरकान को आसान तरीके से समझाया।
इस दौरान आजमीन-ए-हज को मुफ्तियान कराम ने बताया कि हैसियत वालों पर जिंदगी में एक बार हज फ़र्ज़ है। अपने घरवालों पर खर्च करने के बाद इतनी रकम हो कि हज पर जा सकें तो जब अल्लाह मौका दे, तो हज जरूर अदा करें। उलेमा ने उनसे कहा कि सफर पर रवाना होने से पहले अपना दिल हर एक से साफ कर लें। किसी से पहले कभी कहा-सुनी हुई है, तो माफी तलाफी कर लें। जहां जा रहे हैं, वो अल्लाह का दुनिया में घर है, पाक-साफ और हर किस्म की बदगुमानी से दिल भी साफ रहे। काबा शरीफ का तवाफ करने के बाद आजमीन-ए-हज की कैफियत बिल्कुल ऐसी हो जाती है जैसे वह आज ही तवल्लुद हुआ है। यानी उसके जिम्मे कोई गुनाह बाकी नहीं रहता। उलेमा ने कहा कि हज पर जाने से कब्ल उसके अरकान के बारे में पूरी मालूमात कर लेने से हर अरकान आसानी से अदा होते हैं। 



    उन्होंने कहा कि हज पर जाने वाले बहुत मुबारक लोग हैं। वहां हज़रत इब्राहिम, इस्माइल अलैहिस्सलाम की सुन्नत कुर्बानी अदा करना है। मदीने की हाजिरी पर दरूद व सलाम हर वक्त ज़ुबान पर जारी रखें। हजरत मोहम्मद 000 के रोजे मुबारक पर हाजिरी पर सलाम पेश करें। हर वक्त पूरी इंसानियत की हिदायत की दुआ करें। उलेमा ने उमरा और हज के तरीके मसाइल और सुन्नत और वाजिबात से कुरआन और हदीस की रोशनी में बताए। उन्होंने एहराम बांधने का तरीका समझाया। मुफ्तीयान कराम ने बताया कि हज की किस्म और हज के तीन फर्ज है। जिसमें एहराम, नीयत, तलबिया, दो वुकुफे अरफा तीन तवाफे जियारत हज में छह वाजिब है। इसी तरह मुजदलफा की हाजिरी, तीनों शैतानों को कंकरी मारना, कुर्बानी, हलक कराना, हज की सई करना और तवायफें विदा भी शामिल हैं।
    उलेमा ने कहा कि जब आप हज से वापस आएंगे तो आपकी जिंदगी में अब अल्लाह का डर के साथ हज़रत मुहम्मद 000 वाली पाकीजा जिंदगी अपनाना और उसके मुताबिक जिंदगी गुजारने और लोगों के साथ हमदर्दी, सिला रहमी और मददगार साबित होना चाहिए।
    इस दौरान मस्जिद नूर सुपेला के हाजी नईम अहम, हाजी नैय्यर इकबाल और हाजी अब्दुल हमीद ने बताया कि हर साल हज पर जाने वालों के लिए तरबीयती प्रोग्राम मुनाकिद किया जाता  है ताकि लोगों को हज आसान हो सके। आखिर में दुर्ग भिलाई से हज पर जाने वालों को हाजी हमीद की लिखी हिंदी की किताब रहनुमा-ए-हज मुफ्त तकसीम की गई। आखिर में मुल्क में अमन चैन खुशहाली और तरक्की की दुआएं की गई। इस दौरान सैय्यद असलम, हाफिज नसीम, हाफिज अब्दुल मतीन, फैजी पटेल, सुलेमान, अब्दुल जमील, अब्दुल समद, वसीम अहमद समेत आजमीन हज 60 मौजूद थे।

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Saturday, 5 April 2025

व्यंग्य

सड़क का राजनीतिक समीकरण (व्यंग्य)

✅ सईद खान 

    ये गांधी चौक है। चौक में चमकदार टाइल्सयुक्त गोल घेरा, घेरे के भीतर सुंदर बागीचा, बागीचे के बीच रंगीन फव्वारा और फव्वारे के बीचो-बीच राष्टÑपिता महात्मा गांधी की कांस्य निर्मित आदमकद प्रतिमा स्थापित है। शायद इसी से चौक का नाम गांधी चौक पड़ा। अथवा मुमकिन है कि चौक का नाम पहले से गांधी चौक रहा हो और किसी मंत्री-संत्री ने बापू की प्रतिमा यहां बाद में स्थापित करवाई हो। यह पुख्ता करने के लिए कि यही गांधी चौक है। अथवा बापू की स्मृति को चिरजीवि बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया हो। अथवा बापू के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए, अथवा अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए या किसी ठेकेदार को उपकृत करने के लिए भी ऐसा किया गया हो सकता है। जो भी हो, आप तो सिर्फ आम खाओ।   

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    एक अदद गांधी चौक आपके शहर में भी होगा। गांधी चौक अमूमन हर शहर में पाया जाता है। शहर अगर बड़ा हुआ तो एक से ज्यादा चौक भी हो सकते हैं। ज्यादातर गांधी, नेहरु, पटेल और आजाद जैसी अजÞीम शख्सियतों के नाम से वाबस्ता-तो कुछ अपनी सिफत की वजह से मशहूर हो जाते हैं। जैसे जलेबी चौक, जहां किसी नेता अथवा महापुरुष की कोई प्रतिमा नहीं है। न गोल घेरा है, न बागीचा और न फव्वारा। चौक के पास जलेबी की एक बहुत पुरानी दुकान है-बस। इसी से चौक का नाम जलेबी चौक पड़ गया और तब से यह इसी नाम से जाना जा रहा है। ऐसे ही दुर्घटना चौक, जो महज इसलिए मशहूर हो गया क्योंकि आए दिन वहां दुर्घटना होती रहती है। इसी तरह किशन चौक, धरना चौक आदि-इत्यादि। 

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    मशहूर हस्तियों के नाम से वाबस्ता चौक-चौराहों पर हर साल 15 अगस्त, 26 जनवरी और जयंती-पुण्यतिथि के मौके पर जुटने वाली कुछ होशमंद लोगों की भीड़ से पता चलता है कि देशभक्ति की भावना वाले कुछ लोग अब भी बचे हुए हैं। इसी बहाने चौक के साथ-साथ प्रतिमाओं की थोड़ी झाड़-पोंछ हो जाया करती है। हालांकि उस भीड़ में कितने देशभक्ति की भावना वाले और कितने अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने की गरज वाले होते हैं, इसका निर्धारण होना अभी बाकी है। आप कृपया, चौक पर लगी प्रतिमा का चश्मा अथवा टोपी क्षतिग्रस्त होने को विपक्षी पार्टी की साजिश बताकर आसमान सिर पर उठाने वालों की भीड़ से कोई अनुमान न लगाएं।  

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    चौक का होना न सिर्फ व्यवस्थित यातायात के लिए जरूरी है बल्कि इसके होने से राजनीति करने वालों को एक ठिया भी मयस्सर हो जाता है। चौक न हो तो छुटभैय्ये नेताओं के समक्ष विकट समस्या पैदा हो जाएगी। धरना-प्रदर्शन, पुतला दहन, रैली का समापन और किसी की आत्मा की शांति के लिए वे कैंडल कहां जलाएंगे। ये सारे आयोजन चौक में ही संपन्न होते हैं और यहीं से छुटभैय्ये राजनीति का ककहरा सीखते हैं। छुटभैय्यों द्वारा तीज-त्यौहारों और अपने प्रिय नेता को उनके जन्मदिन पर बधाई देने वाली होर्डिंग्स लगाने को भी आप इसी संदर्भ से जोड़कर देख सकते हैं। इस बहाने छुटभैय्यों की फोटू महीनों चौक पर लटकी रहकर राजनीति के मैदान में लंबी कूद के लिए उन्हें ऊर्जा प्रदान करती रहती है। इन कामों के लिए छुटभैय्ये अगर चौक की शरण में न जाएं तो शहरवासियों को पता कैसे चलेगा कि उन्होंने फलां को श्रद्धांजलि अर्पित की है या फलां के विरोध में उसका पुतला फंूका है, अथवा अपने प्रिय नेता को बधाई देने के लिए उन्होंने कितनी बड़ी होर्डिंग लगाई है। इस लेहाज से चौक को आप वाया वार्ड अध्यक्ष, संसद के रेड कार्पेट तक पहुंचने का शार्टकट भी कह सकते हंै। यानि चौक है तो राजनीति है। चौक न हो तो छुटभैय्ये नेताओं को वार्ड अध्यक्ष बनने में ही सालों लग जाएं। महापौर की कुर्सी तक पहुंचना तो दूर की बात है।  

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    चौक के होने के लिए सड़क का होना जरूरी है। छुटभैय्यों के समक्ष जो अहमियत चौक की है, वही सड़क की है। सड़क, सामान्य आदमी के लिए भी खासा महत्व रखती है। आदमी चाहे हवाई जहाज में ही सवार होने के लिए घर से निकला हो, उसका पहला कदम सड़क पर ही पड़ता है। हद तो यह कि आदमी के बच्चे को पैदा होने के लिए भी अब सड़क नापनी पड़ रही है। पहले ऐसा नहीं था। पहले दाईयां घर आ जाती थी। इस लेहाज से सड़क और आदमी के रिश्ते को जन्मजात भी कहा जा सकता है। यही वजह है कि सड़क चाहे जितनी भी जर्जर हो, छोटे-बड़े सैकड़ों गड्ढों से भरी हो और दुर्घटना को आमंत्रित करने वाली हो, आदमी उसका मोह नहीं छोड़ पाता। जर्जर सड़क पर आदमी के नि:शब्द आवाजाही करने का कोई और तात्पर्य मेरी समझ में नहीं आता। 

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    आदमी वर्ग में पाए जाने वाले इंजीनियरों की सड़क बनाने में विशेष रूचि और मंत्री के सड़क निर्माण की प्रक्रिया को लेकर चौकस रहने को भी आप सड़क के साथ आदमी वर्ग के जन्मजात रिश्तों के संदर्भ से जोड़कर देख सकते हैं। आदमी के ही एक वर्ग का सड़क से इतना प्रागाढ़ नाता होता है कि उसे सड़कछाप कहकर विभूषित किया जाता है। हालांकि सभ्य समाज के समक्ष आदमी के सड़कछाप होने को बुरा समझा जाता है। लेकिन जिस तरह विरोध प्रदर्शन के दौरान धवल वस्त्रधारी नेता खुद को धूलभरी सड़क पर पालथी मारकर बैठने से नहीं रोक पाता, उसी तरह आदमी भी खुद को सड़कछाप होने से नहीं रोक पाता। दोनों की अपनी-अपनी मजबूरी है। 

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    आदमी और सड़क के परस्पर संबंध का पता सड़कों पर लगी महापुरुषों की नाम पट्टिकाओं से भी चलता है। ये सड़क ही है, जो देश के प्रति महापुरुषों के योगदान को रेखांकित करने के भी काम आती है। आगे चलकर सड़कों पर लगी ये नाम पट्टिकाएं राजनीति करने वालों को उन पर कालिख पोतने का अवसर भी प्रदान करती है। 

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    बहरहाल ! मेरे शहर में एक और गांधी चौक है। शायद आपके शहर में न हो। किसी शहर में एक ही नाम के दो चौक का होना दुर्लभ हो सकता है। लेकिन मेरे शहर में ऐसा है। कहा जाता है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बापू यहां आए थे और यहां उन्होंने सभा भी ली थी। बाद में बापू के आगमन और उनकी सभा को यादगार बनाने के लिए हुकूमत ने उस स्थल को घेरकर वहां बापू की प्रतिमा स्थापित करवा दी थी। तब से लोग इसे गांधी चौक कहने लगे थे। कालांतर में शहर का विस्तार होने के साथ ही गोल घेरे के आसपास फुटकर व्यवसायी अपने व्यवसाय का विस्तार करते हुए गोल घेरे के चारों ओर पसर गए। यहां तक कि लोगों ने घेरे की जाली से टाट बांधने से भी गुरेज न किया। नतीजा, अब यह गांधी चौक की बजाए हटरी चौक के नाम से जाना जाता है। अब यहां विशेष अवसरों पर कोई आयोजन नहीं होता। अब यहां बजबजाती नालियां और तंग गलियां हैं जो कहीं जाकर नहीं मिलती बल्कि वहीं-वहीं घूमकर लौट आती है। जबकि उस चौक से निकली एक सड़क मंत्री के निवास तक जाती है तो दूसरी अन्य शहरों को इस शहर से जोड़ती है। छुटभैय्यों को ये वाले बापू की बजाए वो वाले बापू का आशिर्वाद ज्यादा सूट करता है। पता नहीं क्यों। जबकि दोनों ही जगह बापू आशिर्वाद की मुद्रा में खड़े हैं। 

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सड़क का राजनीतिक समीकरण

व्यंग्य

सड़क का राजनीतिक समीकरण (व्यंग्य)

✅ सईद खान 

    ये गांधी चौक है। चौक में चमकदार टाइल्सयुक्त गोल घेरा, घेरे के भीतर सुंदर बागीचा, बागीचे के बीच रंगीन फव्वारा और फव्वारे के बीचो-बीच राष्टÑपिता महात्मा गांधी की कांस्य निर्मित आदमकद प्रतिमा स्थापित है। शायद इसी से चौक का नाम गांधी चौक पड़ा। अथवा मुमकिन है कि चौक का नाम पहले से गांधी चौक रहा हो और किसी मंत्री-संत्री ने बापू की प्रतिमा यहां बाद में स्थापित करवाई हो। यह पुख्ता करने के लिए कि यही गांधी चौक है। अथवा बापू की स्मृति को चिरजीवि बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया हो। अथवा बापू के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए, अथवा अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए या किसी ठेकेदार को उपकृत करने के लिए भी ऐसा किया गया हो सकता है। जो भी हो, आप तो सिर्फ आम खाओ।   

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    एक अदद गांधी चौक आपके शहर में भी होगा। गांधी चौक अमूमन हर शहर में पाया जाता है। शहर अगर बड़ा हुआ तो एक से ज्यादा चौक भी हो सकते हैं। ज्यादातर गांधी, नेहरु, पटेल और आजाद जैसी अजÞीम शख्सियतों के नाम से वाबस्ता-तो कुछ अपनी सिफत की वजह से मशहूर हो जाते हैं। जैसे जलेबी चौक, जहां किसी नेता अथवा महापुरुष की कोई प्रतिमा नहीं है। न गोल घेरा है, न बागीचा और न फव्वारा। चौक के पास जलेबी की एक बहुत पुरानी दुकान है-बस। इसी से चौक का नाम जलेबी चौक पड़ गया और तब से यह इसी नाम से जाना जा रहा है। ऐसे ही दुर्घटना चौक, जो महज इसलिए मशहूर हो गया क्योंकि आए दिन वहां दुर्घटना होती रहती है। इसी तरह किशन चौक, धरना चौक आदि-इत्यादि। 

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    बहरहाल ! मेरे शहर में एक और गांधी चौक है। शायद आपके शहर में न हो। किसी शहर में एक ही नाम के दो चौक का होना दुर्लभ हो सकता है। लेकिन मेरे शहर में ऐसा है। कहा जाता है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बापू यहां आए थे और यहां उन्होंने सभा भी ली थी। बाद में बापू के आगमन और उनकी सभा को यादगार बनाने के लिए हुकूमत ने उस स्थल को घेरकर वहां बापू की प्रतिमा स्थापित करवा दी थी। तब से लोग इसे गांधी चौक कहने लगे थे। कालांतर में शहर का विस्तार होने के साथ ही गोल घेरे के आसपास फुटकर व्यवसायी अपने व्यवसाय का विस्तार करते हुए गोल घेरे के चारों ओर पसर गए। यहां तक कि लोगों ने घेरे की जाली से टाट बांधने से भी गुरेज न किया। नतीजा, अब यह गांधी चौक की बजाए हटरी चौक के नाम से जाना जाता है। अब यहां विशेष अवसरों पर कोई आयोजन नहीं होता। अब यहां बजबजाती नालियां और तंग गलियां हैं जो कहीं जाकर नहीं मिलती बल्कि वहीं-वहीं घूमकर लौट आती है। जबकि उस चौक से निकली एक सड़क मंत्री के निवास तक जाती है तो दूसरी अन्य शहरों को इस शहर से जोड़ती है। छुटभैय्यों को ये वाले बापू की बजाए वो वाले बापू का आशिर्वाद ज्यादा सूट करता है। पता नहीं क्यों। जबकि दोनों ही जगह बापू आशिर्वाद की मुद्रा में खड़े हैं। 

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