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Thursday, 27 February 2025

                                                                                                    कहानी  

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                    ✒ सईद खान                                                

अवसर

    हिसाब करने के बाद कैल्क्यूलेटर को परे सरकाते हुए दुकानदार बोला-‘सात सौ अस्सी रुपए।’ 
    ‘सात सौ अस्सी।’ रमाकांत ने आश्चर्य से दुकानदार को देखा। उसे लगा, दुकानदार किसी और से कह रहा है, लेकिन वह उसी से मुखातिब था। रमाकांत को अपनी ओर देखता पाकर वह बोला-‘जी हां, सात सौ अस्सी।’ 
    ‘अरे, लेकिन ये तीन किताब और एक नोट बुक का इतना पैसा।’ रमाकांत किताब खोलकर उसका प्रिंट रेट देखने लगा। उसने हिसाब लगाया, किताबें ही 740 रुपए की हो रही थी। शेष 40 रुपए की नोटबुक। उसने नोटबुक को उलट-पुलट कर देखा और बोला-‘ये नोटबुक तो 25 रुपए में मिलती है।’ 
    ‘मिलती है नहीं, मिलती थी।’ दुकानदार बोला-‘छह महीना पहले तक इसकी कीमत 25 रुपए ही थी। अब बढ़कर 40 हो गई है। उसने आगे कहा-‘लगता है, आपने लंबे समय से कापी-किताब नहीं खरीदी है।’
    ‘नहीं...ऐसी बात नहीं है।’ रमाकांत जल्दी से बोला-‘आप ऐसा कीजिए, ये एक किताब रहने दीजिए और ये दो किताब और ये नोटबुक दे दीजिए।’ कहते हुए उसने जेब से 480 रुपए निकालकर दुकानदार की ओर बढ़ा दिया। और शेष रकम और किताबें लेकर स्कूटर की ओर बढ़ गया। स्कूटर में किक मारते हुए वह सोच रहा था, अगर वह उस किताब को भी ले लेता तो उसकी जेब में मात्र 30 रुपए ही बच जाते। तनख्वाह मिलने में अभी भी चार दिन बाकी है। इस बीच पेट्रोल, सब्जी और पान-सिगरेट पर होने वाले चिल्हर खर्च के अलावा कोई इमरजेंसी भी आ सकती है। इन खर्चों के लिए आदमी को पहले से तैयार रहना चाहिए। ऐन वक्त पर किसी से दस रुपए भी नहीं मिलते। लेकिन जब वह घर पहुंचा तो पेट्रोल और सब्जी वगैरह पर होने वाले चिल्हर खर्च के नाम पर किताब न लाने की उसकी अक्लमंदी को लेकर सुमन की जमकर खरी-खोटी सुनने को मिली उसे। वो तो अच्छा हुआ कि उसने पेट्रोल और सब्जी के साथ पान-सिगरेट का जिक्र नहीं किया। अन्यथा पता नहीं, सुमन के किस रूप का उसे सामना करना पड़ता। सुमन का कहना था, बिटिया की पढ़ाई को लेकर वह कोई समझौता नहीं करना चाहती। वह बोली-‘पेट्रोल और सब्जी के बगैर हम गुजारा कर सकते हैं लेकिन मुझे ये बिल्कुल पसंद नहीं कि कापी-किताब या फीस के नाम पर स्कूल में बिटिया को सबके सामने बेंच पर खड़ा होना पड़े।’
    ‘ऐसे कैसे बेंच पर खड़ा करा देंगे बच्चे को।’ रमाकांत भड़क कर बोला-‘ताला नहीं लगवा दूंगा स्कूल में।’ 
    ‘क्यों। पिछले महीने ही तो बिटिया को एक घंटा गेट पर खड़ा रहना पड़ा था। बिटिया ने तुम्हें बताया भी था, तब तो नहीं लगवाया था तुमने स्कूल में ताला।’  सुमन सब्जी काटते हुए बोली।
    ‘वो तो अपनी ही गलती थी।’ रमाकांत बोला-‘बिटिया ही देर से स्कूल पहुंची थी इसलिए उसे गेट पर खड़ा रहना पड़ा था।’ 
    ‘समय पर बच्चों को कापी-किताब लाकर न देना या फीस जमा न करना भी अपनी ही गलती है।’ सुमन बोली। 
    ‘हां, ठीक है। अपनी गलती है।’ रमाकांत शर्ट के बटन खोलता हुआ बोला- ‘दो-चार दिन की ही बात है। पेमेंट मिलते ही उसकी किताब ला दूंगा। वैसे भी, कल सेटरडे है। पढ़ाई होगी नहीं। और परसों संडे की छुट्टी रहेगी। बिटिया को केवल एक दिन यानी मंडे को किताब के बिना स्कूल जाना पड़ेगा। मंडे की शाम तक मैं किताब ला दूंगा।’ कहते हुए रमाकांत ने शर्ट उतारी और उसे खूंटी पर टांग दिया। तभी उसके मोबाईल की घंटी घनघनाने लगी। मोबाईल कान से लगाकर उसने ‘हैलो’ कहा और तत्काल बाद उसके मुंह से आश्चर्यमिश्रिम आवाज निकली-‘अरे...कब...कैसे...कहां हो तुम लोग...ओके-ओके, मैं भी पहुंचता हूं।’ कहकर उसने मोबाईल आफ किया और वापस शर्ट पहनने लगा। 
    ‘क्या हुआ।’ उसकी बौखलाहट देख सुमन बोली-‘फिर कहां चल पड़े।’ 
    ‘यार, वो...।’ शर्ट के बटन लगाते हुए रमाकांत बोला-‘राजेश को अटैक आया है। तुम जानती हो न उसे...वो प्रापर्टी डीलर।’
    ‘राजेश...।’ सुमन अपने दिमाग पर जोर डालते हुए बोली-‘अच्छा वो..। उन्हें अटैक कैसे आ गया। वो तो अच्छे-भले थे।’
    सुमन की बातों का जवाब देने की बजाए रमाकांत बोला-‘मैं चलता हूं। हो सकता है देर हो जाए। मेरा इंतजार मत करना और खाना खा लेना।’ कहकर वह बाहर निकल गया। 
    अस्पताल पहुंचने पर उसने देखा, वहां काफी भीड़ जमा है। भीड़ देखकर उसका दिल धक्क से रह गया था। भीड़ के साथ पुलिस बल भी मौजूद था। अस्पताल परिसर में भीड़ और उसके साथ पुलिस बल के होने का तात्पर्य उसकी समझ में नहीं आया। अनिष्ट की आशंका से उसने जल्दी से स्कूटर पार्क किया और तेज-तेज कदमों से मुख्य द्वार की ओर बढ़ गया। सामने ही उसे विमल तिवारी, गजेंद्र और ईश्वर मिल गए। राजेश के परेशानहाल परिजन इधर-उधर टहल रहे थे। महिलाएं राजेश की पत्नी को दिलासा दे रही थीं।  
    ‘अब कैसा है राजेश।’ रमाकांत ने दबी जबान में गजेंद्र से पूछा। 
    ‘कुछ कहा नहीं जा सकता।’ गजेंद्र बोला-‘कुछ टेस्ट हो गए हैं। अब एंजीओग्राफी हो रही है। देखो, क्या होता है।’ 
    ‘बाहर शोर कैसा है, काफी भीड़ लगी है।’ रमाकांत ने पूछा।
    ‘उनके किसी परिजन की उपचार के दौरान अस्पताल में मौत हो गई है।’ ईश्वर बोला-‘अस्पताल प्रबंधन ने परिजनों को एक लाख रुपए का बिल थमा दिया है। परिजन कह रहे हैं कि डाक्टरों की लापरवाही से मौत हुई है...।’ 
    ‘तो...।’
    ‘तो क्या।’ ईश्वर बोला-‘मृतक के परिजन पैसा देने के मूड में नहीं है। ऊपर से वे डाक्टरों पर कार्रवाई की मांग भी कर रहे हैं।’ 
    ‘यार।’ रमाकांत ने दोनों हाथ कमर पर रखते हुए कहा-‘गरीबों को भी इतनी महंगी बीमारी होती है...।’ 
    रमाकांत की फुसफुसाहट पर विमल तिवारी हंसकर बोले-‘बीमारी भी क्या अमीरी-गरीबी देखकर आती है।’ 
    अभी वे बातें कर रही ही थे कि डा. दीक्षित केबिन से बाहर निकले। उन्हें देखकर राजेश के परिजन सहित गजेंद्र, विमल और रमाकांत वगैरह भी उधर ही बढ़ गए। 
    डा. दीक्षित ने कहा-‘कार्डियक एंजाईना बढ़ा हुआ है। एंजीओप्लास्टी करनी पड़ेगी।’ उन्होंने आगे कहा-‘आप चाहें तो सेकंड ओपिनियन ले सकते हैं। पेशेंट को कहीं और भी ले जा सकते हैं। लेकिन...।’
    ‘लेकिन क्या...।’ राजेश के चाचा ने जल्दी से पूछा।
    ‘जो भी करना हो, जल्दी करें। देर करना पेशेंट के लिए घातक हो सकता है।’ 
    ‘हमें कुछ नहीं करना।’ चाचा जी के कुछ बोलने से पहले ही राजेश के बेटे ने कहा-‘डाक्टर साब, आप जो जरूरी समझें, करें। हमें न सेकंड ओपिनियन लेना है न पापा को कहीं और लेकर जाना है।’ 
    बिटिया को ट्यूशन मैम के पास छोड़कर सुमन जब घर लौटी तो रमाकांत उसे घर पर ही मिल गया। वह आंगन में ही बैठा था। सुमन को देखकर वह हौले से मुस्कुराया और बोला-‘ट्यूशन मैम के पास गई थीं।’ 
    ‘हां।’ कहकर सुमन ने उसके बालों को सहलाया और बोली-‘चाय लाऊं।’
    ‘हां, पी लूंगा।’ रमाकांत बोला-‘तुम अपने लिए भी बना लो।’ 
    ‘ओ के।’ कहकर सुमन भीतर चली गई। 
    थोड़ी देर बाद वह चाय के कप लिए रमाकांत के पास पहुंची और वहीं पड़ी एक कुर्सी खींचकर उसके बगल में बैठ गई। रमाकांत ने चाय का एक लंबा घूंट लिया और अमरूद के पेड़ पर चहचहा रही चिड़िया को देखने लगा। 
    ‘क्या बात है।’ रमाकांत को गौर से देखते हुए सुमन बोली-‘तबियत तो ठीक है न।’
    ‘तबियत।’ रमाकांत चौंककर बोला-‘क्या हुआ।’
    ‘कुछ गुमसुम लग रहे हो।’ 
    ‘गुमसुम...। नहीं तो...।’ 
    ‘बिटिया की किताब आज ही ले आए। तुम तो कह रहे थे परसों लाउंगा। पेमेंट मिलेगी तो।’ 
    ‘वो...ऐसे ही।’ रमाकांत ने चाय का एक और घूंट लिया और बोला-‘मैंने सोचा, किताब लाना तो है ही, फिर आज ही क्यों न ले लूं।’ 
    ‘आज तुमने स्कूटर भी आड़ा-तिरछा खड़ा करने की बजाए बिल्कुल वैसा ही खड़ा किया है, जैसा करने को मैं कहती थी। तुम्हारे जूते, जुराब, शर्ट और पैंट वगैरह भी अपनी जगह पर हैं।’ 
    ‘तो...।’
    ‘तुम ऐसे तो नहीं थे।’ सुमन बोली-‘रोज मेरी आधी एनर्जी तुम्हारा सामान सहेजते चुक जाती थी।’ 
    ‘ऐसे ही यार।’ सुमन के चेहरे की ओर देखते हुए रमाकांत बोला-‘समझ लो, आज तुम पर प्यार आ गया है।’ 
    ‘वाव।’ सुमन चहककर बोली और रमाकांत की नाक पकड़कर उसके चेहरे को दाएं-बाएं घुमाने लगी।
    ‘छोड़ो भी।’ रमाकांत जल्दी से बोला-‘मेरी चाय गिर जाएगी।’ रमाकांत की हालत देख सुमन खिलखिलाकर हंस पड़ी। थोड़ी देर बाद चाय के कप उठाकर वह भीतर जाने के लिए उठी। लेकिन अचानक जैसे कुछ याद आया, बोली-‘और हां, तुम्हारा दोस्त राजेश कैसा है। गए थे उससे मिलने।’ 
    ‘राजेश।’ सुमन का हाथ पकड़कर रमाकांत उसे वापस कुर्सी पर बैठाते हुए बोला-‘राजेश की अस्पताल से छुट्टी हो गई है। मैं अभी उसी से मिलकर आ रहा हूं।’ 
    ‘अरे! लेकिन तुम तो कह रहे थे, उसे सीवियर अटैक आया है। फिर इतनी जल्दी डिस्चार्ज कैसे हो गए।’ 
    सुमन की बातों का कोई जवाब न देकर रमाकांत बोला-‘उससे मिलने जाते हुए मैं सोच रहा था, वह गंभीर हालत में बिस्तर में पड़ा होगा। हो सकता है, उसके स्लाईन भी लगी हो। और पता नहीं उससे बात करने का मौका भी मिलेगा या उसे सिर्फ देखकर ही लौटना पड़ेगा।’ 
    ‘तो।’ रमाकांत के लहजे ने सुमन को उत्सुकता में डाल दिया था। वह पूरी तन्मयता से रमाकांत की बातें सुन रही थी। रमाकांत ने आगे कहा-‘मैं जब उसके घर पहुंचा तो मेरी उम्मीद के बरअक्स वह मेरे लिए गेट खोलने खुद गेट तक आया। जितनी देर मैं वहां रहा, वह मेरे साथ बैठा बतियाता रहा। उसे देखकर ऐसा लग ही नहीं रहा था कि दो दिन पहले उसकी जिंÞदगी का कोई भरोसा नहीं था।’ 
    ‘ये तो अच्छी बात है।’ 
    ‘अच्छी तो है, लेकिन क्या अजीब भी नहीं है।’ रमाकांत बोला-‘दो दिन पहले जो बंदा मौत और जिंदगी के बीच झूल रहा था, वह आज इतना स्वस्थ दिखा जैसे उसे कुछ हुआ ही नहीं था।’
    ‘मेडिकल सार्इंस ने काफी तरक्की कर ली है जनाब।’ सुमन बोली-‘डाक्टर अब मरीज को मौत के मुंह से भी खींच लाते हैं।’
    ‘बशर्ते...।’ रमाकांत गंभीर लहजे में बोला-‘मरीज की जेब में पैसे हों।’ 
    ‘हां, वो तो है।’ सुमन बोली-पैसे जरूरी हैं। वैसे... कितना खर्च आ गया होगा राजेश को।’
    ‘तीन लाख साठ हजार।’
    ‘तीन ला...ख...।’ सुमन के मुंह से चीख सी निकल गई। शेष शब्द उसके मुंह में ही गडमड हो गए थे। थोड़ी देर बाद खुद को संयत कर वह बोली-‘दो दिन में इतने पैसे लग गए।’
    ‘जरा सोचो।’ रमाकांत बोला- ‘अगर उसके पास पैसे नहीं होते या उसकी जगह मैं होता...।’
    ‘डोंट वरी।’ रमाकांत की मनोदशा को समझते हुए सुमन उठ खड़ी हुई और चाय के कप हाथ में लेकर भीतर जाते हुए बोली-‘भगवान पीठ देखकर डंडे मारता है।’ कहकर वह भीतर चली गई। संभवत: वह नम हो चुकी अपनी आंखों को रमाकांत से छुपाना चाह रही थी। 
    जबकि उस वक्त रमाकांत की आंखों के आगे अस्पताल प्रबंधन से मिले एक लाख के बिल के विरोध में प्रदर्शन कर रहे गरीबों के चेहर डोल रहे थे। उसने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला और उसे तोड़-मरोड़कर गेट से बाहर फेंक कर उठ खड़ा हुआ। 


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कहानी 

व्यंग्य


अवसर (कहानी)

                                                                                                    कहानी  

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                    ✒ सईद खान                                                

अवसर

    हिसाब करने के बाद कैल्क्यूलेटर को परे सरकाते हुए दुकानदार बोला-‘सात सौ अस्सी रुपए।’ 
    ‘सात सौ अस्सी।’ रमाकांत ने आश्चर्य से दुकानदार को देखा। उसे लगा, दुकानदार किसी और से कह रहा है, लेकिन वह उसी से मुखातिब था। रमाकांत को अपनी ओर देखता पाकर वह बोला-‘जी हां, सात सौ अस्सी।’ 
    ‘अरे, लेकिन ये तीन किताब और एक नोट बुक का इतना पैसा।’ रमाकांत किताब खोलकर उसका प्रिंट रेट देखने लगा। उसने हिसाब लगाया, किताबें ही 740 रुपए की हो रही थी। शेष 40 रुपए की नोटबुक। उसने नोटबुक को उलट-पुलट कर देखा और बोला-‘ये नोटबुक तो 25 रुपए में मिलती है।’ 
    ‘मिलती है नहीं, मिलती थी।’ दुकानदार बोला-‘छह महीना पहले तक इसकी कीमत 25 रुपए ही थी। अब बढ़कर 40 हो गई है। उसने आगे कहा-‘लगता है, आपने लंबे समय से कापी-किताब नहीं खरीदी है।’
    ‘नहीं...ऐसी बात नहीं है।’ रमाकांत जल्दी से बोला-‘आप ऐसा कीजिए, ये एक किताब रहने दीजिए और ये दो किताब और ये नोटबुक दे दीजिए।’ कहते हुए उसने जेब से 480 रुपए निकालकर दुकानदार की ओर बढ़ा दिया। और शेष रकम और किताबें लेकर स्कूटर की ओर बढ़ गया। स्कूटर में किक मारते हुए वह सोच रहा था, अगर वह उस किताब को भी ले लेता तो उसकी जेब में मात्र 30 रुपए ही बच जाते। तनख्वाह मिलने में अभी भी चार दिन बाकी है। इस बीच पेट्रोल, सब्जी और पान-सिगरेट पर होने वाले चिल्हर खर्च के अलावा कोई इमरजेंसी भी आ सकती है। इन खर्चों के लिए आदमी को पहले से तैयार रहना चाहिए। ऐन वक्त पर किसी से दस रुपए भी नहीं मिलते। लेकिन जब वह घर पहुंचा तो पेट्रोल और सब्जी वगैरह पर होने वाले चिल्हर खर्च के नाम पर किताब न लाने की उसकी अक्लमंदी को लेकर सुमन की जमकर खरी-खोटी सुनने को मिली उसे। वो तो अच्छा हुआ कि उसने पेट्रोल और सब्जी के साथ पान-सिगरेट का जिक्र नहीं किया। अन्यथा पता नहीं, सुमन के किस रूप का उसे सामना करना पड़ता। सुमन का कहना था, बिटिया की पढ़ाई को लेकर वह कोई समझौता नहीं करना चाहती। वह बोली-‘पेट्रोल और सब्जी के बगैर हम गुजारा कर सकते हैं लेकिन मुझे ये बिल्कुल पसंद नहीं कि कापी-किताब या फीस के नाम पर स्कूल में बिटिया को सबके सामने बेंच पर खड़ा होना पड़े।’
    ‘ऐसे कैसे बेंच पर खड़ा करा देंगे बच्चे को।’ रमाकांत भड़क कर बोला-‘ताला नहीं लगवा दूंगा स्कूल में।’ 
    ‘क्यों। पिछले महीने ही तो बिटिया को एक घंटा गेट पर खड़ा रहना पड़ा था। बिटिया ने तुम्हें बताया भी था, तब तो नहीं लगवाया था तुमने स्कूल में ताला।’  सुमन सब्जी काटते हुए बोली।
    ‘वो तो अपनी ही गलती थी।’ रमाकांत बोला-‘बिटिया ही देर से स्कूल पहुंची थी इसलिए उसे गेट पर खड़ा रहना पड़ा था।’ 
    ‘समय पर बच्चों को कापी-किताब लाकर न देना या फीस जमा न करना भी अपनी ही गलती है।’ सुमन बोली। 
    ‘हां, ठीक है। अपनी गलती है।’ रमाकांत शर्ट के बटन खोलता हुआ बोला- ‘दो-चार दिन की ही बात है। पेमेंट मिलते ही उसकी किताब ला दूंगा। वैसे भी, कल सेटरडे है। पढ़ाई होगी नहीं। और परसों संडे की छुट्टी रहेगी। बिटिया को केवल एक दिन यानी मंडे को किताब के बिना स्कूल जाना पड़ेगा। मंडे की शाम तक मैं किताब ला दूंगा।’ कहते हुए रमाकांत ने शर्ट उतारी और उसे खूंटी पर टांग दिया। तभी उसके मोबाईल की घंटी घनघनाने लगी। मोबाईल कान से लगाकर उसने ‘हैलो’ कहा और तत्काल बाद उसके मुंह से आश्चर्यमिश्रिम आवाज निकली-‘अरे...कब...कैसे...कहां हो तुम लोग...ओके-ओके, मैं भी पहुंचता हूं।’ कहकर उसने मोबाईल आफ किया और वापस शर्ट पहनने लगा। 
    ‘क्या हुआ।’ उसकी बौखलाहट देख सुमन बोली-‘फिर कहां चल पड़े।’ 
    ‘यार, वो...।’ शर्ट के बटन लगाते हुए रमाकांत बोला-‘राजेश को अटैक आया है। तुम जानती हो न उसे...वो प्रापर्टी डीलर।’
    ‘राजेश...।’ सुमन अपने दिमाग पर जोर डालते हुए बोली-‘अच्छा वो..। उन्हें अटैक कैसे आ गया। वो तो अच्छे-भले थे।’
    सुमन की बातों का जवाब देने की बजाए रमाकांत बोला-‘मैं चलता हूं। हो सकता है देर हो जाए। मेरा इंतजार मत करना और खाना खा लेना।’ कहकर वह बाहर निकल गया। 
    अस्पताल पहुंचने पर उसने देखा, वहां काफी भीड़ जमा है। भीड़ देखकर उसका दिल धक्क से रह गया था। भीड़ के साथ पुलिस बल भी मौजूद था। अस्पताल परिसर में भीड़ और उसके साथ पुलिस बल के होने का तात्पर्य उसकी समझ में नहीं आया। अनिष्ट की आशंका से उसने जल्दी से स्कूटर पार्क किया और तेज-तेज कदमों से मुख्य द्वार की ओर बढ़ गया। सामने ही उसे विमल तिवारी, गजेंद्र और ईश्वर मिल गए। राजेश के परेशानहाल परिजन इधर-उधर टहल रहे थे। महिलाएं राजेश की पत्नी को दिलासा दे रही थीं।  
    ‘अब कैसा है राजेश।’ रमाकांत ने दबी जबान में गजेंद्र से पूछा। 
    ‘कुछ कहा नहीं जा सकता।’ गजेंद्र बोला-‘कुछ टेस्ट हो गए हैं। अब एंजीओग्राफी हो रही है। देखो, क्या होता है।’ 
    ‘बाहर शोर कैसा है, काफी भीड़ लगी है।’ रमाकांत ने पूछा।
    ‘उनके किसी परिजन की उपचार के दौरान अस्पताल में मौत हो गई है।’ ईश्वर बोला-‘अस्पताल प्रबंधन ने परिजनों को एक लाख रुपए का बिल थमा दिया है। परिजन कह रहे हैं कि डाक्टरों की लापरवाही से मौत हुई है...।’ 
    ‘तो...।’
    ‘तो क्या।’ ईश्वर बोला-‘मृतक के परिजन पैसा देने के मूड में नहीं है। ऊपर से वे डाक्टरों पर कार्रवाई की मांग भी कर रहे हैं।’ 
    ‘यार।’ रमाकांत ने दोनों हाथ कमर पर रखते हुए कहा-‘गरीबों को भी इतनी महंगी बीमारी होती है...।’ 
    रमाकांत की फुसफुसाहट पर विमल तिवारी हंसकर बोले-‘बीमारी भी क्या अमीरी-गरीबी देखकर आती है।’ 
    अभी वे बातें कर रही ही थे कि डा. दीक्षित केबिन से बाहर निकले। उन्हें देखकर राजेश के परिजन सहित गजेंद्र, विमल और रमाकांत वगैरह भी उधर ही बढ़ गए। 
    डा. दीक्षित ने कहा-‘कार्डियक एंजाईना बढ़ा हुआ है। एंजीओप्लास्टी करनी पड़ेगी।’ उन्होंने आगे कहा-‘आप चाहें तो सेकंड ओपिनियन ले सकते हैं। पेशेंट को कहीं और भी ले जा सकते हैं। लेकिन...।’
    ‘लेकिन क्या...।’ राजेश के चाचा ने जल्दी से पूछा।
    ‘जो भी करना हो, जल्दी करें। देर करना पेशेंट के लिए घातक हो सकता है।’ 
    ‘हमें कुछ नहीं करना।’ चाचा जी के कुछ बोलने से पहले ही राजेश के बेटे ने कहा-‘डाक्टर साब, आप जो जरूरी समझें, करें। हमें न सेकंड ओपिनियन लेना है न पापा को कहीं और लेकर जाना है।’ 
    बिटिया को ट्यूशन मैम के पास छोड़कर सुमन जब घर लौटी तो रमाकांत उसे घर पर ही मिल गया। वह आंगन में ही बैठा था। सुमन को देखकर वह हौले से मुस्कुराया और बोला-‘ट्यूशन मैम के पास गई थीं।’ 
    ‘हां।’ कहकर सुमन ने उसके बालों को सहलाया और बोली-‘चाय लाऊं।’
    ‘हां, पी लूंगा।’ रमाकांत बोला-‘तुम अपने लिए भी बना लो।’ 
    ‘ओ के।’ कहकर सुमन भीतर चली गई। 
    थोड़ी देर बाद वह चाय के कप लिए रमाकांत के पास पहुंची और वहीं पड़ी एक कुर्सी खींचकर उसके बगल में बैठ गई। रमाकांत ने चाय का एक लंबा घूंट लिया और अमरूद के पेड़ पर चहचहा रही चिड़िया को देखने लगा। 
    ‘क्या बात है।’ रमाकांत को गौर से देखते हुए सुमन बोली-‘तबियत तो ठीक है न।’
    ‘तबियत।’ रमाकांत चौंककर बोला-‘क्या हुआ।’
    ‘कुछ गुमसुम लग रहे हो।’ 
    ‘गुमसुम...। नहीं तो...।’ 
    ‘बिटिया की किताब आज ही ले आए। तुम तो कह रहे थे परसों लाउंगा। पेमेंट मिलेगी तो।’ 
    ‘वो...ऐसे ही।’ रमाकांत ने चाय का एक और घूंट लिया और बोला-‘मैंने सोचा, किताब लाना तो है ही, फिर आज ही क्यों न ले लूं।’ 
    ‘आज तुमने स्कूटर भी आड़ा-तिरछा खड़ा करने की बजाए बिल्कुल वैसा ही खड़ा किया है, जैसा करने को मैं कहती थी। तुम्हारे जूते, जुराब, शर्ट और पैंट वगैरह भी अपनी जगह पर हैं।’ 
    ‘तो...।’
    ‘तुम ऐसे तो नहीं थे।’ सुमन बोली-‘रोज मेरी आधी एनर्जी तुम्हारा सामान सहेजते चुक जाती थी।’ 
    ‘ऐसे ही यार।’ सुमन के चेहरे की ओर देखते हुए रमाकांत बोला-‘समझ लो, आज तुम पर प्यार आ गया है।’ 
    ‘वाव।’ सुमन चहककर बोली और रमाकांत की नाक पकड़कर उसके चेहरे को दाएं-बाएं घुमाने लगी।
    ‘छोड़ो भी।’ रमाकांत जल्दी से बोला-‘मेरी चाय गिर जाएगी।’ रमाकांत की हालत देख सुमन खिलखिलाकर हंस पड़ी। थोड़ी देर बाद चाय के कप उठाकर वह भीतर जाने के लिए उठी। लेकिन अचानक जैसे कुछ याद आया, बोली-‘और हां, तुम्हारा दोस्त राजेश कैसा है। गए थे उससे मिलने।’ 
    ‘राजेश।’ सुमन का हाथ पकड़कर रमाकांत उसे वापस कुर्सी पर बैठाते हुए बोला-‘राजेश की अस्पताल से छुट्टी हो गई है। मैं अभी उसी से मिलकर आ रहा हूं।’ 
    ‘अरे! लेकिन तुम तो कह रहे थे, उसे सीवियर अटैक आया है। फिर इतनी जल्दी डिस्चार्ज कैसे हो गए।’ 
    सुमन की बातों का कोई जवाब न देकर रमाकांत बोला-‘उससे मिलने जाते हुए मैं सोच रहा था, वह गंभीर हालत में बिस्तर में पड़ा होगा। हो सकता है, उसके स्लाईन भी लगी हो। और पता नहीं उससे बात करने का मौका भी मिलेगा या उसे सिर्फ देखकर ही लौटना पड़ेगा।’ 
    ‘तो।’ रमाकांत के लहजे ने सुमन को उत्सुकता में डाल दिया था। वह पूरी तन्मयता से रमाकांत की बातें सुन रही थी। रमाकांत ने आगे कहा-‘मैं जब उसके घर पहुंचा तो मेरी उम्मीद के बरअक्स वह मेरे लिए गेट खोलने खुद गेट तक आया। जितनी देर मैं वहां रहा, वह मेरे साथ बैठा बतियाता रहा। उसे देखकर ऐसा लग ही नहीं रहा था कि दो दिन पहले उसकी जिंÞदगी का कोई भरोसा नहीं था।’ 
    ‘ये तो अच्छी बात है।’ 
    ‘अच्छी तो है, लेकिन क्या अजीब भी नहीं है।’ रमाकांत बोला-‘दो दिन पहले जो बंदा मौत और जिंदगी के बीच झूल रहा था, वह आज इतना स्वस्थ दिखा जैसे उसे कुछ हुआ ही नहीं था।’
    ‘मेडिकल सार्इंस ने काफी तरक्की कर ली है जनाब।’ सुमन बोली-‘डाक्टर अब मरीज को मौत के मुंह से भी खींच लाते हैं।’
    ‘बशर्ते...।’ रमाकांत गंभीर लहजे में बोला-‘मरीज की जेब में पैसे हों।’ 
    ‘हां, वो तो है।’ सुमन बोली-पैसे जरूरी हैं। वैसे... कितना खर्च आ गया होगा राजेश को।’
    ‘तीन लाख साठ हजार।’
    ‘तीन ला...ख...।’ सुमन के मुंह से चीख सी निकल गई। शेष शब्द उसके मुंह में ही गडमड हो गए थे। थोड़ी देर बाद खुद को संयत कर वह बोली-‘दो दिन में इतने पैसे लग गए।’
    ‘जरा सोचो।’ रमाकांत बोला- ‘अगर उसके पास पैसे नहीं होते या उसकी जगह मैं होता...।’
    ‘डोंट वरी।’ रमाकांत की मनोदशा को समझते हुए सुमन उठ खड़ी हुई और चाय के कप हाथ में लेकर भीतर जाते हुए बोली-‘भगवान पीठ देखकर डंडे मारता है।’ कहकर वह भीतर चली गई। संभवत: वह नम हो चुकी अपनी आंखों को रमाकांत से छुपाना चाह रही थी। 
    जबकि उस वक्त रमाकांत की आंखों के आगे अस्पताल प्रबंधन से मिले एक लाख के बिल के विरोध में प्रदर्शन कर रहे गरीबों के चेहर डोल रहे थे। उसने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला और उसे तोड़-मरोड़कर गेट से बाहर फेंक कर उठ खड़ा हुआ। 


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कहानी 

व्यंग्य


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Wednesday, 26 February 2025

व्यंग्य

satire, politics, bakhtawar adab, nai tahreek, Read me, Sayeed khan

✒ सईद खान 

अब के बरस

    भोला से मेरा परिचय कोई खास पुराना नहीं है। कुछ दिनों पहले जब मैं अपने उपन्यास के लिए किसी धांसू प्लाट की तलाश में गांव-देहात की खाक छान रहा था, एक देहात के किसी नुकीले पत्थर ने मेरी फटफटिया के टायर का बोलोराम कर दिया था। उस तपती दुपहरी की सख्त धूप में सड़क विधवा की मांग की तरह दूर तक खामोश पड़ी चिलचिला रही थी। ऐसे में फटफटिया का पंक्चर हो जाना बिल्कुल वैसा ही था, जैसे दूबर के लिए दो आषाढ़। शहर वहां से अभी भी लगभग पांच किलोमीटर दूर था। फटफटिया अगर ठीक होती तो पांच किलोमीटर का सफर कोई मायने न रखता लेकिन फिलहाल तीन तेरह नौ अठारह का मामला था। पांच किलोमीटर लंबा रास्ता पचास किलोमीटर जितना लंबा प्रतीत हो रहा था। ऊपर से देहाती लू के स्पेशल झक्कड़ जिस्म में कांटे की तरह चुभ रहे थे, सो अलग। सोचा, आए थे नमाज पढ़ने, रोजे गले पड़ गए। उपन्यास का कोई पलाट-सलाट तो मिला नहीं, उल्टे पंक्चर फटफटिया को पांच किलोमीटर खींच कर ले जाने की मुसीबत गले पड़ गई। हालांकि बंदे के लिए फटफटिया खींचने का यह पहला मौका नहीं था। इससे पहले भी अनेक अवसरों पर बंदे को फटफटिया खींचने का तजुर्बा हो चुका है। पंक्चर हो जाने पर तो अक्सर ही। और कभी-कभी रास्ते में पेटेल खत्म हो जाने पर भी। और हर बार ऐसे मौकों पर बाकायदा यह शपथ जरूर ली जाती कि आइंदा ऐसे हालात पैदा नहीं होने दिए जाएंगे। लेकिन नामुराद शपथ भी तभी याद आती, जब हालात ऐसे हो चुके होते।
    पेट्रोल रहित अथवा पंक्चर फटफटिया खींचने का बंदे का तजुर्बा बिल्कुल वैसा ही है जैसा अनचाही दुल्हन के साथ जिंदगी बसर करना अथवा अनचाहे नेता को पूरे पांच बरस बर्दाश्त करना। वो तो गनीमत थी कि उसी समय भोला वहां नमुदार हो गया था। वरना गांव की धूलभरी सड़क पर पंक्चर फटफटिया को खींचना दो अनचाही दुल्हन के साथ जिंदगी बसर करने अथवा एक अनचाहे नेता के दो कार्यकाल बर्दाश्त करने जैसा दुश्वार हो जाता।

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कहानी 


व्यंग्य


    उस चिलचिलाती धूप में भी बदन पर मात्र एक अंगोछा लपेटे वह बीड़ी खरीदने घर से निकला था। गांव की एकमात्र दुकान में बीड़ी खत्म हो गई थी, इसलिए उसे गांव के मुहाने तक जाना पड़ रहा था। वहां बाईपास की किसी दुकान में उसे बीड़ी मिल सकती थी। मुझे परेशानहाल देख, देहात सुलभ खीसे निपोरते हुए उसने मुझसे पूछा था-‘का होगे बाबू?’
    मैंने उसे अपनी परेशानी बताई तो उसने एक झटके में मुझे मेरी समस्या का समाधान सुझा दिया। वह बोला-‘त का होगे, तैं आगू डहार ले खेंचत चल, मैं पाछू डहार ले पेलत जाहूं।’
    ‘तहूं शहर जाथ अस?’ तनिक आश्चर्यमिश्रित हर्ष के साथ मैंने अपनी छत्तीसगढ़ी भाषाज्ञान का सदुपयोग किया।
    ‘नुक्कड़ तक तो जाबेच करंव।’ वह बोला-‘अउ, तैं कहीबे त थोड़अकन अउ दूरीहा तक तोर फटफटिया ल पेल देहूं।’
    ‘अच्छा! अउ पइसा कतका लेबे?’
    वह बोला-‘जतका तैं दे देबे, उतकेच ल धर लेहूं।’
    ‘फेर भी।’ मैंने उसे टटोलने की गरज से पूछा था-‘पहिले बता देबे ता बढ़िया हो जातिस।’
    वह एकदम से चुप हो गया था। मैंने सोचा, कदाचित वह हिसाब लगा रहा होगा। फिलहाल गरज मेरी थी। अगर वह सौ भी मांगता तो मुझे देना पड़ता। आखिर चिलचिलाती धूप में पंक्चर फटफटिया को पूरे पांच किलोमीटर तक खींचकर ले जाने का सवाल था। लेकिन उसने सिर्फ दस रुपए ही मांगे थे। ये और बात थी कि शहर पहुंचकर मैंने उसे पूरे बीस रुपए दिए थे।
    आज उसी भोलाराम को शहर के एक चैराहे पर खड़ा देख मैं उससे मिले बिना नहीं रह सका। फटफटिया मोड़कर जैसे ही मैं उसके करीब पहुंचा, उसने झट मुझे पहचान लिया और नमस्ते भी किया।
    ‘कइसे भोला?’ मैं बोला-‘ए मेर कइसे खड़े हस?’
    ‘द्वारी जाए बर कउनो सवारी के बाट जोहथ हवं मालिक।’ उसने मुस्कुराने की कोशिश की।
    ‘ओह! लेकिन कइसे आए रहे हियां?’
    ‘ऊ नेता आए रहिन न.....।’ उसने बिना किसी लाग-लपेट के जवाब दिया।
    ‘नेता...? अच्छा ऊ..., ऊ... जऊन चुनाव लड़थ हे।’
    ‘हव।’ भोला बोला-‘तेकरे सइती आए रहवं।’
    ‘हूं।’ फटफटिया को स्टैंड पर खड़ी कर उसकी सीट पर बैठते हुए मैं बोला-‘लेकिन नेता से मिले के तोला का जरूरत पड़ गे?’
    ‘जरूरत तो कउनो नई रहिस...।’
    ‘फेर...?’
    ‘मैं तो संपत के कहे म आए रहवं।’ वह सादगी से बोला-‘संपत ह कहे रहिस के नेता आत हे त शहर जाए ल पड़ही, तेकरे सइती आए रहवं।’
    ‘संपत कउन?’ जेब से सिगरेट का पैकेट निकालते हुए मैंने पूछा।
    ‘संपत एइ नेता के कारकरता हस हमर गांव म।’ भोला बोला-‘ओ कहे रहे के नेता आथे त थोड़ अकन भीड़ जुटाए ल पड़थे। त हमर गांव के 15.20 झन अउ आन गांव के 15.20  झन जुड़ के हमन 40.50  झन आए रहिन। संपत ह सबो ल टरक म बैठाए दे रहे अउ कहे रहे कि इही टरक ह वापस घलो पंहोचा देही।’
    ‘तो ऊ टरक ह अब कहां हे?’
    ‘ओकर डीजल ह सिरा गे हे मालिक।’ भोला बोला-‘डिरावर बतात रहे के टरक अब नइ जाए सकए।’
    ‘ओह! अउ तुंहर संगवारी?’
    ‘कउन जाने मालिक, भीड़ म कहां पछुआ गे हे सब्बो मन।’
    ‘त खाना-वाना खाए हस के नहीं?’ मैंने एक सिगरेट सुलगाते हुए पूछा।
    ‘या।’ खीसें निपोरकर वह बोला-‘जब संपत ही नइ मिले त खाना कहां ले मिलही बाबू।’
    मैंने सिगरेट का एक लंबा कश लिया और भोला को अपने साथ लेकर पास की एक होटल में जा बैठा। वहां उसके लिए समोसा आर्डर कर मैंने पूछा-‘का कहत रहे नेता?’
    तभी वेटर समोसा ले आया। भोला जल्दी-जल्दी समोसा ढकोसने लगा। उसे देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे उसने सुबह से कुछ नहीं खाया है। दो समोसा खाने तक उसके माथे और आंखों में पानी की बूंदे चमकने लगी थी। उसने पानी से भरा पूरा गिलास भी गटक लिया। तभी मेरे इशारे पर वेटर समोसे की एक और प्लेट रख गया। प्लेट से एक समोसा उठाते हुए भोला ने मुझसे पूछा-‘तयं नई खाबे?’
    ‘मैं अभ्भिच भोजन करे हवं।’ मैं बोला।
    भोला चुपचाप समोसा खाता रहा। थोड़ी देर बाद वह बोला-‘नेता कहत रहे के अब के बरस हमर गांव म घलो स्कूल खुल जाही...।’ कहकर उसने समोसे में मुंह मारा। यह बताते हुए उसकी आंखों में आशा की जोत झिलमिला रही थी।
    ‘अउ?’ मैंने पूछा-‘अउ का कहत रहे?’
    ‘कउन जाने मालिक।’ समोसा खाते हुए वह बोला-‘एतेक भीड़ रहिस के कुछ सुनात नइ रहय। मैं बस एतकेच सुन पाए हवं के अब के बरस हमर गांव म घलो स्कूल खुल जाही।’
    ‘अच्छा, ए तो बता भोला।’ मैंने अचानक विषय बदलकर पूछा-‘अब अगर कउनो नेता आही अउ संपत तोला शहर आए ल कही त आबे तंय?’
    ‘काबर नइ आहूं बाबू।’ वह हाथ धोते हुए बोला-‘नई आहूं त संपत मोर खेत के नहर ल बंद नइ करा देही का।’
    अभी मैं कुछ कहने ही जा रहा था कि तभी सायरन बजाता हुआ कारों का एक काफिला वहां से गुजरा। इसके साथ ही थोड़ी देर के लिए सब कुछ जैसे थम सा गया। थोड़ी देर बाद जब काफिला गुजर गया तो पीछे छोड़ गया धूल का गुबार। मैंने जेब से रुमाल निकालकर जल्दी से उसे अपनी नाक पर रख लिया जबकि भोलाराम उड़ती धूल के बीच मजे से चाय की चुस्कियां ले रहा था।


अब के बरस

व्यंग्य

satire, politics, bakhtawar adab, nai tahreek, Read me, Sayeed khan

✒ सईद खान 

अब के बरस

    भोला से मेरा परिचय कोई खास पुराना नहीं है। कुछ दिनों पहले जब मैं अपने उपन्यास के लिए किसी धांसू प्लाट की तलाश में गांव-देहात की खाक छान रहा था, एक देहात के किसी नुकीले पत्थर ने मेरी फटफटिया के टायर का बोलोराम कर दिया था। उस तपती दुपहरी की सख्त धूप में सड़क विधवा की मांग की तरह दूर तक खामोश पड़ी चिलचिला रही थी। ऐसे में फटफटिया का पंक्चर हो जाना बिल्कुल वैसा ही था, जैसे दूबर के लिए दो आषाढ़। शहर वहां से अभी भी लगभग पांच किलोमीटर दूर था। फटफटिया अगर ठीक होती तो पांच किलोमीटर का सफर कोई मायने न रखता लेकिन फिलहाल तीन तेरह नौ अठारह का मामला था। पांच किलोमीटर लंबा रास्ता पचास किलोमीटर जितना लंबा प्रतीत हो रहा था। ऊपर से देहाती लू के स्पेशल झक्कड़ जिस्म में कांटे की तरह चुभ रहे थे, सो अलग। सोचा, आए थे नमाज पढ़ने, रोजे गले पड़ गए। उपन्यास का कोई पलाट-सलाट तो मिला नहीं, उल्टे पंक्चर फटफटिया को पांच किलोमीटर खींच कर ले जाने की मुसीबत गले पड़ गई। हालांकि बंदे के लिए फटफटिया खींचने का यह पहला मौका नहीं था। इससे पहले भी अनेक अवसरों पर बंदे को फटफटिया खींचने का तजुर्बा हो चुका है। पंक्चर हो जाने पर तो अक्सर ही। और कभी-कभी रास्ते में पेटेल खत्म हो जाने पर भी। और हर बार ऐसे मौकों पर बाकायदा यह शपथ जरूर ली जाती कि आइंदा ऐसे हालात पैदा नहीं होने दिए जाएंगे। लेकिन नामुराद शपथ भी तभी याद आती, जब हालात ऐसे हो चुके होते।
    पेट्रोल रहित अथवा पंक्चर फटफटिया खींचने का बंदे का तजुर्बा बिल्कुल वैसा ही है जैसा अनचाही दुल्हन के साथ जिंदगी बसर करना अथवा अनचाहे नेता को पूरे पांच बरस बर्दाश्त करना। वो तो गनीमत थी कि उसी समय भोला वहां नमुदार हो गया था। वरना गांव की धूलभरी सड़क पर पंक्चर फटफटिया को खींचना दो अनचाही दुल्हन के साथ जिंदगी बसर करने अथवा एक अनचाहे नेता के दो कार्यकाल बर्दाश्त करने जैसा दुश्वार हो जाता।

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व्यंग्य


    उस चिलचिलाती धूप में भी बदन पर मात्र एक अंगोछा लपेटे वह बीड़ी खरीदने घर से निकला था। गांव की एकमात्र दुकान में बीड़ी खत्म हो गई थी, इसलिए उसे गांव के मुहाने तक जाना पड़ रहा था। वहां बाईपास की किसी दुकान में उसे बीड़ी मिल सकती थी। मुझे परेशानहाल देख, देहात सुलभ खीसे निपोरते हुए उसने मुझसे पूछा था-‘का होगे बाबू?’
    मैंने उसे अपनी परेशानी बताई तो उसने एक झटके में मुझे मेरी समस्या का समाधान सुझा दिया। वह बोला-‘त का होगे, तैं आगू डहार ले खेंचत चल, मैं पाछू डहार ले पेलत जाहूं।’
    ‘तहूं शहर जाथ अस?’ तनिक आश्चर्यमिश्रित हर्ष के साथ मैंने अपनी छत्तीसगढ़ी भाषाज्ञान का सदुपयोग किया।
    ‘नुक्कड़ तक तो जाबेच करंव।’ वह बोला-‘अउ, तैं कहीबे त थोड़अकन अउ दूरीहा तक तोर फटफटिया ल पेल देहूं।’
    ‘अच्छा! अउ पइसा कतका लेबे?’
    वह बोला-‘जतका तैं दे देबे, उतकेच ल धर लेहूं।’
    ‘फेर भी।’ मैंने उसे टटोलने की गरज से पूछा था-‘पहिले बता देबे ता बढ़िया हो जातिस।’
    वह एकदम से चुप हो गया था। मैंने सोचा, कदाचित वह हिसाब लगा रहा होगा। फिलहाल गरज मेरी थी। अगर वह सौ भी मांगता तो मुझे देना पड़ता। आखिर चिलचिलाती धूप में पंक्चर फटफटिया को पूरे पांच किलोमीटर तक खींचकर ले जाने का सवाल था। लेकिन उसने सिर्फ दस रुपए ही मांगे थे। ये और बात थी कि शहर पहुंचकर मैंने उसे पूरे बीस रुपए दिए थे।
    आज उसी भोलाराम को शहर के एक चैराहे पर खड़ा देख मैं उससे मिले बिना नहीं रह सका। फटफटिया मोड़कर जैसे ही मैं उसके करीब पहुंचा, उसने झट मुझे पहचान लिया और नमस्ते भी किया।
    ‘कइसे भोला?’ मैं बोला-‘ए मेर कइसे खड़े हस?’
    ‘द्वारी जाए बर कउनो सवारी के बाट जोहथ हवं मालिक।’ उसने मुस्कुराने की कोशिश की।
    ‘ओह! लेकिन कइसे आए रहे हियां?’
    ‘ऊ नेता आए रहिन न.....।’ उसने बिना किसी लाग-लपेट के जवाब दिया।
    ‘नेता...? अच्छा ऊ..., ऊ... जऊन चुनाव लड़थ हे।’
    ‘हव।’ भोला बोला-‘तेकरे सइती आए रहवं।’
    ‘हूं।’ फटफटिया को स्टैंड पर खड़ी कर उसकी सीट पर बैठते हुए मैं बोला-‘लेकिन नेता से मिले के तोला का जरूरत पड़ गे?’
    ‘जरूरत तो कउनो नई रहिस...।’
    ‘फेर...?’
    ‘मैं तो संपत के कहे म आए रहवं।’ वह सादगी से बोला-‘संपत ह कहे रहिस के नेता आत हे त शहर जाए ल पड़ही, तेकरे सइती आए रहवं।’
    ‘संपत कउन?’ जेब से सिगरेट का पैकेट निकालते हुए मैंने पूछा।
    ‘संपत एइ नेता के कारकरता हस हमर गांव म।’ भोला बोला-‘ओ कहे रहे के नेता आथे त थोड़ अकन भीड़ जुटाए ल पड़थे। त हमर गांव के 15.20 झन अउ आन गांव के 15.20  झन जुड़ के हमन 40.50  झन आए रहिन। संपत ह सबो ल टरक म बैठाए दे रहे अउ कहे रहे कि इही टरक ह वापस घलो पंहोचा देही।’
    ‘तो ऊ टरक ह अब कहां हे?’
    ‘ओकर डीजल ह सिरा गे हे मालिक।’ भोला बोला-‘डिरावर बतात रहे के टरक अब नइ जाए सकए।’
    ‘ओह! अउ तुंहर संगवारी?’
    ‘कउन जाने मालिक, भीड़ म कहां पछुआ गे हे सब्बो मन।’
    ‘त खाना-वाना खाए हस के नहीं?’ मैंने एक सिगरेट सुलगाते हुए पूछा।
    ‘या।’ खीसें निपोरकर वह बोला-‘जब संपत ही नइ मिले त खाना कहां ले मिलही बाबू।’
    मैंने सिगरेट का एक लंबा कश लिया और भोला को अपने साथ लेकर पास की एक होटल में जा बैठा। वहां उसके लिए समोसा आर्डर कर मैंने पूछा-‘का कहत रहे नेता?’
    तभी वेटर समोसा ले आया। भोला जल्दी-जल्दी समोसा ढकोसने लगा। उसे देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे उसने सुबह से कुछ नहीं खाया है। दो समोसा खाने तक उसके माथे और आंखों में पानी की बूंदे चमकने लगी थी। उसने पानी से भरा पूरा गिलास भी गटक लिया। तभी मेरे इशारे पर वेटर समोसे की एक और प्लेट रख गया। प्लेट से एक समोसा उठाते हुए भोला ने मुझसे पूछा-‘तयं नई खाबे?’
    ‘मैं अभ्भिच भोजन करे हवं।’ मैं बोला।
    भोला चुपचाप समोसा खाता रहा। थोड़ी देर बाद वह बोला-‘नेता कहत रहे के अब के बरस हमर गांव म घलो स्कूल खुल जाही...।’ कहकर उसने समोसे में मुंह मारा। यह बताते हुए उसकी आंखों में आशा की जोत झिलमिला रही थी।
    ‘अउ?’ मैंने पूछा-‘अउ का कहत रहे?’
    ‘कउन जाने मालिक।’ समोसा खाते हुए वह बोला-‘एतेक भीड़ रहिस के कुछ सुनात नइ रहय। मैं बस एतकेच सुन पाए हवं के अब के बरस हमर गांव म घलो स्कूल खुल जाही।’
    ‘अच्छा, ए तो बता भोला।’ मैंने अचानक विषय बदलकर पूछा-‘अब अगर कउनो नेता आही अउ संपत तोला शहर आए ल कही त आबे तंय?’
    ‘काबर नइ आहूं बाबू।’ वह हाथ धोते हुए बोला-‘नई आहूं त संपत मोर खेत के नहर ल बंद नइ करा देही का।’
    अभी मैं कुछ कहने ही जा रहा था कि तभी सायरन बजाता हुआ कारों का एक काफिला वहां से गुजरा। इसके साथ ही थोड़ी देर के लिए सब कुछ जैसे थम सा गया। थोड़ी देर बाद जब काफिला गुजर गया तो पीछे छोड़ गया धूल का गुबार। मैंने जेब से रुमाल निकालकर जल्दी से उसे अपनी नाक पर रख लिया जबकि भोलाराम उड़ती धूल के बीच मजे से चाय की चुस्कियां ले रहा था।


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Tuesday, 25 February 2025

व्यंग्य


कुत्तों से सावधान

सईद खान 

वाया लोकतंत्र

    उस बड़े बंगले के लोहे वाले गेट पर एक ओर बंगले के मालिक की नाम पट्टिका लगी हुई थी और दूसरी ओर नाम पट्टिका से कुछ बड़ी एक और तख्ती लगी हुई थी जिस पर मोटे-मोटे अक्षरों से लिखा हुआ था -‘कुत्तों से सावधान।’ एक दिन किसी सिरफिरे ने उस तख्ती पर लिखे वाक्य के साथ कलाकारी कर दिया। तख्ती में लिखे ‘कुत्तों’ शब्द के आगे उसने ‘अर्ध विराम’ लगा दिया और अक्षर ‘से’ को हटा दिया। यानि ‘कुत्तों से सावधान’ वाली तख्ती की प्रकृति ही बदल गई। अब वहां हो गया ‘कुत्तों, सावधान।’
    उसी रात उस बंगले में चोरी हो गई। चोर ने लंबा हाथ मारा था लेकिन बदकिस्मती से अगले ही रोज वह पकड़ लिया गया। हमने सोचा, उत्ते बड़े बंगले में और वह भी उस बंगले में, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कुत्तों के हवाले थी, बाकायदा वार्निंग देकर चोरी करने वाला चोर कोई ऐसा-वैसा नहीं होगा। वह जरूर कोई पहुंचा हुआ होगा। और हो सकता है, उसने कहीं से (दूसरे मुलुक) से प्रशिक्षण भी लिया हो, क्योंकि जहां तक हमारा नालेज बताता है कि अपने मुलुक में अब तक ऐसा कोई प्रशिक्षण केंद्र स्थापित ही नहीं हुआ है, जहां युवकों को बलवा, तोड़फोड़ और चोरी-डकैती जैसी बहुपयोगी विधाओं का प्रशिक्षण दिया जाता हो। यहां तो जो होता है (उपरोक्त) उस सब में बाहर का ही हाथ होता है। लेहाजा हमने उस इम्पोर्टेड चोर का इंटरव्यूह लेने की ठानी। हमने सोचा, पत्रकारों के बीच अच्छी धाक जम जाएगी अपनी। सो हम थाने जा पहुंचे। लेकिन थाने पहुंचने पर निराशा हाथ लगी, क्योंकि जिसे हम आयातीत चोर समझ रहे थे, वह गली-मोहल्ले का चोर निकला।

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कहानी 

  घर 

व्यंग्य

    

    हम बोले- ‘का भैया, तुम्हें डर नहीं लगा। उत्ते बड़े बंगले में चोरी करते हुए। वह भी उस बंगले में, जिसमें कुत्ते पले हुए थे।’
    ‘नहीं थे यार कुत्ते-सुत्ते।’ वह खीजकर बोला-‘बंगले वाला ही कुत्ता निकला। खाली-पीली तख्ती लगा रखी थी साले ने, ताकि हमारी बिरादरी बंगले में घुसने की हिम्मत न कर सके। साला, राजनीति कर रहा था हमारे साथ।’
    अल्लाह कसम भाई मियां। उस दिन हमने पहली बार जाना कि राजनीति क्या होती है। पहले हम राजनीति को सिर्फ राजनीति समझा करते थे। उस दिना जाना कि राजनीति वह नहीं होती है, जो हम समझा करते हैं। बल्कि वह तो कुछ और ही होती है।
    कुछ दिनों बाद वह चोर हमें नुक्कड़ के चाय के ठेले पर एक पुलिस वाले के साथ चाय सुड़कता मिला। हम बोले-‘का भैया, इत्ती जल्दी कैसे बाहर आ गए? तुमाय पर तो चारी का इल्जाम है न?’
    ‘तो क्या हुआ?’ वह दो टूक लहजे में बोला-‘चोरी का इल्जाम तो दर्जनों है हम पर। और चोरी का ही क्यों, हत्या, लूट और बलात्कार के न जाने कितने इल्जाम हैं हम पर। लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि हर इल्जाम की सजा हमें मिले ही?’
    ‘मतलब?’ हमने चैंककर पूछा तो वह बोला-‘सेटिंग है यार। सब तरफ सेटिंग करके रखना पड़ता है। इसलिए तो इत्ते दिनों से इस पोरफेशन में हैं।’
    ‘सेटिंग बोले तो?’ हमने अपनी पलकें मिचमिचाकर पूछा।
    ‘समझ लो राजनीति है।’ चाय का एक लंबा घूंट सुड़क कर वह बोला-‘तुम्हारी समझ में नहीं आएगी।’  कहकर वह पुलिस वाले के साथ उसकी फटफटिया में जा बैठा और हमारे देखते ही देखते उड़न छू हो गया।
    कुछ दिनों बाद वह फिर मिला हमें। उस वक्त हम अपना पारंपरिक लिबास पहनें पईयां-पईयां सड़क नाप रहे थे। ढीला-ढाला कुर्ता-पायजामा, पैरों में घिसी हुई स्लिपर और आंखों में चौड़े फे्रम वाला चश्मा था। तभी एक चमचमाती कार हमारे बिल्कुल निकट आकर रुकी। हमने देखा, उसकी स्टेयरिंग पर वही चोर बैठा हमें देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रहा है। हम भौंचक्क हो कभी उसकी कार को और कभी उसे देख रहे थे। आश्चर्य से भाड़ की तरह खुले हमारे मुंह का पूरा-पूरा आनंद लेते हुए वह बोला- ‘शक मत करो। चोरी की नहीं है। नगद रोकड़ा देकर खरीदा हूं। वो क्या है कि आजकल मैं सरकारी ठेके लेने लगा हूं।’
    ‘सरकारी ठेका।’ हम चकरा ही गए। हमने सोचा, हम सरकारी जमीन पर एक पान ठेला रखने की हिमाकत भी नहीं कर सके आज तक। और एक यह है। कल का चोर। टोटल असामाजिक। यह सरकारी ठेकेदार हो गया और इत्ती जल्दी कार वाला भी हो गया। लानत है हम पर। हम अपनी सैकड़ाभर रचनाओं के प्रकाशन के बाद भी कार तो क्या लूना वाले भी न हो सके। और यह कार वाला हो गया। अच्छी राजनीति है भई।
    थोड़े दिनों बाद हमें एक और सुखद अनुभूति हुई।
    पता चला कि हमारा फेवरिट चोर चुनाव लड़ रहा है। एक मजबूत पार्टी ने उसे अपना उम्मीदवार घोषित किया है। उसके मुकाबले एक निहायत ही सज्जन पुरुष मैदान में थे। कांटे की टक्कर थी। एक तरफ चोर था। गुंडा और बदनामशुदा सरकारी ठेकेदर। जबकि दूसरी ओर एक सभ्य, शिक्षित और देवतातुल्य सज्जन थे।
    हमने सोचा, नैतिकता अभी मरी नहीं है। समाज अभी भी सभ्य है, शिष्ट है। नैतिकता का पतन नहीं हुआ है अभी। इसलिए अच्छाई की जीत होगी और बुराई की हार होगी।
    लेकिन चुनाव परिणाम चैंकाने वाला था। अच्छाई हार गई और बुराई जीत गई। ‘सत्यमेव जयते’ को हमने राजनीति के मैदान में चारो खाने चित्त देखा। कल का चोर नेता बन गया। जिन पुलिस वालों को कल तक उसे जुतियाते देखा था, उन्हें ही उसकी आगवानी में हाथ बांधे खडे देखा। राजनीति है भई।
    राजनीति के रंग-ढंग देखकर एक बार हमारे भीतर भी कहीं राजनीति का कीड़ा कुलबुलाने लगा था। सोचा, कागज काले करने से अच्छा है कि दूसरों पर कीचड़... सारी राजनीति की जाए। सात पुश्तें तर जाएंगी। राह भी आसान है। न कोई डिग्री न डिप्लोमा। बस नैतिकता और मानवता जैसे ढकोसलों को ताक पर धरना होगा और चमचागिरी, गुंडागर्दी जैसे गुणों का विकास करना होगा। अथवा न्यूली डेव्हलप्ड शार्टकट का उपयोग करना होगा। बंदूक लेकर बीहड़ में कूदने भर की देर है। बीहड़ की उबड-खाबड़ पथरीली राह वाया लोकतंत्र संसद के साफ-सुथरे गलियारे तक भी जाती है। 


वाया लोकतंत्र

व्यंग्य


कुत्तों से सावधान

सईद खान 

वाया लोकतंत्र

    उस बड़े बंगले के लोहे वाले गेट पर एक ओर बंगले के मालिक की नाम पट्टिका लगी हुई थी और दूसरी ओर नाम पट्टिका से कुछ बड़ी एक और तख्ती लगी हुई थी जिस पर मोटे-मोटे अक्षरों से लिखा हुआ था -‘कुत्तों से सावधान।’ एक दिन किसी सिरफिरे ने उस तख्ती पर लिखे वाक्य के साथ कलाकारी कर दिया। तख्ती में लिखे ‘कुत्तों’ शब्द के आगे उसने ‘अर्ध विराम’ लगा दिया और अक्षर ‘से’ को हटा दिया। यानि ‘कुत्तों से सावधान’ वाली तख्ती की प्रकृति ही बदल गई। अब वहां हो गया ‘कुत्तों, सावधान।’
    उसी रात उस बंगले में चोरी हो गई। चोर ने लंबा हाथ मारा था लेकिन बदकिस्मती से अगले ही रोज वह पकड़ लिया गया। हमने सोचा, उत्ते बड़े बंगले में और वह भी उस बंगले में, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कुत्तों के हवाले थी, बाकायदा वार्निंग देकर चोरी करने वाला चोर कोई ऐसा-वैसा नहीं होगा। वह जरूर कोई पहुंचा हुआ होगा। और हो सकता है, उसने कहीं से (दूसरे मुलुक) से प्रशिक्षण भी लिया हो, क्योंकि जहां तक हमारा नालेज बताता है कि अपने मुलुक में अब तक ऐसा कोई प्रशिक्षण केंद्र स्थापित ही नहीं हुआ है, जहां युवकों को बलवा, तोड़फोड़ और चोरी-डकैती जैसी बहुपयोगी विधाओं का प्रशिक्षण दिया जाता हो। यहां तो जो होता है (उपरोक्त) उस सब में बाहर का ही हाथ होता है। लेहाजा हमने उस इम्पोर्टेड चोर का इंटरव्यूह लेने की ठानी। हमने सोचा, पत्रकारों के बीच अच्छी धाक जम जाएगी अपनी। सो हम थाने जा पहुंचे। लेकिन थाने पहुंचने पर निराशा हाथ लगी, क्योंकि जिसे हम आयातीत चोर समझ रहे थे, वह गली-मोहल्ले का चोर निकला।

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कहानी 

  घर 

व्यंग्य

    

    हम बोले- ‘का भैया, तुम्हें डर नहीं लगा। उत्ते बड़े बंगले में चोरी करते हुए। वह भी उस बंगले में, जिसमें कुत्ते पले हुए थे।’
    ‘नहीं थे यार कुत्ते-सुत्ते।’ वह खीजकर बोला-‘बंगले वाला ही कुत्ता निकला। खाली-पीली तख्ती लगा रखी थी साले ने, ताकि हमारी बिरादरी बंगले में घुसने की हिम्मत न कर सके। साला, राजनीति कर रहा था हमारे साथ।’
    अल्लाह कसम भाई मियां। उस दिन हमने पहली बार जाना कि राजनीति क्या होती है। पहले हम राजनीति को सिर्फ राजनीति समझा करते थे। उस दिना जाना कि राजनीति वह नहीं होती है, जो हम समझा करते हैं। बल्कि वह तो कुछ और ही होती है।
    कुछ दिनों बाद वह चोर हमें नुक्कड़ के चाय के ठेले पर एक पुलिस वाले के साथ चाय सुड़कता मिला। हम बोले-‘का भैया, इत्ती जल्दी कैसे बाहर आ गए? तुमाय पर तो चारी का इल्जाम है न?’
    ‘तो क्या हुआ?’ वह दो टूक लहजे में बोला-‘चोरी का इल्जाम तो दर्जनों है हम पर। और चोरी का ही क्यों, हत्या, लूट और बलात्कार के न जाने कितने इल्जाम हैं हम पर। लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि हर इल्जाम की सजा हमें मिले ही?’
    ‘मतलब?’ हमने चैंककर पूछा तो वह बोला-‘सेटिंग है यार। सब तरफ सेटिंग करके रखना पड़ता है। इसलिए तो इत्ते दिनों से इस पोरफेशन में हैं।’
    ‘सेटिंग बोले तो?’ हमने अपनी पलकें मिचमिचाकर पूछा।
    ‘समझ लो राजनीति है।’ चाय का एक लंबा घूंट सुड़क कर वह बोला-‘तुम्हारी समझ में नहीं आएगी।’  कहकर वह पुलिस वाले के साथ उसकी फटफटिया में जा बैठा और हमारे देखते ही देखते उड़न छू हो गया।
    कुछ दिनों बाद वह फिर मिला हमें। उस वक्त हम अपना पारंपरिक लिबास पहनें पईयां-पईयां सड़क नाप रहे थे। ढीला-ढाला कुर्ता-पायजामा, पैरों में घिसी हुई स्लिपर और आंखों में चौड़े फे्रम वाला चश्मा था। तभी एक चमचमाती कार हमारे बिल्कुल निकट आकर रुकी। हमने देखा, उसकी स्टेयरिंग पर वही चोर बैठा हमें देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रहा है। हम भौंचक्क हो कभी उसकी कार को और कभी उसे देख रहे थे। आश्चर्य से भाड़ की तरह खुले हमारे मुंह का पूरा-पूरा आनंद लेते हुए वह बोला- ‘शक मत करो। चोरी की नहीं है। नगद रोकड़ा देकर खरीदा हूं। वो क्या है कि आजकल मैं सरकारी ठेके लेने लगा हूं।’
    ‘सरकारी ठेका।’ हम चकरा ही गए। हमने सोचा, हम सरकारी जमीन पर एक पान ठेला रखने की हिमाकत भी नहीं कर सके आज तक। और एक यह है। कल का चोर। टोटल असामाजिक। यह सरकारी ठेकेदार हो गया और इत्ती जल्दी कार वाला भी हो गया। लानत है हम पर। हम अपनी सैकड़ाभर रचनाओं के प्रकाशन के बाद भी कार तो क्या लूना वाले भी न हो सके। और यह कार वाला हो गया। अच्छी राजनीति है भई।
    थोड़े दिनों बाद हमें एक और सुखद अनुभूति हुई।
    पता चला कि हमारा फेवरिट चोर चुनाव लड़ रहा है। एक मजबूत पार्टी ने उसे अपना उम्मीदवार घोषित किया है। उसके मुकाबले एक निहायत ही सज्जन पुरुष मैदान में थे। कांटे की टक्कर थी। एक तरफ चोर था। गुंडा और बदनामशुदा सरकारी ठेकेदर। जबकि दूसरी ओर एक सभ्य, शिक्षित और देवतातुल्य सज्जन थे।
    हमने सोचा, नैतिकता अभी मरी नहीं है। समाज अभी भी सभ्य है, शिष्ट है। नैतिकता का पतन नहीं हुआ है अभी। इसलिए अच्छाई की जीत होगी और बुराई की हार होगी।
    लेकिन चुनाव परिणाम चैंकाने वाला था। अच्छाई हार गई और बुराई जीत गई। ‘सत्यमेव जयते’ को हमने राजनीति के मैदान में चारो खाने चित्त देखा। कल का चोर नेता बन गया। जिन पुलिस वालों को कल तक उसे जुतियाते देखा था, उन्हें ही उसकी आगवानी में हाथ बांधे खडे देखा। राजनीति है भई।
    राजनीति के रंग-ढंग देखकर एक बार हमारे भीतर भी कहीं राजनीति का कीड़ा कुलबुलाने लगा था। सोचा, कागज काले करने से अच्छा है कि दूसरों पर कीचड़... सारी राजनीति की जाए। सात पुश्तें तर जाएंगी। राह भी आसान है। न कोई डिग्री न डिप्लोमा। बस नैतिकता और मानवता जैसे ढकोसलों को ताक पर धरना होगा और चमचागिरी, गुंडागर्दी जैसे गुणों का विकास करना होगा। अथवा न्यूली डेव्हलप्ड शार्टकट का उपयोग करना होगा। बंदूक लेकर बीहड़ में कूदने भर की देर है। बीहड़ की उबड-खाबड़ पथरीली राह वाया लोकतंत्र संसद के साफ-सुथरे गलियारे तक भी जाती है। 


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Monday, 24 February 2025

व्यंग्य 

पान की पीक, पान, सईद खान, बख्तावर अदब, नई तहरीक, रीड मी, व्यंग्य

- सईद खान

तेरी महिमा अपरंपार

    भारतीय संस्कृति अनेक रंगों से रंगी-पुती है। और इसकी प्रकृति के अनुरूप हर भारतीय भी जुदा-जुदा रंग ओढ़े हुए है। खान-पान, रहन-सहन और आचार-विचार के अलग-अलग रंगो-बू के बाद अगर कोई कसर रह जाती है तो वह होली के रंगों से पूरी हो जाती है। भला कौन चाहेगा कि कोई उसके मुंह पर लाल-पीला रंग पोते। लेकिन बात अगर होली की हो, तो सब चलता है।ं 
    और बात जब रंगों की हो तो जरूरी है कि थोड़ी चर्चा पान की पीक की भी हो जाए। क्योंकि इसके बगैर यह चर्चा अधूरी होगी। पान की महिमा को देखते हुए इसकी पीक को भी (कु) संस्कृति के विविध रंगों से जोड़ा जा सकता है। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि पूरा पान ही हमारी (कु) संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। इसलिए पान को या पान की पीक को बुरा-भला कहने और नाक-भौं सिकोड़ने वालों से मैं निवेदन करना चाहूंगा कि वे कृपया अपनी जानकारी दुरुस्त कर लें और भविष्य में पान का आदर अन्न की तरह करने लगें।
    ‘पान खाए सइयां हमार...’ और ‘खइके पान बनारस वाला...’ जैसे गीत रचकर शायर पहले ही इसका बखान कर चुके हैं। मुहावरों और कहावतों आदि में भी इसकी अच्छी घुसपैठ है। यहां तक कि एक पूरे शहर (बनारस) की पहचान भी इससे कायम है। किसी जिम्मेदारी को हाथ में लेते वक्त लोग ‘बीड़ा’ (अर्थात पान) उठाने की बात करते हैं। तलवार या हथौड़ा नहीं। और देख लो, असामाजिक तत्वों ने भी अपनी सहूलियत के लिए साहित्य से जो शब्द चुना है, वह भी पान की आवश्यक वस्तुओं में से एक है। किसी का बोलोराम करने के लिए वे उसकी गर्दन के नाप का लेन-देन नहीं करते बल्कि ‘सुपाड़ी’ देते-लेते हैं। और आप तो जानते ही हो कि सुपाड़ी के लेन-देन का स्पष्ट अर्थ दुनिया के सारे शब्दकोश में एक ही है। और वो ये कि निकट भविष्य में कोई परलोक सिधारने वाला है। ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा भी पान के बिना अधूरी जान पड़ती है। अतिथि के आगमन पर चाहे छप्पन भोग उसके सामने परोस दिए जाएं, बिदाई के वक्त अगर पान या सौंफ-सुपाड़ी न परोसी जाए तो मेहमान नवाजी पर सवालिया निशान लग सकता है।
    इसी तरह पान ठेलों और गुमटियों की अहमियत को भी नकारा नहीं जा सकता। सर्वविदित है कि देश की राजनीति का भविष्य इन्हीं गुमटियों पर तय होता है। बजट पर जितनी सार्थक बहस पान ठेलों पर होती है, उतनी शायद पांच सितारा होटलों में भी न होती होगी। और तो और मोहल्लेवासियों की जन्म कुंडली का जितना ज्ञान पनवाड़ी को होता है, उतना ज्ञान किसी पंडित को भी नहीं होता होगा। मोहल्लेवासियों की पूरी वंशावली पनवाड़ी के पास दर्ज होती है, जिसका प्रत्यक्ष लाभ यह होता है कि बाहर से आने वाले व्यक्ति को डोर टू डोर एप्रोच कर पता पूछने के झंझट से मुक्ति मिल जाती है। बुद्धिमान आगंतुक किसी का पता पूछने के लिए सीधा उस मोहल्ले के पान ठेले पर जा पहुंचता है, जहां उसे वांछित व्यक्ति की पूरी जन्मकुंडली हासिल हो जाती है जिससे उसका अच्छा-खासा टाईम बच जाता है। 
    एक राज की बात बताता चलूं ( प्रसंगवश )। यह तो आप जानते ही होंगे कि टाईम पास के लिए पान ठेले सर्वोत्तम ठीए साबित होते हैं। राज की बात यह कि यही वह स्थान होता है, जहां मोहल्ले के जवान हो रहे छोरे अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि का बड़ी कुशलता से परिचय भी देते हंै। आती-जाती जवान हो रही छोरियों को देखकर यदि कोई फब्ती न कसे और सीटी न बजाए तो छोरियां हीन भावना से भर जाती है। इसलिए मोहल्ले के जागरुक युवा अपना यह महत्वपूर्ण कर्तव्यपालन भी इसी स्थान पर करते हैं। 
    पान की गुमटियों और पीक चर्चा के बाद पान के शौकीनों की चर्चा भी लाजिमी है। विज्ञान से साबित है कि पान का सेवन लाभदायी है। पान की गिल्लौरी को मुंह में दबाने का भी अपना अलग ही आनंद है। ज्यादातर लोग काफी समय तक इसे यूं ही मुंह में दबाए रख सकते हंै और धीरे-धीरे इसका रसास्वादन करते रहते हैं। ऐसे लोगों को सुबह उठकर दांतों में ब्रश करने के झंझट से मुक्ति मिल जाती है। इनके दांत इतने लाल हो जाते हैं कि दांतों का पीलापन नजर नहीं आता है। वहीं कुछ लोग पान को जल्दी-जल्दी चबाकर चट कर जाने के आदि होते हंै। तो कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो मुंह में पीक भरी रखने पर यकीन रखते हैं। ये लोग जब बात करते हैं तो इनकी गर्दन अपने-आप आसमान की ओर उठ जाती है। लेकिन ये कोई रोग नहीं हुआ, अपितु एक स्वभाविक प्रक्रिया है और मुंह में पीक भरी होने पर स्वमेव संपन्न होती है। जैसे, भैंस जब रंभाती है तो उसकी गर्दन स्वमेव उपर उठ जाती है। वैसे ही। यह आनंद केवल हम भारतीयों को ही नसीब है। अमेरिका, ब्रिटेन या फ्रांस के गोरों को यह आनंद कहां।

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कहानी 

        घर 

व्यंग्य


    सिनेमाहालों, अस्पतालों, सरकारी और अर्धसरकारी भवनों की दीवारों पर जगह-जगह कत्थे और चूने के सम्मिश्रण से बनी आड़ी-तिरछी लकीरें भी पान के शौकीनों की एक और किस्म का ज्ञान कराती है। मुंह में पान और उंगली की पोर पर चूना रखने वाले ज्यादातर बाबू होते हैं। अर्थात सरकारी कार्यालयों की रीढ़ की हड्डी। दीवारों पर बनी चूने की आड़ी-तिरछी धारियों से इन बाबुओं की कार्यकुशलता का तो पता चलता ही है, इससे चूना लगाने वालों को पे्ररणा भी मिलती रहती है। पान के शौकीन किसी भवन के खाली पड़े कोनों में इसलिए पिचकारी मारते हैं ताकि भवन का कोई भी कोना नीरस न लगे और उसकी रंगत में निखार आ जाए लेकिन साजिश करने वाले उनके इरादों पर पानी फेर देते हंै और उनकी मारी हुई पिचकारी पर आड़ी-तिरछी इतनी पीक उगल देते हैं कि पान की वह पहले वाली प्यारी सी पीक अपना सौंदर्य बोध खोकर वीभत्स हो जाती है। 
    वीभत्स रस का एक दूसरा रूप चिकित्सकों और कुछ सामाजिक संगठनों द्वारा जारी उन पोस्टर्स पर भी दिखाई देता है जिसमें मानव अंगों नाक, कान और गला आदि को विकृत रूप में दिखाया जाता है। साथ ही यह प्रचारित किया जाता है कि यह विकृति पान, सिगरेट और पाउच (ज्यादातर पाउच) के सेवन के कारण आती है।
    लेकिन मैं समस्त पाउच पे्रमियों और पान के शौकीनों से निवेदन करना चाहूंगा कि कृपया वे किसी बहकावे में न आएं। ऐसे समस्त सामाजिक संगठन भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात करने पर आमादा हैं। वे चाहते हैं कि हम अपनी (कु) संस्कति से मुंह मोड़ लें। लेकिन वे क्या जाने कि प्राण जाए पर शान न जाए हमारा नीति वाक्य है। पान, सिगरेट और पाउच के सेवन से चाहे हमारी जान चली जाए या इसके द्वारा उत्पन्न गंदगी से किसी को उबकाई आए, हम अपनी परंपरा, अपनी (कु) संस्कृति से भला कैसे मुंह मोड़ सकते हैं। 


तेरी महिमा अपरंपार

व्यंग्य 

पान की पीक, पान, सईद खान, बख्तावर अदब, नई तहरीक, रीड मी, व्यंग्य

- सईद खान

तेरी महिमा अपरंपार

    भारतीय संस्कृति अनेक रंगों से रंगी-पुती है। और इसकी प्रकृति के अनुरूप हर भारतीय भी जुदा-जुदा रंग ओढ़े हुए है। खान-पान, रहन-सहन और आचार-विचार के अलग-अलग रंगो-बू के बाद अगर कोई कसर रह जाती है तो वह होली के रंगों से पूरी हो जाती है। भला कौन चाहेगा कि कोई उसके मुंह पर लाल-पीला रंग पोते। लेकिन बात अगर होली की हो, तो सब चलता है।ं 
    और बात जब रंगों की हो तो जरूरी है कि थोड़ी चर्चा पान की पीक की भी हो जाए। क्योंकि इसके बगैर यह चर्चा अधूरी होगी। पान की महिमा को देखते हुए इसकी पीक को भी (कु) संस्कृति के विविध रंगों से जोड़ा जा सकता है। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि पूरा पान ही हमारी (कु) संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। इसलिए पान को या पान की पीक को बुरा-भला कहने और नाक-भौं सिकोड़ने वालों से मैं निवेदन करना चाहूंगा कि वे कृपया अपनी जानकारी दुरुस्त कर लें और भविष्य में पान का आदर अन्न की तरह करने लगें।
    ‘पान खाए सइयां हमार...’ और ‘खइके पान बनारस वाला...’ जैसे गीत रचकर शायर पहले ही इसका बखान कर चुके हैं। मुहावरों और कहावतों आदि में भी इसकी अच्छी घुसपैठ है। यहां तक कि एक पूरे शहर (बनारस) की पहचान भी इससे कायम है। किसी जिम्मेदारी को हाथ में लेते वक्त लोग ‘बीड़ा’ (अर्थात पान) उठाने की बात करते हैं। तलवार या हथौड़ा नहीं। और देख लो, असामाजिक तत्वों ने भी अपनी सहूलियत के लिए साहित्य से जो शब्द चुना है, वह भी पान की आवश्यक वस्तुओं में से एक है। किसी का बोलोराम करने के लिए वे उसकी गर्दन के नाप का लेन-देन नहीं करते बल्कि ‘सुपाड़ी’ देते-लेते हैं। और आप तो जानते ही हो कि सुपाड़ी के लेन-देन का स्पष्ट अर्थ दुनिया के सारे शब्दकोश में एक ही है। और वो ये कि निकट भविष्य में कोई परलोक सिधारने वाला है। ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा भी पान के बिना अधूरी जान पड़ती है। अतिथि के आगमन पर चाहे छप्पन भोग उसके सामने परोस दिए जाएं, बिदाई के वक्त अगर पान या सौंफ-सुपाड़ी न परोसी जाए तो मेहमान नवाजी पर सवालिया निशान लग सकता है।
    इसी तरह पान ठेलों और गुमटियों की अहमियत को भी नकारा नहीं जा सकता। सर्वविदित है कि देश की राजनीति का भविष्य इन्हीं गुमटियों पर तय होता है। बजट पर जितनी सार्थक बहस पान ठेलों पर होती है, उतनी शायद पांच सितारा होटलों में भी न होती होगी। और तो और मोहल्लेवासियों की जन्म कुंडली का जितना ज्ञान पनवाड़ी को होता है, उतना ज्ञान किसी पंडित को भी नहीं होता होगा। मोहल्लेवासियों की पूरी वंशावली पनवाड़ी के पास दर्ज होती है, जिसका प्रत्यक्ष लाभ यह होता है कि बाहर से आने वाले व्यक्ति को डोर टू डोर एप्रोच कर पता पूछने के झंझट से मुक्ति मिल जाती है। बुद्धिमान आगंतुक किसी का पता पूछने के लिए सीधा उस मोहल्ले के पान ठेले पर जा पहुंचता है, जहां उसे वांछित व्यक्ति की पूरी जन्मकुंडली हासिल हो जाती है जिससे उसका अच्छा-खासा टाईम बच जाता है। 
    एक राज की बात बताता चलूं ( प्रसंगवश )। यह तो आप जानते ही होंगे कि टाईम पास के लिए पान ठेले सर्वोत्तम ठीए साबित होते हैं। राज की बात यह कि यही वह स्थान होता है, जहां मोहल्ले के जवान हो रहे छोरे अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि का बड़ी कुशलता से परिचय भी देते हंै। आती-जाती जवान हो रही छोरियों को देखकर यदि कोई फब्ती न कसे और सीटी न बजाए तो छोरियां हीन भावना से भर जाती है। इसलिए मोहल्ले के जागरुक युवा अपना यह महत्वपूर्ण कर्तव्यपालन भी इसी स्थान पर करते हैं। 
    पान की गुमटियों और पीक चर्चा के बाद पान के शौकीनों की चर्चा भी लाजिमी है। विज्ञान से साबित है कि पान का सेवन लाभदायी है। पान की गिल्लौरी को मुंह में दबाने का भी अपना अलग ही आनंद है। ज्यादातर लोग काफी समय तक इसे यूं ही मुंह में दबाए रख सकते हंै और धीरे-धीरे इसका रसास्वादन करते रहते हैं। ऐसे लोगों को सुबह उठकर दांतों में ब्रश करने के झंझट से मुक्ति मिल जाती है। इनके दांत इतने लाल हो जाते हैं कि दांतों का पीलापन नजर नहीं आता है। वहीं कुछ लोग पान को जल्दी-जल्दी चबाकर चट कर जाने के आदि होते हंै। तो कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो मुंह में पीक भरी रखने पर यकीन रखते हैं। ये लोग जब बात करते हैं तो इनकी गर्दन अपने-आप आसमान की ओर उठ जाती है। लेकिन ये कोई रोग नहीं हुआ, अपितु एक स्वभाविक प्रक्रिया है और मुंह में पीक भरी होने पर स्वमेव संपन्न होती है। जैसे, भैंस जब रंभाती है तो उसकी गर्दन स्वमेव उपर उठ जाती है। वैसे ही। यह आनंद केवल हम भारतीयों को ही नसीब है। अमेरिका, ब्रिटेन या फ्रांस के गोरों को यह आनंद कहां।

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        घर 

व्यंग्य


    सिनेमाहालों, अस्पतालों, सरकारी और अर्धसरकारी भवनों की दीवारों पर जगह-जगह कत्थे और चूने के सम्मिश्रण से बनी आड़ी-तिरछी लकीरें भी पान के शौकीनों की एक और किस्म का ज्ञान कराती है। मुंह में पान और उंगली की पोर पर चूना रखने वाले ज्यादातर बाबू होते हैं। अर्थात सरकारी कार्यालयों की रीढ़ की हड्डी। दीवारों पर बनी चूने की आड़ी-तिरछी धारियों से इन बाबुओं की कार्यकुशलता का तो पता चलता ही है, इससे चूना लगाने वालों को पे्ररणा भी मिलती रहती है। पान के शौकीन किसी भवन के खाली पड़े कोनों में इसलिए पिचकारी मारते हैं ताकि भवन का कोई भी कोना नीरस न लगे और उसकी रंगत में निखार आ जाए लेकिन साजिश करने वाले उनके इरादों पर पानी फेर देते हंै और उनकी मारी हुई पिचकारी पर आड़ी-तिरछी इतनी पीक उगल देते हैं कि पान की वह पहले वाली प्यारी सी पीक अपना सौंदर्य बोध खोकर वीभत्स हो जाती है। 
    वीभत्स रस का एक दूसरा रूप चिकित्सकों और कुछ सामाजिक संगठनों द्वारा जारी उन पोस्टर्स पर भी दिखाई देता है जिसमें मानव अंगों नाक, कान और गला आदि को विकृत रूप में दिखाया जाता है। साथ ही यह प्रचारित किया जाता है कि यह विकृति पान, सिगरेट और पाउच (ज्यादातर पाउच) के सेवन के कारण आती है।
    लेकिन मैं समस्त पाउच पे्रमियों और पान के शौकीनों से निवेदन करना चाहूंगा कि कृपया वे किसी बहकावे में न आएं। ऐसे समस्त सामाजिक संगठन भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात करने पर आमादा हैं। वे चाहते हैं कि हम अपनी (कु) संस्कति से मुंह मोड़ लें। लेकिन वे क्या जाने कि प्राण जाए पर शान न जाए हमारा नीति वाक्य है। पान, सिगरेट और पाउच के सेवन से चाहे हमारी जान चली जाए या इसके द्वारा उत्पन्न गंदगी से किसी को उबकाई आए, हम अपनी परंपरा, अपनी (कु) संस्कृति से भला कैसे मुंह मोड़ सकते हैं। 


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Sunday, 23 February 2025

व्यंग्य

सईद खान, सच्ची श्रद्धांजलि, व्यंग्य, कहानी, लेख, बख्तावर अदब, नई तहरीक, रीड मी

✒ सईद खान  

सच्ची श्रद्धांजलि (व्यंग्य) 

 
    मंत्री जी के पार्टी कार्यालय पहुंचने तक कार्यक्रम की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी थी। अभिनंदन, स्वागत और आशिर्वाद की औपचारिकता के साथ ही मुख्य कार्यक्रम शुरू हुआ। मंत्री जी ने राष्टÑपिता महात्मा गांधी के तैलचित्र पर माल्यार्पण किया। वहां मौजूद पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों में से कुछ और ने भी यही किया। शेष ने बापू के चित्र पर पुष्प वर्षा की। फिर सबने पूरी श्रद्धा के साथ हाथ जोड़कर बापू को नमन किया। उसके बाद मंत्री जी माइक के सामने जा खड़े हुए और बाकी ने सामने लगी कुर्सियों पर आसन जमा लिया। यह सब यंत्रचलित सा हुआ। सरकारी स्कूल के बच्चों द्वारा 15 अगस्त और 26 जनवरी की परेड के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने जैसा। सधा हुआ। यहां तक कि दीनानाथ चौरसिया का दूसरों की नजÞर बचाकर जर्दे वाला पाउच अपने मुंह में उंडेलना और मुत्तु स्वामी का अपने मुंह में पड़े गुटखा के रसहीन अवशेष को हथेली में उगलकर उसे सामने बैठे सुकुल बाबू की कुर्सी के नीचे फेंकना भी सधा हुआ सा था। पूर्व अभ्यासित। जैसे वर्षों से वे इस क्रिया को दोहरा रहे हैं।
    उधर माइक पर एक-दो बार ऊंगली से ठक-ठक करने के बाद मंत्री जी ने कहना शुरू किया- ‘साथियों ! आज, राष्टÑपिता महात्मा गांधी की जयंती मनाई जा रही है...जैसा कि आप सभी जानते हैं कि राष्टÑपिता महात्मा गांधी यानि बापू ने देश की आजादी में अहम किरदार निभाया है...बापू अहिंसावादी थे...बापू ने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा...बापू ने कभी किसी पर क्रोध नहीं किया...बापू सत्यप्रिय थे...बापू ने कभी झूठ नहीं कहा...छोटे-बड़े सभी को बापू ने समान नजरों से देखा...बापू छुआछूत नहीं मानते थे...हम सब बापू के ऋणी हैं...। आओ! बापू की जयंती के इस अवसर पर हम उनके बताए मार्ग और उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लें...यही बापू के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।’ इसके साथ ही मंत्री जी ने अपनी वाणी को विराम दिया। सामने बैठी भीड़ ने ताली बजाई। उनके बाद विधायक, प्रदेश अध्यक्ष, ब्लाक अध्यक्ष और एक-दो पार्षदों ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया। सभी ने बापू के आदर्शों को आत्मसात करने की जरूरत पर जोर दिया। अगर उधम होटल का गर्मागर्म समोसा और भाप छोड़ती केतली देखकर संचालक महोदय ने आभार प्रदर्शन के लिए वरिष्ठ कार्यकर्ता मिर्जा कलीम बेग को आमंत्रित न किया होता तो कदाचित कुछ और कार्यकर्ता और पदाधिकारियों की बदौलत बापू की कुछ और अच्छाईयों पर से पर्दा उठ गया होता। 
    मंत्री जी यहां से गांधी चौक के लिए रवाना हो गए। गांधी चौक में आयोजित कार्यक्रम की तैयारी लगभग अंतिम चरण में थी कि तभी एक पंगा हो गया। बापू की प्रतिमा की सफाई के दौरान पता चला कि प्रतिमा से चश्मा गायब है। कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों में खलबली मचना स्वभाविक था। उसी बीच किसी ने लापरवाही से कहा-‘लेट इट बी यार, जब सालभर चश्मे की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया तो दो मिनट के कार्यक्रम के दौरान मंत्री जी भी चश्मे को नोटिस नहीं करेंगे।’
    ‘यार।’ किसी ने कहा-‘सालभर हम बापू की तरफ देखते ही कब हैं। लेकिन अभी बात अलग है। मंत्री जी पक्का नोटिस करेंगे।’ 
    ‘सवाल ये नहीं कि मंत्री जी नोटिस करेंगे या नहीं, सवाल है कि चश्मा गया कहां।’ भीड़ में से एक युवक आगे बढ़ा। दोनों हाथ कमर पर धरे बापू की प्रतिमा को गौर से देखते हुए वह बुदबुदाया-‘ये हिमाकत जिसने भी की है, यदि प्रशासन ने उसके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया तो हमें धरना-प्रदर्शन करना होगा। क्यों साथियों...।

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कहानी 


व्यंग्य


    
लेकिन इससे पहले कि कोई उसके समर्थन में सिर हिलाता या धरना-प्रदर्शन की कोई योजना बन पाती, मंत्री जी वहां पहुंच गए। बापू का चश्मा भूलकर लोगों ने मंत्री जी का स्वागत-सत्कार किया। मंत्री जी ने उन्हें आशिर्वाद दिया और बापू की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। कुछ और ने भी यही किया। शेष ने पुष्प वर्षा की। फिर सबने हाथ जोड़कर पूरी श्रद्धा के साथ बापू को नमन किया। उसके बाद मंत्री सहित कुछ कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने कार्यक्रम को संबोधित किया। बोले-‘जैसा कि आप सभी जानते हैं कि राष्टÑपिता महात्मा गांधी यानि बापू ने देश की आजादी में अहम किरदार निभाया था...बापू अहिंसावादी थे...बापू ने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा...बापू ने कभी किसी पर क्रोध नहीं किया...बापू सत्यप्रिय थे...बापू ने कभी झूठ नहीं कहा...छोटे-बड़े सभी को बापू ने समान नजरों से देखा...बापू छुआछूत नहीं मानते थे...हम सब बापू के ऋणी हैं...आओ! बापू की जयंती के इस अवसर पर हम उनके बताए मार्ग और उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लें...यही बापू के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी...।’ लोगों ने ताली बजाई और सांई होटल से मंगाई गई दही, कचौरी उदरस्थ की। उतनी देर में लाउडस्पीकर वाले छोकरों ने सधे हाथों से स्टैंड से साउंड बाक्स उतारकर तार आदि को समेट भी लिया था। 
    गांधी चौक के बाद मंत्री जी दो अन्य जगह भी बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए। वहां भी उन्होंने बापू का चरित्र वर्णन किया। उनके बताए मार्ग और आदर्शों पर चलने का संकल्प लेने की बात कही। आखिर में यह भी कहा-‘यही बापू के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।’ 
    इसके बाद वे क्रिस्टल पब्लिक स्कूल पहुंचे जहां हाई स्कूल के बालक-बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत नाटक  ‘अंधेर नगरी-चौपट राजा’ के मंचन के बाद उन्होंने कार्यक्रम को संबोधित किया।  बोले- ‘प्यारे बच्चों बापू ने ...............................।’ रटा रटाया भाषण देने के बाद अंत में उन्होंने यह भी कहा- ‘यही बापू के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।’  स्व-विवेक से यहां उन्होंने कुछ शब्दों का इजÞाफा किया। बोले- ‘बच्चो! तुम देश का भविष्य हो। बापू के बताए मार्ग और उनके आदर्श तुम्हारे लिए ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं।’ मंत्री जी का भाषण खत्म होते ही बच्चों, अभिभावकों और स्कूल स्टाफ ने ताली बजाई। मंत्री जी के लिए यहां स्वल्पाहार का बढ़िया इंतजाम था। लेकिन उन्होंने कुछ भी लेने से इंकार कर दिया। बोले-‘सुबह से यही चल रहा है, अब उबकाई आने लगी है।’ कहकर वे कार में जा बैठे।
    उनके जाने के बाद प्रिंसिपल कक्ष में प्रिंसिपल चारूलता विरूलकर अपने सामने बैठे मोहल्ला विकास समिति के अध्यक्ष सुब्रतो मुखर्जी और शिक्षक पालक समिति के अध्यक्ष हरभजन सिंह से बोलीं-‘उम्मीद नहीं थी कि मंत्री जी इतनी कंजूसी से काम लेंगे। भला बताओ, पांच लाख में दो कक्ष निर्माण और बोरिंग कैसे हो पाएगी।’
    ‘मुझे लगता है...।’ शिक्षक पालक समिति के अध्यक्ष हरभजन सिंह ने कहा-‘कोषाध्यक्ष महोदय अपनी बात दमदारी से नहीं रख पाए। दो कक्ष की कमी और बोरिंग न होने से उन्हें स्टूडेंट्Þस को होने वाली परेशानियों को प्रमुखता से रखना था।’
    ‘अब छोड़ो भी।’ मोहल्ला विकास समिति के अध्यक्ष सुब्रतो मुखर्जी बोले-‘मंत्री जी जितनी राशि की घोषणा कर गए हैं, उसे ही गनीमत जानो। महापौर चुनाव में उनकी पार्टी के प्रत्याशी को हमारे वार्ड से बहुत ही कम वोट पड़े थे, मुझे लगता है, मंत्री जी ने इसी बात की खीज निकाली हो।’
    अचानक प्रिंसिपल चारूलता विरुलकर ने मेज पर रखी घंटी पर जोर से हाथ मारा। साथ ही चिल्लाई-‘मेवालाल।’ जवाब में मेवालाल साक्षात उनके सामने आ खड़ा हुआ। 15 लाख की मांग के विरुद्ध मात्र 5 लाख की घोषणा किए जाने से चिढ़ी बैठीं श्रीमती विरूलकर को क्लास रूम से आ रहे शोरगुल ने और चिढ़ा दिया था। वे तनिक गुस्से में मेवालाल से बोलीं-‘बच्चों से कहो, कार्यक्रम खत्म हो गया है। अपने-अपने घर जाएं। और वो टेंट वालों ने अपना सामान समेटा या नहीं।’
    जाने को उद्यत मेवालाल ने रुककर बताया कि टेंट वालों ने लगभग सारा सामान समेट लिया है। काफी बच्चे जा चुके हैं। कुछ ही बच्चे रह गए हैं, जिन्हें आपके कहे अनुसार स्कूल का सामान यथा स्थान पहुंचाने के लिए मैंने रोक लिया था। अब वे भी जा ही रहे हैं। 
    ‘ठीक है।’ श्रीमती विरूलकर तनिक नर्म लहजे में बोलीं-‘और हां...वो गांधी जी की तस्वीर। उसे उठा लिए वहां से।’ 
    ‘जी मैम।’ मेवालाल बोला-‘उसे मैंने वहीं टांग दिया है, जहां से उसे निकाला था।’ कहकर वह कक्ष से बाहर निकल गया।

सच्ची श्रद्धांजलि (व्यंग्य)

व्यंग्य

सईद खान, सच्ची श्रद्धांजलि, व्यंग्य, कहानी, लेख, बख्तावर अदब, नई तहरीक, रीड मी

✒ सईद खान  

सच्ची श्रद्धांजलि (व्यंग्य) 

 
    मंत्री जी के पार्टी कार्यालय पहुंचने तक कार्यक्रम की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी थी। अभिनंदन, स्वागत और आशिर्वाद की औपचारिकता के साथ ही मुख्य कार्यक्रम शुरू हुआ। मंत्री जी ने राष्टÑपिता महात्मा गांधी के तैलचित्र पर माल्यार्पण किया। वहां मौजूद पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों में से कुछ और ने भी यही किया। शेष ने बापू के चित्र पर पुष्प वर्षा की। फिर सबने पूरी श्रद्धा के साथ हाथ जोड़कर बापू को नमन किया। उसके बाद मंत्री जी माइक के सामने जा खड़े हुए और बाकी ने सामने लगी कुर्सियों पर आसन जमा लिया। यह सब यंत्रचलित सा हुआ। सरकारी स्कूल के बच्चों द्वारा 15 अगस्त और 26 जनवरी की परेड के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने जैसा। सधा हुआ। यहां तक कि दीनानाथ चौरसिया का दूसरों की नजÞर बचाकर जर्दे वाला पाउच अपने मुंह में उंडेलना और मुत्तु स्वामी का अपने मुंह में पड़े गुटखा के रसहीन अवशेष को हथेली में उगलकर उसे सामने बैठे सुकुल बाबू की कुर्सी के नीचे फेंकना भी सधा हुआ सा था। पूर्व अभ्यासित। जैसे वर्षों से वे इस क्रिया को दोहरा रहे हैं।
    उधर माइक पर एक-दो बार ऊंगली से ठक-ठक करने के बाद मंत्री जी ने कहना शुरू किया- ‘साथियों ! आज, राष्टÑपिता महात्मा गांधी की जयंती मनाई जा रही है...जैसा कि आप सभी जानते हैं कि राष्टÑपिता महात्मा गांधी यानि बापू ने देश की आजादी में अहम किरदार निभाया है...बापू अहिंसावादी थे...बापू ने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा...बापू ने कभी किसी पर क्रोध नहीं किया...बापू सत्यप्रिय थे...बापू ने कभी झूठ नहीं कहा...छोटे-बड़े सभी को बापू ने समान नजरों से देखा...बापू छुआछूत नहीं मानते थे...हम सब बापू के ऋणी हैं...। आओ! बापू की जयंती के इस अवसर पर हम उनके बताए मार्ग और उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लें...यही बापू के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।’ इसके साथ ही मंत्री जी ने अपनी वाणी को विराम दिया। सामने बैठी भीड़ ने ताली बजाई। उनके बाद विधायक, प्रदेश अध्यक्ष, ब्लाक अध्यक्ष और एक-दो पार्षदों ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया। सभी ने बापू के आदर्शों को आत्मसात करने की जरूरत पर जोर दिया। अगर उधम होटल का गर्मागर्म समोसा और भाप छोड़ती केतली देखकर संचालक महोदय ने आभार प्रदर्शन के लिए वरिष्ठ कार्यकर्ता मिर्जा कलीम बेग को आमंत्रित न किया होता तो कदाचित कुछ और कार्यकर्ता और पदाधिकारियों की बदौलत बापू की कुछ और अच्छाईयों पर से पर्दा उठ गया होता। 
    मंत्री जी यहां से गांधी चौक के लिए रवाना हो गए। गांधी चौक में आयोजित कार्यक्रम की तैयारी लगभग अंतिम चरण में थी कि तभी एक पंगा हो गया। बापू की प्रतिमा की सफाई के दौरान पता चला कि प्रतिमा से चश्मा गायब है। कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों में खलबली मचना स्वभाविक था। उसी बीच किसी ने लापरवाही से कहा-‘लेट इट बी यार, जब सालभर चश्मे की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया तो दो मिनट के कार्यक्रम के दौरान मंत्री जी भी चश्मे को नोटिस नहीं करेंगे।’
    ‘यार।’ किसी ने कहा-‘सालभर हम बापू की तरफ देखते ही कब हैं। लेकिन अभी बात अलग है। मंत्री जी पक्का नोटिस करेंगे।’ 
    ‘सवाल ये नहीं कि मंत्री जी नोटिस करेंगे या नहीं, सवाल है कि चश्मा गया कहां।’ भीड़ में से एक युवक आगे बढ़ा। दोनों हाथ कमर पर धरे बापू की प्रतिमा को गौर से देखते हुए वह बुदबुदाया-‘ये हिमाकत जिसने भी की है, यदि प्रशासन ने उसके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया तो हमें धरना-प्रदर्शन करना होगा। क्यों साथियों...।

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कहानी 


व्यंग्य


    
लेकिन इससे पहले कि कोई उसके समर्थन में सिर हिलाता या धरना-प्रदर्शन की कोई योजना बन पाती, मंत्री जी वहां पहुंच गए। बापू का चश्मा भूलकर लोगों ने मंत्री जी का स्वागत-सत्कार किया। मंत्री जी ने उन्हें आशिर्वाद दिया और बापू की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। कुछ और ने भी यही किया। शेष ने पुष्प वर्षा की। फिर सबने हाथ जोड़कर पूरी श्रद्धा के साथ बापू को नमन किया। उसके बाद मंत्री सहित कुछ कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने कार्यक्रम को संबोधित किया। बोले-‘जैसा कि आप सभी जानते हैं कि राष्टÑपिता महात्मा गांधी यानि बापू ने देश की आजादी में अहम किरदार निभाया था...बापू अहिंसावादी थे...बापू ने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा...बापू ने कभी किसी पर क्रोध नहीं किया...बापू सत्यप्रिय थे...बापू ने कभी झूठ नहीं कहा...छोटे-बड़े सभी को बापू ने समान नजरों से देखा...बापू छुआछूत नहीं मानते थे...हम सब बापू के ऋणी हैं...आओ! बापू की जयंती के इस अवसर पर हम उनके बताए मार्ग और उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लें...यही बापू के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी...।’ लोगों ने ताली बजाई और सांई होटल से मंगाई गई दही, कचौरी उदरस्थ की। उतनी देर में लाउडस्पीकर वाले छोकरों ने सधे हाथों से स्टैंड से साउंड बाक्स उतारकर तार आदि को समेट भी लिया था। 
    गांधी चौक के बाद मंत्री जी दो अन्य जगह भी बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए। वहां भी उन्होंने बापू का चरित्र वर्णन किया। उनके बताए मार्ग और आदर्शों पर चलने का संकल्प लेने की बात कही। आखिर में यह भी कहा-‘यही बापू के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।’ 
    इसके बाद वे क्रिस्टल पब्लिक स्कूल पहुंचे जहां हाई स्कूल के बालक-बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत नाटक  ‘अंधेर नगरी-चौपट राजा’ के मंचन के बाद उन्होंने कार्यक्रम को संबोधित किया।  बोले- ‘प्यारे बच्चों बापू ने ...............................।’ रटा रटाया भाषण देने के बाद अंत में उन्होंने यह भी कहा- ‘यही बापू के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।’  स्व-विवेक से यहां उन्होंने कुछ शब्दों का इजÞाफा किया। बोले- ‘बच्चो! तुम देश का भविष्य हो। बापू के बताए मार्ग और उनके आदर्श तुम्हारे लिए ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं।’ मंत्री जी का भाषण खत्म होते ही बच्चों, अभिभावकों और स्कूल स्टाफ ने ताली बजाई। मंत्री जी के लिए यहां स्वल्पाहार का बढ़िया इंतजाम था। लेकिन उन्होंने कुछ भी लेने से इंकार कर दिया। बोले-‘सुबह से यही चल रहा है, अब उबकाई आने लगी है।’ कहकर वे कार में जा बैठे।
    उनके जाने के बाद प्रिंसिपल कक्ष में प्रिंसिपल चारूलता विरूलकर अपने सामने बैठे मोहल्ला विकास समिति के अध्यक्ष सुब्रतो मुखर्जी और शिक्षक पालक समिति के अध्यक्ष हरभजन सिंह से बोलीं-‘उम्मीद नहीं थी कि मंत्री जी इतनी कंजूसी से काम लेंगे। भला बताओ, पांच लाख में दो कक्ष निर्माण और बोरिंग कैसे हो पाएगी।’
    ‘मुझे लगता है...।’ शिक्षक पालक समिति के अध्यक्ष हरभजन सिंह ने कहा-‘कोषाध्यक्ष महोदय अपनी बात दमदारी से नहीं रख पाए। दो कक्ष की कमी और बोरिंग न होने से उन्हें स्टूडेंट्Þस को होने वाली परेशानियों को प्रमुखता से रखना था।’
    ‘अब छोड़ो भी।’ मोहल्ला विकास समिति के अध्यक्ष सुब्रतो मुखर्जी बोले-‘मंत्री जी जितनी राशि की घोषणा कर गए हैं, उसे ही गनीमत जानो। महापौर चुनाव में उनकी पार्टी के प्रत्याशी को हमारे वार्ड से बहुत ही कम वोट पड़े थे, मुझे लगता है, मंत्री जी ने इसी बात की खीज निकाली हो।’
    अचानक प्रिंसिपल चारूलता विरुलकर ने मेज पर रखी घंटी पर जोर से हाथ मारा। साथ ही चिल्लाई-‘मेवालाल।’ जवाब में मेवालाल साक्षात उनके सामने आ खड़ा हुआ। 15 लाख की मांग के विरुद्ध मात्र 5 लाख की घोषणा किए जाने से चिढ़ी बैठीं श्रीमती विरूलकर को क्लास रूम से आ रहे शोरगुल ने और चिढ़ा दिया था। वे तनिक गुस्से में मेवालाल से बोलीं-‘बच्चों से कहो, कार्यक्रम खत्म हो गया है। अपने-अपने घर जाएं। और वो टेंट वालों ने अपना सामान समेटा या नहीं।’
    जाने को उद्यत मेवालाल ने रुककर बताया कि टेंट वालों ने लगभग सारा सामान समेट लिया है। काफी बच्चे जा चुके हैं। कुछ ही बच्चे रह गए हैं, जिन्हें आपके कहे अनुसार स्कूल का सामान यथा स्थान पहुंचाने के लिए मैंने रोक लिया था। अब वे भी जा ही रहे हैं। 
    ‘ठीक है।’ श्रीमती विरूलकर तनिक नर्म लहजे में बोलीं-‘और हां...वो गांधी जी की तस्वीर। उसे उठा लिए वहां से।’ 
    ‘जी मैम।’ मेवालाल बोला-‘उसे मैंने वहीं टांग दिया है, जहां से उसे निकाला था।’ कहकर वह कक्ष से बाहर निकल गया।

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व्यंग्य

बटुक जी का संस्कृति बोध


✅ सईद खान

बटुक जी का संस्कृति बोध 

बटुक जी का संस्कृति बोध

व्यंग्य

बटुक जी का संस्कृति बोध


✅ सईद खान

बटुक जी का संस्कृति बोध 

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Saturday, 22 February 2025

व्यंग्य 

dog, satire, story, litrature, sayeed khan, bakhtawar adab, nai tahreek, read me

✒ सईद खान 

कुत्ता तंत्र

    मेरा स्वागत अनापेक्षित गर्मजोशी से हुआ। हालांकि हम मेट्कि तक साथ-साथ ही थे। कालेज में भी हमने एक साथ ही दाखिला लिया था और संभव था कि आगे कुछ और वर्षों तक भी हमारी पढ़ाई साथ-साथ ही जारी रहती, यदि एक भूतपूर्व छात्र नेता से इसका झगड़ा न हुआ होता। उस झगड़े के बाद से ही हमारे बीच दूरियां बढ़ती गई। यहां तक कि हमारे रास्ते भी अलग-अलग हो गए। वह क्रमश: वाया गुंडागर्दी राजनीति की ओर अग्रसर हो गया और मैं उसी रफ्तार से अपनी पढ़ाई में जुट गया।
    इसलिए आज मैं एमबीए हूं। अन्य सुख-सुविधाओं रहित मात्र दस हजार रुपए मासिक वेतनभोगी। और यह केंद्र में एक प्रभावशाली मंत्री है। भव्य बंगले, सेवा टहल के लिए नौकरों की पूरी एक गारद और आवागमन के लिए विलायती कारों का सुविधाभोगी।

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घर (कहानी)

    मैंने एक लंबी सांस लेकर कार्नर टेबल पर पड़े अखबार को चैथी मर्तबा उठाया और उसे यूं ही उलट-पुलट कर देखने लगा। अखबार की पढ़ी जा सकने योग्य तमाम खबरों को दो-दो बार और एक बार भी न पढ़ी जा सकने योग्य खबरों को एक-एक बार पढ़ चुकने के बाद, पूरे अखबार को सरसरी तौर पर देखने के चौथे चरण पर था कि तभी स्वल्पाहार से भरी एक बड़ी सी ट्े थामें एक सेवक वहां नमुदार हुआ। हाथ में थमी स्वल्पाहार की ट्े को उसने सेंटर टेबल पर रखा और मंत्री महोदय के ट्वायलेट में होने की परंपरागत सूचना देकर उल्टे पांव लौट गया।

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क्या रे जिंदगी (कहानी)

    मैंने एक अचटती सी नजर ट्े पर डाली और पुन: अखबार के पन्नों में खो गया। देश-विदेश पृष्ठ पर ब्रिटनी स्पीयर और मेडोना आदि की मादक तस्वीर छापने का औचित्य मैं आज ही समझ पाया। इसके साथ ही मेरा मन पृष्ठ प्रभारी की सजगता और ब्रिटनी, मैडोना की सोशल सर्विस के प्रति श्रद्धा से भर गया। इसके अभाव में मंत्री महोदय के ट्वायलेट की संड़ांध और सामने रखी ट्े की स्वादिष्ट महक से बचना कितना कष्टकारी होता।

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बुद्धिजीवी (कहानी)

    स्वल्पाहार परोसे जाने के पूरे पंद्रह मिनट बाद मंत्री महोदय वहां अवतरित हुए। उन्हें साक्षात देखकर मेरी काया उनके स्वागत में यंत्र चलित सी खड़ी हो गई। हालांकि काया के अंदर का ‘एमबीए’ सख्त प्रतिरोध कर रहा था।  लेकिन काया बाहरी व्यवस्था के प्रभाव में थी। सो तन कर सीधी खड़ी हो गई। अंदर के ‘एमबीए’ होने का दंभ उसी समय भरभरा कर ढेर हो गया था, जब वाचमेन ने मुझे हिकारतभरी नजर से देखा था।

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   वे मेरे सामने एक सोफे पर पसर गए और मुझे बैठने का इशारा करते हुए बोले -‘सब कुशल मंगल तो हैं।’
    मैंने कहा-‘हां। सब कुशल मंगल है।’
    ‘भाभी, बच्चे वगैरह?’ उसने मेरे परिवार की सुध ली। मैं अभिभूत हो गया। 
    मैं बोला -‘हां, सब ठीक हैं। बस- एक मुश्किल आ खड़ी हुई है।’
    ‘अरे! कैसी मुश्किल?’
    ‘अभी जिस मकान में मैं किराए से रह रहा हूं।’ मैं थोड़े संकोच के साथ बोला -‘उस मकान को बलराम सिंह ने खरीद लिया है।’
    ‘बल्लू ने...?’
    ‘बल्लू...?’
    ‘हां वही, बलराम सिंह। बहुत खुराफाती है साला। पैसे की बहुत गर्मी है साले को।’
    ‘उसने मकान खाली करने के लिए एक महीने की मोहलत दी थी। मुझे कोई ढंग का मकान मिला नहीं इसलिए मैं मकान खाली नहीं कर पाया।’
    ‘तो?’ 
    ‘दो दिन पहले इलाके का थानेदार आया था। यह कहने कि दो दिन में अगर मकान खाली नहीं हुआ तो सामान फेंकवा देगा।’
    ‘अरे।’ उसके मुंह से सम्वेदनात्मक आवाज निकली।
    ‘आज कुछ गुंडे आए थे।’ मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई -‘घर में घुसकर पत्नी और बच्चों के साथ बड़ी अभद्रता से पेश आए।’
    ‘मैं बात करता हूं उससे।’ अखबार का एक कोना फाड़कर उसकी सुरसरी बनाते हुए वह बोला -‘तुम ऐसा करो, जितनी जल्दी हो सके अपने लिए कोई दूसरा मकान ढूंढ लो। एकाध हफ्ते की मोहलत मैं उससे ले लूंगा।’ एक समोसा उठाकर उसे उदरस्थ करते हुए वह आगे बोला -‘तुमने तो कुछ लिया ही नहीं। ये तले हुए काजू तो लो, सेहत के लिए बहुत मुफीद हैं ये।’
    मैंने एक काजू उठाकर उसे हाथ में ले लिया और उंगलियों के बीच उसे यूं ही गोल-गोल करते हुए बोला -‘मैं चाहता हूं कि मुझे एक महीने की मोहलत मिल जाए। अगले महीने बच्चों की परीक्षा है। अभी मकान शिफ्ट करुंगा तो बच्चों को पढ़ाई में दिक्कत होगी।’
    ‘एक महीना...?’ वह लंबी डकार लेकर बोला -‘मुश्किल है। साला नहीं मानेगा।’
    ‘तुम्हारे बात करने से भी...?’
    ‘मैं बात करुंगा उससे। लेकिन मुश्किल है।’
    ‘बस, एक महीने की ही मोहलत दिलवा दो। परीक्षा होते ही...।’
    तभी उसके कुर्ते की जेब में रखा मोबाइल घनघनाने लगा। उसने जेब से मोबाइल निकालकर उसे कान से लगाया और बोला-‘हैलो। हां, मैं बोल रहा हूं।’
    थोड़ी देर बाद मोबाइल जेब के हवाले करते हुए वह मुझसे बोला -‘सीएम साहब का बुलावा है। मुझे जाना होगा। लेकिन तुम चिंता मत करो। बल्लू से मैं बात कर लूंगा। परीक्षा का क्या है। परीक्षा तो कहीं भी रहकर दी जा सकती है। फिर भी मैं बात करुंगा उससे।’
    वह उठ खड़ा हुआ। मैं भी खड़ा हो गया। वह अंदर वाले कमरे की ओर बढ़ गया। मैं बाहर निकल आया। काजू अब भी मेरे हाथ में था। मैं उसे मुट्ठी मेंं भींचे आगे बढ़ गया।
    आज मैं पैदल ही घर से चला था। स्कूटर की हेड लाइट पिछले कुछ दिनों से परेशान कर रही थी। दिन को मिस्त्री के पास जाने का न वक्त रहता है न याद आती है। इसलिए आज आफिस से लौटते हुए मैंने स्कूटर को मिस्त्री के पास छोड़ दिया था और मंत्री निवास के निकट रहने का लाभ उठाते हुए मैं पैदल ही घर से चल पड़ा था।
    मंत्री निवास से निकल कर मैं अपने घर की ओर अग्रसर हो गया। मन खिन्नता से भरा हुआ था। मंै इस मंत्री के पास जो आस लेकर आया था, वह टूट चुकी थी। यह मंत्री बाद में था, पहले मेरा दोस्त था इसलिए मुझे पूरी उम्मीद थी कि यह मेरा काम करवा देगा। इसका एक फोन कर देना ही काफी होता। लेकिन पता नहीं क्यों, इसने मुझमें कोई दिलचस्पी नहीं ली।
    मैं जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए घर की ओर जाने वाली गली में प्रविष्ठ हो गया। गली में सन्नाटा पसरा पड़ा था। मैं लंबे-लंबे डग भरता आगे बढ़ रहा था कि सहसा मेरी आहट से शेरु के कान खड़े हो गए। उसने भौंक कर गली में अपनी मौजूदगी का इशारा किया। मंैने भी गला खंखार कर उसे उसके भौंकने का जवाब दिया। यह बताने के लिए कि यह मैं हूं। इस मोहल्ले के पुराने बाशिंदों में से एक। लेकिन मेरे गला खंखारने का उसकी सेहत पर कोई असर नहीं हुआ। वह गुर्राने लगा। मैंने सोचा, शायद प्यार जता रहा है। गली का कुत्ता है। अपना शेरू है। लेकिन मेरी सोच गलत साबित हुई। उसकी गुर्राहट बदस्तूर बढ़ती गई। यहां तक कि जोर-जोर से भौंकते हुए वह मेरे पीछे ही हो लिया। थोड़ा आगे, एक स्थान पर जहां जरा रौशनी थी, मैं रुक गया। सोचा, शायद मेरी सूरत देखकर यह भौंकना बंद कर देगा। लेकिन मेरी सूरत देखकर भी उसने भौंकना बंद नहीं किया। अलबत्ता अब वह ऐसे-ऐसे पैंतरे दिखाने लगा था, जैसे मौका मिलते ही वह मुझे काट खाएगा। मैं बौखला गया। सोचने लगा, कल तक जो मेरी झूठन खाता था, आज मुझे ही आंखे दिखा रहा है। आखिर इसे हो क्या गया है?
    एक बारगी मेरे दिमाग में इस ख्याल ने भी करवट ली कि कहीं मेरे पसीने की बू तो चेंज नहीं हो गई है। कुत्तों के आगे (बद) बू का खास महत्व होता है। बू से ही वे निर्णय लेते हैं। कुछेक मामलों में मानव द्वारा लिए गए निर्णय भी कुत्तों द्वारा ग्रहित बू पर आधारित हुआ करते हैं। लेहाजा कुत्तों की घ्राण शक्ति से इंकार नहीं किया जा सकता। अलबत्ता यह माना जा सकता है कि पसीने की बू ही चेंज हो जाए।
    वे दिन लद गए, जब पसीना गुलाब हुआ करता था। पहले एक सी गिजा हुआ करती थी। एक जैसे लोग थे। साफ-सुथरी हवा थी और भ्रष्टाचार रहित वातावरण होता था। अब किसिम-किसिम की गिजा है। रंग-बिरंगे लोग हैं। प्रदूषण से लबरेज हवा है और भ्रष्ट वातावरण है। आज आदमी की आदमियत ही कहीं खो गई है, पसीने की कौन कहे। और शक्ल तो वैसे भी चेंजेबल है यार। आदमी ही आदमी को धोखा दे रहा है।
    शेरु के बदस्तूर भौंकनाद से दूसरी-तीसरी गली के कुत्ते भी अपनी-अपनी जगह से उसके सुर में सुर मिलाने लगे थे। पूरी गली भौंकनाद से गूंज रही थी। इधर शेरु भौंकता ‘भौं-भौं।’ उधर से कोई दूसरा कुत्ता उसके जवाब में तुकबंदी करता सा भौंकता ‘भौं-भौ-भउ-उ-उ..।’
    मुझे लगा, एकता की ऐसी मिसाल कहीं और देखने को शायद ही मिले। किसी पार्टी.... सारी... किसी गली का एक कुत्ता भौंकना शुरू किया नहीं कि दूसरी, तीसरी गली के बाकी कुत्ते भी भौंकने लग पड़ते हैं। बगैर यह देखे की क्यों और किस पर भौंका जा रहा है। चाहे उनका आपस में कोई वैचारिक मतभेद ही क्यों न हो, लेकिन जब बात पूरी बिरादरी पर आ जाती है तो इनकी एकता देखते ही बनती है। 
    अनुभव बताता है कि ऐसे में प्रतिकार की बजाए उनके आगे हथियार डाल देना चाहिए। 
    यही मैंने भी किया।


कुत्ता तंत्र

व्यंग्य 

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✒ सईद खान 

कुत्ता तंत्र

    मेरा स्वागत अनापेक्षित गर्मजोशी से हुआ। हालांकि हम मेट्कि तक साथ-साथ ही थे। कालेज में भी हमने एक साथ ही दाखिला लिया था और संभव था कि आगे कुछ और वर्षों तक भी हमारी पढ़ाई साथ-साथ ही जारी रहती, यदि एक भूतपूर्व छात्र नेता से इसका झगड़ा न हुआ होता। उस झगड़े के बाद से ही हमारे बीच दूरियां बढ़ती गई। यहां तक कि हमारे रास्ते भी अलग-अलग हो गए। वह क्रमश: वाया गुंडागर्दी राजनीति की ओर अग्रसर हो गया और मैं उसी रफ्तार से अपनी पढ़ाई में जुट गया।
    इसलिए आज मैं एमबीए हूं। अन्य सुख-सुविधाओं रहित मात्र दस हजार रुपए मासिक वेतनभोगी। और यह केंद्र में एक प्रभावशाली मंत्री है। भव्य बंगले, सेवा टहल के लिए नौकरों की पूरी एक गारद और आवागमन के लिए विलायती कारों का सुविधाभोगी।

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घर (कहानी)

    मैंने एक लंबी सांस लेकर कार्नर टेबल पर पड़े अखबार को चैथी मर्तबा उठाया और उसे यूं ही उलट-पुलट कर देखने लगा। अखबार की पढ़ी जा सकने योग्य तमाम खबरों को दो-दो बार और एक बार भी न पढ़ी जा सकने योग्य खबरों को एक-एक बार पढ़ चुकने के बाद, पूरे अखबार को सरसरी तौर पर देखने के चौथे चरण पर था कि तभी स्वल्पाहार से भरी एक बड़ी सी ट्े थामें एक सेवक वहां नमुदार हुआ। हाथ में थमी स्वल्पाहार की ट्े को उसने सेंटर टेबल पर रखा और मंत्री महोदय के ट्वायलेट में होने की परंपरागत सूचना देकर उल्टे पांव लौट गया।

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क्या रे जिंदगी (कहानी)

    मैंने एक अचटती सी नजर ट्े पर डाली और पुन: अखबार के पन्नों में खो गया। देश-विदेश पृष्ठ पर ब्रिटनी स्पीयर और मेडोना आदि की मादक तस्वीर छापने का औचित्य मैं आज ही समझ पाया। इसके साथ ही मेरा मन पृष्ठ प्रभारी की सजगता और ब्रिटनी, मैडोना की सोशल सर्विस के प्रति श्रद्धा से भर गया। इसके अभाव में मंत्री महोदय के ट्वायलेट की संड़ांध और सामने रखी ट्े की स्वादिष्ट महक से बचना कितना कष्टकारी होता।

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बुद्धिजीवी (कहानी)

    स्वल्पाहार परोसे जाने के पूरे पंद्रह मिनट बाद मंत्री महोदय वहां अवतरित हुए। उन्हें साक्षात देखकर मेरी काया उनके स्वागत में यंत्र चलित सी खड़ी हो गई। हालांकि काया के अंदर का ‘एमबीए’ सख्त प्रतिरोध कर रहा था।  लेकिन काया बाहरी व्यवस्था के प्रभाव में थी। सो तन कर सीधी खड़ी हो गई। अंदर के ‘एमबीए’ होने का दंभ उसी समय भरभरा कर ढेर हो गया था, जब वाचमेन ने मुझे हिकारतभरी नजर से देखा था।

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   वे मेरे सामने एक सोफे पर पसर गए और मुझे बैठने का इशारा करते हुए बोले -‘सब कुशल मंगल तो हैं।’
    मैंने कहा-‘हां। सब कुशल मंगल है।’
    ‘भाभी, बच्चे वगैरह?’ उसने मेरे परिवार की सुध ली। मैं अभिभूत हो गया। 
    मैं बोला -‘हां, सब ठीक हैं। बस- एक मुश्किल आ खड़ी हुई है।’
    ‘अरे! कैसी मुश्किल?’
    ‘अभी जिस मकान में मैं किराए से रह रहा हूं।’ मैं थोड़े संकोच के साथ बोला -‘उस मकान को बलराम सिंह ने खरीद लिया है।’
    ‘बल्लू ने...?’
    ‘बल्लू...?’
    ‘हां वही, बलराम सिंह। बहुत खुराफाती है साला। पैसे की बहुत गर्मी है साले को।’
    ‘उसने मकान खाली करने के लिए एक महीने की मोहलत दी थी। मुझे कोई ढंग का मकान मिला नहीं इसलिए मैं मकान खाली नहीं कर पाया।’
    ‘तो?’ 
    ‘दो दिन पहले इलाके का थानेदार आया था। यह कहने कि दो दिन में अगर मकान खाली नहीं हुआ तो सामान फेंकवा देगा।’
    ‘अरे।’ उसके मुंह से सम्वेदनात्मक आवाज निकली।
    ‘आज कुछ गुंडे आए थे।’ मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई -‘घर में घुसकर पत्नी और बच्चों के साथ बड़ी अभद्रता से पेश आए।’
    ‘मैं बात करता हूं उससे।’ अखबार का एक कोना फाड़कर उसकी सुरसरी बनाते हुए वह बोला -‘तुम ऐसा करो, जितनी जल्दी हो सके अपने लिए कोई दूसरा मकान ढूंढ लो। एकाध हफ्ते की मोहलत मैं उससे ले लूंगा।’ एक समोसा उठाकर उसे उदरस्थ करते हुए वह आगे बोला -‘तुमने तो कुछ लिया ही नहीं। ये तले हुए काजू तो लो, सेहत के लिए बहुत मुफीद हैं ये।’
    मैंने एक काजू उठाकर उसे हाथ में ले लिया और उंगलियों के बीच उसे यूं ही गोल-गोल करते हुए बोला -‘मैं चाहता हूं कि मुझे एक महीने की मोहलत मिल जाए। अगले महीने बच्चों की परीक्षा है। अभी मकान शिफ्ट करुंगा तो बच्चों को पढ़ाई में दिक्कत होगी।’
    ‘एक महीना...?’ वह लंबी डकार लेकर बोला -‘मुश्किल है। साला नहीं मानेगा।’
    ‘तुम्हारे बात करने से भी...?’
    ‘मैं बात करुंगा उससे। लेकिन मुश्किल है।’
    ‘बस, एक महीने की ही मोहलत दिलवा दो। परीक्षा होते ही...।’
    तभी उसके कुर्ते की जेब में रखा मोबाइल घनघनाने लगा। उसने जेब से मोबाइल निकालकर उसे कान से लगाया और बोला-‘हैलो। हां, मैं बोल रहा हूं।’
    थोड़ी देर बाद मोबाइल जेब के हवाले करते हुए वह मुझसे बोला -‘सीएम साहब का बुलावा है। मुझे जाना होगा। लेकिन तुम चिंता मत करो। बल्लू से मैं बात कर लूंगा। परीक्षा का क्या है। परीक्षा तो कहीं भी रहकर दी जा सकती है। फिर भी मैं बात करुंगा उससे।’
    वह उठ खड़ा हुआ। मैं भी खड़ा हो गया। वह अंदर वाले कमरे की ओर बढ़ गया। मैं बाहर निकल आया। काजू अब भी मेरे हाथ में था। मैं उसे मुट्ठी मेंं भींचे आगे बढ़ गया।
    आज मैं पैदल ही घर से चला था। स्कूटर की हेड लाइट पिछले कुछ दिनों से परेशान कर रही थी। दिन को मिस्त्री के पास जाने का न वक्त रहता है न याद आती है। इसलिए आज आफिस से लौटते हुए मैंने स्कूटर को मिस्त्री के पास छोड़ दिया था और मंत्री निवास के निकट रहने का लाभ उठाते हुए मैं पैदल ही घर से चल पड़ा था।
    मंत्री निवास से निकल कर मैं अपने घर की ओर अग्रसर हो गया। मन खिन्नता से भरा हुआ था। मंै इस मंत्री के पास जो आस लेकर आया था, वह टूट चुकी थी। यह मंत्री बाद में था, पहले मेरा दोस्त था इसलिए मुझे पूरी उम्मीद थी कि यह मेरा काम करवा देगा। इसका एक फोन कर देना ही काफी होता। लेकिन पता नहीं क्यों, इसने मुझमें कोई दिलचस्पी नहीं ली।
    मैं जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए घर की ओर जाने वाली गली में प्रविष्ठ हो गया। गली में सन्नाटा पसरा पड़ा था। मैं लंबे-लंबे डग भरता आगे बढ़ रहा था कि सहसा मेरी आहट से शेरु के कान खड़े हो गए। उसने भौंक कर गली में अपनी मौजूदगी का इशारा किया। मंैने भी गला खंखार कर उसे उसके भौंकने का जवाब दिया। यह बताने के लिए कि यह मैं हूं। इस मोहल्ले के पुराने बाशिंदों में से एक। लेकिन मेरे गला खंखारने का उसकी सेहत पर कोई असर नहीं हुआ। वह गुर्राने लगा। मैंने सोचा, शायद प्यार जता रहा है। गली का कुत्ता है। अपना शेरू है। लेकिन मेरी सोच गलत साबित हुई। उसकी गुर्राहट बदस्तूर बढ़ती गई। यहां तक कि जोर-जोर से भौंकते हुए वह मेरे पीछे ही हो लिया। थोड़ा आगे, एक स्थान पर जहां जरा रौशनी थी, मैं रुक गया। सोचा, शायद मेरी सूरत देखकर यह भौंकना बंद कर देगा। लेकिन मेरी सूरत देखकर भी उसने भौंकना बंद नहीं किया। अलबत्ता अब वह ऐसे-ऐसे पैंतरे दिखाने लगा था, जैसे मौका मिलते ही वह मुझे काट खाएगा। मैं बौखला गया। सोचने लगा, कल तक जो मेरी झूठन खाता था, आज मुझे ही आंखे दिखा रहा है। आखिर इसे हो क्या गया है?
    एक बारगी मेरे दिमाग में इस ख्याल ने भी करवट ली कि कहीं मेरे पसीने की बू तो चेंज नहीं हो गई है। कुत्तों के आगे (बद) बू का खास महत्व होता है। बू से ही वे निर्णय लेते हैं। कुछेक मामलों में मानव द्वारा लिए गए निर्णय भी कुत्तों द्वारा ग्रहित बू पर आधारित हुआ करते हैं। लेहाजा कुत्तों की घ्राण शक्ति से इंकार नहीं किया जा सकता। अलबत्ता यह माना जा सकता है कि पसीने की बू ही चेंज हो जाए।
    वे दिन लद गए, जब पसीना गुलाब हुआ करता था। पहले एक सी गिजा हुआ करती थी। एक जैसे लोग थे। साफ-सुथरी हवा थी और भ्रष्टाचार रहित वातावरण होता था। अब किसिम-किसिम की गिजा है। रंग-बिरंगे लोग हैं। प्रदूषण से लबरेज हवा है और भ्रष्ट वातावरण है। आज आदमी की आदमियत ही कहीं खो गई है, पसीने की कौन कहे। और शक्ल तो वैसे भी चेंजेबल है यार। आदमी ही आदमी को धोखा दे रहा है।
    शेरु के बदस्तूर भौंकनाद से दूसरी-तीसरी गली के कुत्ते भी अपनी-अपनी जगह से उसके सुर में सुर मिलाने लगे थे। पूरी गली भौंकनाद से गूंज रही थी। इधर शेरु भौंकता ‘भौं-भौं।’ उधर से कोई दूसरा कुत्ता उसके जवाब में तुकबंदी करता सा भौंकता ‘भौं-भौ-भउ-उ-उ..।’
    मुझे लगा, एकता की ऐसी मिसाल कहीं और देखने को शायद ही मिले। किसी पार्टी.... सारी... किसी गली का एक कुत्ता भौंकना शुरू किया नहीं कि दूसरी, तीसरी गली के बाकी कुत्ते भी भौंकने लग पड़ते हैं। बगैर यह देखे की क्यों और किस पर भौंका जा रहा है। चाहे उनका आपस में कोई वैचारिक मतभेद ही क्यों न हो, लेकिन जब बात पूरी बिरादरी पर आ जाती है तो इनकी एकता देखते ही बनती है। 
    अनुभव बताता है कि ऐसे में प्रतिकार की बजाए उनके आगे हथियार डाल देना चाहिए। 
    यही मैंने भी किया।


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व्यंग्य

आओ इसका पता लगाएं  (व्यंग्य)

सईद खान 

आओ इसका पता लगाएं

    बच्चों! पिछले अध्याय में तुम समाज का विस्तृत अध्ययन कर चुके हो। और यह जान चुके हो कि भिन्न-भिन्न प्राणियों के समूह को समाज कहते हैं। इस अध्याय में हम समाज के कुछ विशेष प्राणियों के स्वभाव और रूचि के विषय में आगे पढ़ेंगे जिससे किसी अवसर पर यदि तुम्हें उनसे डील करनी पड़े तो असुविधा न हो।


खुद अनुभव करके दखो (1)

    चुनाव के पश्चात नवनिर्वाचित सांसद के बंगले में जाओ। कल्पना करो कि चुनाव से पूर्व तुमने इस सांसद को जिताने के लिए थोड़ी मेहतन भी की थी और चुनाव प्रचार के दौरान तुमने उसके साथ अपने वार्ड में जनसंपर्क भी किया था। अनेक अवसर पर बड़ी आत्मीयता से उसने तुम्हारे कंधे पर हाथ भी धरा था और किसी अवसर पर उसने तुम्हारे होने वाले पुत्र को नौकरी दिलाने का आश्वासन भी दिया था। सो इसी संबंध में चर्चा के लिए तुम वहां पहुंचे हो।
    बंगले में बहुत भीड़ है। तुम्हारी तरह अन्य बेवकूफ भी वहां जमा है। सांसद अंदर डइंगरूम में अपने विशेष प्यादों से घिरा जलपान कर रहा है। तुम जैसे-तैसे डइंगरूम के दरवाजे तक पहुंचने में सफल हो जाते हो। तुम्हें यह गुमान रहता है कि सांसद तुम्हें देखते ही अंदर बुलवा लेगा। लेकिन वह तुम्हें देखते ही यों नजरें फेर लेता है, जैसे तुम्हें पहचानता ही नहीं। उसके नयनों की भाषा समझते ही तुम्हें अपनी औकात समझ लेनी चाहिए। इसके बावजूद भी यदि तुम चुनाव से पूर्व की उसके द्वारा बरती गई घनिष्टता के मायाजाल में फंसे रहे तो अपना अपमान निश्चित समझो और ‘और रमेश। कैसे हो?  क्या हाल है?  घर में सब कुशल मंगल तो है न?  कोई कष्ट तो नहीं है...?’ जैसी मृदुवाणी की जगह अब (सांसद बनते ही) ‘तुम लोग यार, आदमी हो या जानवर?  कोई बात समझते ही नहीं। जब देखो, मुंह उठाए चले आते हो...।’  जैसा कटुवचन सुनना पड़ सकता है। सो यह जान लो।


तुम्हारी आस क्यों टूटती है?

आओ इसका पता लगाएं

    चुनाव का उम्मीदवार विशेष दर्जे का सामाजिक प्राणी होता है। चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होने वाला व्यक्ति ही चुनाव लड़ सकता है। इसलिए उसके स्वभाव में कटुता संभावित होती है। और, ‘करेला नीम चढ़ा’ की तर्ज पर विजयी होते ही स्वभाव से वह और कटु हो जाता है। किंतु चुनाव संपन्न होने तक वह सहृदय होने का सफल नाटक करता है। जैसा नाटक उसके बाप-दादा करते आ रहे हैं। जिससे तुम धोका खा जाते हो। जैसा धोखा तुम्हारे बाप-दादा खाते आ रहे हैं।


खुद अनुभव करके देखो (2)

    किसी दिन अपने क्षेत्र के थाने में जाओ। कल्पना करो कि थाने में तुम्हें अपने साथ हुई चोरी की रपट दर्ज करवानी है। यह कल्पना तुम थाने पहुचंने से पहले ही कर लेना। यदि थाने में प्रविष्ठ होकर भी तुम कल्पना लोक में विचरते रहे, तो तुम्हारी यह क्रिया थानेदार को रूष्ट कर सकती है। वैसे भी, थाने में प्रविष्ठ होते ही वहां के वातावरण से तुम्हारी घिग्घी पहले ही बंध जाएगी। और थोड़ी-थोड़ी देर में थानेदार द्वारा हवालात की ओर मुंह करके ‘क्यों रे मादर...।’  जैसा कुछ अप्रिय वाक्य सुनकर और उसे अपनी ओर प्रश्नवाचक नजरों से घूरता पाकर तुम्हारा रहा-सहा हौसला भी पस्त हो जाएगा। ध्यान रहे कि उच्च शिक्षित, सभ्य और सु-संस्कारित होने के अपने दंभ को थाने में रहने की अवधि तक तजे रहना और थानेदार से ाआइये बैठिए’ और ‘मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं जनाब ?’ जैसी सहृदयता की आस कदापि न करना। साथ ही यह देखकर खुद को अपमानित भी महसूस मत करना कि तुम्हारे मुहल्ले का सटोरिया, जिसे तुम अब तक लुच्चा और लफंगा समझते आए हो, वह कितनी शान से थानेदार के सामने बैठा जुगाली कर रहा है और थानेदार तुमसे बैठने के लिए भी नहीं कह रहा है।
    रपट दर्ज हो जाने के बाद हवलदार यदि चाय-पानी का तकादा करे, तो उसे यह दलील मत देना कि घर में हुई चोरी से तुम पहले ही बर्बाद हो चुके हो। इसलिए हवलदार को देने के लिए तुम्हारे पास कुछ नहीं है। यह दलील बेतुकी होगी। भला तुम्हारे घर में हुई चोरी में हवलदार का क्या दोष कि तुम उसे सूखा ही सूखा निपटाने चले आए? सो बगैर चूं-चां किए सौ-दो-सौ रुपए रोजनामचे के बीच दबा देना। यह ध्यान रखना कि जब भी थाने जाना हो, जेब में कुछ रेजगारी अवश्य रख लेना। यह नियम है। चाहे तुम अपने साथ हुई मारपीट की रपट दर्ज करवाने लहू-लुहान अवस्था में ही थाने क्यों न जा रहे हो।


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कहानी


ऐसा क्यों होता है?

आओ इसका पता लगाएं

    मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिक क्रिया-कलाप सुचारू रूप से सम्पन्न होता रहे, इस हेतु कुछ विधान बनाए गए हैं। पुलिसिया कार्यप्रणाली इसी विधान का एक आवश्यक अंग है। लेकिन अनुभव और अध्ययन से ज्ञात होता है कि ज्यों ही कोई सामाजिक प्राणी इस अंग से जुड़ता है, वह स्वयं असामाजिक हो जाता है। और समाज के शेष सभी प्राणियों को वह एक ही डंडे से हांकता है। यह डंडा भी दरअसल उसे विधान से प्राप्त होता है। साथ ही इस अंग को संगठित एवं सुचारू रूप से संपादित करने के लिए जो वर्दी उसे प्रदान की जाती है, उसे धारण करते ही यह अंग निर्दयी और कुछ-कुछ पशुतुल्य हो जाता है। बात-बात पर उसके मुंह से कांटे झरते हैं। वह, यह मानकर चलता है कि वह क्षेत्र विशेष का वदीर्धारी गुंडा है। इसलिए उसके व्यवहार से गुंडाई क्षार स्वमेव झड़ते रहते हैं। फलस्वरूप वह सभ्य लोगों से भी वैसे ही पेश आता है, जैसा गुंडो से।
    सटोरिए का उसके सामने बैठकर बड़ी शान से जुगाली करना, जिसे देखकर तुम खुद को अपमानित महसूस कर रहे थे, व्यवहारिक दृष्टिकोण से ‘म्यूचुअल अंडर स्टैंडिंग’ के तहत संभव है।
    तो ध्यान रहे। जब भी थाने जाना हो, अपमान सहने की पूर्व तैयारी कर लेना और जेब में रेजगारी धरना मत भूलना। यह अघोषित विधान है और दुनिया का कोई अर्थ शास्त्र, समाज शास्त्र, विज्ञान, भूगोल, इतिहास और गणित का कोई सूत्र इस विधान पर लागू नहीं होता।


अभ्यास के लिए प्रश्न

निम्न प्रश्नों के उत्तर लिखो

    (1) चुनाव लड़ रहे व्यक्ति के स्वभाव में विजयी होने के बाद आने वाले ऐतिहासिक परिवर्तन का कारण स्पष्ट करो।
    (2) परस्पर विरोधी होने के बावजूद थानेदार और सटोरिए की घनिष्टता किन कारणों से संभव है।


सही जोड़ी बनाओ

जनता                 अमानुष
पुलिस                 मूर्ख
अधिकारी वर्ग धूर्त
नेता                 भ्रष्ट
चिकित्सक         रंगदार


आओ इसका पता लगाएं (व्यंग्य)

व्यंग्य

आओ इसका पता लगाएं  (व्यंग्य)

सईद खान 

आओ इसका पता लगाएं

    बच्चों! पिछले अध्याय में तुम समाज का विस्तृत अध्ययन कर चुके हो। और यह जान चुके हो कि भिन्न-भिन्न प्राणियों के समूह को समाज कहते हैं। इस अध्याय में हम समाज के कुछ विशेष प्राणियों के स्वभाव और रूचि के विषय में आगे पढ़ेंगे जिससे किसी अवसर पर यदि तुम्हें उनसे डील करनी पड़े तो असुविधा न हो।


खुद अनुभव करके दखो (1)

    चुनाव के पश्चात नवनिर्वाचित सांसद के बंगले में जाओ। कल्पना करो कि चुनाव से पूर्व तुमने इस सांसद को जिताने के लिए थोड़ी मेहतन भी की थी और चुनाव प्रचार के दौरान तुमने उसके साथ अपने वार्ड में जनसंपर्क भी किया था। अनेक अवसर पर बड़ी आत्मीयता से उसने तुम्हारे कंधे पर हाथ भी धरा था और किसी अवसर पर उसने तुम्हारे होने वाले पुत्र को नौकरी दिलाने का आश्वासन भी दिया था। सो इसी संबंध में चर्चा के लिए तुम वहां पहुंचे हो।
    बंगले में बहुत भीड़ है। तुम्हारी तरह अन्य बेवकूफ भी वहां जमा है। सांसद अंदर डइंगरूम में अपने विशेष प्यादों से घिरा जलपान कर रहा है। तुम जैसे-तैसे डइंगरूम के दरवाजे तक पहुंचने में सफल हो जाते हो। तुम्हें यह गुमान रहता है कि सांसद तुम्हें देखते ही अंदर बुलवा लेगा। लेकिन वह तुम्हें देखते ही यों नजरें फेर लेता है, जैसे तुम्हें पहचानता ही नहीं। उसके नयनों की भाषा समझते ही तुम्हें अपनी औकात समझ लेनी चाहिए। इसके बावजूद भी यदि तुम चुनाव से पूर्व की उसके द्वारा बरती गई घनिष्टता के मायाजाल में फंसे रहे तो अपना अपमान निश्चित समझो और ‘और रमेश। कैसे हो?  क्या हाल है?  घर में सब कुशल मंगल तो है न?  कोई कष्ट तो नहीं है...?’ जैसी मृदुवाणी की जगह अब (सांसद बनते ही) ‘तुम लोग यार, आदमी हो या जानवर?  कोई बात समझते ही नहीं। जब देखो, मुंह उठाए चले आते हो...।’  जैसा कटुवचन सुनना पड़ सकता है। सो यह जान लो।


तुम्हारी आस क्यों टूटती है?

आओ इसका पता लगाएं

    चुनाव का उम्मीदवार विशेष दर्जे का सामाजिक प्राणी होता है। चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होने वाला व्यक्ति ही चुनाव लड़ सकता है। इसलिए उसके स्वभाव में कटुता संभावित होती है। और, ‘करेला नीम चढ़ा’ की तर्ज पर विजयी होते ही स्वभाव से वह और कटु हो जाता है। किंतु चुनाव संपन्न होने तक वह सहृदय होने का सफल नाटक करता है। जैसा नाटक उसके बाप-दादा करते आ रहे हैं। जिससे तुम धोका खा जाते हो। जैसा धोखा तुम्हारे बाप-दादा खाते आ रहे हैं।


खुद अनुभव करके देखो (2)

    किसी दिन अपने क्षेत्र के थाने में जाओ। कल्पना करो कि थाने में तुम्हें अपने साथ हुई चोरी की रपट दर्ज करवानी है। यह कल्पना तुम थाने पहुचंने से पहले ही कर लेना। यदि थाने में प्रविष्ठ होकर भी तुम कल्पना लोक में विचरते रहे, तो तुम्हारी यह क्रिया थानेदार को रूष्ट कर सकती है। वैसे भी, थाने में प्रविष्ठ होते ही वहां के वातावरण से तुम्हारी घिग्घी पहले ही बंध जाएगी। और थोड़ी-थोड़ी देर में थानेदार द्वारा हवालात की ओर मुंह करके ‘क्यों रे मादर...।’  जैसा कुछ अप्रिय वाक्य सुनकर और उसे अपनी ओर प्रश्नवाचक नजरों से घूरता पाकर तुम्हारा रहा-सहा हौसला भी पस्त हो जाएगा। ध्यान रहे कि उच्च शिक्षित, सभ्य और सु-संस्कारित होने के अपने दंभ को थाने में रहने की अवधि तक तजे रहना और थानेदार से ाआइये बैठिए’ और ‘मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं जनाब ?’ जैसी सहृदयता की आस कदापि न करना। साथ ही यह देखकर खुद को अपमानित भी महसूस मत करना कि तुम्हारे मुहल्ले का सटोरिया, जिसे तुम अब तक लुच्चा और लफंगा समझते आए हो, वह कितनी शान से थानेदार के सामने बैठा जुगाली कर रहा है और थानेदार तुमसे बैठने के लिए भी नहीं कह रहा है।
    रपट दर्ज हो जाने के बाद हवलदार यदि चाय-पानी का तकादा करे, तो उसे यह दलील मत देना कि घर में हुई चोरी से तुम पहले ही बर्बाद हो चुके हो। इसलिए हवलदार को देने के लिए तुम्हारे पास कुछ नहीं है। यह दलील बेतुकी होगी। भला तुम्हारे घर में हुई चोरी में हवलदार का क्या दोष कि तुम उसे सूखा ही सूखा निपटाने चले आए? सो बगैर चूं-चां किए सौ-दो-सौ रुपए रोजनामचे के बीच दबा देना। यह ध्यान रखना कि जब भी थाने जाना हो, जेब में कुछ रेजगारी अवश्य रख लेना। यह नियम है। चाहे तुम अपने साथ हुई मारपीट की रपट दर्ज करवाने लहू-लुहान अवस्था में ही थाने क्यों न जा रहे हो।


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कहानी


ऐसा क्यों होता है?

आओ इसका पता लगाएं

    मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिक क्रिया-कलाप सुचारू रूप से सम्पन्न होता रहे, इस हेतु कुछ विधान बनाए गए हैं। पुलिसिया कार्यप्रणाली इसी विधान का एक आवश्यक अंग है। लेकिन अनुभव और अध्ययन से ज्ञात होता है कि ज्यों ही कोई सामाजिक प्राणी इस अंग से जुड़ता है, वह स्वयं असामाजिक हो जाता है। और समाज के शेष सभी प्राणियों को वह एक ही डंडे से हांकता है। यह डंडा भी दरअसल उसे विधान से प्राप्त होता है। साथ ही इस अंग को संगठित एवं सुचारू रूप से संपादित करने के लिए जो वर्दी उसे प्रदान की जाती है, उसे धारण करते ही यह अंग निर्दयी और कुछ-कुछ पशुतुल्य हो जाता है। बात-बात पर उसके मुंह से कांटे झरते हैं। वह, यह मानकर चलता है कि वह क्षेत्र विशेष का वदीर्धारी गुंडा है। इसलिए उसके व्यवहार से गुंडाई क्षार स्वमेव झड़ते रहते हैं। फलस्वरूप वह सभ्य लोगों से भी वैसे ही पेश आता है, जैसा गुंडो से।
    सटोरिए का उसके सामने बैठकर बड़ी शान से जुगाली करना, जिसे देखकर तुम खुद को अपमानित महसूस कर रहे थे, व्यवहारिक दृष्टिकोण से ‘म्यूचुअल अंडर स्टैंडिंग’ के तहत संभव है।
    तो ध्यान रहे। जब भी थाने जाना हो, अपमान सहने की पूर्व तैयारी कर लेना और जेब में रेजगारी धरना मत भूलना। यह अघोषित विधान है और दुनिया का कोई अर्थ शास्त्र, समाज शास्त्र, विज्ञान, भूगोल, इतिहास और गणित का कोई सूत्र इस विधान पर लागू नहीं होता।


अभ्यास के लिए प्रश्न

निम्न प्रश्नों के उत्तर लिखो

    (1) चुनाव लड़ रहे व्यक्ति के स्वभाव में विजयी होने के बाद आने वाले ऐतिहासिक परिवर्तन का कारण स्पष्ट करो।
    (2) परस्पर विरोधी होने के बावजूद थानेदार और सटोरिए की घनिष्टता किन कारणों से संभव है।


सही जोड़ी बनाओ

जनता                 अमानुष
पुलिस                 मूर्ख
अधिकारी वर्ग धूर्त
नेता                 भ्रष्ट
चिकित्सक         रंगदार


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Friday, 21 February 2025

कहानी

बुद्धिजीवी

                                                                                                                                     सईद खान

बुद्धिजीवी

    उसने पैंट की जेब में हाथ डाला और जेब में पड़े सिक्कों को ऊंगलियों की मदद से गिनकर अनुमान लगाने की कोशिश करने लगा कि जेब में कितने पैसे हैं। कुल चार सिक्के थे। इसका मतलब चार रुपए तो हैं ही उसके पास। और अगर एक या दो सिक्का 2 रुपए का हुआ तो उसकी जेब में 5 अथवा 6 रुपए भी हो सकते हैं। उसने सोचा, तो भी, इतने कम पैसों में क्या होना है, इससे तो दो सिगरेट भी नहीं आएगी। कुछ सोचकर उसने शर्ट की जेब में रखा कागजों का ढेर निकाला और एक-एक कागज को उलट-पुलट कर देखने लगा। इस उम्मीद में कि किसी कागज के बीच 5 या 10 का नोट निकल आए। लेकिन उसे निराश होना पड़ा। चीथड़ों में तब्दील हो रहे कागजों के ढेर में एक भी नोट नहीं था। 
    उसके सामने कुर्सी पर बैठा पुरुषोत्तम पेज को फिनिशिंग टच दे रहा था। उसने सोचा, क्या उसे पुरुषोत्तम से दस-बीस रुपए मांग लेना चाहिए। लेकिन अगले ही पल, यह ख्याल आते ही कि दो दिन पहले जब वह कौशिक से बीस रुपए ले रहा था, पुरुषोत्तम वहां पहुंच गया था। ऐसे में आज उसका पुरुषोत्तम से रुपए मांगना ठीक नहीं होगा। पता नहीं वह उसके बारे में क्या धारणा बना ले। उसकी मन:स्थिति से अनजान पुरुषोत्तम कुर्सी से उठा और बोला-‘पेज सेव कर दिया हूं। प्रिंट लेकर बास को दिखा दो।’ 

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    ‘ओ के।’ कहकर उसने पुरुषोत्तम से हाथ मिलाया और प्रिंटर के पास जाकर खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद प्रिंट हाथ में लिए वह बास के सामने खड़ा था।
    बास की नजरें उस वक्त टीवी स्क्रीन से चिपकी हुई थी। एसी की वजह से केबिन कूलिंग चेंबर की तरह हो गया था। पसीने से लगभग बुरी तरह भीग चुकी उसकी बनियान से टकराकर एसी की ठंडकता उसे स्वर्ग सा आभाष करा रही थी। यही वजह थी कि उसने खुद बास का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोई कोशिश नहीं बल्कि चुपचाप खड़ा एसी का आनंद लेता रहा। वह सोच रहा था, ‘लोग खामखा ग्लोबल वार्मिंग का खौफ दिखाते हैंं। स्वर्ग जैसी ठंडकता तो आदमी के वश में है। फिर काहे की ग्लोबल वार्मिंग।’ 

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क्या रे जिंदगी (कहानी )

    तभी बास उसकी ओर आकर्षित हुआ और एक हुंकारा भरकर बोला-‘हूं...। पेज हो गया आपका।’
    ‘जी सर।’ कहते हुए हाशिम ने जल्दी से प्रिंट उनके सामने रख दिया। प्रिंट देखते हुए एक खबर पर ऊंगली रखकर उन्होंने पूछा-‘ये खबर किसकी है।’ उस वक्त हाशिम को वे किसी रीछ से कम नहीं लगे। अपनी मुंडी को आधी प्रिंट पर और थोड़ी ऊपर उठाकर वह जब भी सामने खड़े रिपोर्टर को देखते, रिपोर्टर को वे रीछ ही दिखाई देते। उनके गले से आ रही आवाज भी घुरघुराती सी लगती।
    ‘जी...।’ हाशिम ने उनकी मुंडी के बीच से प्रिंट पर ­ाांककर देखने की कोशिश करते हुए जवाब दिया-‘आशीष जी की है।’
    ‘हूं...आशीष की।’ खबर पढ़ते हुए वे बड़बड़ाए-‘आशीष से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती। खबर के न सिर का पता है न पैर का...पूरी खबर टेबल डिस्पैच है... वर्जन भी नहीं है... फोटो का एंगल भी खबर से मैच नहीं कर रहा है...।’ तीन कालम की उस खबर में बास ने ढेरों खामियां गिनाते हुए कहा-‘खबर, सड़क के गड्ढों की है, तो इसकी पड़ताल भी तो हो कि गड्ढे क्यों हैं। और इसका दोषी कौन है। सड़क कब बनी और इतनी जल्दी उसकी परतें उधड़ क्यों गई। और ये, कि आखिर कब तक लोगों को गड्ढों से भरी सड़क पर धक्के खाते हुए आवाजाही करनी पड़ेगी।’ 
    ‘जी सर।’
    ‘जी सर क्या।’ 
    ‘सर, मेरा मतलब है, खबर में ये सब होना चाहिए।’
    ‘बिलकुल होना चाहिए। इसके बगैर कोई खबर पूरी कैसे हो सकती है।’
    ‘आयंदा ध्यान रखूंगा सर।’
    ‘आयंदा से तुम्हारा मतलब है, अभी ये खबर ऐसे ही जाने दें।’ बास ने गुर्राकर हाशिम से कहा -‘लोग हसेंगे खबर पढ़कर। हमारे कांपीटीटर अखबार मजाक उड़ाएंगे हमारा।’ फिर बोले-‘कहां है आशीष, बुलाओ उसे।’
    ‘सर, वो तो जा चुके हैं।’ हाशिम ने भोलेपन से जवाब दिया। 
    ‘क्या मजाक है यार।’ हाशिम का जवाब सुनकर वे एकदम से झुझला गए थे। उनकी भाव भंगिमा से ऐसा लग रहा था, जैसे प्रिंट उठाकर हाशिम के मुंह पर दे मारेंगे। लेकिन ऐसा कुछ करने की बजाए वे बोले-‘ऐसा करो, इस खबर को निकालो यहां से और इसकी जगह कोई दूसरी खबर लगाओ।’
    ‘सर, दूसरी खबर तो है नहीं। और रिपोर्टर भी सारे जा चुके हैं।’ 
    ‘क्या तमाशा बना रखा है यार तुम लोगों ने।’ बास के मुंह से झुंझलाहट भरी आवाज निकली। बोले-‘तुम लोग आखिर ये बात कब समझोगे कि अखबारनवीस होने के नाते समाज के प्रति कितनी बड़ी जिम्मेदारी है हम पर। हमारा काम कागज काले करने का नहीं है। समाज को, शासन को और प्रशासन को आईना दिखाने का है। अगर हम इसी तरह लापरवाही करते रहे तो इस देश में रावण राज कायम होने में देर नहीं लगेगी।’

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    हाशिम चुप ही रहा। 
    ‘ऐसा करो।’ कुछ सोचकर वे बोले-‘परसों दिलबर ने एक खबर बनाई थी। वह भी सड़क की ही खबर है। इसकी जगह उस खबर को लगा दो।’ 
    ‘लेकिन सर।’ हाशिम तनिक ­िा­ाकते हुए बोला-‘उस खबर को भगत जी ने लेने से मना किया है।’
    ‘भगत जी ने...क्यों।’ 
    ‘सर, वो कह रहे थे कि वो सड़क कुशवाहा कंस्ट्रक्शन की है।’ 
    ‘तो...।’ 
    ‘सर, कुशवाहा जी अग्रवाल जी के अच्छे दोस्त हैं।’ हाशिम बोला-‘कुशवाहा जी जब भी भोपाल जाते हैं, अग्रवाल जी से जरूर मिलते हैं।’ 
    ‘कुशवाहा...। अच्छा वो... तो उस सड़क का ठेका उसी के पास है।’ 
    ‘जी सर।’
    ‘क्या दिलबर को ये बात पहले नहीं मालूम थी कि वो सड़क कुशवाहा कंस्ट्रक्शन की है।’
    ‘जी सर। उन्हें नहीं मालूम था।’ हाशिम बोला-‘खबर बनने के बाद जब खबर भगत जी के पास पहुंची तो उन्होंने उसे लेने से मना कर दिया।’
    ‘तो ऐसा करो...।’ कुछ  सोचकर थोड़ी देर बाद वे अपेक्षाकृत नरम लहजे में बोले-‘इसी खबर को जाने दो, लेकिन ध्यान रहे, आयंदा ऐसी खबर नहीं जानी चाहिए।’ 
    ‘जी सर।’ उसने जल्दी से प्रिंट उनके हाथ से लेते हुए पूछा-‘सर पेज छुड़वा दूं।’
    ‘हां, जाने दो।’ 
    बास के हाथ से प्रिंट लेकर वह जल्दी से केबिन के बाहर निकल आया। 
    आफिस के गेट से निकलते हुए उसने दीवार पर लगी घड़ी देखी। सवा नौ बज चुके थे। गेट के बाहर उसके इंतजार में खड़े प्रदीप को साथ लेकर वह लंबे-लंबे डग भरता हुआ आफिस के ठीक सामने से जा रही छोटी लाईन की ओर बढ़ गया। रेलवे लाईन में पैदल चलते हुए स्टेशन पहुंचने में उन्हें बीस से पच्चीस मिनट लगते हैं। हालांकि रात होने की वजह से रेलवे लाईन पर चलना दिक्कतभरा होता है। रेलपांत के किनारे लगे फिश प्लेट, प्वायंट्स और नट-बोल्ट के अलावा आसपास की ­ाुग्गी ­ोपड़ी के रहवासियों की रेल पांत के किनारे ‘हल्का’ होने की संस्कृति से बचकर निकलना आसान नहीं होता। लेकिन उसके और प्रदीप उपाध्याय के पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं होता। सड़क मार्ग लंबा पड़ता है और रिक्शा या आटो वाले को देने के लिए उनके पास पैसे नहीं होते इसलिए वे स्टेशन आनेजाने के लिए इसी लौहपथ गामिनी को पैदल पथ गामिनी की तरह इस्तेमाल करते थे।
    स्टेशन पहुंचने पर भीतर जाने से पहले हाशिम का हाथ पकड़कर प्रदीप बाहर जाने वाले रास्ते पर मुड़ गया तो हाशिम बोला-‘पैसे हैं जेब में जो उधर जा रहे हो, मेरे पास कुल पांच रुपए हैं।’ उसने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी। 
    ‘डोंट वरी।’ प्रदीप बोला-‘मुत्मईन सींकड़ी’ के लिए मैं पहले ही जुगाड़ कर लेता हूं। दो घंटे का सवाल है यार। बिना इसके सफर कटेगा कैसे।’
    ‘मुत्मईन सींकड़ी’ से प्रदीप का आशय सिगरेट से था। सिगरेट को उसने ‘मुत्मईन सींकड़ी’ का नाम दे रखा था और शराब को ‘मुत्मईन सीरप’ कहता था। वह कहता- ‘आदमी को कोई और लत भले न हो, लेकिन सिगरेट की लत जरूर हो। खासकर रिपोर्टर्स को इसकी लत होनी ही चाहिए।’ वह आगे कहता-‘जिन रिपोर्टर्स को सिगरेट की भी लत नहीं है, तू देखना, वो साले जल्दी ही पागल हो जाएंगे।’
    सिगरेट लेकर हम वहीं एक पत्थर पर बैठ गए थे और लंबे-लंबे कश लगा रहे थे। दिनभर की थकान, ­ाुं­ालाहट, बास की फटकार और कल की चिंता में सिगरेट का हर कश सचमुच खासा इत्मिनान देने वाला होता। मु­ो लगता, प्रदीप ने यूं ही इसका नाम मुत्मईन सींकड़ी नहीं रखा है।
    दुर्ग-छपरा सारनाथ एक्सपे्रस चूंकि दुर्ग से ही चलती थी इसलिए अक्सर अपने निर्धारित समय रात सवा दस बजे तक रायपुर पहुंच जाती थी। सवा नौ बजे आफिस से निकलकर पैदल पथ गामिनी पर पैदल चलते हुए हम ट्रेन के पहुंचने से पहले ही स्टेशन पहुंच जाते थे। हमारे पास इतना वक्त भी रहता था कि स्टेशन के भीतर जाने से पहले हम एक सिगरेट पी लें। तब तक ट्रेन भी आ जाती। हम सीधे सारनाथ की एस-6 बोगी में घुस जाते। यह बोगी एमएसटी होल्डर्स के लिए अलाउड थी। यही वजह है कि रायपुर-बिलासपुर के बीच डेली अपडाउन करने वालों से बोगी भरी रहती। रोज-रोज एक साथ, एक से डेढ़ घंटे के सफर ने उन्हें परिवार सा बांधे रखा था। हंसी-मजाक से भरे वो दो घंटे अगले दिन सुबह नौ पांच की लोकल पकड़ने और घरेलु चिंताओं से जू­ाने के लिए ऊर्जा प्रदान करने वाले होते। 
    ‘क्या बात है, बड़ी दिलेरी से पैसे खर्च किए जा रहे हैं।’ अगले दिन नौ पांच की लोकल से रायपुर पहुंचने पर एक पानठेले में प्रदीप को रुकता देख हाशिम बोला-‘लगता है, लाटरी लग गई है।’ 
    ‘भगवान न करे यार कि हमारे नाम की कभी लाटरी भी खुले।’ सिगरेट जलाते हुए प्रदीप बोला-‘इस शरीर को धक्के खाकर खाना पचाने की आदत हो गई है। फोकट में पैसा मिलेगा तो हार्ट फेल हो जाएगा या दिमाग फिर जाएगा अपना।’ 
    सिगरेट जलाकर हम छोटी लाईन की ओर मुड़ गए थे। रास्ते में प्रदीप बोला-‘कल रात पत्नी से पंगा हो गया था। देर रात तक नींद नहीं आई थी। अब आंखे गड़ रही है।’
    ‘क्या हो गया था।’ 
    ‘वही रोज वाला मैटर। बास से कहकर वापस बिलासपुर क्यों नहीं आ जाते। जैसे मेरे बोलने पर मु­ो रायपुर भेजा गया है।’ 
    ‘यही हाल अपना भी है यार।’ हाशिम बोला-‘बेगम कहती है, तनख्वाह तो बढ़ी नहीं, ऊपर से रायपुर जानेआने का खर्च सिर पर आ गया। उसे इस बात का भी अफसोस है कि जब तक बिलासपुर में थे तो गाहे-ब-गाहे कान्फें्रस में कोई गिफ्ट-शिफ्ट भी मिल जाता था। अब तो उससे भी हाथ धो बैठे। ऊपर से वो शौकत मियां का ताना...।’ 
    ‘शौकत मियां...अच्छा वो अखबार वाले...क्या नाम है अखबार का...। प्रदीप कुछ याद करने की कोशिश करता हुआ बोला-‘हां, याद आया, धधकती ज्वाला...यही न।’
    ‘हां।’ हाशिम बोला-‘बेगम के मायके में उसके घर के पास रहते हंै। पहले बर्तनों में कलई करने का काम करते थे। पता नहीं कैसे किसी अखबार से जुड़ गए और बाद में अपना अखबार भी निकालने लगे। बेगम का कहना है कि उसके देखते ही देखते वह कार वाला हो गया है। जबकि पहले साईकिल भी नहीं थी उसके पास।’
    ‘फिर।’ 
    ‘फिर क्या।’ हाशिम बोला-‘अक्सर उसी का ताना देती है। बेगम के हिसाब से मैं बर्तन में कलई करने वाले से भी गया गुजरा हूं। एक दिन जब मैंने गुस्से में बेगम से कहा कि मैं उसकी तरह बेगैरत नहीं हूं, तो कहती है, तो हो क्यों नहीं जाते बेगैरत, रोका कौन है।’
    हाशिम की बात पर प्रदीप की हंसी छूट गई। वह उसके कंधे पर हाथ रखकर बोला-‘ये सौ टके की बात है यार। ढेर सारा पैसा कमाने की जरूरी शर्ताें में एक यह भी है कि आदमी अपना जमीर गिरवी रख दे।’
    ‘जमीर से याद आया।’ हाशिम ने एकदम से विषय बदलते हुए कहा- ‘तू किसी अमीर भाई की बात कर रहा था। उनका क्या हुआ।’
    ‘अमीर भाई। अच्छा वो...वो मामला निपट गया यार जैसे-तैसे।’ कहते हुए प्रदीप रेल पटरी से बाहर निकला और दो कदम चलकर फिर पटरी पर चलने लगा था। उसके सामने किसी ‘हल्का’ होने वाले का ‘वजन’ आ गया था। पटरी पर वापस आकर उसने अपनी बात जारी रखी। बोला-‘उस मामले में एसपी साहब ने अच्छा सपोर्ट किया। बाद में समाज के प्रतिष्ठित लोगों से कहकर दोनों के बीच सुलह भी करवा दिया।’ प्रदीप ने जेब से एक और सिगरेट निकालकर सुलगा ली थी। एक सिगरेट उसने हाशिम की ओर भी बढ़ाई थी लेकिन हाशिम ने मना कर दिया तो सिगरेट को जेब में वापस रखते हुए वह बोला-‘कभी-कभी मु­ो लगता है कि अगर मैं बीच में नहीं आया होता, तो दहेज प्रताड़ना के मामले में अमीर भाई का पूरा परिवार अब तक जेल में होता। अच्छे लोग है बेचारे। समाज में अच्छी खासी इज्जत है। बहू भी सम­ादार लगी। पता नहीं कैसे बहकावे में आ गई थी।’ थोड़ा रुककर उसने अपनी बात आगे बढ़ाई। बोला-‘अपने प्रोफेशन में यही एक बात तो है, जो इस पेशे से बांधे हुए है। ग्लैमर, रोमांच और एप्रोच...।’
    ‘तथाकथित।’ हाशिम ने उसकी बात काटकर कहा।
    ‘तथाकथित...।’ प्रदीप ने असमंजस के से भाव में दोहराया। फिर ठहाका लगाकर बोला- ‘ठीक कहता है, तथाकथित ग्लैमर, रोमांच और एप्रोच।’
    तभी उनके पीछे से ट्रेन की सीटी की आवाज सुनाई दी उन्हें। दोनों ने पीछे पलटकर देखा। धमतरी से आने वाली छोटी लाईन की ट्रेन सीटी बजाते हुए आ रही थी। उसे देखकर दोनों पटरी से नीचे उतर गए। ट्रेन जैसे-तैसे जब आगे बढ़ गई तो वे फिर पटरी पर चलने लगे। सामने जाती ट्रेन को देखकर हाशिम बोला-‘ऐसा नहीं लग रहा है, जैसे कोई बूढ़ा मैराथन में दौड़ रहा है। अब गिरा कि तब गिरा।’
    ‘नहीं।’ प्रदीप बोला- ‘ट्रेन मु­ो अपने प्रोफेशन के तथाकथित ग्लैमर, रोमांच और एप्रोच की तरह लग रही है। जैसे ये टेÑन होते हुए भी ट्रेन नहीं है। वैसे ही हमारे प्रोफेशन में ग्लैमर, रोमांच और एप्रोच की स्थिति है, है भी और नहीं भी।’ 
    ‘ये ग्लैमर, रोमांच और अप्रोच, क्या सचमुच हमारे प्रोफेशन में है। कलेक्टर, कमिश्नर और किसी बड़े अधिकारी का हमारा फोन काल रिसीव कर लेना। या विधायक का हमारे कंधे पर हाथ धरकर कहना, और खान साहब, क्या हाल हैं आपके, क्या यही ग्लैमर है।’ चलते-चलते हाशिम ने एक पत्थर को पैर से ठोकर मारते हुए कहा-‘ऐसा तो नहीं कि हमने इनका केवल वहम पाल रखा है।’
    हाशिम के जवाब में प्रदीप ने किसी शाईर का ये शेर अर्ज किया-
    ‘न छीन मु­ासे मेरे रोज-ओ-शब के हंगामे, 
    मैं जी रहा हूं, मु­ो ये गुमान रहने दे।’ 
    शेर मुकम्मल करने के बाद वह बोला-‘यार, वहम ही सही, जी लेने दे इसी खुशफहमी में।’
    ‘वाह!’ हाशिम ने जरा सा अपने सिर को झुकाया और सीधा हाथ माथे पर लगाकर बोला- ‘वाह! क्या बात है।’ 
    ‘शुक्रिया, शुक्रिया।’ प्रदीप भी किसी मं­ो हुए शाईर की तरह थोड़ा झुककर अपना हाथ माथे से लगाते हुए बोला-‘नवाजिश आपकी, जो इस नाचीज़ को आपने इज्जत बख़्शी।’
    बातें करते हुए दोनों आफिस के करीब पहुंच गए थे। लेकिन आफिस के भीतर जाने की बजाए दोनों रमटी की चाय दुकान में जाकर बैठ गए थे। यह उनका रोज का मामूल था। आफिस में दाखिल होने के पहले वे रमटी के हाथ की चाय जरूर पीते थे। 
    ‘परसों एक सज्जन मिले थे।’ चाय का एक घूंट लेते हुए हाशिम बोला-‘मेरे परिचित हैं। पूछ रहे थे, आजकल किस अखबार में हो, क्या देख रहे हो। फिर कहने लगे, चालीस-पैंतालीस हजार सेलरी तो होगी ही।’
    ‘वाह।’ प्रदीप एकदम से चहक कर बोला-‘क्या ख्याल है लोगों का हमारे बारे में, फिर, तू ने क्या कहा।’
    ‘कहता क्या, उनकी हां में हां मिलाना पड़ा। जान-पहचान के और लोग भी बैठे थे वहां। ये थोड़े न कहता कि सेलरी सिर्फ चौदह हजार है। मैंने कहा, नहीं उतनी तो नहीं, तीस हजार के करीब है, तो कहने लगे, आप लोगों को तो ऊपर से भी काफी कुछ मिल जाता है।’ 
    ‘अरे वाह!’ प्रदीप व्यंग्यात्मक लहजे में बोला-‘कहना नहीं था, तेरे मुंह में घी-शक्कर।’
    वे दोनों बाते कर ही रहे थे कि अविनाश भी वहां आ पहुंचा था। वह डेस्क इंचार्ज था और सुबह के समय अक्सर इस बात को लेकर चिढ़ा रहता था कि सुबह की मीटिंग में उसका कोई रोल नहीं है फिर भी उसे बुलाया जाता है। आफिस आते हुए अक्सर वह फटफटिया को घसीटता हुआ ही नजर आता। पूछने पर कहता-‘क्या बताऊं यार। कल ही पचास रुपए का डलवाया था। चार चक्कर तो लग ही जाते हैं। लेकिन इस बार पता नहीं कैसे, तीसरे ही चक्कर में टंकी खाली हो गई।’ तो कभी कहता-‘साली पंक्चर हो गई। पिछले महीने ही नया ट्यूब डलवाया हूं।’ फिर अपनी बात में पुख्तगी पैदा करने के लिए दूसरों को सुनाते हुए बड़बड़ाता-‘बताता हूं, साले दुकानदार को, नकली माल बेचने की एक खबर लगा दूंगा तो होश ठिकाने आ जाएंगे साले के।’ और जब उससे कहा जाता-‘यार, अब त्याग भी दे यार इसे और कोई मोटरसाइकिल फायनेंस करा ले। आजकल तो आसान शर्तों पर फायनेंस हो रहा है। फिर क्यों इतनी तकलीफ ­ोलता है, तो कहता-‘मजीठिया मिल जाने दे, सीधे कार ही फायनांस कराउंगा।’ 
    प्रदीप उसकी मजीठिया वाली बात के जवाब में एक गीत गुनगुनाने लगता-‘तु­ो गीतों में ढालूंगा, सावन को आने दो। सावन को...।’ वह बाकायदा राग भी अलापता और कहता-‘इसे लोरी की तरह गाकर सालों से मैं अपनी पत्नी को थपकी देकर सुला रहा हूं। साले, मजीठिया का सपना देख रहा है, पता नहीं कब मजीठिया का लाभ मिलेगा और कब वो सावन आएगा..।’ 
    अभी वे बातें कर ही रहे थे कि हाशिम का मोबाईल बजने लगा। जेब से मोबाईल निकालकर उसने कालर का नाम पढ़ा फिर साथियों को चुप रहने का इशारा कर मोबाईल कान से लगा लिया। अविनाश और प्रदीप ने महसूस किया कि कुछ देर तक जी-जी करने के बाद हाशिम के चेहरे का रंग बदलने लगा था। उन्हें अंदाज लगाते देर नहीं लगी कि आफिस का ही काल होगा। 
    थोड़ी देर बाद हाशिम ने तनिक गुस्से में कहा-‘ठीक है, मैं आफिस आ रहा हूं। वहीं बात करते हैं।’ कहकर उसने काल ड्राप कर दिया।
    ‘क्या बात है।’ फोन कटते ही प्रदीप ने पूछा-‘कौन था।’
    ‘और कौन होगा।’ हाशिम ­ाुं­ालाकर बोला-‘वही अपने मार्र्केटिंग हेड गुप्ता जी।’ 
    ‘गुप्ता जी, अब उन्हें काए की बदहजमी हो गई।’
    प्रदीप की बातों का कोई जवाब न देकर हाशिम बड़बड़ाया-‘साला, क्या नौकरी है यार। ठेका श्रमिक हो कर रह गए हैं।’
    ‘आखिर बात क्या है। बताएगा।’ 
    तभी रमटी चाय लेकर आ गया। उसके हाथ से चाय का गिलास थामते हुए हाशिम बोला-‘आज एक खबर लगी है अखबार में, उसी को लेकर भड़क रहा था।’ 
    ‘किसकी खबर है।’
    ‘खबर नहीं यार, विज्ञप्ती है। कोई ब्लाक अध्यक्ष नियुक्त हुआ है, उसी की विज्ञप्ति है।’ 
    ‘तो।’
    ‘कह रहा था।’ हाशिम ने चाय का एक लंबा घूंट लेकर कहा-‘इतने सालों से पत्रकारिता कर रहे हो, इतनी भी सम­ा नहीं है कि कौन सी खबर कहां लेना है, कितनी बड़ी लेना है। जिस तरह आपने खबर लगाई है, उससे तो अखबार का भठ्ठा ही बैठ जाना है।’ 
    ‘ऐसा क्या हो गया खबर में।’ अविनाश असंमजस में बोला।
    ‘कह रहा था, खबर सिंगल कालम में लगना था। बंदे की फोटो नहीं लगाना था। आपने तो सारा कुछ एक बार में ही छाप दिया है। खबर छोटी और उसकी फोटो के बिना छपती तो हमारे एक्जीक्यूटिव का दस दो का एक विज्ञापन पक जाता।’
    ‘अब बोलो।’ हाशिम के चुप होते ही अविनाश बोला-‘अब मार्केटिंग वाले हमें बताएंगे कि खबर क्या होती है और उसे किस तरह लगाना है।’ 
    उसके जवाब में प्रदीप ने अंगे्रजी की एक कहावत दोहराई-‘वाइल इन रोम, डू ऐज रोमंस डू।’ फिर बोला-‘जब हम मार्केटिंग वालों के कहने पर गृह राज्य मंत्री की पत्नी के जन्मदिवस पर बुके भेंट करते हुए एक हिस्ट्रीशीटर का फोटो कैप्शन लगा सकते हैं, क्योंकि वह बड़ा विज्ञापनदाता है, और एक दहेज प्रताड़ना के आरोपी प्रोफेसर के आरोपमुक्त होने वाली खबर छापकर स्पेस क्राईम का आरोप ­ोल सकते हैं, गड्ढों से भरी सड़क की एक कंप्लीट खबर को जब हम सिर्फ इसलिए डस्टबिन में डाल सकते हैं क्योंकि ठेकेदार मालिक का दोस्त है और सड़क की ही एक दूसरी खबर को सिर्फ इसलिए लगा सकते हैं क्योंकि उस ठेकेदार की मालिक या संपादक से कोई जान-पहचान नहीं है, तो किसी खबर को मार्केटिंग वालों के कहने पर छोटी बड़ी क्यों नहीं कर  सकते।’  एक मिनट के लिए रुककर प्रदीप ने अपनी बात आगे बढ़ाई। बोला- ‘एक फंडा हमेशा याद रखो, द फंडा इज, दैट बास इज आलवेज राइट। और ये गुमान मत पालो कि कोई तुम्हें बुद्धिजीवी कहकर सम्मानित करता है तो सचमुच तुम बुद्धिजीवी ही हो और तुम्हारे साथ बुद्धिजीवी जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए।’ कहकर वह उठा और हाशिम व अविनाश से बोला-‘अब चलो, मीटिंग का टाईम हो गया। ये समझकर उठो कि रोम जा रहे हैं हम।’ 

बुद्धिजीवी

कहानी

बुद्धिजीवी

                                                                                                                                     सईद खान

बुद्धिजीवी

    उसने पैंट की जेब में हाथ डाला और जेब में पड़े सिक्कों को ऊंगलियों की मदद से गिनकर अनुमान लगाने की कोशिश करने लगा कि जेब में कितने पैसे हैं। कुल चार सिक्के थे। इसका मतलब चार रुपए तो हैं ही उसके पास। और अगर एक या दो सिक्का 2 रुपए का हुआ तो उसकी जेब में 5 अथवा 6 रुपए भी हो सकते हैं। उसने सोचा, तो भी, इतने कम पैसों में क्या होना है, इससे तो दो सिगरेट भी नहीं आएगी। कुछ सोचकर उसने शर्ट की जेब में रखा कागजों का ढेर निकाला और एक-एक कागज को उलट-पुलट कर देखने लगा। इस उम्मीद में कि किसी कागज के बीच 5 या 10 का नोट निकल आए। लेकिन उसे निराश होना पड़ा। चीथड़ों में तब्दील हो रहे कागजों के ढेर में एक भी नोट नहीं था। 
    उसके सामने कुर्सी पर बैठा पुरुषोत्तम पेज को फिनिशिंग टच दे रहा था। उसने सोचा, क्या उसे पुरुषोत्तम से दस-बीस रुपए मांग लेना चाहिए। लेकिन अगले ही पल, यह ख्याल आते ही कि दो दिन पहले जब वह कौशिक से बीस रुपए ले रहा था, पुरुषोत्तम वहां पहुंच गया था। ऐसे में आज उसका पुरुषोत्तम से रुपए मांगना ठीक नहीं होगा। पता नहीं वह उसके बारे में क्या धारणा बना ले। उसकी मन:स्थिति से अनजान पुरुषोत्तम कुर्सी से उठा और बोला-‘पेज सेव कर दिया हूं। प्रिंट लेकर बास को दिखा दो।’ 

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    ‘ओ के।’ कहकर उसने पुरुषोत्तम से हाथ मिलाया और प्रिंटर के पास जाकर खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद प्रिंट हाथ में लिए वह बास के सामने खड़ा था।
    बास की नजरें उस वक्त टीवी स्क्रीन से चिपकी हुई थी। एसी की वजह से केबिन कूलिंग चेंबर की तरह हो गया था। पसीने से लगभग बुरी तरह भीग चुकी उसकी बनियान से टकराकर एसी की ठंडकता उसे स्वर्ग सा आभाष करा रही थी। यही वजह थी कि उसने खुद बास का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोई कोशिश नहीं बल्कि चुपचाप खड़ा एसी का आनंद लेता रहा। वह सोच रहा था, ‘लोग खामखा ग्लोबल वार्मिंग का खौफ दिखाते हैंं। स्वर्ग जैसी ठंडकता तो आदमी के वश में है। फिर काहे की ग्लोबल वार्मिंग।’ 

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क्या रे जिंदगी (कहानी )

    तभी बास उसकी ओर आकर्षित हुआ और एक हुंकारा भरकर बोला-‘हूं...। पेज हो गया आपका।’
    ‘जी सर।’ कहते हुए हाशिम ने जल्दी से प्रिंट उनके सामने रख दिया। प्रिंट देखते हुए एक खबर पर ऊंगली रखकर उन्होंने पूछा-‘ये खबर किसकी है।’ उस वक्त हाशिम को वे किसी रीछ से कम नहीं लगे। अपनी मुंडी को आधी प्रिंट पर और थोड़ी ऊपर उठाकर वह जब भी सामने खड़े रिपोर्टर को देखते, रिपोर्टर को वे रीछ ही दिखाई देते। उनके गले से आ रही आवाज भी घुरघुराती सी लगती।
    ‘जी...।’ हाशिम ने उनकी मुंडी के बीच से प्रिंट पर ­ाांककर देखने की कोशिश करते हुए जवाब दिया-‘आशीष जी की है।’
    ‘हूं...आशीष की।’ खबर पढ़ते हुए वे बड़बड़ाए-‘आशीष से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती। खबर के न सिर का पता है न पैर का...पूरी खबर टेबल डिस्पैच है... वर्जन भी नहीं है... फोटो का एंगल भी खबर से मैच नहीं कर रहा है...।’ तीन कालम की उस खबर में बास ने ढेरों खामियां गिनाते हुए कहा-‘खबर, सड़क के गड्ढों की है, तो इसकी पड़ताल भी तो हो कि गड्ढे क्यों हैं। और इसका दोषी कौन है। सड़क कब बनी और इतनी जल्दी उसकी परतें उधड़ क्यों गई। और ये, कि आखिर कब तक लोगों को गड्ढों से भरी सड़क पर धक्के खाते हुए आवाजाही करनी पड़ेगी।’ 
    ‘जी सर।’
    ‘जी सर क्या।’ 
    ‘सर, मेरा मतलब है, खबर में ये सब होना चाहिए।’
    ‘बिलकुल होना चाहिए। इसके बगैर कोई खबर पूरी कैसे हो सकती है।’
    ‘आयंदा ध्यान रखूंगा सर।’
    ‘आयंदा से तुम्हारा मतलब है, अभी ये खबर ऐसे ही जाने दें।’ बास ने गुर्राकर हाशिम से कहा -‘लोग हसेंगे खबर पढ़कर। हमारे कांपीटीटर अखबार मजाक उड़ाएंगे हमारा।’ फिर बोले-‘कहां है आशीष, बुलाओ उसे।’
    ‘सर, वो तो जा चुके हैं।’ हाशिम ने भोलेपन से जवाब दिया। 
    ‘क्या मजाक है यार।’ हाशिम का जवाब सुनकर वे एकदम से झुझला गए थे। उनकी भाव भंगिमा से ऐसा लग रहा था, जैसे प्रिंट उठाकर हाशिम के मुंह पर दे मारेंगे। लेकिन ऐसा कुछ करने की बजाए वे बोले-‘ऐसा करो, इस खबर को निकालो यहां से और इसकी जगह कोई दूसरी खबर लगाओ।’
    ‘सर, दूसरी खबर तो है नहीं। और रिपोर्टर भी सारे जा चुके हैं।’ 
    ‘क्या तमाशा बना रखा है यार तुम लोगों ने।’ बास के मुंह से झुंझलाहट भरी आवाज निकली। बोले-‘तुम लोग आखिर ये बात कब समझोगे कि अखबारनवीस होने के नाते समाज के प्रति कितनी बड़ी जिम्मेदारी है हम पर। हमारा काम कागज काले करने का नहीं है। समाज को, शासन को और प्रशासन को आईना दिखाने का है। अगर हम इसी तरह लापरवाही करते रहे तो इस देश में रावण राज कायम होने में देर नहीं लगेगी।’

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    हाशिम चुप ही रहा। 
    ‘ऐसा करो।’ कुछ सोचकर वे बोले-‘परसों दिलबर ने एक खबर बनाई थी। वह भी सड़क की ही खबर है। इसकी जगह उस खबर को लगा दो।’ 
    ‘लेकिन सर।’ हाशिम तनिक ­िा­ाकते हुए बोला-‘उस खबर को भगत जी ने लेने से मना किया है।’
    ‘भगत जी ने...क्यों।’ 
    ‘सर, वो कह रहे थे कि वो सड़क कुशवाहा कंस्ट्रक्शन की है।’ 
    ‘तो...।’ 
    ‘सर, कुशवाहा जी अग्रवाल जी के अच्छे दोस्त हैं।’ हाशिम बोला-‘कुशवाहा जी जब भी भोपाल जाते हैं, अग्रवाल जी से जरूर मिलते हैं।’ 
    ‘कुशवाहा...। अच्छा वो... तो उस सड़क का ठेका उसी के पास है।’ 
    ‘जी सर।’
    ‘क्या दिलबर को ये बात पहले नहीं मालूम थी कि वो सड़क कुशवाहा कंस्ट्रक्शन की है।’
    ‘जी सर। उन्हें नहीं मालूम था।’ हाशिम बोला-‘खबर बनने के बाद जब खबर भगत जी के पास पहुंची तो उन्होंने उसे लेने से मना कर दिया।’
    ‘तो ऐसा करो...।’ कुछ  सोचकर थोड़ी देर बाद वे अपेक्षाकृत नरम लहजे में बोले-‘इसी खबर को जाने दो, लेकिन ध्यान रहे, आयंदा ऐसी खबर नहीं जानी चाहिए।’ 
    ‘जी सर।’ उसने जल्दी से प्रिंट उनके हाथ से लेते हुए पूछा-‘सर पेज छुड़वा दूं।’
    ‘हां, जाने दो।’ 
    बास के हाथ से प्रिंट लेकर वह जल्दी से केबिन के बाहर निकल आया। 
    आफिस के गेट से निकलते हुए उसने दीवार पर लगी घड़ी देखी। सवा नौ बज चुके थे। गेट के बाहर उसके इंतजार में खड़े प्रदीप को साथ लेकर वह लंबे-लंबे डग भरता हुआ आफिस के ठीक सामने से जा रही छोटी लाईन की ओर बढ़ गया। रेलवे लाईन में पैदल चलते हुए स्टेशन पहुंचने में उन्हें बीस से पच्चीस मिनट लगते हैं। हालांकि रात होने की वजह से रेलवे लाईन पर चलना दिक्कतभरा होता है। रेलपांत के किनारे लगे फिश प्लेट, प्वायंट्स और नट-बोल्ट के अलावा आसपास की ­ाुग्गी ­ोपड़ी के रहवासियों की रेल पांत के किनारे ‘हल्का’ होने की संस्कृति से बचकर निकलना आसान नहीं होता। लेकिन उसके और प्रदीप उपाध्याय के पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं होता। सड़क मार्ग लंबा पड़ता है और रिक्शा या आटो वाले को देने के लिए उनके पास पैसे नहीं होते इसलिए वे स्टेशन आनेजाने के लिए इसी लौहपथ गामिनी को पैदल पथ गामिनी की तरह इस्तेमाल करते थे।
    स्टेशन पहुंचने पर भीतर जाने से पहले हाशिम का हाथ पकड़कर प्रदीप बाहर जाने वाले रास्ते पर मुड़ गया तो हाशिम बोला-‘पैसे हैं जेब में जो उधर जा रहे हो, मेरे पास कुल पांच रुपए हैं।’ उसने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी। 
    ‘डोंट वरी।’ प्रदीप बोला-‘मुत्मईन सींकड़ी’ के लिए मैं पहले ही जुगाड़ कर लेता हूं। दो घंटे का सवाल है यार। बिना इसके सफर कटेगा कैसे।’
    ‘मुत्मईन सींकड़ी’ से प्रदीप का आशय सिगरेट से था। सिगरेट को उसने ‘मुत्मईन सींकड़ी’ का नाम दे रखा था और शराब को ‘मुत्मईन सीरप’ कहता था। वह कहता- ‘आदमी को कोई और लत भले न हो, लेकिन सिगरेट की लत जरूर हो। खासकर रिपोर्टर्स को इसकी लत होनी ही चाहिए।’ वह आगे कहता-‘जिन रिपोर्टर्स को सिगरेट की भी लत नहीं है, तू देखना, वो साले जल्दी ही पागल हो जाएंगे।’
    सिगरेट लेकर हम वहीं एक पत्थर पर बैठ गए थे और लंबे-लंबे कश लगा रहे थे। दिनभर की थकान, ­ाुं­ालाहट, बास की फटकार और कल की चिंता में सिगरेट का हर कश सचमुच खासा इत्मिनान देने वाला होता। मु­ो लगता, प्रदीप ने यूं ही इसका नाम मुत्मईन सींकड़ी नहीं रखा है।
    दुर्ग-छपरा सारनाथ एक्सपे्रस चूंकि दुर्ग से ही चलती थी इसलिए अक्सर अपने निर्धारित समय रात सवा दस बजे तक रायपुर पहुंच जाती थी। सवा नौ बजे आफिस से निकलकर पैदल पथ गामिनी पर पैदल चलते हुए हम ट्रेन के पहुंचने से पहले ही स्टेशन पहुंच जाते थे। हमारे पास इतना वक्त भी रहता था कि स्टेशन के भीतर जाने से पहले हम एक सिगरेट पी लें। तब तक ट्रेन भी आ जाती। हम सीधे सारनाथ की एस-6 बोगी में घुस जाते। यह बोगी एमएसटी होल्डर्स के लिए अलाउड थी। यही वजह है कि रायपुर-बिलासपुर के बीच डेली अपडाउन करने वालों से बोगी भरी रहती। रोज-रोज एक साथ, एक से डेढ़ घंटे के सफर ने उन्हें परिवार सा बांधे रखा था। हंसी-मजाक से भरे वो दो घंटे अगले दिन सुबह नौ पांच की लोकल पकड़ने और घरेलु चिंताओं से जू­ाने के लिए ऊर्जा प्रदान करने वाले होते। 
    ‘क्या बात है, बड़ी दिलेरी से पैसे खर्च किए जा रहे हैं।’ अगले दिन नौ पांच की लोकल से रायपुर पहुंचने पर एक पानठेले में प्रदीप को रुकता देख हाशिम बोला-‘लगता है, लाटरी लग गई है।’ 
    ‘भगवान न करे यार कि हमारे नाम की कभी लाटरी भी खुले।’ सिगरेट जलाते हुए प्रदीप बोला-‘इस शरीर को धक्के खाकर खाना पचाने की आदत हो गई है। फोकट में पैसा मिलेगा तो हार्ट फेल हो जाएगा या दिमाग फिर जाएगा अपना।’ 
    सिगरेट जलाकर हम छोटी लाईन की ओर मुड़ गए थे। रास्ते में प्रदीप बोला-‘कल रात पत्नी से पंगा हो गया था। देर रात तक नींद नहीं आई थी। अब आंखे गड़ रही है।’
    ‘क्या हो गया था।’ 
    ‘वही रोज वाला मैटर। बास से कहकर वापस बिलासपुर क्यों नहीं आ जाते। जैसे मेरे बोलने पर मु­ो रायपुर भेजा गया है।’ 
    ‘यही हाल अपना भी है यार।’ हाशिम बोला-‘बेगम कहती है, तनख्वाह तो बढ़ी नहीं, ऊपर से रायपुर जानेआने का खर्च सिर पर आ गया। उसे इस बात का भी अफसोस है कि जब तक बिलासपुर में थे तो गाहे-ब-गाहे कान्फें्रस में कोई गिफ्ट-शिफ्ट भी मिल जाता था। अब तो उससे भी हाथ धो बैठे। ऊपर से वो शौकत मियां का ताना...।’ 
    ‘शौकत मियां...अच्छा वो अखबार वाले...क्या नाम है अखबार का...। प्रदीप कुछ याद करने की कोशिश करता हुआ बोला-‘हां, याद आया, धधकती ज्वाला...यही न।’
    ‘हां।’ हाशिम बोला-‘बेगम के मायके में उसके घर के पास रहते हंै। पहले बर्तनों में कलई करने का काम करते थे। पता नहीं कैसे किसी अखबार से जुड़ गए और बाद में अपना अखबार भी निकालने लगे। बेगम का कहना है कि उसके देखते ही देखते वह कार वाला हो गया है। जबकि पहले साईकिल भी नहीं थी उसके पास।’
    ‘फिर।’ 
    ‘फिर क्या।’ हाशिम बोला-‘अक्सर उसी का ताना देती है। बेगम के हिसाब से मैं बर्तन में कलई करने वाले से भी गया गुजरा हूं। एक दिन जब मैंने गुस्से में बेगम से कहा कि मैं उसकी तरह बेगैरत नहीं हूं, तो कहती है, तो हो क्यों नहीं जाते बेगैरत, रोका कौन है।’
    हाशिम की बात पर प्रदीप की हंसी छूट गई। वह उसके कंधे पर हाथ रखकर बोला-‘ये सौ टके की बात है यार। ढेर सारा पैसा कमाने की जरूरी शर्ताें में एक यह भी है कि आदमी अपना जमीर गिरवी रख दे।’
    ‘जमीर से याद आया।’ हाशिम ने एकदम से विषय बदलते हुए कहा- ‘तू किसी अमीर भाई की बात कर रहा था। उनका क्या हुआ।’
    ‘अमीर भाई। अच्छा वो...वो मामला निपट गया यार जैसे-तैसे।’ कहते हुए प्रदीप रेल पटरी से बाहर निकला और दो कदम चलकर फिर पटरी पर चलने लगा था। उसके सामने किसी ‘हल्का’ होने वाले का ‘वजन’ आ गया था। पटरी पर वापस आकर उसने अपनी बात जारी रखी। बोला-‘उस मामले में एसपी साहब ने अच्छा सपोर्ट किया। बाद में समाज के प्रतिष्ठित लोगों से कहकर दोनों के बीच सुलह भी करवा दिया।’ प्रदीप ने जेब से एक और सिगरेट निकालकर सुलगा ली थी। एक सिगरेट उसने हाशिम की ओर भी बढ़ाई थी लेकिन हाशिम ने मना कर दिया तो सिगरेट को जेब में वापस रखते हुए वह बोला-‘कभी-कभी मु­ो लगता है कि अगर मैं बीच में नहीं आया होता, तो दहेज प्रताड़ना के मामले में अमीर भाई का पूरा परिवार अब तक जेल में होता। अच्छे लोग है बेचारे। समाज में अच्छी खासी इज्जत है। बहू भी सम­ादार लगी। पता नहीं कैसे बहकावे में आ गई थी।’ थोड़ा रुककर उसने अपनी बात आगे बढ़ाई। बोला-‘अपने प्रोफेशन में यही एक बात तो है, जो इस पेशे से बांधे हुए है। ग्लैमर, रोमांच और एप्रोच...।’
    ‘तथाकथित।’ हाशिम ने उसकी बात काटकर कहा।
    ‘तथाकथित...।’ प्रदीप ने असमंजस के से भाव में दोहराया। फिर ठहाका लगाकर बोला- ‘ठीक कहता है, तथाकथित ग्लैमर, रोमांच और एप्रोच।’
    तभी उनके पीछे से ट्रेन की सीटी की आवाज सुनाई दी उन्हें। दोनों ने पीछे पलटकर देखा। धमतरी से आने वाली छोटी लाईन की ट्रेन सीटी बजाते हुए आ रही थी। उसे देखकर दोनों पटरी से नीचे उतर गए। ट्रेन जैसे-तैसे जब आगे बढ़ गई तो वे फिर पटरी पर चलने लगे। सामने जाती ट्रेन को देखकर हाशिम बोला-‘ऐसा नहीं लग रहा है, जैसे कोई बूढ़ा मैराथन में दौड़ रहा है। अब गिरा कि तब गिरा।’
    ‘नहीं।’ प्रदीप बोला- ‘ट्रेन मु­ो अपने प्रोफेशन के तथाकथित ग्लैमर, रोमांच और एप्रोच की तरह लग रही है। जैसे ये टेÑन होते हुए भी ट्रेन नहीं है। वैसे ही हमारे प्रोफेशन में ग्लैमर, रोमांच और एप्रोच की स्थिति है, है भी और नहीं भी।’ 
    ‘ये ग्लैमर, रोमांच और अप्रोच, क्या सचमुच हमारे प्रोफेशन में है। कलेक्टर, कमिश्नर और किसी बड़े अधिकारी का हमारा फोन काल रिसीव कर लेना। या विधायक का हमारे कंधे पर हाथ धरकर कहना, और खान साहब, क्या हाल हैं आपके, क्या यही ग्लैमर है।’ चलते-चलते हाशिम ने एक पत्थर को पैर से ठोकर मारते हुए कहा-‘ऐसा तो नहीं कि हमने इनका केवल वहम पाल रखा है।’
    हाशिम के जवाब में प्रदीप ने किसी शाईर का ये शेर अर्ज किया-
    ‘न छीन मु­ासे मेरे रोज-ओ-शब के हंगामे, 
    मैं जी रहा हूं, मु­ो ये गुमान रहने दे।’ 
    शेर मुकम्मल करने के बाद वह बोला-‘यार, वहम ही सही, जी लेने दे इसी खुशफहमी में।’
    ‘वाह!’ हाशिम ने जरा सा अपने सिर को झुकाया और सीधा हाथ माथे पर लगाकर बोला- ‘वाह! क्या बात है।’ 
    ‘शुक्रिया, शुक्रिया।’ प्रदीप भी किसी मं­ो हुए शाईर की तरह थोड़ा झुककर अपना हाथ माथे से लगाते हुए बोला-‘नवाजिश आपकी, जो इस नाचीज़ को आपने इज्जत बख़्शी।’
    बातें करते हुए दोनों आफिस के करीब पहुंच गए थे। लेकिन आफिस के भीतर जाने की बजाए दोनों रमटी की चाय दुकान में जाकर बैठ गए थे। यह उनका रोज का मामूल था। आफिस में दाखिल होने के पहले वे रमटी के हाथ की चाय जरूर पीते थे। 
    ‘परसों एक सज्जन मिले थे।’ चाय का एक घूंट लेते हुए हाशिम बोला-‘मेरे परिचित हैं। पूछ रहे थे, आजकल किस अखबार में हो, क्या देख रहे हो। फिर कहने लगे, चालीस-पैंतालीस हजार सेलरी तो होगी ही।’
    ‘वाह।’ प्रदीप एकदम से चहक कर बोला-‘क्या ख्याल है लोगों का हमारे बारे में, फिर, तू ने क्या कहा।’
    ‘कहता क्या, उनकी हां में हां मिलाना पड़ा। जान-पहचान के और लोग भी बैठे थे वहां। ये थोड़े न कहता कि सेलरी सिर्फ चौदह हजार है। मैंने कहा, नहीं उतनी तो नहीं, तीस हजार के करीब है, तो कहने लगे, आप लोगों को तो ऊपर से भी काफी कुछ मिल जाता है।’ 
    ‘अरे वाह!’ प्रदीप व्यंग्यात्मक लहजे में बोला-‘कहना नहीं था, तेरे मुंह में घी-शक्कर।’
    वे दोनों बाते कर ही रहे थे कि अविनाश भी वहां आ पहुंचा था। वह डेस्क इंचार्ज था और सुबह के समय अक्सर इस बात को लेकर चिढ़ा रहता था कि सुबह की मीटिंग में उसका कोई रोल नहीं है फिर भी उसे बुलाया जाता है। आफिस आते हुए अक्सर वह फटफटिया को घसीटता हुआ ही नजर आता। पूछने पर कहता-‘क्या बताऊं यार। कल ही पचास रुपए का डलवाया था। चार चक्कर तो लग ही जाते हैं। लेकिन इस बार पता नहीं कैसे, तीसरे ही चक्कर में टंकी खाली हो गई।’ तो कभी कहता-‘साली पंक्चर हो गई। पिछले महीने ही नया ट्यूब डलवाया हूं।’ फिर अपनी बात में पुख्तगी पैदा करने के लिए दूसरों को सुनाते हुए बड़बड़ाता-‘बताता हूं, साले दुकानदार को, नकली माल बेचने की एक खबर लगा दूंगा तो होश ठिकाने आ जाएंगे साले के।’ और जब उससे कहा जाता-‘यार, अब त्याग भी दे यार इसे और कोई मोटरसाइकिल फायनेंस करा ले। आजकल तो आसान शर्तों पर फायनेंस हो रहा है। फिर क्यों इतनी तकलीफ ­ोलता है, तो कहता-‘मजीठिया मिल जाने दे, सीधे कार ही फायनांस कराउंगा।’ 
    प्रदीप उसकी मजीठिया वाली बात के जवाब में एक गीत गुनगुनाने लगता-‘तु­ो गीतों में ढालूंगा, सावन को आने दो। सावन को...।’ वह बाकायदा राग भी अलापता और कहता-‘इसे लोरी की तरह गाकर सालों से मैं अपनी पत्नी को थपकी देकर सुला रहा हूं। साले, मजीठिया का सपना देख रहा है, पता नहीं कब मजीठिया का लाभ मिलेगा और कब वो सावन आएगा..।’ 
    अभी वे बातें कर ही रहे थे कि हाशिम का मोबाईल बजने लगा। जेब से मोबाईल निकालकर उसने कालर का नाम पढ़ा फिर साथियों को चुप रहने का इशारा कर मोबाईल कान से लगा लिया। अविनाश और प्रदीप ने महसूस किया कि कुछ देर तक जी-जी करने के बाद हाशिम के चेहरे का रंग बदलने लगा था। उन्हें अंदाज लगाते देर नहीं लगी कि आफिस का ही काल होगा। 
    थोड़ी देर बाद हाशिम ने तनिक गुस्से में कहा-‘ठीक है, मैं आफिस आ रहा हूं। वहीं बात करते हैं।’ कहकर उसने काल ड्राप कर दिया।
    ‘क्या बात है।’ फोन कटते ही प्रदीप ने पूछा-‘कौन था।’
    ‘और कौन होगा।’ हाशिम ­ाुं­ालाकर बोला-‘वही अपने मार्र्केटिंग हेड गुप्ता जी।’ 
    ‘गुप्ता जी, अब उन्हें काए की बदहजमी हो गई।’
    प्रदीप की बातों का कोई जवाब न देकर हाशिम बड़बड़ाया-‘साला, क्या नौकरी है यार। ठेका श्रमिक हो कर रह गए हैं।’
    ‘आखिर बात क्या है। बताएगा।’ 
    तभी रमटी चाय लेकर आ गया। उसके हाथ से चाय का गिलास थामते हुए हाशिम बोला-‘आज एक खबर लगी है अखबार में, उसी को लेकर भड़क रहा था।’ 
    ‘किसकी खबर है।’
    ‘खबर नहीं यार, विज्ञप्ती है। कोई ब्लाक अध्यक्ष नियुक्त हुआ है, उसी की विज्ञप्ति है।’ 
    ‘तो।’
    ‘कह रहा था।’ हाशिम ने चाय का एक लंबा घूंट लेकर कहा-‘इतने सालों से पत्रकारिता कर रहे हो, इतनी भी सम­ा नहीं है कि कौन सी खबर कहां लेना है, कितनी बड़ी लेना है। जिस तरह आपने खबर लगाई है, उससे तो अखबार का भठ्ठा ही बैठ जाना है।’ 
    ‘ऐसा क्या हो गया खबर में।’ अविनाश असंमजस में बोला।
    ‘कह रहा था, खबर सिंगल कालम में लगना था। बंदे की फोटो नहीं लगाना था। आपने तो सारा कुछ एक बार में ही छाप दिया है। खबर छोटी और उसकी फोटो के बिना छपती तो हमारे एक्जीक्यूटिव का दस दो का एक विज्ञापन पक जाता।’
    ‘अब बोलो।’ हाशिम के चुप होते ही अविनाश बोला-‘अब मार्केटिंग वाले हमें बताएंगे कि खबर क्या होती है और उसे किस तरह लगाना है।’ 
    उसके जवाब में प्रदीप ने अंगे्रजी की एक कहावत दोहराई-‘वाइल इन रोम, डू ऐज रोमंस डू।’ फिर बोला-‘जब हम मार्केटिंग वालों के कहने पर गृह राज्य मंत्री की पत्नी के जन्मदिवस पर बुके भेंट करते हुए एक हिस्ट्रीशीटर का फोटो कैप्शन लगा सकते हैं, क्योंकि वह बड़ा विज्ञापनदाता है, और एक दहेज प्रताड़ना के आरोपी प्रोफेसर के आरोपमुक्त होने वाली खबर छापकर स्पेस क्राईम का आरोप ­ोल सकते हैं, गड्ढों से भरी सड़क की एक कंप्लीट खबर को जब हम सिर्फ इसलिए डस्टबिन में डाल सकते हैं क्योंकि ठेकेदार मालिक का दोस्त है और सड़क की ही एक दूसरी खबर को सिर्फ इसलिए लगा सकते हैं क्योंकि उस ठेकेदार की मालिक या संपादक से कोई जान-पहचान नहीं है, तो किसी खबर को मार्केटिंग वालों के कहने पर छोटी बड़ी क्यों नहीं कर  सकते।’  एक मिनट के लिए रुककर प्रदीप ने अपनी बात आगे बढ़ाई। बोला- ‘एक फंडा हमेशा याद रखो, द फंडा इज, दैट बास इज आलवेज राइट। और ये गुमान मत पालो कि कोई तुम्हें बुद्धिजीवी कहकर सम्मानित करता है तो सचमुच तुम बुद्धिजीवी ही हो और तुम्हारे साथ बुद्धिजीवी जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए।’ कहकर वह उठा और हाशिम व अविनाश से बोला-‘अब चलो, मीटिंग का टाईम हो गया। ये समझकर उठो कि रोम जा रहे हैं हम।’ 

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