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    Thursday, 22 January 2026


     

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    Friday, 22 August 2025

    नौशाद अहमद सिद्दीकी

    ✅ नई तहरीक : भिलाई

        अंचल के शायर नौशाद अहमद सिद्दीकी की ग़ज़लों का प्रसारण आकाशवाणी रायपुर रेडियो स्टेशन के साहित्यिक पत्रिका पल्लवी के कार्यक्रम में 23 अगस्त, शनिवार को सुबह 10 बजे होगा। इसकी रिकॉर्डिंग कार्यक्रम प्रभारी संपादक प्रकाश उदय ने की है। 
        इसके अलावा शायर नौशाद सिद्दीकी देश के प्रमुख मंचों पर ससम्मान आमंत्रित किए गए हैं। 24 अगस्त को अखिल भारतीय रेडियो श्रोता सम्मेलन, बागपत (उत्तर प्रदेश) के कार्यक्रम में नौशाद सिद्दीकी का सम्मान किया जाएगा वहीं वे 25 अगस्त को मेरठ सिटी उत्तर प्रदेश में आल इंडिया मुशायरा और कवि सम्मेलन में नामचीन शायरों, कवियों, कवित्रियों के साथ मंच साझा करेंगे। इस उपलब्धि पर साहित्यिक बिरादरी ने नौशाद अहमद सिद्दीकी को शुभकामनाएं दी है।

    बागपत में सम्मानित होंगे शायर नौशाद, आकाशवाणी से प्रसारण आज

    नौशाद अहमद सिद्दीकी

    ✅ नई तहरीक : भिलाई

        अंचल के शायर नौशाद अहमद सिद्दीकी की ग़ज़लों का प्रसारण आकाशवाणी रायपुर रेडियो स्टेशन के साहित्यिक पत्रिका पल्लवी के कार्यक्रम में 23 अगस्त, शनिवार को सुबह 10 बजे होगा। इसकी रिकॉर्डिंग कार्यक्रम प्रभारी संपादक प्रकाश उदय ने की है। 
        इसके अलावा शायर नौशाद सिद्दीकी देश के प्रमुख मंचों पर ससम्मान आमंत्रित किए गए हैं। 24 अगस्त को अखिल भारतीय रेडियो श्रोता सम्मेलन, बागपत (उत्तर प्रदेश) के कार्यक्रम में नौशाद सिद्दीकी का सम्मान किया जाएगा वहीं वे 25 अगस्त को मेरठ सिटी उत्तर प्रदेश में आल इंडिया मुशायरा और कवि सम्मेलन में नामचीन शायरों, कवियों, कवित्रियों के साथ मंच साझा करेंगे। इस उपलब्धि पर साहित्यिक बिरादरी ने नौशाद अहमद सिद्दीकी को शुभकामनाएं दी है।

    Tuesday, 19 August 2025



    satire, story, article, feature, sayeed khan


    - व्यंग्य
    - सईद खान 

        बेगम को कामवाली चाहिए। मैं बोला-‘नौ लखा ले लो।’ 
        वह बोली-‘नहीं, कामवाली।’
        ‘कार, बंगला...।’ मैनें उसके स्त्रीत्व लोभ को कुरेदा।
        ‘नो, सिर्फ कामवाली।’
        ‘कहो तो वैसी साड़ी ला दूं, जैसी नए साल में पड़ोसन पहनी थी।’ मैंने पड़ोसन फंडा आजमाया।
        वह बोली-‘पहले कामवाली।’ वह तटस्थ थी। 
        अगर वह इनमें से किसी एक पर या सभी पर भी राजी हो जाती तो मैं फौरन प्रामिस कर लेता। लेकिन कोई चारा काम न आया। कार, बंगला और नौलखा का प्रलोभन भी नहीं चला। पड़ोसन का फंडा भी फुस्स हो गया।
         मैं आफिस पहुंचा। कामवाली दिमाग में हाथौड़े की तरह बार-बार प्रहार कर रही थी। मेरी परेशानी सुखचैन से छुपी न रह सकी। आखिर उसने पूछ ही लिया-‘क्या बात है बड़े बाबू, आज कुछ परेशान लग रहे हो?’
        ‘हां यार!’ मैं उसके हाथ से फाईल लेते हुए बोला-‘कामवाली नहीं मिल रही है।’
        ‘अरे!’ वह एकदम से चौंककर बोला-‘भाग गई? कब भागी?’ और मेरे कुछ बोलने से पहले ही वह कहता चला गया-‘कामवालियों का कोई भरोसा नहीं बड़े बाबू कि कब भाग जाए।’ थोड़े दिन तो ठीक-ठाक रहती है लेकिन मौका मिलते ही मालमत्ता लेकर चंपत हो जाती है। कभी-कभी तो यह भी सुनाई दे जाता है कि कामवाली अगर थोड़ा ठीक-ठाक हुई तो घर के लड़के ही उसे लेकर नौ-दो ग्यारह हो जाते हैं। वैसे...।’ थोड़ा रुककर वह बोला-‘आपका बेटा तो अभी छोटा है न...।’
        मैंने आंखे तरेरकर उसकी ओर देखा तो वह संभलकर बोला-‘नई, मैं तो यूं ही कह रहा था। वैसे... ज्यादा मालमत्ता लेकर तो नहीं भागी न बड़े बाबू? रपट-वपट लिखवाए या नहीं?’
        ‘नहीं।’ 
        ‘अरे! क्यों?’ं वह बोला-‘सबसे पहले तो रपट ही लिखवानी थी बड़े बाबू। ऐसे मामलों में लापरवाही ठीक नहीं होती। ऐसा कीजिए, अभीच चलिए। मैं भी चलता हूं।’
        ‘यार...।’ मैंने कुछ कहना चाहा।
        लेकिन मेरी बात काटकर वह धाराप्रवाह बोलता रहा-‘नई, अगर मालमत्ता जाने की रपट नहीं लिखवाना है तो मत लिखवाइये। लेकिन कामवाली के भागने की रपट तो जरूर लिखवाइये बड़े बाबू। शर्मा जी ने भी ऐसइच किया था।’ 
        ‘शर्मा जी ने...?’
        ‘हां बड़े बाबू।’ वह तनिक झुककर बोला-‘शर्मा जी की कामवाली तो काफी मालमत्ता लेकर भागी थी। लेकिन उन्होंने रपट लिखवाई सिर्फ कामवाली के भागने की। मुझसे कह रहे थे, यार! अगर मैं यह लिखवाता कि कामवाली मालमत्ता लेकर भागी है तो मेरी इंक्वारी हो जाती। मालमत्ते का क्या है। हाथ का मैल है। चला गया तो चला गया। फिर आ जाएगा।’
        ‘अच्छा।’ 
        ‘और क्या बड़े बाबू। आखिर आप भी तो उसी विभाग में हैं। मालमत्ते का क्या है। हाथ का मैल है। चला गया तो चला गया। फिर आ जाएगा। आ ही जाएगा। क्यों। वैसे.. गया कितना है?’ ढंग ऐसा था, जैसे सुखचैन के भेष में सामने जेम्स बांड खड़ा है।
        मैं बोला-‘एक भी नहीं।’
        ‘अंय।’ वह एकदम से सीधा हो गया। फिर बोला-‘चलो अच्छा हुआ। अच्छा हुआ कि खाली हाथ भागी। मालमत्ता लेकर भागती तो मुश्किल हो जाती।’
        ‘यार।’ मैं तनिक झल्लाकर बोला-‘तुम मेरी भी कुछ सुनोगे।’ 
        ‘हां-हां। बोलिए न बड़े बाबू।’ 
        ‘मेरी कामवाली नहीं भागी है।’
        ‘अंय। लेकिन अभी तो आप कह रहे थे...।’
        ‘मैंने कहा था, नहीं मिल रही है।’
        ‘तो मतलब तो वोइच हुआ न बड़े बाबू। भागी है तब तो नहीं मिल रही है।’
        ‘नहीं।’ मैं बोला -‘थी ही नहीं। होती तो भागती न?’
        ‘अरे! तो ऐसा बोलते न बड़े बाबू।’ वह बोला-‘आप बोले, नहीं मिल रही है तो मैंने समझा भाग गई है तो नहीं मिल रही है।’
        ‘अच्छा, सुनो।’ उसकी बकवास से तंग आकर मैं बोला-‘तुम्हारी नजर में है कोई?’
        ‘कई हैं।’ वह एक झटके से बोला-‘कहिए तो एकाध सेट कर दूं।’
        ‘सेट कर दूं मतलब?’ मैंने तनिक चैंककर कर पूछा।
        वह बोला-‘सेट कर दूं मतलब। सेट कर दूं, और क्या? पता तो चले कि आपको कामवाली चाहिए किसलिए? घर के लिए, पर्सनल यूज के लिए या बास के लिए?’
        ‘मुझे घर के लिए चाहिए।’ मैं जल्दी से बोला।
        ‘घर के लिए...।’ वह एक पल कुछ सोचकर बोला-‘तो फिर घर टाइप देखनी पड़ेगी। यानि थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। लेकिन मिल जाएगी। ऐसा कीजिए, आज आफिस के बाद आप मेरे साथ ही चलिए।’
        आफिस के बाद सुखचैन मुझे लेकर एक गंदी सी बस्ती में गया। वहां एक घर के सामने स्कूटर रुकवाकर ‘अभी आया’ कहते हुए वह घर के अंदर घुस गया।
        थोड़ी देर बाद एक अधेड़ उम्र की औरत के साथ वह बाहर निकला।
        वह लीला थी। वह बोली-‘मेरे पास तो टेम नहीं है। आप सावित्री से मिल लीजिए।’
        सावित्री का पता उसने सुखचैन को समझा दी थी।
        हम सावित्री के घर पहुंचे। सावित्री ने हमें कमला के पास भेज दी। कमला ने विमला के पास। विमला बोली-‘सविता को देख लो। शायद वह खाली हो। हम सविता के पास पहुंचे। वह बोली -‘मेरे पास तो पहले ही छह घर हैं।’
        हमें वहां से बैंरग लौटना पड़ा।
        घर लौटते हुए रास्ते में सुखचैन बोला-‘चिंता की बात नहीं है बड़े बाबू। कल हम फिर निकलेंगे इस अभियान पर।’
        घर लौटा तो बेगम फिर भिनक गई। एक तो देर से घर लौट रहा था। दूसरा ये कि उसे सुनाने के लिए कामवाली से संबंधित कोई शुभ समाचार भी नहीं था मेरे पास। ‘कैसे मर्द हो तुम? एक कामवाली भी नहीं ढूंढ सकते...।’ जैसा कटु वचन सुनकर भी कामवाली ढूंढने के निमित्त आज की अपनी कोशिश का ब्यौरा मैं उसे नहीं दे सका। कोई फायदा नहीं होता। उसे तो रिजल्ट चाहिए था।
        दूसरे दिन आफिस जाते हुए मैं सोच रहा था कि कुछ दिनों की छुट्टी लेकर सिर्फ एक सूत्रीय काम किया जाए। कामवाली ढूंढने का। सो आफिस पहुंच कर सबसे पहला काम जो मैंने किया, वह था, छुट्टी के लिए आवेदन लिखकर बास के सामने खड़े होने का।
        वे बोले-‘क्या बात है?’
        मैं बोला-‘सर। मुझे छुट्टी चाहिए। पूरे एक हफ्ते की। इटस एन इमरजेंसी।’
        बॉस जरा भी विचलित नहीं हुए। पूर्ववत फाइल देखते हुए बोले-‘तुम्हारी सास पिछले हफ्ते ही बाथरूम में फिसलकर गिरी थी जिससे उनकी कमर में फे्रक्चर गया था। साढू की बिटिया की शादी भी हो गई है। साले का रिश्ता तय करने के नाम पर भी तुम छुट्टी ले चुके हो। अब क्या बहाना लेकर आए हो?’
        ‘बहाना नहीं सर।’ मैं बोला-‘इस बार मेरे पास जेनुइन कारण है। मुझे कामवाली ढूंढने के लिए छुट्टी चाहिए।’
        ‘कामवाली?’ बास ने चैंक कर मेरी ओर देखा।
        मैंने कहा-‘जी सर।’
        मेरा आवेदन फौरन मंजूर हो गया। दस्तखत करते हुए बास बोले-‘यार! अगर कोई ढंग की मिले तो एकाध मेरी वाइफ के लिए भी देख लेना।’
        हफ्ते भर की छुटटी का एक-एक पल कामवाली ढूंढने में गुजर गया। लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। इस चक्कर में वजन घटकर आधा हो गया। रंग काला पड़ गया और बाल भी काफी झड़ गए। अपने फीगर में आए इस क्रांतिकारी परिवर्तन का अहसास मुझे आफिस ज्वायन करते ही हो गया था। शीला अब घोष दादा के बगल में बैठने लगी थी।
        बीवी की प्रताड़ना का क्रम भी जारी थी। शीला का मेरे बगल से कुर्सी हटाकर घोष दादा के बगल में बैठने की हरकत से मन पहले ही कुंठा से भरा हुआ था कि एक दिन सुखचैन आया। आते ही बोला-‘बड़े बाबू। मिल गई।’
        ‘अच्छा।’ मैं फाईल के पन्ने पलटते हुए बोला-‘ऐसा करो, उसे शर्मा जी के पास ले जाओ। उनसे कहना, एक सरसरी नजर डालकर बास के केबिन में भेज दें।’
        ‘क्या?’ सुखचैन चौंककर बोला-‘क्या बोल रय हो बड़े बाबू?’
        ‘अरे यार।’ फाईल एक झटके से बंद कर मैं तनिक झल्लाकर बोला-‘मैं उसे निपटा चुका हंू। शर्मा जी देख लें तो बास का दस्तखत करवाकर वापस ले आना।’
        ‘किसकी बात कर रय हो बड़े बाबू?’
        ‘लेबर फाइल की। और किसकी।’
        ‘ओह!’ सुखचैन जरा झुककर बोला-‘लेकिन मैं तो कामवाली की बात कर रहा हंू। कामवाली की। एक नंबर की कामवाली ढूंढकर रखा हूं मैं आपके लिए।’
        ‘कामवाली?’ मैं एकदम से उछलकर खड़ा ही हो गया।
        थोड़ी देर बाद मैं सुखचैन के साथ लीला की उसी गंदी सी बस्ती में एक घर के सामने खड़ा दरवाजा खुलने का इंतजार कर रहा था। दूसरी बार दरवाजा खटखटाने पर पच्चीस-छब्बीस वर्षीय एक युवती ने दरवाजा खोला। उसे देखकर सुखचैन ने मुझसे कहा, ‘ये रामकली है। मैं इसी की बात कर रहा था। कल ही गांव से लौटी है।’
        तीखे नाक-नक्श की वह युवती कहीं से भी कमवाली नजर नहीं आ रही थी। मैं उसे ऊपर से नीचे तक देखकर सुखचैन से बोला-‘ये कामवाली है?’
        ‘और कैसी चाहिए बड़े बाबू आपको?’ मेरा आशय न समझते हुए वह बोला-‘फस्स क्लास तो है।’
        बाकी बातें मैंने रामकली से की। उसे काम की तलाश थी और मुझे कामवाली की। अंतत: डीलिंग हो गई। वह बोली-‘मैं कल से आउंगी।’
        घर लौटते हुए, रास्ते में सुखचैन मुझसे बोला-‘बड़े बाबू, आज तो आप ऐसे खुश नजर आ रहे हैं जैसे आपका डबल प्रमोशन हो गया हो।’
        ‘हां, और ये खुशी मुझे तुम्हारी वजह से मिली है।’ मैं एक होटल के सामने स्कूटर खड़ी करते हुए बोला-‘चलो, आज इसी खुशी में तुम्हे बढ़िया नाश्ता कराता हूं।’
        नाश्ता करते हुए सुखचैन बोला-‘मेरे आठ बच्चे है बड़े बाबू। बूढ़े माता-पिता भी साथ ही रहते हैं। और घर भी पुश्तैनी है। पुराने जमाने का। आज के छोटे-छोटे चार फ्लैट के बराबर। पूरे घर की देखभाल पत्नी के ही जिम्मे है। घर के अलावा बच्चों की, मेरी और माता-पिता की साज-संभाल भी वही करती है।’
        ‘अकेले?’
        ‘जी हां।’
        ‘कोई कामवाली क्यों नही रख लेते?’
        ‘कामवाली।’ सुखचैन एक रसगुल्ला उठा कर मुंह में रखते हुए बोला-‘मेरी पत्नी को पसंद नहीं कि उसके हिस्से का काम कोई और करे। घर का काम करने में उसे आनंद आता है।’
        सुखचैन ने जवाब तो सहजता से दिया था लेकिन मुझे लगा कि वह मुझे लताड़ रहा है।
        दूसरे दिन नियत समय पर रामकली घर आ गई।
        मंै उस वक्त नहा कर बाहर निकला था और अफिस के लिए तैयार हो रहा था, जब रामकली ने घंटी बजाई। दरवाजा पत्नी ने खोला। तब तक मैं भी वहां पहुंच गया था। दरवाजे पर रामकली को देखकर मैं चहका -‘ओह! रामकली। तू आ गई।’ कहकर मैंने पत्नी से रामकली का परिचय कराया। रामकली को ऊपर से नीचे तक देखते हुए बेगम की आंखे क्रमश: फैलती रही। रामकली का अच्छी तरह मुआएना करने के बाद, जब बेगम ने मेरी ओर देखा तो उसकी फैली-फैली आंखों में मैं अपने लिए प्रशंसा के भाव तलाश रहा था। लेकिन वहां प्रशंसा की बजाए शोले भड़क रहे थे। मैं समझ गया कि यह रामकली की कमसिन उमर और उसकी गठी हुई देहयष्टि का असर है। अगर मजबूरी नहीं होती तो तय था कि बेगम उसी क्षण रामकली को धक्के देकर भगा दी होती और मेरी सात पुश्तों के पुल्लिंग वर्ग को बदचलन करार दे रही होती।
        शाम को जब मैं आफिस से लौटा तो रामकली हाल में सफाई कर रही थी और बेगम किचन में मशरूफ थी। मैं सीधे अपने कमरे में चला गया और फाइल वगैरह यथास्थान रखते हुए रामकली को आवाज देकर चाय लाने के लिए कहा।
        थोड़ी देर बाद, हाथों में चाय की ट्े थामें रामकली की जगह बेगम दनदनाते हुए कमरे में नमुदार हुई और चाय की ट्े मेरे सामने पटकते हुए बोली-‘खबरदार! जो आज के बाद किसी काम के लिए तुमने रामकली को आवाज दी तो। मंै मर गई हंू क्या?’
        मुझे सहसा सुखचैन की याद हो आई। उसकी पत्नी को घर का काम करने में आनंद आता था। मेरी बेगम को यह आनंद कमसिन रामकली के आने के बाद आने लगा था। शायद।

    कामवाली



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    - व्यंग्य
    - सईद खान 

        बेगम को कामवाली चाहिए। मैं बोला-‘नौ लखा ले लो।’ 
        वह बोली-‘नहीं, कामवाली।’
        ‘कार, बंगला...।’ मैनें उसके स्त्रीत्व लोभ को कुरेदा।
        ‘नो, सिर्फ कामवाली।’
        ‘कहो तो वैसी साड़ी ला दूं, जैसी नए साल में पड़ोसन पहनी थी।’ मैंने पड़ोसन फंडा आजमाया।
        वह बोली-‘पहले कामवाली।’ वह तटस्थ थी। 
        अगर वह इनमें से किसी एक पर या सभी पर भी राजी हो जाती तो मैं फौरन प्रामिस कर लेता। लेकिन कोई चारा काम न आया। कार, बंगला और नौलखा का प्रलोभन भी नहीं चला। पड़ोसन का फंडा भी फुस्स हो गया।
         मैं आफिस पहुंचा। कामवाली दिमाग में हाथौड़े की तरह बार-बार प्रहार कर रही थी। मेरी परेशानी सुखचैन से छुपी न रह सकी। आखिर उसने पूछ ही लिया-‘क्या बात है बड़े बाबू, आज कुछ परेशान लग रहे हो?’
        ‘हां यार!’ मैं उसके हाथ से फाईल लेते हुए बोला-‘कामवाली नहीं मिल रही है।’
        ‘अरे!’ वह एकदम से चौंककर बोला-‘भाग गई? कब भागी?’ और मेरे कुछ बोलने से पहले ही वह कहता चला गया-‘कामवालियों का कोई भरोसा नहीं बड़े बाबू कि कब भाग जाए।’ थोड़े दिन तो ठीक-ठाक रहती है लेकिन मौका मिलते ही मालमत्ता लेकर चंपत हो जाती है। कभी-कभी तो यह भी सुनाई दे जाता है कि कामवाली अगर थोड़ा ठीक-ठाक हुई तो घर के लड़के ही उसे लेकर नौ-दो ग्यारह हो जाते हैं। वैसे...।’ थोड़ा रुककर वह बोला-‘आपका बेटा तो अभी छोटा है न...।’
        मैंने आंखे तरेरकर उसकी ओर देखा तो वह संभलकर बोला-‘नई, मैं तो यूं ही कह रहा था। वैसे... ज्यादा मालमत्ता लेकर तो नहीं भागी न बड़े बाबू? रपट-वपट लिखवाए या नहीं?’
        ‘नहीं।’ 
        ‘अरे! क्यों?’ं वह बोला-‘सबसे पहले तो रपट ही लिखवानी थी बड़े बाबू। ऐसे मामलों में लापरवाही ठीक नहीं होती। ऐसा कीजिए, अभीच चलिए। मैं भी चलता हूं।’
        ‘यार...।’ मैंने कुछ कहना चाहा।
        लेकिन मेरी बात काटकर वह धाराप्रवाह बोलता रहा-‘नई, अगर मालमत्ता जाने की रपट नहीं लिखवाना है तो मत लिखवाइये। लेकिन कामवाली के भागने की रपट तो जरूर लिखवाइये बड़े बाबू। शर्मा जी ने भी ऐसइच किया था।’ 
        ‘शर्मा जी ने...?’
        ‘हां बड़े बाबू।’ वह तनिक झुककर बोला-‘शर्मा जी की कामवाली तो काफी मालमत्ता लेकर भागी थी। लेकिन उन्होंने रपट लिखवाई सिर्फ कामवाली के भागने की। मुझसे कह रहे थे, यार! अगर मैं यह लिखवाता कि कामवाली मालमत्ता लेकर भागी है तो मेरी इंक्वारी हो जाती। मालमत्ते का क्या है। हाथ का मैल है। चला गया तो चला गया। फिर आ जाएगा।’
        ‘अच्छा।’ 
        ‘और क्या बड़े बाबू। आखिर आप भी तो उसी विभाग में हैं। मालमत्ते का क्या है। हाथ का मैल है। चला गया तो चला गया। फिर आ जाएगा। आ ही जाएगा। क्यों। वैसे.. गया कितना है?’ ढंग ऐसा था, जैसे सुखचैन के भेष में सामने जेम्स बांड खड़ा है।
        मैं बोला-‘एक भी नहीं।’
        ‘अंय।’ वह एकदम से सीधा हो गया। फिर बोला-‘चलो अच्छा हुआ। अच्छा हुआ कि खाली हाथ भागी। मालमत्ता लेकर भागती तो मुश्किल हो जाती।’
        ‘यार।’ मैं तनिक झल्लाकर बोला-‘तुम मेरी भी कुछ सुनोगे।’ 
        ‘हां-हां। बोलिए न बड़े बाबू।’ 
        ‘मेरी कामवाली नहीं भागी है।’
        ‘अंय। लेकिन अभी तो आप कह रहे थे...।’
        ‘मैंने कहा था, नहीं मिल रही है।’
        ‘तो मतलब तो वोइच हुआ न बड़े बाबू। भागी है तब तो नहीं मिल रही है।’
        ‘नहीं।’ मैं बोला -‘थी ही नहीं। होती तो भागती न?’
        ‘अरे! तो ऐसा बोलते न बड़े बाबू।’ वह बोला-‘आप बोले, नहीं मिल रही है तो मैंने समझा भाग गई है तो नहीं मिल रही है।’
        ‘अच्छा, सुनो।’ उसकी बकवास से तंग आकर मैं बोला-‘तुम्हारी नजर में है कोई?’
        ‘कई हैं।’ वह एक झटके से बोला-‘कहिए तो एकाध सेट कर दूं।’
        ‘सेट कर दूं मतलब?’ मैंने तनिक चैंककर कर पूछा।
        वह बोला-‘सेट कर दूं मतलब। सेट कर दूं, और क्या? पता तो चले कि आपको कामवाली चाहिए किसलिए? घर के लिए, पर्सनल यूज के लिए या बास के लिए?’
        ‘मुझे घर के लिए चाहिए।’ मैं जल्दी से बोला।
        ‘घर के लिए...।’ वह एक पल कुछ सोचकर बोला-‘तो फिर घर टाइप देखनी पड़ेगी। यानि थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। लेकिन मिल जाएगी। ऐसा कीजिए, आज आफिस के बाद आप मेरे साथ ही चलिए।’
        आफिस के बाद सुखचैन मुझे लेकर एक गंदी सी बस्ती में गया। वहां एक घर के सामने स्कूटर रुकवाकर ‘अभी आया’ कहते हुए वह घर के अंदर घुस गया।
        थोड़ी देर बाद एक अधेड़ उम्र की औरत के साथ वह बाहर निकला।
        वह लीला थी। वह बोली-‘मेरे पास तो टेम नहीं है। आप सावित्री से मिल लीजिए।’
        सावित्री का पता उसने सुखचैन को समझा दी थी।
        हम सावित्री के घर पहुंचे। सावित्री ने हमें कमला के पास भेज दी। कमला ने विमला के पास। विमला बोली-‘सविता को देख लो। शायद वह खाली हो। हम सविता के पास पहुंचे। वह बोली -‘मेरे पास तो पहले ही छह घर हैं।’
        हमें वहां से बैंरग लौटना पड़ा।
        घर लौटते हुए रास्ते में सुखचैन बोला-‘चिंता की बात नहीं है बड़े बाबू। कल हम फिर निकलेंगे इस अभियान पर।’
        घर लौटा तो बेगम फिर भिनक गई। एक तो देर से घर लौट रहा था। दूसरा ये कि उसे सुनाने के लिए कामवाली से संबंधित कोई शुभ समाचार भी नहीं था मेरे पास। ‘कैसे मर्द हो तुम? एक कामवाली भी नहीं ढूंढ सकते...।’ जैसा कटु वचन सुनकर भी कामवाली ढूंढने के निमित्त आज की अपनी कोशिश का ब्यौरा मैं उसे नहीं दे सका। कोई फायदा नहीं होता। उसे तो रिजल्ट चाहिए था।
        दूसरे दिन आफिस जाते हुए मैं सोच रहा था कि कुछ दिनों की छुट्टी लेकर सिर्फ एक सूत्रीय काम किया जाए। कामवाली ढूंढने का। सो आफिस पहुंच कर सबसे पहला काम जो मैंने किया, वह था, छुट्टी के लिए आवेदन लिखकर बास के सामने खड़े होने का।
        वे बोले-‘क्या बात है?’
        मैं बोला-‘सर। मुझे छुट्टी चाहिए। पूरे एक हफ्ते की। इटस एन इमरजेंसी।’
        बॉस जरा भी विचलित नहीं हुए। पूर्ववत फाइल देखते हुए बोले-‘तुम्हारी सास पिछले हफ्ते ही बाथरूम में फिसलकर गिरी थी जिससे उनकी कमर में फे्रक्चर गया था। साढू की बिटिया की शादी भी हो गई है। साले का रिश्ता तय करने के नाम पर भी तुम छुट्टी ले चुके हो। अब क्या बहाना लेकर आए हो?’
        ‘बहाना नहीं सर।’ मैं बोला-‘इस बार मेरे पास जेनुइन कारण है। मुझे कामवाली ढूंढने के लिए छुट्टी चाहिए।’
        ‘कामवाली?’ बास ने चैंक कर मेरी ओर देखा।
        मैंने कहा-‘जी सर।’
        मेरा आवेदन फौरन मंजूर हो गया। दस्तखत करते हुए बास बोले-‘यार! अगर कोई ढंग की मिले तो एकाध मेरी वाइफ के लिए भी देख लेना।’
        हफ्ते भर की छुटटी का एक-एक पल कामवाली ढूंढने में गुजर गया। लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। इस चक्कर में वजन घटकर आधा हो गया। रंग काला पड़ गया और बाल भी काफी झड़ गए। अपने फीगर में आए इस क्रांतिकारी परिवर्तन का अहसास मुझे आफिस ज्वायन करते ही हो गया था। शीला अब घोष दादा के बगल में बैठने लगी थी।
        बीवी की प्रताड़ना का क्रम भी जारी थी। शीला का मेरे बगल से कुर्सी हटाकर घोष दादा के बगल में बैठने की हरकत से मन पहले ही कुंठा से भरा हुआ था कि एक दिन सुखचैन आया। आते ही बोला-‘बड़े बाबू। मिल गई।’
        ‘अच्छा।’ मैं फाईल के पन्ने पलटते हुए बोला-‘ऐसा करो, उसे शर्मा जी के पास ले जाओ। उनसे कहना, एक सरसरी नजर डालकर बास के केबिन में भेज दें।’
        ‘क्या?’ सुखचैन चौंककर बोला-‘क्या बोल रय हो बड़े बाबू?’
        ‘अरे यार।’ फाईल एक झटके से बंद कर मैं तनिक झल्लाकर बोला-‘मैं उसे निपटा चुका हंू। शर्मा जी देख लें तो बास का दस्तखत करवाकर वापस ले आना।’
        ‘किसकी बात कर रय हो बड़े बाबू?’
        ‘लेबर फाइल की। और किसकी।’
        ‘ओह!’ सुखचैन जरा झुककर बोला-‘लेकिन मैं तो कामवाली की बात कर रहा हंू। कामवाली की। एक नंबर की कामवाली ढूंढकर रखा हूं मैं आपके लिए।’
        ‘कामवाली?’ मैं एकदम से उछलकर खड़ा ही हो गया।
        थोड़ी देर बाद मैं सुखचैन के साथ लीला की उसी गंदी सी बस्ती में एक घर के सामने खड़ा दरवाजा खुलने का इंतजार कर रहा था। दूसरी बार दरवाजा खटखटाने पर पच्चीस-छब्बीस वर्षीय एक युवती ने दरवाजा खोला। उसे देखकर सुखचैन ने मुझसे कहा, ‘ये रामकली है। मैं इसी की बात कर रहा था। कल ही गांव से लौटी है।’
        तीखे नाक-नक्श की वह युवती कहीं से भी कमवाली नजर नहीं आ रही थी। मैं उसे ऊपर से नीचे तक देखकर सुखचैन से बोला-‘ये कामवाली है?’
        ‘और कैसी चाहिए बड़े बाबू आपको?’ मेरा आशय न समझते हुए वह बोला-‘फस्स क्लास तो है।’
        बाकी बातें मैंने रामकली से की। उसे काम की तलाश थी और मुझे कामवाली की। अंतत: डीलिंग हो गई। वह बोली-‘मैं कल से आउंगी।’
        घर लौटते हुए, रास्ते में सुखचैन मुझसे बोला-‘बड़े बाबू, आज तो आप ऐसे खुश नजर आ रहे हैं जैसे आपका डबल प्रमोशन हो गया हो।’
        ‘हां, और ये खुशी मुझे तुम्हारी वजह से मिली है।’ मैं एक होटल के सामने स्कूटर खड़ी करते हुए बोला-‘चलो, आज इसी खुशी में तुम्हे बढ़िया नाश्ता कराता हूं।’
        नाश्ता करते हुए सुखचैन बोला-‘मेरे आठ बच्चे है बड़े बाबू। बूढ़े माता-पिता भी साथ ही रहते हैं। और घर भी पुश्तैनी है। पुराने जमाने का। आज के छोटे-छोटे चार फ्लैट के बराबर। पूरे घर की देखभाल पत्नी के ही जिम्मे है। घर के अलावा बच्चों की, मेरी और माता-पिता की साज-संभाल भी वही करती है।’
        ‘अकेले?’
        ‘जी हां।’
        ‘कोई कामवाली क्यों नही रख लेते?’
        ‘कामवाली।’ सुखचैन एक रसगुल्ला उठा कर मुंह में रखते हुए बोला-‘मेरी पत्नी को पसंद नहीं कि उसके हिस्से का काम कोई और करे। घर का काम करने में उसे आनंद आता है।’
        सुखचैन ने जवाब तो सहजता से दिया था लेकिन मुझे लगा कि वह मुझे लताड़ रहा है।
        दूसरे दिन नियत समय पर रामकली घर आ गई।
        मंै उस वक्त नहा कर बाहर निकला था और अफिस के लिए तैयार हो रहा था, जब रामकली ने घंटी बजाई। दरवाजा पत्नी ने खोला। तब तक मैं भी वहां पहुंच गया था। दरवाजे पर रामकली को देखकर मैं चहका -‘ओह! रामकली। तू आ गई।’ कहकर मैंने पत्नी से रामकली का परिचय कराया। रामकली को ऊपर से नीचे तक देखते हुए बेगम की आंखे क्रमश: फैलती रही। रामकली का अच्छी तरह मुआएना करने के बाद, जब बेगम ने मेरी ओर देखा तो उसकी फैली-फैली आंखों में मैं अपने लिए प्रशंसा के भाव तलाश रहा था। लेकिन वहां प्रशंसा की बजाए शोले भड़क रहे थे। मैं समझ गया कि यह रामकली की कमसिन उमर और उसकी गठी हुई देहयष्टि का असर है। अगर मजबूरी नहीं होती तो तय था कि बेगम उसी क्षण रामकली को धक्के देकर भगा दी होती और मेरी सात पुश्तों के पुल्लिंग वर्ग को बदचलन करार दे रही होती।
        शाम को जब मैं आफिस से लौटा तो रामकली हाल में सफाई कर रही थी और बेगम किचन में मशरूफ थी। मैं सीधे अपने कमरे में चला गया और फाइल वगैरह यथास्थान रखते हुए रामकली को आवाज देकर चाय लाने के लिए कहा।
        थोड़ी देर बाद, हाथों में चाय की ट्े थामें रामकली की जगह बेगम दनदनाते हुए कमरे में नमुदार हुई और चाय की ट्े मेरे सामने पटकते हुए बोली-‘खबरदार! जो आज के बाद किसी काम के लिए तुमने रामकली को आवाज दी तो। मंै मर गई हंू क्या?’
        मुझे सहसा सुखचैन की याद हो आई। उसकी पत्नी को घर का काम करने में आनंद आता था। मेरी बेगम को यह आनंद कमसिन रामकली के आने के बाद आने लगा था। शायद।

    Thursday, 3 July 2025

     मोहर्रम उल हराम, 1447 हिजरी 

                                                                                 फरमाने रसूल   

    "रसुल अल्लाह ﷺ ने एक शख्स को सूरह अखलास पढ़ते हुए सुना तो फरमाया, इसके लिए जन्नत वाजिब हो गई।"

    - जमाह तिर्मिज़ी 


    Hajj, Umra, Saudi Arebia, Makka, Madina, Read Me
    ✅ नई तहरीक : रियाद 
    हज के मनासिक से फारिग होकर बेशतर हुज्जाज रूहानियत के एक गहरे सफ़र पर गामज़न हो गए और सऊदी अरब में बिखरी इस्लाम के तारीख़ी मुक़ामात का रूहानी सफर किया। 
        मक्का मुकर्रमा में हुज्जाज कराम ने जबल-ए-नूर का रूख किया। नूर का पहाड़ नामी इस पहाड़ की चोटी पर ग़ार-ए-हिरा वाके है, जहां हज़रत जिब्राईल पहली वही लेकर आए थे। ऊंट के कोहान जैसी शक्ल जबले नूर के क़रीब ही हिरा कल्चरल डिस्ट्रिक्ट की 'रेवीलेशन गैलरी है, जहां हुज्जाज को अपनी मालूमात में इज़ाफे़ के लिए इस्लामी तारीख़ के औराक़ पलटने का बेहतरीन मौका मिलता है। 

    Hajj, Umra, Saudi Arebia, Makka, Madina, Read Me


        हुज्जाज कहते हैं 'जहां से ये सब कुछ शुरू हुआ, वहां खड़े हो कर ऐसा लगता है कि अभी कुछ और जानना बाक़ी है। यहां पहुंचने पर बहुत से लोगों की आँखों में आँसू होते हैं। ये सिर्फ एक चढ़ाई नहीं है, ये रुहानी बेदारी है।
        जबले नूर के जुनूब में, जबल-ए-सौर है। ये वो पहाड़ है जो पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 और उनके सहाबी हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ के लिए उस वक़्त ना दिखाई देने वाला गहोरा बन गया था, जब वो मदीने को हिज्रत कर रहे थे।
        ये मुक़द्दस कहानी अब भी हुज्जाज को बहुत अच्छी तरह उस वाक़े की याद दिलाती है, जब मकड़ी ने ग़ार के दहाने पर जाला बुन दिया था और कुमरी ने घोंसला बना दिया था ताकि ख़ुदा के पैग़ंबर और उनके साथी को कोई देख ना सके।

    Hajj, Umra, Saudi Arebia, Makka, Madina, Read Me


        एक और मुक़ाम जहां हुज्जाज अक्सर जाते हैं, वो जबल-ए-अबूओक़ुबीस है, जिसके बारे में रिवायत है कि इस पहाड़ को पहली बार ज़मीन की गोद में रखा गया। ये पहाड़, मस्जिद उल-हराम से क़रीब है और पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 की तरफ़ से दीन की इबतिदाई दावत और भारी रुहानी ज़िम्मेदारी की याद दिलाता है। पास में, नमूद नुमाइश से बेनयाज़ मगर तारीख़ी लिहाज़ से अहम, मस्जिद अलाकबा है, जहां अंसार-ए-मदीना ने पैगंबर-ए-इस्लाम 000 के दस्त-ए-मुबारक पर बैअत की थी।
        अब्बासी दौर में तामीर होने वाली ये मस्जिद, मुस्लमानों के दीन पर कारबन्द रहने के अह्द और इबतिदाई इस्लामी उखूवत-ओ-इत्तिहाद की अलामत है।
        इस मुक़ाम से थोड़े ही फ़ासले पर अलहजून का ज़िला है, जहां जबल-ए-सय्यदा वाके है। इस पहाड़ की बुनियाद के नज़दीक मुकब्बिर-ए-अलमाला है, जो पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 की इंतिहाई अज़ीज़ अहलिया अमीर उल मोमेनीन हज़रत ख़दीजा की आख़िरी आरामगाह है और जो आज भी बेहद एहतिराम का मर्कज़ है।  हुज्जाज उन मुक़ामात की जियारत को जाना ज्यादा पसंद करते हैं जहां ऐसे अफ़राद की क़ुर्बानीयों को समझने में मदद मिलती है, जिन्होंने इस्लाम की तशकील साज़ी की।
        मदीने की अपनी ही एक लाज़वाल विरासत है। यहां मस्जिद-ए-किब्लातैन है जहां नमाज़ के दौरान पैग़ंबर-ए-इस्लाम पर वही नाज़िल हुई जिसके बाद आप 999  ने यरूशलम के बजाय अपना रूख मक्का की जानिब मोड़ लिया। इस लम्हे ने मुस्लमानों की अलहदा शिनाख़्त क़ायम करने में एक इंतिहाई अहम तबदीली की बुनियाद डाल दी। 
        मस्जिद-ए-नबवी से जानिब-ए-मग़रिब, सात मसाजिद हैं। उनमें हर मस्जिद किसी ना किसी तरह जंग ख़ंदक़ के किसी वाक़े से जुड़ी हुई है। इन मसाजिद में अलिफ़ता मस्जिद के अलावा दीगर मसाजिद किसी शख़्सियत के नाम पर है। मसलन यहां की तीन मसाजिद के नाम मस्जिद-ए-फ़ातिमा, मस्जिद-ए-अली इब्न-ए-अबी तालिब और मस्जिद-ए-सलमान फ़ारसी हैं। ये मसाजिद, इस्लाम की तारीख़ से भरी पड़ी हैं और इस्लाम की अहम तरीन जंगी मुहिम्मात के दौरान जो मुश्किलात दरपेश हुईं, उनकी यादगार भी हैं।
        अहद का पहाड़, मदीना से शुमाल की जानिब है और इसकी ढलान जंग अहद और इस मुक़ाम की याद दिलाती है जहां पैग़ंबर-ए-इस्लाम के चचा हज़रत हमज़ा इब्न-ए-अबदुल मुतलिब और लश्कर के 70 जान-निसार शहीद हुए थे। आज जब हुज्जाज इस क़ब्रिस्तान के पास से गुज़रते हैं तो उन शहीदों के एहतिराम में चंद लम्हों के लिए ख़ामोश हो जाते हैं। 



        एक अरसा बीत चुका है लेकिन मस्जिद-ए-नबवी के क़रीब वाके उस क़ब्रिस्तान के पास आ कर हुज्जाज आज भी दुआ करते हैं और इस्लाम के अहद-ए-रफ़्ता को याद करते हैं। इस मुक़ाम पर हुज्जाज को इन शख़्सियात से एक राबिता सा महसूस होता है जो इस्लाम के इबतिदाई बरसों में बानी-ए-इस्लाम के साथ खड़े रहे।
        मुक़ामात-ए-मुक़द्दसा के अलावा भी दीगर ऐसी कई जगहें हैं जो रूहानियत में बेशक़ीमत इज़ाफ़ा करने के लिए उन्हें अपनी तरफ़ मुतवज्जा करती हैं। उनमें मदीना के शुमाल मग़रिब की तरफ़ वाके मुक़ाम ख़ैबर है जहां इस्लाम के ख़िलाफ़ एक मर्कज़ी फ़ौजी मुहिम का आग़ाज़ हुआ था। यहीं पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 की क़ियादत के अख़लाक़ी और जंगी हिकमत-ए-अमली के मुख़्तलिफ़ पहलू यकजा हो कर सामने आते हैं।

    हज की अदायगी के बाद हाजियों ने किया तारीखी मुकामात का रूहानी सफर

     मोहर्रम उल हराम, 1447 हिजरी 

                                                                                 फरमाने रसूल   

    "रसुल अल्लाह ﷺ ने एक शख्स को सूरह अखलास पढ़ते हुए सुना तो फरमाया, इसके लिए जन्नत वाजिब हो गई।"

    - जमाह तिर्मिज़ी 


    Hajj, Umra, Saudi Arebia, Makka, Madina, Read Me
    ✅ नई तहरीक : रियाद 
    हज के मनासिक से फारिग होकर बेशतर हुज्जाज रूहानियत के एक गहरे सफ़र पर गामज़न हो गए और सऊदी अरब में बिखरी इस्लाम के तारीख़ी मुक़ामात का रूहानी सफर किया। 
        मक्का मुकर्रमा में हुज्जाज कराम ने जबल-ए-नूर का रूख किया। नूर का पहाड़ नामी इस पहाड़ की चोटी पर ग़ार-ए-हिरा वाके है, जहां हज़रत जिब्राईल पहली वही लेकर आए थे। ऊंट के कोहान जैसी शक्ल जबले नूर के क़रीब ही हिरा कल्चरल डिस्ट्रिक्ट की 'रेवीलेशन गैलरी है, जहां हुज्जाज को अपनी मालूमात में इज़ाफे़ के लिए इस्लामी तारीख़ के औराक़ पलटने का बेहतरीन मौका मिलता है। 

    Hajj, Umra, Saudi Arebia, Makka, Madina, Read Me


        हुज्जाज कहते हैं 'जहां से ये सब कुछ शुरू हुआ, वहां खड़े हो कर ऐसा लगता है कि अभी कुछ और जानना बाक़ी है। यहां पहुंचने पर बहुत से लोगों की आँखों में आँसू होते हैं। ये सिर्फ एक चढ़ाई नहीं है, ये रुहानी बेदारी है।
        जबले नूर के जुनूब में, जबल-ए-सौर है। ये वो पहाड़ है जो पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 और उनके सहाबी हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ के लिए उस वक़्त ना दिखाई देने वाला गहोरा बन गया था, जब वो मदीने को हिज्रत कर रहे थे।
        ये मुक़द्दस कहानी अब भी हुज्जाज को बहुत अच्छी तरह उस वाक़े की याद दिलाती है, जब मकड़ी ने ग़ार के दहाने पर जाला बुन दिया था और कुमरी ने घोंसला बना दिया था ताकि ख़ुदा के पैग़ंबर और उनके साथी को कोई देख ना सके।

    Hajj, Umra, Saudi Arebia, Makka, Madina, Read Me


        एक और मुक़ाम जहां हुज्जाज अक्सर जाते हैं, वो जबल-ए-अबूओक़ुबीस है, जिसके बारे में रिवायत है कि इस पहाड़ को पहली बार ज़मीन की गोद में रखा गया। ये पहाड़, मस्जिद उल-हराम से क़रीब है और पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 की तरफ़ से दीन की इबतिदाई दावत और भारी रुहानी ज़िम्मेदारी की याद दिलाता है। पास में, नमूद नुमाइश से बेनयाज़ मगर तारीख़ी लिहाज़ से अहम, मस्जिद अलाकबा है, जहां अंसार-ए-मदीना ने पैगंबर-ए-इस्लाम 000 के दस्त-ए-मुबारक पर बैअत की थी।
        अब्बासी दौर में तामीर होने वाली ये मस्जिद, मुस्लमानों के दीन पर कारबन्द रहने के अह्द और इबतिदाई इस्लामी उखूवत-ओ-इत्तिहाद की अलामत है।
        इस मुक़ाम से थोड़े ही फ़ासले पर अलहजून का ज़िला है, जहां जबल-ए-सय्यदा वाके है। इस पहाड़ की बुनियाद के नज़दीक मुकब्बिर-ए-अलमाला है, जो पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 की इंतिहाई अज़ीज़ अहलिया अमीर उल मोमेनीन हज़रत ख़दीजा की आख़िरी आरामगाह है और जो आज भी बेहद एहतिराम का मर्कज़ है।  हुज्जाज उन मुक़ामात की जियारत को जाना ज्यादा पसंद करते हैं जहां ऐसे अफ़राद की क़ुर्बानीयों को समझने में मदद मिलती है, जिन्होंने इस्लाम की तशकील साज़ी की।
        मदीने की अपनी ही एक लाज़वाल विरासत है। यहां मस्जिद-ए-किब्लातैन है जहां नमाज़ के दौरान पैग़ंबर-ए-इस्लाम पर वही नाज़िल हुई जिसके बाद आप 999  ने यरूशलम के बजाय अपना रूख मक्का की जानिब मोड़ लिया। इस लम्हे ने मुस्लमानों की अलहदा शिनाख़्त क़ायम करने में एक इंतिहाई अहम तबदीली की बुनियाद डाल दी। 
        मस्जिद-ए-नबवी से जानिब-ए-मग़रिब, सात मसाजिद हैं। उनमें हर मस्जिद किसी ना किसी तरह जंग ख़ंदक़ के किसी वाक़े से जुड़ी हुई है। इन मसाजिद में अलिफ़ता मस्जिद के अलावा दीगर मसाजिद किसी शख़्सियत के नाम पर है। मसलन यहां की तीन मसाजिद के नाम मस्जिद-ए-फ़ातिमा, मस्जिद-ए-अली इब्न-ए-अबी तालिब और मस्जिद-ए-सलमान फ़ारसी हैं। ये मसाजिद, इस्लाम की तारीख़ से भरी पड़ी हैं और इस्लाम की अहम तरीन जंगी मुहिम्मात के दौरान जो मुश्किलात दरपेश हुईं, उनकी यादगार भी हैं।
        अहद का पहाड़, मदीना से शुमाल की जानिब है और इसकी ढलान जंग अहद और इस मुक़ाम की याद दिलाती है जहां पैग़ंबर-ए-इस्लाम के चचा हज़रत हमज़ा इब्न-ए-अबदुल मुतलिब और लश्कर के 70 जान-निसार शहीद हुए थे। आज जब हुज्जाज इस क़ब्रिस्तान के पास से गुज़रते हैं तो उन शहीदों के एहतिराम में चंद लम्हों के लिए ख़ामोश हो जाते हैं। 



        एक अरसा बीत चुका है लेकिन मस्जिद-ए-नबवी के क़रीब वाके उस क़ब्रिस्तान के पास आ कर हुज्जाज आज भी दुआ करते हैं और इस्लाम के अहद-ए-रफ़्ता को याद करते हैं। इस मुक़ाम पर हुज्जाज को इन शख़्सियात से एक राबिता सा महसूस होता है जो इस्लाम के इबतिदाई बरसों में बानी-ए-इस्लाम के साथ खड़े रहे।
        मुक़ामात-ए-मुक़द्दसा के अलावा भी दीगर ऐसी कई जगहें हैं जो रूहानियत में बेशक़ीमत इज़ाफ़ा करने के लिए उन्हें अपनी तरफ़ मुतवज्जा करती हैं। उनमें मदीना के शुमाल मग़रिब की तरफ़ वाके मुक़ाम ख़ैबर है जहां इस्लाम के ख़िलाफ़ एक मर्कज़ी फ़ौजी मुहिम का आग़ाज़ हुआ था। यहीं पैग़ंबर-ए-इस्लाम 000 की क़ियादत के अख़लाक़ी और जंगी हिकमत-ए-अमली के मुख़्तलिफ़ पहलू यकजा हो कर सामने आते हैं।

    Saturday, 14 June 2025

    ✅ इंशा वारसी : रायपुर 

        एक ऐतिहासिक कदम के तहत भारत सरकार ने आगामी राष्ट्रीय जनगणना में जाति गणना को शामिल करने को मंजूरी दे दी है, जो स्वतंत्रता के बाद बंद कर दी गई एक प्रथा की महत्वपूर्ण वापसी को दर्शाता है। समाज सुधारकों, विद्वानों और नीति निर्माताओं द्वारा लंबे समय से मांगे जा रहे इस निर्णय को देश में समानता को बढ़ावा देने और सामाजिक न्याय की जड़ों को गहरा करने की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम के रूप में सराहा जा रहा है। ऐसे समय में जब समावेशी विकास राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र है, जाति जनगणना डेटा-संचालित नीति निर्माण के एक युग की शुरुआत करने का वादा करती है जो वास्तव में भारत के जटिल सामाजिक ताने-बाने को दर्शाती है।
        जाति जनगणना, राष्ट्रीय गणना अभ्यास के हिस्से के रूप में व्यक्ति की जातिगत पहचान पर डेटा का व्यवस्थित संग्रह है। इसका लक्ष्य विभिन्न जाति समूहों के सामाजिक-आर्थिक वितरण की सटीक और विस्तृत समझ हासिल करना है, जिससे सरकार को लक्षित नीतियों को तैयार करने में मदद मिले, जो सबसे वंचितों का उत्थान करें। ऐतिहासिक रूप से, 1931 तक औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा जाति के आंकड़े नियमित रूप से एकत्र किए जाते थे। हालाँकि, स्वतंत्रता के बाद, जाति की गणना अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) तक सीमित थी, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अन्य को व्यापक राष्ट्रीय डेटा सेट से बाहर रखा गया था। इस अंतर को पाटने का आखिरी प्रयास, 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) विसंगतियों और डेटा की अविश्वसनीयता से प्रभावित हुई थी, जिसका मुख्य कारण एक मानकीकृत जाति सूची का अभाव था।


        भारत ने ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े समुदायों के उत्थान के लिए संवैधानिक प्रतिबद्धताएं की हैं, लेकिन जाति पर विश्वसनीय डेटा के बिना जनसांख्यिकी के अनुसार, सकारात्मक कार्रवाई की नीतियाँ अक्सर अंधेरे में काम करती हैं। वर्तमान में, ओबीसी के लिए आरक्षण नीतियाँ 1931 की जनगणना के अनुमानों पर आधारित हैं, जिसमें ओबीसी की आबादी 52% आंकी गई थी। हालाँकि, बिहार के 2023 जाति सर्वेक्षण जैसे राज्य-स्तरीय सर्वेक्षणों से पता चला है कि ओबीसी और अत्यंत पिछड़े वर्ग राज्य की आबादी का 63% से अधिक हिस्सा हैं। ऐसे निष्कर्ष कल्याणकारी लाभों और आरक्षणों के समान वितरण को सुनिश्चित करने के लिए एक अद्यतन राष्ट्रीय जाति डेटाबेस की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
        राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने एसईसीसी 2011 की खामियों को दूर करने के लिए एक परिष्कृत गणना तंत्र की जोरदार वकालत की है, जहां ओपन-एंडेड जाति रिपोर्टिंग के कारण 46 लाख से अधिक अलग-अलग प्रविष्टियां और 8 करोड़ से अधिक त्रुटियां हुईं। आगामी जाति जनगणना का उद्देश्य अधिक संरचित और सत्यापन योग्य डेटा संग्रह प्रक्रिया के माध्यम से इन चुनौतियों को दूर करना है। पहचान सत्यापन के लिए आधार को एकीकृत करना, शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना और छंटाई और वर्गीकरण के लिए एआई उपकरणों का लाभ उठाना अभ्यास की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए प्रस्तावित उपायों में से हैं।
        जाति जनगणना सिर्फ़ एक संख्यात्मक अभ्यास ही नहीं, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा है, इसका सामाजिक समानता और शासन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। विभिन्न समुदायों के वास्तविक जनसांख्यिकीय प्रसार को उजागर कर यह पिछड़े समूहों के उप-वर्गीकरण की अनुमति देता है, जैसे कि न्यायमूर्ति रोहिणी आयोग द्वारा अनुशंसित ओबीसी के भीतर। यह सुनिश्चित करता है कि आरक्षण का लाभ सबसे वंचितों तक पहुँचे, न कि प्रमुख उप-समूहों द्वारा एकाधिकार किया जाए। इसी तरह, सटीक जाति डेटा राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करने, ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े लोगों को आवाज़ देकर लोकतंत्र को मज़बूत करने में सहायक हो सकता है। इस कदम के महत्व को भारत के संवैधानिक दृष्टिकोण के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। अनुच्छेद 340 राज्य को पिछड़े वर्गों के कल्याण की पहचान करने और उन्हें बढ़ावा देने का अधिकार देता है, और जाति जनगणना इस जनादेश के अनुरूप है। यह अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 के लक्ष्यों को प्रतिध्वनित करता है, जो भेदभाव को प्रतिबंधित करते हैं और अवसर की समानता की गारंटी देते हैं। हालांकि, विश्वसनीय डेटा के बिना, इन संवैधानिक आदर्शों को प्रतीकात्मक इशारों में कमजोर किए जाने का जोखिम है।
        हालांकि इस बात पर चिंता जताई गई है कि जाति जनगणना जातिगत पहचान को मजबूत कर सकती है या राजनीतिक शोषण का साधन बन सकती है, लेकिन पारदर्शी, नैतिक और विवेकपूर्ण कार्यान्वयन के माध्यम से ऐसे जोखिमों को कम किया जा सकता है। जाति जनगणना को राजनीतिक के बजाय विकास के साधन के रूप में मानना, इसे समावेशी विकास के उत्प्रेरक में बदल सकता है। निगरानी तंत्र, कानूनी सुरक्षा उपाय और नीति मूल्यांकन अवश्य होने चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत रूप दिया गया है कि डेटा केवल सामाजिक न्याय के लिए काम करे न कि चुनावी अंकगणित के लिए। इसके अलावा, आय स्तर, शिक्षा और बहुआयामी गरीबी जैसे सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के साथ जाति के आंकड़ों को पूरक बनाने से समग्र कल्याण कार्यक्रमों को तैयार करने में मदद मिल सकती है। यह क्षेत्रीय असमानताओं को संबोधित करने और स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में अंतराल को पाटने के लिए अनुकूलित हस्तक्षेप की अनुमति देता है जहां जाति-आधारित असमानताएं बनी रहती हैं।
        निष्कर्ष रूप में, जाति जनगणना कराने का निर्णय भारत की अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज की ओर यात्रा में एक महत्वपूर्ण क्षण है। यह सकारात्मक कार्रवाई को फिर से मापने, कल्याण लक्ष्यीकरण को परिष्कृत करने और हमारे संविधान में निहित समानता के प्रति प्रतिबद्धता को पुनर्जीवित करने का अवसर है। इस डेटा-संचालित दृष्टिकोण को ईमानदारी और सावधानी से अपनाकर, भारत संरचनात्मक असमानताओं को खत्म करने और एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण की दिशा में एक निर्णायक कदम उठा सकता है, जहाँ प्रत्येक नागरिक की प्रगति में समान हिस्सेदारी हो।

    - फ़्रैंकोफ़ोन और पत्रकारिता अध्ययन,

    जामिया मिलिया इस्लामिया.
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)

    जाति जन गणना : भारत में सामाजिक न्याय को पुनर्परिभाषित करना

    ✅ इंशा वारसी : रायपुर 

        एक ऐतिहासिक कदम के तहत भारत सरकार ने आगामी राष्ट्रीय जनगणना में जाति गणना को शामिल करने को मंजूरी दे दी है, जो स्वतंत्रता के बाद बंद कर दी गई एक प्रथा की महत्वपूर्ण वापसी को दर्शाता है। समाज सुधारकों, विद्वानों और नीति निर्माताओं द्वारा लंबे समय से मांगे जा रहे इस निर्णय को देश में समानता को बढ़ावा देने और सामाजिक न्याय की जड़ों को गहरा करने की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम के रूप में सराहा जा रहा है। ऐसे समय में जब समावेशी विकास राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र है, जाति जनगणना डेटा-संचालित नीति निर्माण के एक युग की शुरुआत करने का वादा करती है जो वास्तव में भारत के जटिल सामाजिक ताने-बाने को दर्शाती है।
        जाति जनगणना, राष्ट्रीय गणना अभ्यास के हिस्से के रूप में व्यक्ति की जातिगत पहचान पर डेटा का व्यवस्थित संग्रह है। इसका लक्ष्य विभिन्न जाति समूहों के सामाजिक-आर्थिक वितरण की सटीक और विस्तृत समझ हासिल करना है, जिससे सरकार को लक्षित नीतियों को तैयार करने में मदद मिले, जो सबसे वंचितों का उत्थान करें। ऐतिहासिक रूप से, 1931 तक औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा जाति के आंकड़े नियमित रूप से एकत्र किए जाते थे। हालाँकि, स्वतंत्रता के बाद, जाति की गणना अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) तक सीमित थी, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अन्य को व्यापक राष्ट्रीय डेटा सेट से बाहर रखा गया था। इस अंतर को पाटने का आखिरी प्रयास, 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) विसंगतियों और डेटा की अविश्वसनीयता से प्रभावित हुई थी, जिसका मुख्य कारण एक मानकीकृत जाति सूची का अभाव था।


        भारत ने ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े समुदायों के उत्थान के लिए संवैधानिक प्रतिबद्धताएं की हैं, लेकिन जाति पर विश्वसनीय डेटा के बिना जनसांख्यिकी के अनुसार, सकारात्मक कार्रवाई की नीतियाँ अक्सर अंधेरे में काम करती हैं। वर्तमान में, ओबीसी के लिए आरक्षण नीतियाँ 1931 की जनगणना के अनुमानों पर आधारित हैं, जिसमें ओबीसी की आबादी 52% आंकी गई थी। हालाँकि, बिहार के 2023 जाति सर्वेक्षण जैसे राज्य-स्तरीय सर्वेक्षणों से पता चला है कि ओबीसी और अत्यंत पिछड़े वर्ग राज्य की आबादी का 63% से अधिक हिस्सा हैं। ऐसे निष्कर्ष कल्याणकारी लाभों और आरक्षणों के समान वितरण को सुनिश्चित करने के लिए एक अद्यतन राष्ट्रीय जाति डेटाबेस की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
        राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने एसईसीसी 2011 की खामियों को दूर करने के लिए एक परिष्कृत गणना तंत्र की जोरदार वकालत की है, जहां ओपन-एंडेड जाति रिपोर्टिंग के कारण 46 लाख से अधिक अलग-अलग प्रविष्टियां और 8 करोड़ से अधिक त्रुटियां हुईं। आगामी जाति जनगणना का उद्देश्य अधिक संरचित और सत्यापन योग्य डेटा संग्रह प्रक्रिया के माध्यम से इन चुनौतियों को दूर करना है। पहचान सत्यापन के लिए आधार को एकीकृत करना, शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना और छंटाई और वर्गीकरण के लिए एआई उपकरणों का लाभ उठाना अभ्यास की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए प्रस्तावित उपायों में से हैं।
        जाति जनगणना सिर्फ़ एक संख्यात्मक अभ्यास ही नहीं, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा है, इसका सामाजिक समानता और शासन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। विभिन्न समुदायों के वास्तविक जनसांख्यिकीय प्रसार को उजागर कर यह पिछड़े समूहों के उप-वर्गीकरण की अनुमति देता है, जैसे कि न्यायमूर्ति रोहिणी आयोग द्वारा अनुशंसित ओबीसी के भीतर। यह सुनिश्चित करता है कि आरक्षण का लाभ सबसे वंचितों तक पहुँचे, न कि प्रमुख उप-समूहों द्वारा एकाधिकार किया जाए। इसी तरह, सटीक जाति डेटा राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करने, ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े लोगों को आवाज़ देकर लोकतंत्र को मज़बूत करने में सहायक हो सकता है। इस कदम के महत्व को भारत के संवैधानिक दृष्टिकोण के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। अनुच्छेद 340 राज्य को पिछड़े वर्गों के कल्याण की पहचान करने और उन्हें बढ़ावा देने का अधिकार देता है, और जाति जनगणना इस जनादेश के अनुरूप है। यह अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 के लक्ष्यों को प्रतिध्वनित करता है, जो भेदभाव को प्रतिबंधित करते हैं और अवसर की समानता की गारंटी देते हैं। हालांकि, विश्वसनीय डेटा के बिना, इन संवैधानिक आदर्शों को प्रतीकात्मक इशारों में कमजोर किए जाने का जोखिम है।
        हालांकि इस बात पर चिंता जताई गई है कि जाति जनगणना जातिगत पहचान को मजबूत कर सकती है या राजनीतिक शोषण का साधन बन सकती है, लेकिन पारदर्शी, नैतिक और विवेकपूर्ण कार्यान्वयन के माध्यम से ऐसे जोखिमों को कम किया जा सकता है। जाति जनगणना को राजनीतिक के बजाय विकास के साधन के रूप में मानना, इसे समावेशी विकास के उत्प्रेरक में बदल सकता है। निगरानी तंत्र, कानूनी सुरक्षा उपाय और नीति मूल्यांकन अवश्य होने चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत रूप दिया गया है कि डेटा केवल सामाजिक न्याय के लिए काम करे न कि चुनावी अंकगणित के लिए। इसके अलावा, आय स्तर, शिक्षा और बहुआयामी गरीबी जैसे सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के साथ जाति के आंकड़ों को पूरक बनाने से समग्र कल्याण कार्यक्रमों को तैयार करने में मदद मिल सकती है। यह क्षेत्रीय असमानताओं को संबोधित करने और स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में अंतराल को पाटने के लिए अनुकूलित हस्तक्षेप की अनुमति देता है जहां जाति-आधारित असमानताएं बनी रहती हैं।
        निष्कर्ष रूप में, जाति जनगणना कराने का निर्णय भारत की अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज की ओर यात्रा में एक महत्वपूर्ण क्षण है। यह सकारात्मक कार्रवाई को फिर से मापने, कल्याण लक्ष्यीकरण को परिष्कृत करने और हमारे संविधान में निहित समानता के प्रति प्रतिबद्धता को पुनर्जीवित करने का अवसर है। इस डेटा-संचालित दृष्टिकोण को ईमानदारी और सावधानी से अपनाकर, भारत संरचनात्मक असमानताओं को खत्म करने और एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण की दिशा में एक निर्णायक कदम उठा सकता है, जहाँ प्रत्येक नागरिक की प्रगति में समान हिस्सेदारी हो।

    - फ़्रैंकोफ़ोन और पत्रकारिता अध्ययन,

    जामिया मिलिया इस्लामिया.
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)

    Sunday, 1 June 2025

     जिल हज्ज, 1446 हिजरी

    ﷽ 

       फरमाने रसूल     

    "तुम अपने लिए भलाई के अलावा कोई और दुआ ना करो क्योंकि जो तुम कहते हो उस पर फरिश्ते आमीन कहते है।"

    - मुस्लिम 

    रियाज़ अल जन्ना में साल के दौरान सिर्फ एक मर्तबा नवाफ़िल अदा करने के हवाले से पाबंदी ख़त्म 


    makka-madina-masjid-e-nabvi-masjid-e-haram

    ✅ नई तहरीक : रियाद 

    मदीना मुनव्वरा में कयाम के दौरान रौज़ा-ए-रसूलﷺ  पर हाज़िरी के ख्वाहिशमंदों के लिए बड़ी ख़ुशख़बरी सामने आई है। हरमैन शरीफ़ैन इंतिज़ामी उमूर के सोशल मीडीया एकाऊंटस के मुताबिक़ मस्जिद नबवीﷺ  रियाज़ अल जन्ना में एक साल के दौरान सिर्फ एक मर्तबा नवाफ़िल अदा करने के हवाले से पाबंदी ख़त्म कर दी गई है। 

    makka-madina-masjid-e-nabvi-masjid-e-haram


     

        जानकारी के मुताबिक नसक़ मोबाइल एप के ज़रीये परमिट के हुसूल की शर्त अब भी बरक़रार रहेगी, नई हिदायात के तहत तमाम ज़ाइरीन नसक़ मोबाइल एप के ज़रीये हर 20 मिनट बाद नया इजाज़तनामा हासिल कर सकते हैं। मस्जिद नबवीﷺ  में मौजूद ज़ाइरीन भी नए शैडूल के तहत मोबाइल एप के ज़रीये रियाज़ अल जन्ना में नवाफ़िल अदा करने के इजाज़त नामे हासिल कर सकेंगे।

    रौज़ा रसूलﷺ पर हाज़िरी के ख्वाहिशमंदों के लिए बड़ी ख़ुशख़बरी

     जिल हज्ज, 1446 हिजरी

    ﷽ 

       फरमाने रसूल     

    "तुम अपने लिए भलाई के अलावा कोई और दुआ ना करो क्योंकि जो तुम कहते हो उस पर फरिश्ते आमीन कहते है।"

    - मुस्लिम 

    रियाज़ अल जन्ना में साल के दौरान सिर्फ एक मर्तबा नवाफ़िल अदा करने के हवाले से पाबंदी ख़त्म 


    makka-madina-masjid-e-nabvi-masjid-e-haram

    ✅ नई तहरीक : रियाद 

    मदीना मुनव्वरा में कयाम के दौरान रौज़ा-ए-रसूलﷺ  पर हाज़िरी के ख्वाहिशमंदों के लिए बड़ी ख़ुशख़बरी सामने आई है। हरमैन शरीफ़ैन इंतिज़ामी उमूर के सोशल मीडीया एकाऊंटस के मुताबिक़ मस्जिद नबवीﷺ  रियाज़ अल जन्ना में एक साल के दौरान सिर्फ एक मर्तबा नवाफ़िल अदा करने के हवाले से पाबंदी ख़त्म कर दी गई है। 

    makka-madina-masjid-e-nabvi-masjid-e-haram


     

        जानकारी के मुताबिक नसक़ मोबाइल एप के ज़रीये परमिट के हुसूल की शर्त अब भी बरक़रार रहेगी, नई हिदायात के तहत तमाम ज़ाइरीन नसक़ मोबाइल एप के ज़रीये हर 20 मिनट बाद नया इजाज़तनामा हासिल कर सकते हैं। मस्जिद नबवीﷺ  में मौजूद ज़ाइरीन भी नए शैडूल के तहत मोबाइल एप के ज़रीये रियाज़ अल जन्ना में नवाफ़िल अदा करने के इजाज़त नामे हासिल कर सकेंगे।

    Saturday, 3 May 2025

     जी काअदा, 1446 हिजरी

       फरमाने रसूल     

    "वो शख्स जन्नत में दाखिल नही होगा, जिसकी शरारतों से उसका हमसाया (पड़ोसी) बे ख़ौफ़ नही रहता।"

    - मुस्लिम  

    4  4 मई, यौमे शहादत पर खास 


    Tipu Sultan, Sher-e-Maisoor, sri rangpatnam, Haider Ali

    ✅ नई तहरीक : भोपाल

        4 मई का दिन बर्रे सग़ीर की तारीख़ में एक अज़ीम, गैरतमंद और बेमिसाल सिपाही-ओ-हुक्मरान की याद दिलाता है। ये दिन उस बहादुर, इंसाफ़ पसंद और उसूल परस्त बादशाह की शहादत का है, जिसे दुनिया शेर-ए-मैसूर टीपू सुल्तान के नाम से जानती है। 
        ये वो बादशाह हैं जिसने अंग्रेज़ों की गु़लामी क़बूल करने की बजाय शहादत को तर्जीह दी। वो हुक्मरां थे, मगर ग़ैरत-ओ-हमीयत उनके लहू में थी। आज जब उनका यौम शहादत आता है, तो मुल्क की फ़िज़ा में अदल-ओ-इन्साफ़ की कमी, बदअमनी और गिरते अख़लाक़ी इक़दार उसकी ग़ैरतभरी क़ियादत को मज़ीद यादगार बना देते हैं। हमें ये सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि कहीं हमने ऐसे किरदारों को सिर्फ तारीख़ की किताबों तक महदूद तो नहीं कर दिया है। 

    Tipu Sultan, Sher-e-Maisoor, sri rangpatnam, Haider Ali
    टीपू सुलतान किसी मख़सूस फ़िरक़े, क़ौम या ज़ात को तर्जीह नहीं देते थे बल्कि उनका पैग़ाम पूरे भारत के लिए था। उन्होंने अपनी हुक्मरानी में अदल-ओ-इन्साफ़ को बुनियाद बनाया। उनके दौर-ए-हुकूमत में हर मज़हब, हर ज़ात, हर फ़र्द को यकसाँ हुक़ूक़ हासिल थे। वो सिर्फ़ तलवार के शहसवार ना थे, बल्कि उनकी रियासत में फ़लाही कामों का भी सिलसिला था, तमाम कामों की फ़रावानी थी और चारों सिम्त उनका बोल-बाला था।
    टीपू सुलतान ने ख़वातीन के हुक़ूक़ के तहफ़्फ़ुज़ के लिए जो इक़दामात किए, वो ना सिर्फ अपने वक़्त के लिए इन्क़िलाबी थे, बल्कि आज के दौर में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारों का अमली नमूना कहे जा सकते हैं। इस अह्द में औरत को कमतर, हक़ीर और महज एक जिन्सी शै समझा जाता था। खासतौर पर निचली ज़ात की औरतें दलित, शूद्र और दीगर पसमांदा तबक़ात से ताल्लुक़ रखने वाली ख़वातीन, जिन्हें ना इज़्ज़त-ए-नफ़स का हक़ हासिल था और ना ही तन ढांपने की आज़ादी। मुआशरे का जब्र इस क़दर संगीन था कि इन औरतों पर जिस्म ढकने पर जुर्माने और तशद्दुद किया जाता। ऐसी ही एक ख़ातून थी नंगेली, जिसका ताल्लुक़ केराला के इलाक़े से था। जब उस पर नंगे जिस्म रखने के टैक्स का तक़ाज़ा किया गया तो उसने अपनी छाती काट कर उसे टैक्स के तौर पर पेश कर दिया था। ये एहतिजाज सिर्फ उसका ज़ाती रद्द-ए-अमल ना था बल्कि एक अह्द के ख़िलाफ़ ख़ामोश इन्क़िलाब था।
        ऐसे ही पस-ए-मंज़र में टीपू सुलतान का ये ऐलान कि हर औरत को पर्दे और हया का हक़ हासिल है, ख़ाह वो किसी भी ज़ात, मज़हब या तबक़े से ताल्लुक़ रखती हो, एक अदालती इन्क़िलाब से कम ना था। उनके इस फ़रमान के बाद रियासत-ए-मैसूर में निचली ज़ात की ख़वातीन को वो समाजी तहफ़्फ़ुज़ मिला जिससे वो पहली बार ख़ुद को इन्सान समझने लगें। टीपू सुलतान ने औरतों के लिए तालीमी मवाक़े, विरासत के हुक़ूक़ और मुआशरती वक़ार को क़ानूनी शक्ल दी जो इस दौर में किसी हिंदू या मुस्लमान हुकमरान के यहां आम ना था।
        ये हक़ीक़त है कि उनके दौर में औरत को बापरदा ज़िंदगी, तालीम, और जायदाद में हिस्सा जैसी नेअमतें मिलीं, जो सदियों तक फ़क़त ऊंची ज़ात की ख़वातीन को दस्तयाब थीं। उन्होंने रियास्ती सतह पर उस निज़ाम को चैलेंज किया जो औरत के बदन को भी टैक्स के काबिल समझता था, और औरत के हिजाब को ना सिर्फ मज़हबी बल्कि इन्सानी हक़ क़रार दिया। आज जब हम ख़वातीन के हुक़ूक़ के हवाले से क़ानूनसाज़ी की बात करते हैं, तो टीपू सुलतान जैसे इन्क़िलाबी हुक्मरां की मसाल हमें ये सबक़ देती है कि एक रियासत तभी इन्साफ़ पर क़ायम हो सकती है जब उसमें हर इन्सान, ख़ुसूसन हर औरत, को उसका बुनियादी हक़ हासिल हो।
        उन्होंने तालीम को आम करने और बच्चियों की तालीम पर ज़ोर दिया। उनका मानना था कि किसी क़ौम की तरक़्क़ी उसकी औरतों की तालीम से मशरूत है। उन्होंने मदारिस, लाइब्रेरियां और तर्बीयती इदारे क़ायम किए जहां ख़वातीन भी ज़ेवर-ए-इलम से आरास्ता हो सकें।
        टीपू सुलतान की सबसे ख़ूबसूरत पहचान उनका बैन उल मज़ाहिब इत्तिहाद था। उनका वज़ीर-ए-आज़म पण्डित पूर्णिया एक हिंदू था, जो उनके क़रीब तरीन मुशीरों में शामिल था हालाँकि बाद में उसने ग़द्दारी की। उन्होंने पूरा इख़तियार दे रखा था कि वो रियास्ती उमूर में फ़ैसले कर सके। ये उस दौर की मिसाल है, जब मज़हब, ज़ात, या अक़ीदे की बुनियाद पर तफ़रीक़ ना की जाती थी, बल्कि सलाहीयत को मयार बनाया जाता था।
        आज जब हमारा मुआशरा फ़िर्कावारीयत, ज़ात पात और मज़हबी ताअस्सुब का शिकार है, हमें टीपू सुलतान की तालीमात और तर्ज़-ए-हुक्मरानी की तरफ़ लौटने की ज़रूरत है। उनकी ज़िंदगी हमें सिखाती है कि असल ताक़त तलवार में नहीं, इन्साफ़ में है।
        टीपू सुलतान ने अंग्रेज़ों की गु़लामी क़बूल नहीं की, बल्कि अपनी जान दे दी, मगर कभी सर नहीं झुकाया। उनका वो मशहूर क़ौल आज भी हमारे दिलों में गूँजता है :

    शेर की एक दिन की ज़िंदगी, गीदड़ की सौ साला ज़िंदगी से बेहतर है। 

        आज मुल्क में हालात अफ़सोसनाक हैं। मज़हब और शिनाख़्त की बुनियाद पर इन्सानों के दरमयान तफ़रीक़ बढ़ती जा रही है। कहीं नाम पूछ कर मार दिया जाता है, कहीं मस्जिद में इबादत करने वालों को निशाना बनाया जाता है, और कहीं गाय के नाम पर बे-गुनाहों को सर-ए-बाज़ार पीट-पीट कर मार दिया जाता है, इन्सान का नाम ही ज़िंदगी और मौत के फ़ैसले का पैमाना बन चुका है। तालीमी इदारों, शहरों, और सड़कों के नाम तक बदले जा रहे हैं ताकि तारीख़ का चेहरा मसख़ कर सिर्फ एक मख़सूस नज़रिए को ग़ालिब कर दिया जाए। और ये नाम महज इस बुनियाद पर बदले जा रहे हैं कि वो किसी ख़ास मज़हब या शख़्सियत से मंसूब हैं। ये हालात ना सिर्फ जमहूरी इक़दार के मुनाफ़ी हैं बल्कि इन्सानियत के बुनियादी उसूलों से भी टकराते हैं। ये वो दौर है, जहां तास्सुब ने इन्साफ़ को दबा दिया है, और नफ़रत ने भाईचारे की जगह ले ली है।
        ऐसे माहौल में टीपू सुलतान का अदल-ओ-इन्साफ़ और मज़हबी हम-आहंगी पर मबनी तर्ज़-ए-हुकूमत एक रोशन मिसाल बन कर सामने आता है। उन्होंने कभी किसी की शिनाख़्त, मज़हब या ज़ात को उसकी इज़्ज़त या इन्साफ़ से महरूम करने का ज़रीया नहीं बनाया। 
        दरे अस्ना औरंगज़ेब रहमतुल्लाह अलैह के ख़िलाफ़ जो ज़हर उगला गया और उनकी क़ब्र पर सियासत की गई, वो ना सिर्फ तारीख़ से जहालत का सबूत है बल्कि समाज में नफ़रत के बढ़ते ज़हर का भी पता देती है। एक बाशऊर क़ौम अपने माज़ी को हमेशा याद रखती है, बल्कि इससे सबक़ सीख कर हाल को बेहतर बनाती है। लेकिन आज हमारे बुज़ुर्गों की तौहीन की जा रही है बल्कि फ़िर्कापरस्ती को हथियार बना कर समाज को बांटने की कोशीश की जा रही है। टीपू सुलतान और औरंगज़ेब जैसे किरदार हमें याद दिलाते हैं कि असल क़ियादत वही होती है, जो दीन, अदल और ग़ैरत पर मबनी हो और यही पैग़ाम आज हमें सबसे ज़्यादा दरकार है। 
        शहीद टीपू सुलतान एक ऐसे बादशाह हैं, जो मुल्क की हिफ़ाज़त करते हुए मैदान-ए-जंग में शहीद हुए। 4 मई, यौम शहादत टीपू सुलतान सिर्फ एक तारीख़ी दिन नहीं, बल्कि ये तारीख हमें याद दिलाती है कि हमें भी इन्साफ़, बराबरी, ख़वातीन के हुक़ूक़, तालीम और क़ौमी इत्तिहाद के लिए आवाज़ बुलंद करनी है। एससी, एसटी और दलितों को इन्साफ़ दिलाने के लिए पुरज़ोर आवाज़ बुलंद करना होगी, जो मनुवादी, पूंजीवादी अनासिर बदनाम करने में लगे हुए हैं, उन्हें हर जगह से उखाड़ फेंकना है, यही इस दिन का पैग़ाम है। टीपू सुलतान आज भी ज़िंदा हैं। हमारी सोच में, हमारे उसूलों में और हर उस इन्सान में जो जुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा होता है।

    MW Ansari, IPS (Rtd)
    Bhopal



    शेर-ए-मैसूर का इंसारफ, औरत को मिली बापरदा ज़िंदगी, तालीम, और जायदाद में हिस्सा जैसी नेअमतें : एमडब्ल्यू अंसारी

     जी काअदा, 1446 हिजरी

       फरमाने रसूल     

    "वो शख्स जन्नत में दाखिल नही होगा, जिसकी शरारतों से उसका हमसाया (पड़ोसी) बे ख़ौफ़ नही रहता।"

    - मुस्लिम  

    4  4 मई, यौमे शहादत पर खास 


    Tipu Sultan, Sher-e-Maisoor, sri rangpatnam, Haider Ali

    ✅ नई तहरीक : भोपाल

        4 मई का दिन बर्रे सग़ीर की तारीख़ में एक अज़ीम, गैरतमंद और बेमिसाल सिपाही-ओ-हुक्मरान की याद दिलाता है। ये दिन उस बहादुर, इंसाफ़ पसंद और उसूल परस्त बादशाह की शहादत का है, जिसे दुनिया शेर-ए-मैसूर टीपू सुल्तान के नाम से जानती है। 
        ये वो बादशाह हैं जिसने अंग्रेज़ों की गु़लामी क़बूल करने की बजाय शहादत को तर्जीह दी। वो हुक्मरां थे, मगर ग़ैरत-ओ-हमीयत उनके लहू में थी। आज जब उनका यौम शहादत आता है, तो मुल्क की फ़िज़ा में अदल-ओ-इन्साफ़ की कमी, बदअमनी और गिरते अख़लाक़ी इक़दार उसकी ग़ैरतभरी क़ियादत को मज़ीद यादगार बना देते हैं। हमें ये सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि कहीं हमने ऐसे किरदारों को सिर्फ तारीख़ की किताबों तक महदूद तो नहीं कर दिया है। 

    Tipu Sultan, Sher-e-Maisoor, sri rangpatnam, Haider Ali
    टीपू सुलतान किसी मख़सूस फ़िरक़े, क़ौम या ज़ात को तर्जीह नहीं देते थे बल्कि उनका पैग़ाम पूरे भारत के लिए था। उन्होंने अपनी हुक्मरानी में अदल-ओ-इन्साफ़ को बुनियाद बनाया। उनके दौर-ए-हुकूमत में हर मज़हब, हर ज़ात, हर फ़र्द को यकसाँ हुक़ूक़ हासिल थे। वो सिर्फ़ तलवार के शहसवार ना थे, बल्कि उनकी रियासत में फ़लाही कामों का भी सिलसिला था, तमाम कामों की फ़रावानी थी और चारों सिम्त उनका बोल-बाला था।
    टीपू सुलतान ने ख़वातीन के हुक़ूक़ के तहफ़्फ़ुज़ के लिए जो इक़दामात किए, वो ना सिर्फ अपने वक़्त के लिए इन्क़िलाबी थे, बल्कि आज के दौर में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारों का अमली नमूना कहे जा सकते हैं। इस अह्द में औरत को कमतर, हक़ीर और महज एक जिन्सी शै समझा जाता था। खासतौर पर निचली ज़ात की औरतें दलित, शूद्र और दीगर पसमांदा तबक़ात से ताल्लुक़ रखने वाली ख़वातीन, जिन्हें ना इज़्ज़त-ए-नफ़स का हक़ हासिल था और ना ही तन ढांपने की आज़ादी। मुआशरे का जब्र इस क़दर संगीन था कि इन औरतों पर जिस्म ढकने पर जुर्माने और तशद्दुद किया जाता। ऐसी ही एक ख़ातून थी नंगेली, जिसका ताल्लुक़ केराला के इलाक़े से था। जब उस पर नंगे जिस्म रखने के टैक्स का तक़ाज़ा किया गया तो उसने अपनी छाती काट कर उसे टैक्स के तौर पर पेश कर दिया था। ये एहतिजाज सिर्फ उसका ज़ाती रद्द-ए-अमल ना था बल्कि एक अह्द के ख़िलाफ़ ख़ामोश इन्क़िलाब था।
        ऐसे ही पस-ए-मंज़र में टीपू सुलतान का ये ऐलान कि हर औरत को पर्दे और हया का हक़ हासिल है, ख़ाह वो किसी भी ज़ात, मज़हब या तबक़े से ताल्लुक़ रखती हो, एक अदालती इन्क़िलाब से कम ना था। उनके इस फ़रमान के बाद रियासत-ए-मैसूर में निचली ज़ात की ख़वातीन को वो समाजी तहफ़्फ़ुज़ मिला जिससे वो पहली बार ख़ुद को इन्सान समझने लगें। टीपू सुलतान ने औरतों के लिए तालीमी मवाक़े, विरासत के हुक़ूक़ और मुआशरती वक़ार को क़ानूनी शक्ल दी जो इस दौर में किसी हिंदू या मुस्लमान हुकमरान के यहां आम ना था।
        ये हक़ीक़त है कि उनके दौर में औरत को बापरदा ज़िंदगी, तालीम, और जायदाद में हिस्सा जैसी नेअमतें मिलीं, जो सदियों तक फ़क़त ऊंची ज़ात की ख़वातीन को दस्तयाब थीं। उन्होंने रियास्ती सतह पर उस निज़ाम को चैलेंज किया जो औरत के बदन को भी टैक्स के काबिल समझता था, और औरत के हिजाब को ना सिर्फ मज़हबी बल्कि इन्सानी हक़ क़रार दिया। आज जब हम ख़वातीन के हुक़ूक़ के हवाले से क़ानूनसाज़ी की बात करते हैं, तो टीपू सुलतान जैसे इन्क़िलाबी हुक्मरां की मसाल हमें ये सबक़ देती है कि एक रियासत तभी इन्साफ़ पर क़ायम हो सकती है जब उसमें हर इन्सान, ख़ुसूसन हर औरत, को उसका बुनियादी हक़ हासिल हो।
        उन्होंने तालीम को आम करने और बच्चियों की तालीम पर ज़ोर दिया। उनका मानना था कि किसी क़ौम की तरक़्क़ी उसकी औरतों की तालीम से मशरूत है। उन्होंने मदारिस, लाइब्रेरियां और तर्बीयती इदारे क़ायम किए जहां ख़वातीन भी ज़ेवर-ए-इलम से आरास्ता हो सकें।
        टीपू सुलतान की सबसे ख़ूबसूरत पहचान उनका बैन उल मज़ाहिब इत्तिहाद था। उनका वज़ीर-ए-आज़म पण्डित पूर्णिया एक हिंदू था, जो उनके क़रीब तरीन मुशीरों में शामिल था हालाँकि बाद में उसने ग़द्दारी की। उन्होंने पूरा इख़तियार दे रखा था कि वो रियास्ती उमूर में फ़ैसले कर सके। ये उस दौर की मिसाल है, जब मज़हब, ज़ात, या अक़ीदे की बुनियाद पर तफ़रीक़ ना की जाती थी, बल्कि सलाहीयत को मयार बनाया जाता था।
        आज जब हमारा मुआशरा फ़िर्कावारीयत, ज़ात पात और मज़हबी ताअस्सुब का शिकार है, हमें टीपू सुलतान की तालीमात और तर्ज़-ए-हुक्मरानी की तरफ़ लौटने की ज़रूरत है। उनकी ज़िंदगी हमें सिखाती है कि असल ताक़त तलवार में नहीं, इन्साफ़ में है।
        टीपू सुलतान ने अंग्रेज़ों की गु़लामी क़बूल नहीं की, बल्कि अपनी जान दे दी, मगर कभी सर नहीं झुकाया। उनका वो मशहूर क़ौल आज भी हमारे दिलों में गूँजता है :

    शेर की एक दिन की ज़िंदगी, गीदड़ की सौ साला ज़िंदगी से बेहतर है। 

        आज मुल्क में हालात अफ़सोसनाक हैं। मज़हब और शिनाख़्त की बुनियाद पर इन्सानों के दरमयान तफ़रीक़ बढ़ती जा रही है। कहीं नाम पूछ कर मार दिया जाता है, कहीं मस्जिद में इबादत करने वालों को निशाना बनाया जाता है, और कहीं गाय के नाम पर बे-गुनाहों को सर-ए-बाज़ार पीट-पीट कर मार दिया जाता है, इन्सान का नाम ही ज़िंदगी और मौत के फ़ैसले का पैमाना बन चुका है। तालीमी इदारों, शहरों, और सड़कों के नाम तक बदले जा रहे हैं ताकि तारीख़ का चेहरा मसख़ कर सिर्फ एक मख़सूस नज़रिए को ग़ालिब कर दिया जाए। और ये नाम महज इस बुनियाद पर बदले जा रहे हैं कि वो किसी ख़ास मज़हब या शख़्सियत से मंसूब हैं। ये हालात ना सिर्फ जमहूरी इक़दार के मुनाफ़ी हैं बल्कि इन्सानियत के बुनियादी उसूलों से भी टकराते हैं। ये वो दौर है, जहां तास्सुब ने इन्साफ़ को दबा दिया है, और नफ़रत ने भाईचारे की जगह ले ली है।
        ऐसे माहौल में टीपू सुलतान का अदल-ओ-इन्साफ़ और मज़हबी हम-आहंगी पर मबनी तर्ज़-ए-हुकूमत एक रोशन मिसाल बन कर सामने आता है। उन्होंने कभी किसी की शिनाख़्त, मज़हब या ज़ात को उसकी इज़्ज़त या इन्साफ़ से महरूम करने का ज़रीया नहीं बनाया। 
        दरे अस्ना औरंगज़ेब रहमतुल्लाह अलैह के ख़िलाफ़ जो ज़हर उगला गया और उनकी क़ब्र पर सियासत की गई, वो ना सिर्फ तारीख़ से जहालत का सबूत है बल्कि समाज में नफ़रत के बढ़ते ज़हर का भी पता देती है। एक बाशऊर क़ौम अपने माज़ी को हमेशा याद रखती है, बल्कि इससे सबक़ सीख कर हाल को बेहतर बनाती है। लेकिन आज हमारे बुज़ुर्गों की तौहीन की जा रही है बल्कि फ़िर्कापरस्ती को हथियार बना कर समाज को बांटने की कोशीश की जा रही है। टीपू सुलतान और औरंगज़ेब जैसे किरदार हमें याद दिलाते हैं कि असल क़ियादत वही होती है, जो दीन, अदल और ग़ैरत पर मबनी हो और यही पैग़ाम आज हमें सबसे ज़्यादा दरकार है। 
        शहीद टीपू सुलतान एक ऐसे बादशाह हैं, जो मुल्क की हिफ़ाज़त करते हुए मैदान-ए-जंग में शहीद हुए। 4 मई, यौम शहादत टीपू सुलतान सिर्फ एक तारीख़ी दिन नहीं, बल्कि ये तारीख हमें याद दिलाती है कि हमें भी इन्साफ़, बराबरी, ख़वातीन के हुक़ूक़, तालीम और क़ौमी इत्तिहाद के लिए आवाज़ बुलंद करनी है। एससी, एसटी और दलितों को इन्साफ़ दिलाने के लिए पुरज़ोर आवाज़ बुलंद करना होगी, जो मनुवादी, पूंजीवादी अनासिर बदनाम करने में लगे हुए हैं, उन्हें हर जगह से उखाड़ फेंकना है, यही इस दिन का पैग़ाम है। टीपू सुलतान आज भी ज़िंदा हैं। हमारी सोच में, हमारे उसूलों में और हर उस इन्सान में जो जुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा होता है।

    MW Ansari, IPS (Rtd)
    Bhopal



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