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Wednesday, 13 September 2023

 - सईद खान 
 
Satire, Vyangya
बचपन में मेरी दादी अक्सर मुझे कहानियां सुनाया करती थीं। उनकी कहानी के पात्र ज्यादातर प्रतापी राजा, बहाुदर योद्धा और सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र सरीके लोग हुआ करते थे। दादी कदाचित अपने कुल के चिराग यानि मुझे सर्वगुण संपन्न आदमी बनाना चाहती थी। शायद इसीलिए कहानी सुनाकर बाकायदा वे मुझे नसीहत भी किया करती थीं। वे कहती थीं- ‘वक्त जरूरत पर अगर गधे को भी बाप कहना पड़े तो कोई वांदा नहीं।’ जब जÞरा बड़ा हुआ और पता चला कि गधा तो बेवकूफी की अलामत है, तो दादी की नसीहत मुझे बकवास लगने लगी। लेकिन बाद में जब-जब सरकारी बाबुओं, पुलिस वालों, छुटभैय्ये नेताओं और सहकर्मियों से अपना काम निकलवाने के लिए मुझे उन्हें ‘बाप’ कहना पड़ा, दादी के तजुर्बे के आगे मेरा सिर श्रद्धा से झुकता चला गया और मुझे उनकी नसीहतों में सार नजर आने लगा। 
    दादी कहती थीं- ‘वफादारी कुत्ते से सीखो, चालाकी लोमड़ी से, स्मरण करना तोते से, मेहनत करना च्यूंटी से और लक्ष्य पर झपटना बाज से...।’ आदि-इत्यादि। यानि हर अच्छे कर्म के लिए दादी पशु वर्ग की ही मिसाल दिया करती थीं। उन्होंने कभी आदमी की मिसाल नहीं दीं। कभी ये नहीं कहा कि ईमानदारी खान साहब से सीखो, कर्तव्यबोध तिवारी जी से, वक्त की पाबंदी वर्मा जी से और सच् बोलना सक्सेना जी से। वगैरह-वगैरह। 
Satire, Vyangya, sayeed khan
दादी ने एक बार मुझे बताया था कि ईश्वर निर्मित सगरे प्राणियों में आदमी को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। मैंने जब उनसे पूछा, कि आदमी को सर्वप्रथम कब, किसने और क्यों सर्वश्रेष्ठ कहा, तो वे बोलीं-‘उन्हें उनकी दादी ने बताया था कि आदमी को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है।’ किब, कसने और क्यों कहा, इसका वे कोई जवाब नहीं दे सकीं। वे यह भी नहीं बता सकीं कि आदमी को सर्वश्रेष्ठ कहे जाने का आधार क्या था।
    दादी द्वारा दी गई इस जानकारी और अच्छे कर्म के लिए उनका पशु वर्ग की मिसाल देना मुझे खटकने लगा था। मैं चक्कर में पड़ गया कि यदि आदमी सगरे प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है, तो उसे नसीहत करने के लिए पशु वर्ग की मिसाल क्यों दी जा रही है। आदमी को आदमी की मिसाल क्यों नहीं दी जाती। क्या आदमी के खाते में ऐसा कोई कर्म नहीं, जिसकी मिसाल दी जा सके। 
    मुझे लगा, आदमी ने मानवता, देश सेवा, भाईचारा और सर्वधर्म समभाव आदि कथित गुणों का खुद को स्वामी मानते हुए खुद ही खुद के सर्वश्रेष्ठ होने पर मुहर लगा दी है। या शायद सर्वश्रेष्ठ होने के निमित्त पशु वर्ग ने कभी कोई दावा ही पेश न किया हो। या दावा पेश किया भी हो, तो उसे खारिज कर दिया गया हो। 
    आदमी के प्रति पशु वर्ग की आक्रामकता को इस संदर्भ से जोड़कर देखा जा सकता है। हो सकता है, प्रतिकार स्वरूप पशु वर्ग आदमी की तथाकथित ‘श्रेष्ठता’ को निराधार साबित करने के लिए नित नए पैंतरे आजमा रहा है। आदमी की आदमियत पर पशुता के बढ़ते प्रभाव के पीछे निश्चित रूप से पशु वर्ग की कोई साजिश हो सकती है- ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह। मासूम बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाना, दूसरों का माल हड़पना, दूसरों को नुकसान पहुंचाने की ताक में रहना, जो है, उससे संतोष करने की बजाए और अधिक की लालसा करना जैसे (अव) गुण पशु वर्ग की विशेषता हो सकते हैं, तथाकथित सर्वश्रेष्ठ प्राणी के कदापि नहीं। लेकिन पशु वर्ग और आदमी के गुण-दोष के तुलनात्मक अध्ययन के आंकड़े तो कुछ और ही कह रहे हैं। 
    बकौल दादी- आदमी अगर सर्वश्रेष्ठ है तो धरती पर स्वर्ग उतर आना चाहिए। लेकिन इसके उलट धरती नरक बनती जा रही है। आदमी, आदमी से डर रहा है। हिंसक पशुओं को तो आदमी ने काबू में कर लिया है लेकिन आदमी, आदमी के वश में नहीं रहा। क्या यह आदमी, धरती पर अवतरित किए जाने के मूल स्वरूप और इसके पीछे ईश्वर की कल्पना वाला आदमी ही है।
    दादी की एक और बात मुझे याद आ रही है। वे कहतीं थीं- ‘आदमजात के कुछ समूह विशेष के नैतिक और चारित्रिक गुणों का जिक्र करते ही, समूह से जुड़े आदमी की आकृति कल्पना पटल पर सहज ही उभर आती है। जैसे ठंडा बोले तो...। वैसे ही, देश सेवक बोले तो...राजनेता, चरित्र निर्माता बोले तो...शिक्षक, रक्षक बोले तो...पुलिस और धरती का भगवान बोले तो...चिकित्सक आदि।’ दादी के बताए इस समूह विशेष से जुड़े किसी आदमी से फिलहाल मेरा सामना नहीं हुआ है। कभी अगर सामना हुआ तो इस पर विस्तार से बात होगी। अलबत्ता एक दूसरे समूह से जुडेÞ आदमियों से मेरा सामना अमूमन रोज ही हो रहा है। यह समूह, प्रतिकार स्वरूप पशु वर्ग द्वारा आजमाए जा रहे पैंतरों और परिणाम स्वरूप आदमी की आदमियत पर पशुता के बढ़ते प्रभाव की मेरी आशंका को और अधिक बल देने वाला है। खीज, झुंझलाहट, क्रोधावेग और कभी-कभी यूं ही भी, आदमी, आदमी को नालायक और बेवकूफ कहने की बजाए ‘गधा कहीं का’, ‘उल्लू का पठ्ठा’ और ‘बैल’ (निर्बुद्धि) आदि कहकर अपनी भड़ास निकाल रहा है। इस समूह से जुड़ा आदमी उपरोक्त विशेषण (?) दो तरह से अभिव्यक्त कर रहा है, डायरेक्ट उच्चारित करके और इनडायरेक्ट यानि सांकेतिक रूप से भी। अब अगर कोई यह कहे कि अब तक किसी ने उसे उपरोक्त विशेषण से नहीं नवाजा है अथवा किसी में ऐसी हिम्मत नहीं है कि वह उसे ‘गधा कहीं का’, ‘उल्लू का पठ्ठा’ और ‘बैल’ आदि कह सके-तो अगली बार जब दस लाख की लागत से बनीं सड़क, जिसकी परतें दो महीनें में ही उधड़ गई है, पर चलते हुए आपकी स्कूटर हिचकोले खाए, धनिया पावडर में घोड़े की लीद जैसा स्वाद आए या रेलवे स्टेशन में वेंडर कड़क चाय बोलकर आपको गर्म पानी थमा दे तो मेरी आशंका और अपनी दशा पर गौर जरूर कर लेना। 
    दादी ने बताया था कि भगवान ने इंसान यानि आदमी को एक बनाकर भेजा है। लेकिन मामला अब सिर्फ आदमी का नहीं, आदमी वर्सेस आदमी हो गया है। एक वो, जो गुंडों द्वारा बहन को तंग किए जाने की शिकायत करने थाने जाते हुए भी डरता है, और एक वो, जो थाने आने वाले हर आदमी को मोटा बकरा समझता है। एक वो, जिसे तपती धूप में चौराहे पर सिर्फ इसलिए खड़ा कर दिया गया है, क्योंकि चौक से मंत्री जी के काफिले को गुजरना है। और एक वो, जो इस रुतबे को हासिल करने के लिए एक वोट की खातिर कभी आपके दरवाजे पर याचक की तरह हाथ जोड़े खड़ा था। एक वो, जो ले-देकर धरती का भगवान बना बैठा है। और एक वो, जो खाली जेब में एंडोस्कोपी, ईसीजी, यूरिन, ब्लड और स्टूल टेस्ट की रिपोर्ट धरे घर लौटते हुए इस उधेड़बुन में खोया रहता है कि साधारण बुखार की ये कौन सी पैथी है। और एक वो, जो ..., स्व-विवेक से इसी तरह आगे बढ़ते जाएं। 
    प्रसंगवश एक दोहा याद आ रहा है- ‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाए, बलिहारी गुरु आपकी...’  अर्थात-कवि कहता है कि ... यानि कवि के अनुसार गुरु (आजकल टीचर) का स्थान सर्वोपरि है। यानि टीचर ने ही आदमी को आदमी बनाया। इसलिए कवि कहता है कि अगर गोविंद और गुरु साथ-साथ खड़े हैं तो पहले गुरु का चरण स्पर्श हो। बाद में गोविंद का। गुरु का पहले इसलिए, क्योंकि आदमी में आदमियत गुरु ही विकसित करता है। अदरवाईज आदमी पशु तुल्य होता। तो इस तरह आदमी संस्कारवान होते-होते महान हुआ फिर सर्वश्रेष्ठ हो गया (इटसेल्फ) और इस दौड़ में वह इतना आगे बढ़ गया है कि सारे संस्कार पीछे छोड़ आया है और सिर्फ सर्वश्रेष्ठ का ठप्पा लगाए घूम रहा है। आज स्थिति यह है कि यदि गुरु किसी गंवार के साथ खड़े हों तो गुरु का पहले तो क्या बाद में भी चरण स्पर्श नहीं किया जाता और गंवार की वंदना पूरी श्रद्धा के साथ की जाती है।


  

आदमी वर्सेस आदमी (व्यंग्य )

 - सईद खान 
 
Satire, Vyangya
बचपन में मेरी दादी अक्सर मुझे कहानियां सुनाया करती थीं। उनकी कहानी के पात्र ज्यादातर प्रतापी राजा, बहाुदर योद्धा और सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र सरीके लोग हुआ करते थे। दादी कदाचित अपने कुल के चिराग यानि मुझे सर्वगुण संपन्न आदमी बनाना चाहती थी। शायद इसीलिए कहानी सुनाकर बाकायदा वे मुझे नसीहत भी किया करती थीं। वे कहती थीं- ‘वक्त जरूरत पर अगर गधे को भी बाप कहना पड़े तो कोई वांदा नहीं।’ जब जÞरा बड़ा हुआ और पता चला कि गधा तो बेवकूफी की अलामत है, तो दादी की नसीहत मुझे बकवास लगने लगी। लेकिन बाद में जब-जब सरकारी बाबुओं, पुलिस वालों, छुटभैय्ये नेताओं और सहकर्मियों से अपना काम निकलवाने के लिए मुझे उन्हें ‘बाप’ कहना पड़ा, दादी के तजुर्बे के आगे मेरा सिर श्रद्धा से झुकता चला गया और मुझे उनकी नसीहतों में सार नजर आने लगा। 
    दादी कहती थीं- ‘वफादारी कुत्ते से सीखो, चालाकी लोमड़ी से, स्मरण करना तोते से, मेहनत करना च्यूंटी से और लक्ष्य पर झपटना बाज से...।’ आदि-इत्यादि। यानि हर अच्छे कर्म के लिए दादी पशु वर्ग की ही मिसाल दिया करती थीं। उन्होंने कभी आदमी की मिसाल नहीं दीं। कभी ये नहीं कहा कि ईमानदारी खान साहब से सीखो, कर्तव्यबोध तिवारी जी से, वक्त की पाबंदी वर्मा जी से और सच् बोलना सक्सेना जी से। वगैरह-वगैरह। 
Satire, Vyangya, sayeed khan
दादी ने एक बार मुझे बताया था कि ईश्वर निर्मित सगरे प्राणियों में आदमी को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। मैंने जब उनसे पूछा, कि आदमी को सर्वप्रथम कब, किसने और क्यों सर्वश्रेष्ठ कहा, तो वे बोलीं-‘उन्हें उनकी दादी ने बताया था कि आदमी को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है।’ किब, कसने और क्यों कहा, इसका वे कोई जवाब नहीं दे सकीं। वे यह भी नहीं बता सकीं कि आदमी को सर्वश्रेष्ठ कहे जाने का आधार क्या था।
    दादी द्वारा दी गई इस जानकारी और अच्छे कर्म के लिए उनका पशु वर्ग की मिसाल देना मुझे खटकने लगा था। मैं चक्कर में पड़ गया कि यदि आदमी सगरे प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है, तो उसे नसीहत करने के लिए पशु वर्ग की मिसाल क्यों दी जा रही है। आदमी को आदमी की मिसाल क्यों नहीं दी जाती। क्या आदमी के खाते में ऐसा कोई कर्म नहीं, जिसकी मिसाल दी जा सके। 
    मुझे लगा, आदमी ने मानवता, देश सेवा, भाईचारा और सर्वधर्म समभाव आदि कथित गुणों का खुद को स्वामी मानते हुए खुद ही खुद के सर्वश्रेष्ठ होने पर मुहर लगा दी है। या शायद सर्वश्रेष्ठ होने के निमित्त पशु वर्ग ने कभी कोई दावा ही पेश न किया हो। या दावा पेश किया भी हो, तो उसे खारिज कर दिया गया हो। 
    आदमी के प्रति पशु वर्ग की आक्रामकता को इस संदर्भ से जोड़कर देखा जा सकता है। हो सकता है, प्रतिकार स्वरूप पशु वर्ग आदमी की तथाकथित ‘श्रेष्ठता’ को निराधार साबित करने के लिए नित नए पैंतरे आजमा रहा है। आदमी की आदमियत पर पशुता के बढ़ते प्रभाव के पीछे निश्चित रूप से पशु वर्ग की कोई साजिश हो सकती है- ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह। मासूम बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाना, दूसरों का माल हड़पना, दूसरों को नुकसान पहुंचाने की ताक में रहना, जो है, उससे संतोष करने की बजाए और अधिक की लालसा करना जैसे (अव) गुण पशु वर्ग की विशेषता हो सकते हैं, तथाकथित सर्वश्रेष्ठ प्राणी के कदापि नहीं। लेकिन पशु वर्ग और आदमी के गुण-दोष के तुलनात्मक अध्ययन के आंकड़े तो कुछ और ही कह रहे हैं। 
    बकौल दादी- आदमी अगर सर्वश्रेष्ठ है तो धरती पर स्वर्ग उतर आना चाहिए। लेकिन इसके उलट धरती नरक बनती जा रही है। आदमी, आदमी से डर रहा है। हिंसक पशुओं को तो आदमी ने काबू में कर लिया है लेकिन आदमी, आदमी के वश में नहीं रहा। क्या यह आदमी, धरती पर अवतरित किए जाने के मूल स्वरूप और इसके पीछे ईश्वर की कल्पना वाला आदमी ही है।
    दादी की एक और बात मुझे याद आ रही है। वे कहतीं थीं- ‘आदमजात के कुछ समूह विशेष के नैतिक और चारित्रिक गुणों का जिक्र करते ही, समूह से जुड़े आदमी की आकृति कल्पना पटल पर सहज ही उभर आती है। जैसे ठंडा बोले तो...। वैसे ही, देश सेवक बोले तो...राजनेता, चरित्र निर्माता बोले तो...शिक्षक, रक्षक बोले तो...पुलिस और धरती का भगवान बोले तो...चिकित्सक आदि।’ दादी के बताए इस समूह विशेष से जुड़े किसी आदमी से फिलहाल मेरा सामना नहीं हुआ है। कभी अगर सामना हुआ तो इस पर विस्तार से बात होगी। अलबत्ता एक दूसरे समूह से जुडेÞ आदमियों से मेरा सामना अमूमन रोज ही हो रहा है। यह समूह, प्रतिकार स्वरूप पशु वर्ग द्वारा आजमाए जा रहे पैंतरों और परिणाम स्वरूप आदमी की आदमियत पर पशुता के बढ़ते प्रभाव की मेरी आशंका को और अधिक बल देने वाला है। खीज, झुंझलाहट, क्रोधावेग और कभी-कभी यूं ही भी, आदमी, आदमी को नालायक और बेवकूफ कहने की बजाए ‘गधा कहीं का’, ‘उल्लू का पठ्ठा’ और ‘बैल’ (निर्बुद्धि) आदि कहकर अपनी भड़ास निकाल रहा है। इस समूह से जुड़ा आदमी उपरोक्त विशेषण (?) दो तरह से अभिव्यक्त कर रहा है, डायरेक्ट उच्चारित करके और इनडायरेक्ट यानि सांकेतिक रूप से भी। अब अगर कोई यह कहे कि अब तक किसी ने उसे उपरोक्त विशेषण से नहीं नवाजा है अथवा किसी में ऐसी हिम्मत नहीं है कि वह उसे ‘गधा कहीं का’, ‘उल्लू का पठ्ठा’ और ‘बैल’ आदि कह सके-तो अगली बार जब दस लाख की लागत से बनीं सड़क, जिसकी परतें दो महीनें में ही उधड़ गई है, पर चलते हुए आपकी स्कूटर हिचकोले खाए, धनिया पावडर में घोड़े की लीद जैसा स्वाद आए या रेलवे स्टेशन में वेंडर कड़क चाय बोलकर आपको गर्म पानी थमा दे तो मेरी आशंका और अपनी दशा पर गौर जरूर कर लेना। 
    दादी ने बताया था कि भगवान ने इंसान यानि आदमी को एक बनाकर भेजा है। लेकिन मामला अब सिर्फ आदमी का नहीं, आदमी वर्सेस आदमी हो गया है। एक वो, जो गुंडों द्वारा बहन को तंग किए जाने की शिकायत करने थाने जाते हुए भी डरता है, और एक वो, जो थाने आने वाले हर आदमी को मोटा बकरा समझता है। एक वो, जिसे तपती धूप में चौराहे पर सिर्फ इसलिए खड़ा कर दिया गया है, क्योंकि चौक से मंत्री जी के काफिले को गुजरना है। और एक वो, जो इस रुतबे को हासिल करने के लिए एक वोट की खातिर कभी आपके दरवाजे पर याचक की तरह हाथ जोड़े खड़ा था। एक वो, जो ले-देकर धरती का भगवान बना बैठा है। और एक वो, जो खाली जेब में एंडोस्कोपी, ईसीजी, यूरिन, ब्लड और स्टूल टेस्ट की रिपोर्ट धरे घर लौटते हुए इस उधेड़बुन में खोया रहता है कि साधारण बुखार की ये कौन सी पैथी है। और एक वो, जो ..., स्व-विवेक से इसी तरह आगे बढ़ते जाएं। 
    प्रसंगवश एक दोहा याद आ रहा है- ‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाए, बलिहारी गुरु आपकी...’  अर्थात-कवि कहता है कि ... यानि कवि के अनुसार गुरु (आजकल टीचर) का स्थान सर्वोपरि है। यानि टीचर ने ही आदमी को आदमी बनाया। इसलिए कवि कहता है कि अगर गोविंद और गुरु साथ-साथ खड़े हैं तो पहले गुरु का चरण स्पर्श हो। बाद में गोविंद का। गुरु का पहले इसलिए, क्योंकि आदमी में आदमियत गुरु ही विकसित करता है। अदरवाईज आदमी पशु तुल्य होता। तो इस तरह आदमी संस्कारवान होते-होते महान हुआ फिर सर्वश्रेष्ठ हो गया (इटसेल्फ) और इस दौड़ में वह इतना आगे बढ़ गया है कि सारे संस्कार पीछे छोड़ आया है और सिर्फ सर्वश्रेष्ठ का ठप्पा लगाए घूम रहा है। आज स्थिति यह है कि यदि गुरु किसी गंवार के साथ खड़े हों तो गुरु का पहले तो क्या बाद में भी चरण स्पर्श नहीं किया जाता और गंवार की वंदना पूरी श्रद्धा के साथ की जाती है।


  

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Wednesday, 6 September 2023

लेख



✒ सईद खान

    इंदिरा मार्केट स्थित सफदर हाशमी चौक में कुछ विशेष अवसरों पर जुटने वाली उस भीड़ के ज्यादातर चेहरे जाने-पहचाने होते हैं। कुछ ही चेहरे राहगीरों के होते हैं, जो आते-जाते भीड़ देखकर उत्सुकतावश खुद उसका हिस्सा बन जाते हैं। भीड़ के बीच सड़क पर दो-तीन शव पड़े हैं। फौजी पोशाक में एक सिक्ख दो युवकों के कांधे का सहारा लेकर लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है। उसी समय एक आतंकवादी सामने आ जाता है और फौजी पर गोलियों की बौछार कर देता है। गोली लगने से फौजी भी सड़क पर गिर पड़ता है। भीड़ ताली बजाती है। कुछ लोग पूरे मंजर को अपने मोबाईल में कैद करने में मशरूफ रहते हैं। थोड़ी देर बाद भीड़ छंट जाती है। जमीन पर पड़े फौजी और युवा अपने कपड़ों से धूल झाड़ते हुए उठ खड़े होते हैं और अपनी राह हो लेते हैं। इसके साथ ही चौक की आमद-ओ-रफ्त भी रूटीन पर आ जाती है। 
    चौक पर यह नजारा हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को देखा जा सकता है। इन दो अवसरों के अलावा देशवासियों को भीतर तक झकझोर देने वाली हर बड़ी घटना के बाद भी सफदर हाशमी चौक पर ऐसे ही भीड़ जुटती है। भीड़ के बीच एक सिक्ख पिता अपने दोनों और कभी-कभी तीनों युवा पुत्रों के साथ इंसानों को इंसानियत का पाठ पढ़ाने का जतन करता है। सिक्ख परिवार की हरकत देख भीड़ कभी हंसती है और कभी अवाक सी हो जाती है। फिर ताली बजाती है और अपनी राह हो लेती है। 
    जमशेदपुर (टाटा) में जन्मे लगभग 65 वर्षीय गुरुदेव सिंह भाठिया को इस बात से कोई सरोकार नहीं कि शहर उनके जज्बात की कितनी कद्र करता है और उनके जज्बात से समाज में कोई बदलाव आ भी रहा है या नहीं। उन्हें तो जैसे नशा है, हर बुरी बात की मुखालफत करने का। एक जुनून सा है, मजहब, मुल्क, हवस और सियासत के नाम पर इंसानियत को शर्मसार करने वालों के मुख पर पड़ा मुखौठा नोंचने का। जिसे वे ‘गीता’ की नसीहत ‘कर्म किए जा..’ की तर्ज पर अंजाम दिए जा रहे हैं। जमशेदपुर से काम की तलाश में 1990 में वे परिवार सहित दुर्ग आ गए थे। यहां के एक करीबी शहर (दल्लीराजहरा) में उनकी एक बहन ब्याही थीं। बहन का सहारा मिला तो वे यहीं के होकर रह गए। कुछ दिनों तक हाथ ठेला लेकर गली-कूचे में घूमकर फैंसी आयटम बेचकर परिवार चलाया करते थे। धंधा चल निकला तो बाद में उन्होंने दुकान खोल ली। किस्मत ने साथ दिया और दुकान चल निकली। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि स्कूली जीवन में रामलीला में अभिनय करने का शौक था। यह पूछे जाने पर कि इस तरह चौक पर हर साल 15 अगस्त, 26 जनवरी और अन्य अवसरों पर नाट्य मंचन करने के पीछे आपका मकसद क्या है, उन्होंने कहा, देश की संस्कृति, गौरव और देशवासियों की वीरता की दास्तां लोगों ने विस्मृÞत कर दी है। जनप्रतिनिधि ही लोकतंत्र पर कुठाराघात कर रहे हैं। फिजा में एक दहशत सी तारी है। किसी को किसी पर भरोसा नहीं रहा। मानवीय मूल्य कहीं गुम होकर रह गए हंै। थोड़ा रुककर अपनी बात उन्होंने इस तरह आगे बढ़ाई-‘वो दौर याद करें, जब लोग चहक कर कहते थे, ‘मेरे घर मेहमान आए हैं।’ अपने लोगों की हालत, उनकी सोच और उनकी मानसिकता देख कर दुख होता है तो पहुंच जाता हूं, सफदर हाशमी चौक, लोगों को यह समझाने की तुम उस देश के वासी हो, जिसमें दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता है। तुम आखिर जा कहां रहे हो?’ 

आपके बच्चे भी आपके साथ होते हैं। 

हां, तीनों बेटे दिलीप, मनप्रीत और गुरमीत। तीनों स्क्रिप्ट लिखने से लेकर मंचन तक मेरे साथ होते हैं। मेरे छह बच्चे हैं। तीन बेटे और तीन बेटियां। सभी की शादी हो गई है। मैं अपने बेटों पर कोई दबाव नहीं बनाता कि उन्हें मेरा साथ देना ही है। आज के बच्चे युवा होते ही अपनी राह खुद चुनते हैं। मुझे इस बात का गुरूर है कि मेरे बच्चे मेरे जज्बात की कद्र करते हैं। 
    उनकी दुकान पर चर्चा के दौरान उनके पुत्र मनप्रीत उर्फ काके और दिलीप उर्फ लाटी ने कहा, दुकान से फुरसत नहीं मिलती। लेकिन पापा का आदेश होता है तो फुरसत निकाल ही लेते हैं, जैसे-तैसे। सब्जेक्ट पर चर्चा के बाद स्क्रिप्ट लिखने का काम मनप्रीत करता है। एक दिन पहले थोड़ा रिहर्सल कर लेते हैं-बस। 
    श्री भाठिया की पत्नी निर्मल कौर के अलावा बेटियां और दामाद भी उनके शौक का पूरा सम्मान और यथा संभव सहयोग करते हैं। नाट्य मंचन के जरिए मोहब्बत का पैगाम देते श्री भाठिया को लंबा अर्सा गुजर गया है। उन्हें नहीं पता कि लोगों को नसीहत करने की उनकी यह कोशिश कब रंग दिखाएगी। देखना यह भी है कि ‘अंधा बांटे रेवड़ी’ की तर्ज पर पुरस्कार बांटने वाले जागरुक लोगों की नजर उन पर कब पड़ती है। 



मेरा पैग़ाम है मोहब्बत...

लेख



✒ सईद खान

    इंदिरा मार्केट स्थित सफदर हाशमी चौक में कुछ विशेष अवसरों पर जुटने वाली उस भीड़ के ज्यादातर चेहरे जाने-पहचाने होते हैं। कुछ ही चेहरे राहगीरों के होते हैं, जो आते-जाते भीड़ देखकर उत्सुकतावश खुद उसका हिस्सा बन जाते हैं। भीड़ के बीच सड़क पर दो-तीन शव पड़े हैं। फौजी पोशाक में एक सिक्ख दो युवकों के कांधे का सहारा लेकर लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है। उसी समय एक आतंकवादी सामने आ जाता है और फौजी पर गोलियों की बौछार कर देता है। गोली लगने से फौजी भी सड़क पर गिर पड़ता है। भीड़ ताली बजाती है। कुछ लोग पूरे मंजर को अपने मोबाईल में कैद करने में मशरूफ रहते हैं। थोड़ी देर बाद भीड़ छंट जाती है। जमीन पर पड़े फौजी और युवा अपने कपड़ों से धूल झाड़ते हुए उठ खड़े होते हैं और अपनी राह हो लेते हैं। इसके साथ ही चौक की आमद-ओ-रफ्त भी रूटीन पर आ जाती है। 
    चौक पर यह नजारा हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को देखा जा सकता है। इन दो अवसरों के अलावा देशवासियों को भीतर तक झकझोर देने वाली हर बड़ी घटना के बाद भी सफदर हाशमी चौक पर ऐसे ही भीड़ जुटती है। भीड़ के बीच एक सिक्ख पिता अपने दोनों और कभी-कभी तीनों युवा पुत्रों के साथ इंसानों को इंसानियत का पाठ पढ़ाने का जतन करता है। सिक्ख परिवार की हरकत देख भीड़ कभी हंसती है और कभी अवाक सी हो जाती है। फिर ताली बजाती है और अपनी राह हो लेती है। 
    जमशेदपुर (टाटा) में जन्मे लगभग 65 वर्षीय गुरुदेव सिंह भाठिया को इस बात से कोई सरोकार नहीं कि शहर उनके जज्बात की कितनी कद्र करता है और उनके जज्बात से समाज में कोई बदलाव आ भी रहा है या नहीं। उन्हें तो जैसे नशा है, हर बुरी बात की मुखालफत करने का। एक जुनून सा है, मजहब, मुल्क, हवस और सियासत के नाम पर इंसानियत को शर्मसार करने वालों के मुख पर पड़ा मुखौठा नोंचने का। जिसे वे ‘गीता’ की नसीहत ‘कर्म किए जा..’ की तर्ज पर अंजाम दिए जा रहे हैं। जमशेदपुर से काम की तलाश में 1990 में वे परिवार सहित दुर्ग आ गए थे। यहां के एक करीबी शहर (दल्लीराजहरा) में उनकी एक बहन ब्याही थीं। बहन का सहारा मिला तो वे यहीं के होकर रह गए। कुछ दिनों तक हाथ ठेला लेकर गली-कूचे में घूमकर फैंसी आयटम बेचकर परिवार चलाया करते थे। धंधा चल निकला तो बाद में उन्होंने दुकान खोल ली। किस्मत ने साथ दिया और दुकान चल निकली। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि स्कूली जीवन में रामलीला में अभिनय करने का शौक था। यह पूछे जाने पर कि इस तरह चौक पर हर साल 15 अगस्त, 26 जनवरी और अन्य अवसरों पर नाट्य मंचन करने के पीछे आपका मकसद क्या है, उन्होंने कहा, देश की संस्कृति, गौरव और देशवासियों की वीरता की दास्तां लोगों ने विस्मृÞत कर दी है। जनप्रतिनिधि ही लोकतंत्र पर कुठाराघात कर रहे हैं। फिजा में एक दहशत सी तारी है। किसी को किसी पर भरोसा नहीं रहा। मानवीय मूल्य कहीं गुम होकर रह गए हंै। थोड़ा रुककर अपनी बात उन्होंने इस तरह आगे बढ़ाई-‘वो दौर याद करें, जब लोग चहक कर कहते थे, ‘मेरे घर मेहमान आए हैं।’ अपने लोगों की हालत, उनकी सोच और उनकी मानसिकता देख कर दुख होता है तो पहुंच जाता हूं, सफदर हाशमी चौक, लोगों को यह समझाने की तुम उस देश के वासी हो, जिसमें दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता है। तुम आखिर जा कहां रहे हो?’ 

आपके बच्चे भी आपके साथ होते हैं। 

हां, तीनों बेटे दिलीप, मनप्रीत और गुरमीत। तीनों स्क्रिप्ट लिखने से लेकर मंचन तक मेरे साथ होते हैं। मेरे छह बच्चे हैं। तीन बेटे और तीन बेटियां। सभी की शादी हो गई है। मैं अपने बेटों पर कोई दबाव नहीं बनाता कि उन्हें मेरा साथ देना ही है। आज के बच्चे युवा होते ही अपनी राह खुद चुनते हैं। मुझे इस बात का गुरूर है कि मेरे बच्चे मेरे जज्बात की कद्र करते हैं। 
    उनकी दुकान पर चर्चा के दौरान उनके पुत्र मनप्रीत उर्फ काके और दिलीप उर्फ लाटी ने कहा, दुकान से फुरसत नहीं मिलती। लेकिन पापा का आदेश होता है तो फुरसत निकाल ही लेते हैं, जैसे-तैसे। सब्जेक्ट पर चर्चा के बाद स्क्रिप्ट लिखने का काम मनप्रीत करता है। एक दिन पहले थोड़ा रिहर्सल कर लेते हैं-बस। 
    श्री भाठिया की पत्नी निर्मल कौर के अलावा बेटियां और दामाद भी उनके शौक का पूरा सम्मान और यथा संभव सहयोग करते हैं। नाट्य मंचन के जरिए मोहब्बत का पैगाम देते श्री भाठिया को लंबा अर्सा गुजर गया है। उन्हें नहीं पता कि लोगों को नसीहत करने की उनकी यह कोशिश कब रंग दिखाएगी। देखना यह भी है कि ‘अंधा बांटे रेवड़ी’ की तर्ज पर पुरस्कार बांटने वाले जागरुक लोगों की नजर उन पर कब पड़ती है। 



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